Friday, March 13, 2026
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कवितायेँ _ कल्पना पाण्डेय

1)कुम्भ…..
स्त्री ….
शीश के दो पाटों के बीच से निकलती हुई लाल
नैनों में पहुंचते ही पारदर्शी
फिर आँचल में सफ़ेद होकर
भुजाओं और उंगलियों में उतरकर गहरी नीली
अंत में….
 बची हुई देह में
 फिर रक्तवर्णा होती हुई गहरी नदी है।
स्त्री गंगा है क्या ?
या देह नामक स्थल
शायद कुम्भ है …….हर मायने का
2) गाढ़ा दुःख….
वो चाहे हमेशा से एक चिड़िया थी पर उसका एक मदारी था।
था तो था….
3)सफेद तितलियाँ … नीला प्रेम
प्रेम में पड़ी औरतें ……
खुले बंद केशों में
आधी मूंदी आँखों वाली
 चिपके सिले अधर लिए
टूटी फूटी लकीरों से
सूखी गहरी बिवाइ पड़ी
एक अधूरी
अनसुनी मौन प्रार्थना भर हैं जिसमें….
 दिशा
 देश
 दूरी
 देव
 दायरा
 देह
 सब नाम भर के शब्द हैं।
 गिरवी रखी सफ़ेद तितलियां हों जैसे…..
 पंखों में गीला नीला प्रेम पोते हुए
4)दरख़्त…
पुरुष होने का अर्थ है एक ऐसा सदाबहार दरख़्त हो जाना जिस पर स्त्री ……
बेल की तरह लिपट सके
फूल की तरह महक सके।
 कली की तरह बढ़ सके ।
 पत्तियों की तरह फैल सके ।
 फल की तरह लद सके।
 शाखा की तरह जुड़ सके
 और
 जड़ की तरह दब सके।
कल्पना पांडेय
2503 दिव्यांश प्रथम
गाज़ियाबाद
9899809960
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