कवि – रश्मि बजाज, पृष्ठ-108, प्रकाशक – अयन प्रकाशन, देहली,

 

कविता संग्रह - जुर्रत ख़्वाब देखने की (2018) - रश्मि बजाज। 5समीक्षक – डॉ अमृतलाल मदान

 

*अशेष संभावनाएं कवि की, कविता की…*

युवा कवयित्री रश्मि बजाज का सद्य प्रकाशित पाँचवां काव्य-संकलन “जुर्रत ख़्वाब  देखने की “अपनी क़िस्म का एक अनूठा संग्रह है।एक दुधारी तलवार की भांति यह संग्रह गहरे व्यंग्य-व्रण एवं गम्भीर विचार-घाव देता प्रतीत होता है।इस काव्य-यात्रा पर निकले पाठक को दो प्रकार की धाराओं के बीच बहते जाने की विचित्र अनुभूति भी होती है।एक रागमय अजस्र ,अजेय जीवन की धारा और दूसरी सामाजिक,सांस्कृतिक विसंगतियों को उलीचती धारमय धारा जिसमें अंगार एवं चिंगारियां हैं।प्रथमतया, प्रस्तुत संग्रह का शीर्षक ही चौंकाने वाला है।ख़्वाब देखना मनुष्य की एक सहज नैसर्गिक प्रक्रिया है,किन्तु जब इन्हें देखने के लिये जुर्रत जुटाने की बात होने लगे तो समसामयिक परिवेश एवं परिस्थितियों की  विकटता प्रखरता से इंगित होने लगती है।इस ‘नींद उड़ा देने वाले विस्फोटक और विकराल समय’ में  आशावादी ख़्वाब देखना सच ही एक ‘जुर्रत’, ‘बगावत’ है और कविता करना एक ‘उन्मादी’ कर्म जिसके प्रति इस कवयित्री ने अपनी कटिबद्धता प्रस्तुत की है।उसका यह काव्य-समर्पण कवि के कविता-कर्म,साहस,संघर्ष और सौंदर्य-दृष्टि को स्थापित करने के लिए भी है।

कविता संग्रह - जुर्रत ख़्वाब देखने की (2018) - रश्मि बजाज। 6संग्रह की कवितायें चार प्रभागों में विभाजित हैं – प्रथम खंड ‘कोई उन्मादी लिखता कविता’ में कवि-कलम का उन्माद,आक्रोश बड़ी शिद्दत से अभिव्यक्ति पाते हैं और इस अभिव्यक्ति में पैने व्यंग्य एवं तीक्ष्ण शब्दबाण उसके अस्त्र-शस्त्र बन जाते हैं।यह हमारे समय की विडंबना है कि गम्भीर सत्य और मारक व्यंग्य पर्याय बन चले हैं:”व्यष्टि ,समष्टि सब/ लगें निस्सार/पैगम्बर/बौने,बेकार…”और “होली हो जाती है /एक खूनी रंगरेली/दीवाली मनहूस आग/सब फूंकने वाली… भासता है इतिहास/एक रिसता सा घाव…देश,देशभक्ति /एक एब्सर्ड थिएटर…तन-मन से झरती है रेत…हो जाती है क़लम/कंटकी एक दरांती”-‘निःशेष ‘नामक कविता से लिए ये उद्धरण कितना उद्वेलित करते हैं।कवयित्री आने वाले समय में काव्य-कर्म के समक्ष आने वाले खतरों से खबरदार करती है और ये भी इंगित करती है कि ये खतरे राजनीतिक छलावों से भरे होंगे:”मठाधीश और पंथ-प्रवर्तक/कर डालेंगे /निर्ममता से क़त्ल/तेरे निर्भीक पृष्ठ पर /लिखा हरेक/दुःसाहसी आख़र!”कवयित्री पूरी जुर्रत से’रिस्क’ ले कर  सिर्फ अपनी सच्चाई के संग खड़ी होती है और चुनौती देती है:”तुम चाहो तो/कर सकते हो/घोषित मुझको/इक तनखैय्या/लगा के मुझ पर ठप्पा /इस उस मठ का/और इस उस खेमे का” । किसी भी प्रकार के दुराग्रहों से दूर उसका अपना अलग ‘एजेंडा’है और वो दो-टूक घोषणा करती है:”आग उगलना/और कर देना/स्वाह सभी संभावनाएं/मानवता की और मानव की/यह सब मुझसे/कभी न होगा!”

एक श्रेष्ठ ,परिपक्व एवं सजग कवि नैराश्य -आशा ,सुख-दुःख, अवसाद-उल्लास में एक संतुलन बिठा कर भी चलता है।रश्मि में भी संतुलन की यह दृष्टि -सम्पन्नता दृष्टिगोचर होती है जब अपनी व्यंग्योक्ति की उन्मादी कविताओं में वह आशा एवं प्रेम के सकारात्मक संबोधन व स्वर भी मुखरित करने लगती है।यथा :

“तोड़ कब्र का/हर मुर्दा पत्थर /मैं फिर उग आऊंगा/खिलूँगा/खिलखिलाऊंगा…”

“साधक और कवि/खोज लाते हैं नए ब्रह्माण्ड”

“इन्हीं पलों में/ बुद्ध हो उठते हैं फिर जीवित”

“बार-बार लौट आते हैं हमें संभालने /हमारे सूफी!”

“बैठ नाव लहरों की /किनारे आ उतरती हैं जलपरियां”

संग्रह के अगले लघु-खंड “रहेंगे ज़िंदा” में कवयित्री ने विभिन्न  क्षेत्रों  की तीन विभूतियों का काव्यात्मक चारु अनुभूतियों से स्मरण किया है-अमृता प्रीतम,बाबा अम्बेडकर एवं अब्दुल कलाम । अमृता को रश्मि ने “जीवन को/ कविता करने की/जुर्रत करती”बताया है तो अम्बेडकर को चिराग रूप में वर्णित करते हुआ लिखा है “तेल उसमे नहीं/जलता था लहू/उसकी लौ तेज़ और तेज़ हुई”, अब्दुल कलाम की स्मृति में रचित ‘संभावना’ कविता में व्यंग्य का पुट द्रष्टव्य है-”उलझे थे जब /यूँ ही हम सब/’म’ से मंदिर /’म’ से मस्जिद के बेमानी झगड़ों में/तब लिख दी उसने आसमान पर नई इबारत”!/ ‘म’ से ‘मिसा(इ)लमैन,’म’से मानवता ”।मानव और मानवता की महान संभावनाओं को व्यक्त करते ये तीनों  व्यक्तित्व रश्मि के लिए स्तुत्य हैं।

कवयित्री की दुधारी तलवार की मार संग्रह के अगले खंड “ये वक्त नहीं है थमने का”में भी दृष्टिगोचर होती है।’सहस्रनेत्रिणी’ कवयित्री’सहस्रमुखी क्रांति’ का स्वप्न देखती है,उसका ‘फैसला’ है :”नहीं कहना अब/वामन को विराट/ज़र्रे को सूरज/ज़ुल्मी को सम्राट”,वह सत्ताधारियों को चेताती है-“सुनो सूत्रधार,बाग़ी कुर्सियां/जा पहुचेंगी/सेंटर-स्टेज”।उसका संघर्ष जारी है और वह सब परिवर्तनकामीजन का आह्वान करती है :”ये वक्त न तेरे थमने का/बाकी है अभी असली जिहाद/आदम को इंसां करने का!”

अपनी ‘फेम-ह्यूमनिस्ट ‘कविताओं के लिए सुविख्यात  रश्मि बजाज ने संकलन के अंतिम खंड की कविताओं को “मैं हूँ स्त्री”का उपशीर्षक दिया है और ये कविताएं भी प्रचलित परिपाटी से हट कर हैं।इनमें विशेषतौर पर ध्यातव्य हैं’-सोचती हूं वाल्ट- विटमेन'(अमेरिकी कवि के स्वयं में विरोधाभासी -अनेक अनुभवों के रूप में स्त्री होने की अनुभूति),’शाश्वतदलिता'(भाग्य मेरा पर/ नहीं बदलता/मैं हूँ स्त्री-शाश्वतदलिता),’फ़कत क़िस्सा'(नहीं औरत क्या तेरे इस जहान का हिस्सा/या फिर ये इंकलाब तेरा है फ़कत किस्सा?) ,’मनु की स्मृति'(मनुबीज है रक्तबीज)और अंतिम अद्भुत कविता ‘पुत्री जनक की’जिसमें जानकी -एक पश्चातापिनी पुत्री के तौर पर घोषणा करती है:अब इस भू पर  आऊंगी मैं/बन कर इक अवलम्बन-शक्ति /अपनी माँ अपने बाबा की”।मिथकों,दर्शनों,महाख्यानों ,महापुरुषों ,समाज,संस्कृति को स्त्री-संदर्भ में यक्षिणी-प्रश्नों’ के कटघरे में खड़ा करतीं एवं नये समतामूलक ढांचे की परिकल्पना प्रस्तुत करतीं ये कविताएं समकालीन  हिंदी कविता के स्त्रीवादी स्वर को मजबूती प्रदान करती हैं।

संग्रह के कला-पक्ष पर विचार करते हुए कवयित्री की जुर्रत भरी प्रयोगधर्मिता को रेखांकित करना आवश्यक है जो उसने शब्दों के साथ खेलते हुए प्रदर्शित की है।

नए प्रयोग हुए हैं – चायीली, सिग्रेटीय, समोसीय, लोरीली, मिसायलीय, मीडियावीर, महमहाऊंगा, भग्गी भाई, नास्तिके-आज़म (संदर्भ – भगत सिंह), छगनवा, छगन सेठ आदि चौकाने वाले पद-समूहों का सुघड़ उपयोग। भाषा यहां कथ्य की सहज अनुगामिनी है, भाव-विचारानुकूल शब्द-चयन एवं शब्द-प्रवाह  ने कविताओं को प्रखर भाषा-शक्ति प्रदान की है।

संग्रह की अन्य विशिष्टता है इसकी अनेक सारगर्भित उद्धरणीय, चिरस्मरणीय काव्य-पंक्तियाँ  जो अमूल्य काव्य-धरोहर बन कर उभरी हैं:”नहीं होतीं कभी / निःशेष संभावनाएं/कवि की…कविता की…”, “हमारे मुर्दाघरों में / जिंदा हैं तो सिर्फ यही / दरवेश और सूफ़ी …” “अमृता नहीं थी / सिर्फ कविता / वह है / एक महाकाव्य…”।

ऐसे सशक्त एवं नई सम्भावनाएं खोलने वाले  काव्य-संकलन का हिंदी काव्य-जगत में स्वागत है। “जुर्रत ख़्वाब देखने की” हमारे समय की एक अवश्य-पठनीय काव्यकृति है।

 

डॉ अमृतलाल मदान, 1150 /11, प्रोफ़ेसर कॉलोनी, कैथल,हरियाणा, सम्पर्क-9466239164

 

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