संगीता राजपूत श्यामा की कविता – सजल

एक दूसरे से जलता है क्यो, कोने में मन के दीप जला ले । भीड़ लोभ की खड़ी मुँह पसारे, खोने से पहले दीप जला ले । लक्ष्य भेदने तू चलेगा नया, झाड़ कांटो के डग में मिलेगे । आखों से आलस हटा कर बढ़ो, सोने से पहले दीप जला ले...

डॉ सुशील कुमारी की कविता – राम

राम.... तुम मर्यादा पुरुषोत्तम तुम सत्य, शील और  सौंदर्य की  मूर्ति तुम धर्म तुम आराध्य तुम  सूर्यवंशी तुम  प्रिय पुत्र तुम आज्ञाकारी तुम प्रिय भाई तुम जानकी  प्रिय तुम प्रजा  हितैषी तुम भीलनी  के जूठे बेर खाने  वाले तुम  वन, उपवन, जंगल, नदी, पर्वत दर-दर भटकर अपनी   मृगनयनी को खोजने वाले .. तुम  वैदही वियोगी  'राम' तुम निज ...

विनय बंसल की कविता – बहुत कुछ है इन आँखों में

बहुत कुछ है इन आँखों में, तुमको हम बतलाएँ। बादल, बिजली, इन्द्रधनुष है, हैं घनघोर घटाएँ। इनमें लोरी,गजल, गीत हैं, सरगम है, संगीत। सपने हैं, अपने हैं इनमें, शोला-शबनम, प्रीत। शर्म, हाय आँखों में रहती, आँखे कभी लजातीं। आँखे आँखों से मिल जाएं, सच्ची प्रीति निभातीं। आँखों में है जोश, उदासी, नफरत है, अरु प्यार। रुदन और परिहास...

हूबनाथ की कविताएँ

बापू बुनियादी रूप से हिंसक थे वे सभी जिन्हें पढ़ा रहे थे आप पाठ अहिंसा का जनमजात झुट्ठे थे वे सभी जिन्हें चला रहे थे आप सत्य की राह पर और वे हँस रहे थे आपकी बेवकूफ़ी पर मन ही मन आपके अपरिग्रह के पिछवाड़े वे जुटा रहे थे संपत्ति सात पीढ़ियों के लिए आपकी अजीबोगरीब सनक कइयों को लगा था आदमी अजीब है पर...

डॉ. ममता पंत की कविता – हिजाब : दंभ पितृसत्ता का!

वो करते हैं बात हिजाब की पहले हिसाब तो कीजिए जनाब उन आंखों का जिनकी कुदृष्टि ने लील ली कइयों की अस्मत धकेल दिया जहन्नुम में विवश कर दिया जीने को ज़लालत भरा जीवन जिसे उनकी रूह ठेलती है नित बोझ की भांति अपनी पीठ पर ! हथियार पितृसत्ता का जिसका इस्तेमाल होता रहा सदियों से स्त्रियों के खिलाफ जकड़...

दीपावली विशेष : आशीष मिश्रा की कविता – दीपावली का दीपक

दिवाली के समय गाँव का बाज़ार याद आता है दुकानों पर सजे दीप-माला व हार याद आता है। पापा के साथ जाता था कुम्हार की दुकान पर बड़ी आशा में बैठा होता था वो अपने स्थान पर। बड़ी आशा से वो हमारी प्रतीक्षा करता था बड़ी आशा से वो हमारी ओर देखता था। आशा...