नरेंद्र कौर छाबड़ा की कहानी – मातमपुर्सी

कोठी के हालनुमा कमरे के ठीक मध्य में सफ़ेद चादर से ढंका परिवार के मुखिया का शव पड़ा है.सगे-सम्बन्धियों से घिरा. घर की औरतें छाती पीट-पीटकर रो-रोकर थकने के बाद अब खामोश हैं. पत्नी तो रो-रोकर निढाल-सी पड़ी है.उनका बेटा विदेश में प्रतिष्ठित कंपनी...

कांता रॉय की कहानी – वंशज

गाँव की उबड़खाबड़ सड़क और सरकारी जीप के अलबेले हिचकोले! कभी तो जीप तीस डिग्री दायें झुक जाती तो कभी बाएं| कलेजा मुँह को आ जाता| फिर भी डर के आगे जीत है कि राह पर लल्लनपुर पहुँचने की उमंग बरक़रार थी| जीप के आगे...

मनवीन कौर पाहवा की कहानी : मंजर – 1984

मौसम शांत था। हल्की ठंडी हवा की लहरें दीवारों से टकराकर उन्हें नम करने में जुटी थीं। कच्ची धूप खिड़की से झांक क़र अपनी उपस्तिथि दर्ज क़र रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। कोटा के जाने - माने बैंक के मैनेजर शर्मा जी...

दीपक शर्मा की कहानी – कुंजी

बीती वह पुरानी थी..... लेकिन मोतियाबिंद के मेरे ऑपरेशन के दौरान जब मेरी आँखें अंधकार की निःशेषता में गईं तो उसकी कौंध मेरे समीप चली आई..... अकस्मात्..... मैंने देखा, माँ रो रही हैं, अपने स्वभाव के विरुद्ध..... और गुस्से में लाल, बाबा हॉल की पट्टीदार खिड़की की पट्टी...

पद्मा मिश्रा की कहानी – वो नीली डायरी और अहसास

दीपावली की सफाई करते समय धूल खाती ऊपरी मंजिल की एक अलमारी में मिल गई, मेरी‌ वो नीली डायरी,,,मेरे कालेज के दिनों की डायरी,,जब मैं रोज की घटनाओं को अंकित करती थी,, यहां तक कि सहेलियों से हुए लड़ाई झगड़े भी.. बच्चों की तरह...

पारुल हर्ष बंसल की कहानी – बीता यौवन

पतझड़ होने के कारण समस्त प्रकृति बिन वस्त्रों की प्रतीत हो रही थी, मानो किसी ने उन पुराने आवरणों को नोंचकर अलग कर दिया हो. इन सूखे वृक्षों पर फड़फड़ाते पंछियों के आशियाने भी बिन छत समान घर हो गए थे. अब उनके आपस...