ठहरा हुआ स्वर्णिम सपना

  • रमेश यादव

शैलेश जी जैसे ही बैंक में आए सभी कर्मचारियों ने उनका स्वागत किया और अभिनंदन की बरसात करने लगे। “ हार्टी कांग्रेचुलेशन  सर, एन्ड ऑल दि बेस्ट फॉर फ्यूचर पोस्टिंग ” कहते हुए जेनी ने उन्हें एक प्यारा–सा हग देते हुए गले से लगा लिया।

जेनी शाखा की वरिष्ठ अधिकारी है और उसकी पूरी क्षमता है कि वह किसी भी शाखा की प्रबंधक बन सकें। मगर इंटर स्टेट तबादले के खौफ़ के चलते उसने पिछले दस वर्षों से प्रमोशन टेस्ट नहीं दिया था। शैलेश जी से उसे विशेष लगाव था, दोनों एक दूसरे के अच्छे मित्र थे। सहकर्मियों के इस प्यार और अपनत्व को स्वीकार करते हुए शैलेश जी ने भी सभी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। खुशी के मारे उनकी आँखें छलक गईं। चायवाला आया और सभी को चाय देकर चला गया।

बैंक के काम-काज का समय हो रहा था। लोग चाय की चुस्कियों के साथ अपनी-अपनी टेबल पर आसीन हो गए। जैसे ही दरबान ने मुख्य फाटक खोला बाहर खड़े कस्टमर अपने- अपने काम निपटाने के लिए अलग-अलग काउंटरों पर बिखर गए। कुछ पैसे निकालने आए थे, कुछ भरने, कुछ डीडी बनवाने, कुछ लोग ‘आरटीजीएस’ या ‘एनईफटी’ करने आए थे। कई बुजुर्ग भी इस रेले में शामिल थे जो अपनी पेंशन निकालने के लिए आए थे। कुछ लोग जल्दबाजी में थे, तो कुछ इत्मीनान से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।

शैलेश जी ने अपनी डायरी खोली और पहले पन्ने पर लिखी तारीख पर उनकी नजर टिक गई। बतौर अधिकारी इस शाखा में उन्हें तीन साल हो गए थे। अब प्रबंधक के रूप में उनकी पदोन्नति हो गई थी। कल देर शाम को ही पदोन्नति की लिस्ट मेल पर आ गई थी, मगर तब तक सारे कर्मचारी जा चुके थे, अत: आज सबेरे लोगों ने उन्हें बधाइयां दी। शैलेश जी के लिए यह खुशी का दिन था। बैग से कैश वाल्ट की चाबी निकाली और वॉल्ट की ओर बढ़ गए। बत्तीस साल के नौजवान मॅनेजर मनोज कुमार ने उन्हें बधाई दी और अपनी चाबी वॉल्ट को लगाई। शैलेश जी ने अपनी चाबी लगाई और “ खबर तो प्यारी है, पर अब तबादले को लेकर चिंता बढ़ गई है। पचपन की उम्र में महाराष्ट्र से बाहर जाना मेरे लिए शायद संभव नहीं होगा। रूरल पोस्टिंग के लिए तो बिल्कुल तैयार नहीं हूँ, वैसे भी तीन साल बाद रिटायर्ड हो रहा हूँ, अब बाहर जाकर क्या करूंगा ?”

“ हां मगर ये अपने बस में कहाँ है ! हम अधिकारियों का तो आल इंडिया परमिट होता है, किसी भी कोने में भेज दिया जाएगा। मेरी तकदीर अच्छी थी कि दूसरी पोस्टिंग मुंबई में मिल गई।” कैश बाहर निकालकर दोनों अपने–अपने टेबल की ओर मुड़ गए यह सोचते हुए कि – हम तो खूंटे से बंधी गइया हैं, हाँकों जिधर हँक जाएंगे साहब !

दुविधा और अशांत मन से शैलेश जी अपने काम में जुट गए। मन के एक कोने में हर्ष की फूहार थी तो दूसरे में पीड़ा की रिसाव थी। सिर्फ दो प्रमोशन पाने में पूरे पैंतीस साल लग गए जबकि अब इस नए दौर में युवाओं की भरती सीधे प्रोबेशनरी ऑफिसर या मॅनेजर के रूप में हो रही है। मन भले अशांत था, पर तन काम में लगा हुआ था। ग्राहकों को टोकन देकर कैश चेक और कैश रिसीप्ट (जमा) की स्लिप पास कर रहे थे। साथ ही साथ चेक रिटर्न, चेक बुक भी जारी कर रहे थे। एटीएम मशीन, एटीएम कार्ड की भी जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। रोज सबेरे कैश निकालना, शाम को कैश टैली करके तिजोरी में रखना, कैश की पोजीशन मेंटेन करना, ग्राहकों को बैंक की नई योजनाओं की जानकारी देना, तिजोरी ( वॉल्ट ) की चाबी संभालना ( इस महान जिम्मेदारी के बदले बैंक से कोई आर्थिक लाभ नहीं ! बल्कि इसे सँभालने का मानसिक तनाव अधिक था )। मेन कैशियर नहीं आया था इसलिए कैश जमा करनेवाला कैशियर भुगतान भी कर   रहा था। फोन की घंटी बजी, “ सर, पत्नी की तबियत खराब है इसलिए दो-तीन दिन बैंक नहीं आऊंगा। ”

मेन कैशियर नहीं आ रहा है इसकी सूचना मॅनेजर को देकर वे दोनों किसी अन्य ऑपरेटर को कैश में बैठाने के लिए माथापच्ची करने लगे, जो किसी छोटी-मोटी जंग से कम ना थी ! घंटे भर की ये माथापच्ची सप्ताह में एक-दो बार तो आम बात थी। कैश में बैठने के लिए कोई सहजता से राजी नहीं होता था, क्योंकि एक–दो दिन के लिए कौन मानसिक पीड़ा मोल लेगा ! वैसे भी इस काम के लिए बैंक द्वारा बड़ा ही मामूली भत्ता मिलता है, जिसके चलते लगभग हर कर्मचारी इस जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है। जब तक नया कैशियर तैनात नहीं हो जाता, तब तक कस्टमर के ताने बोनस में अलग से झेलते हुए शैलेश जी मुस्कुराते रहते थे…। ‘खता कोई और करे, सजा कोई और भुगते’ वाली कहावत थी। लगभग तीन सौ ग्राहकों से निबटना, उनके प्रश्नों के जवाब देना, बीसियों  बार साहब का इंटरकॉम और ग्राहकों के फोन अटैंड करना, गाहे-बगाहे ट्रांसफर स्लिप, एनईफटी स्लिप पास करना, के.वाय.सी. जांच करना इत्यादि की जिम्मेदारियों को निभाते हुए वे अपने आपको किसी सुपरमैन से कम नहीं आंकते थे। हर अनुभाग के अधिकारियों की लगभग यही स्थिति थी।

“ प्रॉफिटबिलिटी ( मुनाफा ) को बढ़ाने के चक्कर में बैंक द्वारा कर्मचारियों की संख्या में की गई कटौती का यह नतीजा है। हर बैंक से औसतन प्रत्येक महीने लगभग तीन से चार सौ कर्मचारी रिटायर्ड होते हैं, बदले में भरती नहीं के बराबर होती है…. ! बैंक की नौकरी मतलब आग से खेलना। नज़र चूकते ही खतरे की संभावनाएं बढ़ जाती है…जोखिम भरा काम…। गलती का खामियाजा तुरंत भुगतना पड़ता है। धोखाधड़ी और जालसाजी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। अब तो साइबर क्राइम के नए- नए तरीके जालसाजों द्वारा अपनाए जा रहे हैं। हर बैंककर्मी आज तनाव भरी ज़िंदगी जीने को मजबूर है। बावजूद इसके समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है। काम कितना बढ़ गया है साहब ! ऊपर से ये कम्प्यूटर भी परेशान करता है।” दो दिन के लिए आया नया कैशियर भुन-भुना रहा था। शैलेश जी बस हां में हां मिलाये रहे थे, आखिर वे भी तो भुक्तभोगी थे।

किसी दौर में इस तीन मंजिलों वाली शाखा में अस्सी कर्मचारी काम करते थे आज एक मंजिल पर आ टिकी इस शाखा में सिर्फ पच्चीस कर्मचारी रह गए हैं। उनमें से भी औसतन रोज चार- पांच लोग छुट्टी पर होते हैं। खैर ! नौकरी का दूसरा नाम मज़बूरी भी तो है। मज़बूरी से किया गया काम कितना सुकून भरा हो सकता है इसका अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है ! शैलेश जी मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहे थे- प्रभु पहला प्रमोशन भी तबादले के चलते देर से लिया। दूसरा प्रमोशन समय पर हो गया है, पर पोस्टिंग कहाँ होगी पता नहीं ! महाराष्ट्र में होगी तो ठीक है, वरना ये प्रमोशन लेकर मैं क्या हासिल करूंगा ! सिर्फ नाम के लिए कि बतौर मैनेजर, बैंक से रिटायर हुआ। सीनियर होने के नाते वेतन में तो कोई खास इज़ाफा नहीं होगा बल्कि जिम्मेदारियां तीन गुनी बढ़ जाएंगी। जिम्मेदारियों से तो मैं भागना नहीं चाहता पर दूसरे स्टेट में तबादले की तमाम परेशानियों को कैसे झेलूँगा ? जवानी के दिन होते तो झेल भी लेता ! मगर तब प्रमोशन इतना आसान नहीं था। अपने शहर में रहूँगा तो बैंक का बिजनेस बढ़ाने के लिए बहुत कुछ कर पाऊंगा। मगर बैंक प्रबंधन सब कुछ जानते हुए भी इस मर्ज को ना जाने क्यों बनाए रखना चाहती है ! समय के साथ-साथ अब इस सोच में भी बदलाव होना चाहिए। तीन साल की नौकरी बची है प्रभु किसी तरह पूरी कर लूँ यही काफी है। स्टाफ शॉर्टेज और टारगेट के चलते बैंक में मैनेजर की नौकरी आज किसी गुलामी से कम नहीं है।

खैर किसी तरह बिजनेस का समय खत्म हुआ। शाम की चाय-पार्टी आज शैलेश जी के नाम थी। काम के साथ बात करते हुए लोग अपना-अपना मन हल्का कर रहे थे। क्लर्क लोग जल्दी-जल्दी काम निपटाकर घर भागने की तैयारी में लगे थे। ये लोग ट्रांसफर और प्रमोशन की चिंता से मुक्त थे।

तिवारी साहब जो बिहार से बतौर अधिकारी मुंबई पोस्ट हुए थे, कहने लगे “ मुंबई आने की खुशी तो बहुत थी पर यहां की लोकल ट्रेन की नारकीय यात्रा से अब थक गया हूँ। इससे तो अच्छा मैं अपने छोटे से शहर में ज्यादा खुश था। नौकरी मिली तो घर-परिवार की भी उन्नति हुई। यहां तो मैं कुछ बचा ही नहीं पा रहा हूँ। वहां बुजुर्ग माता-पिता परेशान रहते हैं। पटना में था तो गांव भी हो आता था। सुकून भरी ज़िंदगी थी। अब तो सारा समय आने-जाने में ही बीत जाता है।”

मनोरंजन जो ओडिसा से आए थे, कहने लगे, “ सर, अब इस प्रमोशन के बाद सौ-डेढ़ सौ लोग सर्कल से बाहर जाएंगे और उतने ही लोग दूसरे सर्कल से मुंबई आएंगे। ट्रान्स्पोर्टेशन, क़्वार्टर, क़्वार्टरों का रख-रखाव, फर्नीचर, जॉइनिंग पीरियेड, आने-जाने का खर्च, होटल का खर्च, भाषा की परेशानी इत्यादि के बारे में सोचा जाये तो बैंक का कितना नुकसान होता है ! एक ओर प्रॉफिटबिलिटी की बात की जाती है तो दूसरी ओर रूरल, अर्बन, सेमी अर्बन पोस्टिंग पर बैंक फालतू में खर्च करती है। अब इस तरह के नियमों पर गंभीरता से सोचना चाहिए, इससे बैंकों को अधिक लाभ होगा। प्रॉफिटबिलिटी को भी बढ़ाया जा सकता है। इस ट्रांसफर से आखिर हासिल क्या होता है ! जो लोग खुशी से जाना चाहते हों उन्हें जरूर भेंजे पर, मन मारकर सिर्फ मज़बूरी में ट्रांसफर होकर बाहर जाना कहां तक उचित है ! वो दौर अलग था जब अपने शहर से बाहर जाना फख़्रका विषय था। तब परिवार बड़ा होता था, फैमिली को साथ ले जाना संभव था, पर अब बच्चों की पढ़ाई, पत्नी की नौकरी और भाषा की समस्या भी बढ़ गई है।”

रिटेल बैंकिंग की अधिकारी जेनी मैडम ने भी सुर मिलाया, “ हां इस सोच के चलते महिला कर्मचारियों का कितना बड़ा नुकसान होता है। नब्बे फीसदी महिलाएं तो प्रमोशन लेती ही नहीं ! माना कि अब महिला अधिकारियों को बाहर नहीं भेजा जाता पर मॅनेजर होने के बाद बाहर ट्रांसफर हो ही जता है, मगर मैं  ट्रांसफर लेकर महिला-पुरुष कर्मचारियों में भेद-भाव को उचित नहीं मानती। अगर ट्रांसफर इसी शहर में होता तो आज मैं भी किसी शाखा की मैनेजर होती। मैनेजर बनने के बाद बाहर जाना ही पड़ेगा, इससे तो अच्छा है प्रमोशन ना लेना ! फ्रेंड्स आगे बढ़ना किसे अच्छा नहीं लगता ? यह तो मानवी स्वभाव है। जबकि बैंकिंग इंडस्ट्री में महिलाएं बेहतर सेवाएं प्रदान कर सकती हैं, और वे कर भी रहीं हैं। बैंकों से बाहर की दुनिया में भी महिलाओं ने अपनी काबिलियत को सिद्ध किया है।”

महिला फ्रंट की बात को काटते हुए पीछे से पाचपांडे जी भी बोल पड़े,     “ यार अभी भी हम पूरी तरह कम्प्यूटर से यूज़र फ्रेंडली नहीं हो पाए हैं, ट्रांसफर के बाद नया डिपार्टमेंट मिलता है, जिसे सीखने-सिखाने में ही महीनों बीत जाते हैं। काम करते हुए यदि कोई गलती हो जाती है तो चार्जशीट जारी किया जाता है, आर्थिक नुकसान पर अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है ! ऐसा कौन-सी नौकरी में होता है यार ! बस इसी डर के मारे बैंक अधिकारी अपने काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पाते। खैर, जब काम पकड़ में आता है तब तक पुन: ट्रांसफर हो जाता है। युवा उम्र में तो ठीक है पर फोर्टी प्लस, फिफ्टी प्लस में यह कहते हुए भी संकोच होता है कि कम्प्यूटर पर काम सीखना पड़ेगा, जबकि लेजर के ज़माने में हम हर डिपार्ट्मेंट के मास्टर हुआ करते थे। नई तकनीकी का लाभ बहुत है पर वह यूजर फ्रेंडली होना चाहिए। यहां तो रोज का रोना है, कभी सर्वर प्रॉब्लम, तो कभी हैंग की समस्या ! तकनीकी की परेशानी आने पर ‘डीआईटी’ (तकनीकी अनुभाग) को फोन लगाओ तो, वहां जल्दी कोई फोन ही नहीं उठाता…, वही स्टाफ शॉर्टेज का रोना वहां भी है…, कुल मिलाकर सिस्टम के साथ घंटों जूझना पड़ता है, जिसके चलते समय की बरबादी होती है और कस्टमर को परेशानी अलग से होती है…।”

युवा प्रोबेशनरी अधिकारी प्रदीप भी भिड़ गए, “ सर, हम तो यहां होटल के खाने से तंग आ चुके हैं। दिन भर ऑफिस में मर-मर के काम करने के बाद घर जाकर खाना बनाना, कपड़े-बर्तन धोना, साफ-सफाई इत्यादि करना तो किसी काले पानी की सजा से कम नहीं लगती। मगर क्या करें साहब, दिन गिन रहे हैं ! सोचते हैं कब मुक्ति मिले और घर का दाना-पानी नसीब हो। मुंबई आने का शौक एक साल में ही पूरा हो गया। यार नोटबंदी के दौरान तो कई बार ब्रांच में ही सोना पड़ा, बदले में मिला क्या ! बाबाजी का ठुल्लू…।”

“ मगर सर, नोटबंदी के दौर में हम बैंकवालों ने जिस जज़्बे के साथ काम किया वास्तव में वह देश सेवा की एक मिसाल थी। पूरे देश ने हमारे कम को सराहा। मगर हमारे ही कुछ बंधुओं की नासमझी के चलते आज हम सभी की साख मिट्टी में मिल गई है। लोग-बाग तो सभी बैंक कर्मियों को बदनाम करते हैं, यह तो उचित नहीं है। सर, रात के बारह-बारह बजे तक हमने काम किया पर वह हमें बोझ नहीं लगा। बल्कि दूसरे दिन खुशी से पुन: सारे लोग टीम स्पिरिट से काम करते नज़र आए। यह हमारे जीवन में नया अनुभव रहा। काश, इसी तरह रोज लोग टीम स्पिरिट से काम करते तो एक दूसरे का बोझ हम हल्का कर पाते।” विजय जी ने ट्रांसफर के मुद्दे से सबका ध्यान हटाते हुए बैंक कर्मियों के दुखती रग पर हाथ रख दिया था।

“नोटबंदी के दौरान लोगों ने बैंकों के बाहर लंबी-लंबी कतारें देखीं। उनकी परेशानियों से हम भी दो-चार होते रहे। कई लोगों की जाने भी गई। कई लोगों ने सौदेबाजियां भी की। कई जगहों पर तो सुरक्षा के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। गरीब ठेलेवाले, हाथगाड़ियां चलाने वाले और चालू किस्म के लोग पैसों के लालच में कमीशन बेसिस पर व्यापारियों के नोट बदलवाने के लिए सुबह से ही कतार में खड़े होते और एक बैंक से दूसरे बैंक की दौड़ लगाते नजर आए…। अंगुली पर लगी स्याही को तुरंत मिटाने के भी कई उदाहरण हमने देखे। इन जैसे कितने लोगों को हमने पुलिस के हवाले किया, इसके बाद अपने खातों के जरिए भी नोट बदलवाने के धंधे में कई लोग लिप्त रहे।” रमाकांत ने अपनी बात रखी।

“हां भाई, मगर बैंक कर्मियों ने क्या कम पीड़ा भोगी ! कई लोग बीमार पड़ गए। घर-परिवार के जरूरी कामों को छोड़कर देश और बैंक की सेवा में दिन-रात जुटे रहे। अपने मित्रों और परिवार की शादियों में भी लोग शरीक नहीं हो पाए। तिवारी जी के भांजे की सगाई पटना में थी वे नहीं गए। अमोल साहब के पैर में बड़ा- सा फोड़ा हो गया था, बावजूद इसके वे लंगड़ाते हुए अपनी ड्यूटी पर रोज आ रहे थे। वरिष्ठ प्रबंधक होकर भी अरविंद साहब कंधे से कंधा मिलाकर देर रात तक काम करते रहे। अपने पद को भूलकर वे काउंटर पर नोट बदल रहे थे।” शीला मैडम ने भी अपना पक्ष रखा।

“टीवी चैनल की न्यूज के अनुसार अपनी निजी ज़िंदगियों की तमाम परेशानियों को छोड़कर देश भर के बैंककर्मी दिन-रात लोगों की मुश्किलें दूर करते रहे। अहमदाबाद में एक महिला कर्मचारी चित्रा, काम के तनाव के मारे बेहोश होकर गिर गई। नागपुर के एक कैशियर कमल रंगवानी को दिल का दौरा पड़ा और ऑन दि स्पॉट उनकी मौत हो गई। जयपुर की बैंक अधिकारी मनीषा यादव की दादी गुज़र गई थी पर वो अपनी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाई। उसके पापा पूर्व बैंकर थे, तो वे बैंक की जिम्मेदारियों और जवाबदेही को समझते थे, अत: उन्होंने मनीषा को गोरखपुर आने से रोक दिया। रोहतक के एक को-ऑपरेटिव बैंक के मैनेजर राजेश चन्द्र की हार्ट अटैक से मौत हो गई। वे तीन दिनों से बैंक में ही रुके थे। कई लोगों का शुगर बढ़ गया था। छुट्टियां ना मिलने की वजह से लोग अपना इलाज नहीं करवा पा रहे थे।” व्हाट्सएप पर के विडिओ को दिखाते हुए अमीता मैडम भावुक हो गई।

“यार, हमारे यूनियन लीडर दीपक जी लगातार शाखा में अपनी सेवाएं दे रहे थे। लोगों को तसल्ली देकर हौसलाफ़जाई कर रहे थे। मुख्य प्रबंधक लगातार लोगों पर ध्यान देते हुए कर्मियों के साथ बैठकर काउंटर और ग्राहक संभाल रहे थे। नोटों को टैली करने में उन्होंने बड़ी अहम भूमिका निभाई। उस दौरान हमारे कैशियर को तीन बार रुपए शॉर्ट आए और उसे जेब से भरना पड़ा। कुछ गद्दारों के चलते हमारी बदनामी देश भर में हुई। मेहनत तो कई लोगों ने की पर मलाई कुछ खास लोगों ने खाई। सरकार को चाहिए कि इन गद्दारों को पकड़कर लोगों के सामने पेश करे और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दे, तथा हमें बदनामी से मुक्त कराए, तब उन बैंक शहीदों की आत्मा को संतुष्टि मिलेगी।” मनीषा जी तेवर में आ गई। लोगों ने उन्हें शांत किया।

कैशियर को दस हजार रुपए शॉर्ट आ रहे थे, अत: चर्चा खत्म करके कुछ लोग कैश टैली करने के काम में लग गए, शेष अपने काम में जुट गए।

शाम को शैलेश जी जब घर पहुँचे तो परिवार के साथ अपनी प्रमोशन की खुशी को शेयर किया। सभी ने मानो आसमान छू लिया हो। पत्नी सुलेखा ने बड़े प्यार से उनकी आरती उतारी और तिलक किया। उनकी बिटिया रानी भी खुश थी। खुशी के इस मौके का सहारा लेते हुए शैलेश जी ने रानी से पूछा, “बेटे आप हमारी इकलौती संतान हो। नौकरी के सिलसिले में हम दोनों दिनभर बाहर रहते हैं। तुम्हारी परवरिश में जो भी बेहतर हो पाया, उसे करने की हमने पूरी कोशिश की। कुछ दिनों में तुम भी नौकरी करने लग जाओगी, मगर तुम्हारे शादी की चिंता अब हमें सताने लगी है। तुम एक मित्र की तरह बताओ कि हम तुम्हारे लिए दूल्हा ढूँढ़ें या तुमने ढूँढ लिया है ! तुमने इंजीनियरिंग की है, अपना भला-बुरा अच्छी तरह से जानती हो । तुम्हारी खुशी में ही हमारी खुशी है।”

पत्नी सुलेखा ने बिटिया को गोद में भर लिया, “हां बेटे जो है साफ-साफ बता दो। अब ज़माना बदल गया है।”

रानी शरमा गई, “मम्मी, पापा होने के साथ-साथ आप दोनों मेरे अच्छे मेरे मित्र भी हैं, इसे मैं अपने बचपन से ही महसूस करती आ रही हूँ। मैं अपने आपको सबसे खुशनसीब मानती हूँ कि आपकी कोख से मैंने जन्म लिया। आज़ाद पंछी की तरह मैंने अब तक की ज़िंदगी जी है। एक बेटे की तरह आप लोगों ने मुझे पाला है। मेरा कोई अफेयर नहीं है। मित्र तो कई हैं, पर लव मैरिज या इंटरकास्ट मैरिज में मुझे कोई रुचि नहीं है। जिन लोगों ने इस तरह से शादियां की हैं उनकी परेशानियों और सोच को मैं देख चुकी हूँ। मेरे मामा खुद इसके भुक्तभोगी हैं। सो ‘आय एम वेरी मच क्लियर इन दिस मॅटर।’ आप लोग जिससे कहेंगे मैं उससे शादी कर लूंगी। आप दोनों के बीच जितना प्यार, स्नेह, सम्मान है, उसे मैं बचपन से देख रही हूँ, आप दोनों मेरे लिए एक आदर्श हैं।” और वह पापा से लिपट गई।

शैलेश और सुलेखा जी की आँखें छलक गई। बिटिया को चूम लिया। दोनों ने मिलकर तय किया कि दो-तीन दिन दोनों ऑफिस नहीं जाएंगे। भविष्य की योजनाएं बनाएंगे।

दूसरे दिन बड़े सबेरे उठकर शैलेश जी, अपने मित्र सदानंद के घर गए और तिजोरी की चाबी उसे सौंपते हुए बोले “ प्लीज इसे मॅनेजर साहब को दे देना, और बता देना कि तीन दिन हम बैंक नहीं आएंगे।”

अगले तीन दिनों में शैलेश जी और उनकी पत्नी ने कई मुद्दों पर विचार विमर्श किया, संभावनाओं को तलाशा। परिवार के भविष्य के लिए प्राथमिकताओं की सूची बनाई और नए सिरे से जीवन को जीने का प्रयास किया।

आखिर वह दिन भी आया जब शैलेश जी को तबादले का पत्र थमाया गया। उनकी पोस्टिंग जयपुर के किसी रूरल ब्रांच में कर दी गई थी। इस खबर से वे उदास हो गए, पल भर के लिए लगा जैसे उनकी दुनिया ठहर गई हो, मगर एक ज़िगरबाज इंसान की तरह उन्होंने अपने आपको संभाला।

ये वही शैलेश जी थे जो नोटबंदी के दौरान रात बारह बजे से पहले कभी घर नहीं गए। उसके बाद छुट्टीवाले दिन भी बैंक आकर मॅनेजर एवं अन्य चुनिंदा कर्मियों के साथ मिलकर नोटों का मिलान भी किया। बड़े धैर्य के साथ उन्होंने अपने ‘सीएम’ साहब से कहा, “सर उम्र के इस पड़ाव पर रूरल ब्रांच में जाकर मैं भला क्या सीखूंगा और क्या काम करूंगा ! मेरे लिए वहां सब कुछ नया होगा, नए सिरे से जीवन को आरंभ करना होगा। इतने बड़े शहर से किसी गांव-खेड़े में जाकर काम करने की मेरी वो उम्र नहीं रही, ना ही अब शरीर साथ देगा। अब मैं पद और टारगेट के रेस में नहीं दौड़ना चाहता। वहां तो लोग यही कहेंगे ना कि मॅनेजर साहब को काम नहीं आता, भाषा नहीं आती और ना जाने क्या क्या…! पत्नी की तबियत ठीक नहीं रहती है, बेटी की शादी की उम्र हो गई है। मेरे लिए ये जिम्मेदारियां अब अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।” यह कहते हुए उन्होंने अपना रिवर्सन पत्र सीएम साहब को सौंप दिया। साहब भी चौंक गए पर उन्हें अपने वो दिन याद आ गए कि किस तरह से उन्होंने संघर्ष किया, तब आज इस कुर्सी पर बैठे हैं। मगर व्यक्तिगत जीवन में जो नुकसान हुआ उसकी प्रतिपूर्ति यह कुर्सी नहीं कर सकती थी ! उनकी आंखों के सामने बेटी की लाश और उसका सुसाइड नोट तैर गया। उस घटना की याद आते ही उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। टारगेट और प्रमोशन के चक्कर में वे अपने परिवार के साथ न्याय नहीं कर पाए थे और आज इस अनचाही ज़िंदगी को जीने के लिए मज़बूर थे। आज तक वे अपने मानसिक द्वंद्व से उभर नहीं पाए थे। शैलेश जी के फैसले का स्वागत उन्होंने अपनी इन पंक्तियों के साथ किया, “ पूरे की ख़्वाहिश में इंसान बहुत कुछ खोता है, भूल जाता है कि आधा चांद भी बेहद खूबसूरत होता है। ”

रिवर्सन की खबर जैसे ही बाहर आयी पूरी ब्रांच में सन्नाटा छा गया। पलभर में ही उदासी की एक चादर लोगों के चेहरों पर पसर गई। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ दिन पहले की वह हँसती, खेलती, मुबारकबाद वाली शाम आज इस तरह एक अलग रूप में सामने खड़ी हो जाएगी ! आगे बढ़कर जेनी ने शैलेश जी की पीठ सहलाई और बोली, “ कौन पूरी तरह काबिल है, कौन पूरी तरह पूरा….हर एक शख़्स कहीं न कहीं किसी जगह थोड़ा-सा अधूरा है।” शैलेश जी हमेशा की तरह मुस्कुरा रहे थे और लोग एहसास कर रहे थे कि जीवन का एक स्वर्णिम सपना ठहर गया था।

 

ठहरा हुआ स्वर्णिम सपना- कहानी - रमेश यादव 3रमेश यादव.

481/161- विनायक वासुदेव, एन.एम. जोशी मार्ग, चिंचपोकली ( पश्चिम ), मुंबई -400011. फोन – 9820759088.  Email – rameshyadav0910@yahoo.com

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