उस खामोश अँधेरी रात में टिन की चद्दरों पर पानी की बूंदे ऐसे गिर रही थी मानो बम गिर रहे हों। तड़–तड़ की उन तेज आवाजों में कुछ भी सुन पाना मुमकिन नहीं था। किचकिची खाकर बारिश तेज और तेज होती जा रही थी। दरवाजे से उचटकर आने वाला पानी टाट को भिगोते हुए पूरे कमरे में फ़ैल रहा था। खिडकियों से पानी रिस रहा था।

बिजली गुल थी और चारों तरफ अँधेरे में सिर्फ़ वे पल ही रोशन हो पाते थे, जब कडकडाती हुई बिजली चमकती थी। बिजली की कड़कड़ाहट से दिल बैठ जाता। हवा के ठंडे नश्तर चुभोते झौंके उसके बदन को ठिठुरा देते। उसकी हड्डियां सिहर उठती। उसे लग रहा था जैसे वह इस रात जहाज में किसी सफ़र पर हो जहाँ आसपास सिवा पानी के कुछ भी नहीं।

उसके कमरे की टिन की छत अब भी सिर झुकाए बारिश के हथौड़े की मार सहन कर रही थी। वह तेज बारिश होने पर कभी सहज नहीं रह पाता था। रह–रहकर गाँव का घर उसकी स्मृतियों में छाने लगता। गाँव के मकान की याद आते ही वह चिंता में पड़ गया कि क्या वहाँ भी ऐसी ही बारिश हो रही होगी। इतनी ही भयावह।

इस मूसलधार बारिश का सामना वह मिट्टी और खपरैलों का जर्जर मकान कैसे कर सकेगा। उसका दिल जोर–जोर से धड़कने लगता है। कहीं ऐसी बारिश में कुछ हों गया तो… तमाम आशंकाएं और दुश्चिंताएं उसे घेरने लगती है। उसका सिर चकराने लगता है।

उसे लगा जैसे उस कच्चे मकान की मिट्टी और गोबर से बनी दीवारों के पोपड़े बारिश के पानी में भींगकर गीली रोटी की तरह भरभराकर गिर रहे हैं। खपरैलों से चूते पानी ने गोबर से लीपी फर्श पर मटमैले पोखर का आकार ले लिया है। घर का सामान उस पोखर में समाता जा रहा है। पोपडे के साथ अब दीवार से मिट्टी के लौंदे भी गिरने लगे हैं। पोपडे और लौंदे पोखर में समाकर मिट्टी हो रहे हैं। खिड़की और दरवाजे दीवारों से छिटकते जा रहे हैं। दीवारों पर टिकी खजूर के पेड़ के तनों की लंबी–लंबी म्यालें भी जगह छोड़ने लगी है। दीवारों के भरभरा जाने से खिड़की–दरवाजे भी चरमराकर गिर पड़े हैं। अब म्यालें नीचे आ रही हैं और इन म्यालों पर टिकी सांकटियाँ भी खपरैलों के साथ धरती की ओर गिरती आ रही हैं। एक चरमराती-सी आवाज़ के साथ धन्न… की बड़ी आवाज़ के साथ छत और फर्श गड्ड–मड्ड हो चुके हैं। उसे लगा धन्न… की आवाज़ उसके भीतर कहीं से आई है। शायद मकान नहीं वह खुद ही भरभराकर गिर पड़ा है।

घर खंडहर में बदल चुका था। खंडहर पर बारिश जारी थी। पानी और कीचड़ एक में एक हो रहे थे। घर का कुछ सामान खंडहर में दब चुका था तो कुछ खंडहर के बीच से निकल उघड रहा था। सांकटियाँ और म्यालें रात के अँधेरे में कंकाल की तरह डरा रही थी। सबकुछ लगातार भीग रहा था। चारों तरफ पानी ही पानी।

एक बच्चा हौले से अपने घर का दरवाजा ठेलता है और कागज से बनी एक नाव को गली में बहते हुए पानी में छोड़ देता है। कागज की नाव हिचकोले लेते हुए कुछ देर तक जाती है। बच्चे के चेहरे पर ख़ुशी नाच रही है। वह दौड़कर भीतर जाता है। पिता से जिद करते हुए एक और नाव बनवाता है फिर उसे दरवाजे पर ले आता है। उसकी कागज से बनी नाव गली के बहते हुए पानी की लहरों पर गिरती–उठती तैरती है। बच्चा अपनी हाफपैंट में दोनों हाथ डाले दूर तक उसे जाते हुए देखते रहता है। जो आगे जाकर पानी में मिल जाती है और फिर उसकी नजरों से ओझल हो जाती है।

वह अक्सर देखता है कि उसके पिता किताबों में डूबे रहते हैं। किताबों से उनका गहरा जुड़ाव था खाली वक्त में वे लगातार पढ़ते रहते। उसे नहीं मालूम कि पिता इन किताबों में क्या पढ़ते हैं और इन किताबों में क्या लिखा होता है। एक बार उसने पूछा भी था कि क्या आपकी भी परीक्षा होने वाली है, जो आप इतने ध्यान से अपनी किताबें पढ़ते रहते हो। क्या आपकी मेडम ने आपको इतना सारा पढने का होमवर्क दिया है।

पिता ने किताब से नजरें हटाई और हंसते हुए कहने लगे–”हाँ, शायद ऐसा ही कुछ समझ लो। तुम्हारी परीक्षा तो सिर्फ़ स्कूल में तयशुदा समय पर ही होती है लेकिन हमारी परीक्षा तो कहीं भी, कभी भी हो सकती है। पूरी ज़िन्दगी परीक्षाएं तो चलती ही रहती है। लेकिन ये जो किताबें हैं न, ये हमें उन परीक्षाओं के लिए तैयार करती हैं। हमें संघर्ष करना सीखाती हैं।”

कई बार पिता उसे पास बैठा लेते और किताबों में से कुछ पढ़कर सुनाते। उस वक्त उसे कुछ ज़्यादा समझ में तो नहीं आता लेकिन पिता के बाएँ कपाल पर उस नस को वह अपलक देखता रहता जो पढ़ते वक्त खून के तेज–तेज दौड़ने से फडकती रहती, उसे लगता कि ठीक इस वक्त उनका दिल भी इतनी ही तेजी से धडक रहा होगा। वे उसे इनमें से चाँद–सितारों से लेकर गरीब की रोटी तक न जाने क्या–क्या सुनाते रहते। इन दुनिया–जहान की बार्तों में तब उसका मन नहीं लगता, वह थोड़ी देर तक सुनता और फिर बाहर गली में दोस्तों के साथ खेलने निकल पड़ता।

वे उसे कई बार अपने अनुभवों के किस्से सुनाते। उन किस्सों के जरिए वे अपने जीवन के अभावों और उनके संघर्षों की लंबी कहानियाँ सुनाते। उनमें एक अनूठी किस्सागोई थी कि वे जब किस्से सुनाते तो वह सुनता ही रह जाता। वे उसे किसी कहानी की तरह दिलचस्प लगते। किस्से में वे संकटों से घिर जाते, ताकतवर और पैसे वाले लोग उन्हें घेर लेते, वे परेशानी में होते। लगता कि उनकी ज़िन्दगी पर खतरा है लेकिन उनके चेहरे पर सहज मुस्कान बनी रहती गोया वे किसी और की कहानी सुना रहे हों। यह सब सुनाते हुए वे किसी संत की तरह निपट तटस्थ बने रहते। कभी अपनी ही नादानियों पर हंसते तो कभी समाज की व्यवस्थाओं पर उनकी भौंहें टेढ़ी हो जाती। उसे उनके किस्से बड़े अच्छे लगते पर उसके कई सवाल भी होते। वे उसके सवाल के जवाब भी देते पर छोटी उम्र में समझ ही कम हो तो जवाब भी कैसे समझ आते। वह सोचता कि जब बड़ा होगा तब फिर पिता से यह सब पूछेगा और ध्यान से सुनेगा। फिर उन्हें याद रखेगा। हमेशा के लिए. शायद अगली पीढ़ी को सुनाने के लिए.

लेकिन ऐसा कहाँ हो पाया, हम जैसा चाहते हैं, ठीक–ठीक वैसा ही कहाँ हो पाता है कभी। वह जब बड़ा हुआ, उससे पहले पिता चल बसे थे। समझ के आते न आते पिता की पगड़ी उसके सिर आ चुकी थी। तब तक अधूरे किस्सों की तरह ही उसकी समझ भी अधूरी ही थी। उनकी जीवन की कश्ती इतने झीने कागज की रही कि संघर्षों के तेज बहाव में जल्दी ही डूब गई. डूबने से पहले अपनी कश्ती को बचाने की उन्होंने भरपूर कोशिश की। वे लहरों और हवा के खिलाफ थे, फिर भी बिना हार माने पूरी शिद्दत से वे आखरी दम तक लड़ते रहे। यह जीवन की भले ही हार हो पर उनके संघर्षों की जीत ही थी। इस दौर में जब मरने के कुछ दिनों बाद ही लोग अपने परिजनों को याद नहीं रख पाते, वहीँ परिवार ही नहीं वहाँ के लोगों की स्मृतियों और उनके मन में वे आज बीस साल बाद तक जीवित हैं। उन्हें बस्ती के लोग अब भी उतनी ही अपनाइयत से याद करते हैं। उनके जाने के बाद भी संघर्षों के बीज यहाँ–वहां फलते–फूलते रहे।

“अच्छे आदमियों की यहाँ जितनी ज़रूरत होती है, उतनी ही ज़रूरत वहाँ भी होती है बेटा…”-उसके कानों में आज भी उस बूढ़े की बातें गूंजती हैं, वह बूढा जो पिता के गुजर जाने के बाद अपने गाँव से लकड़ी टेकते हुए दो घंटे पैदल चलकर यहाँ तक पंहुचा था। उसकी आँखों में नमी के जलजले थे और गला बार–बार रुंध जाता था। तीन–चार गिलास पानी पीने के बाद ही वह सहज हो सका था। लेकिन पिता के यूँ चले जाने का अफ़सोस अब भी उसके चेहरे पर बना हुआ था।

“बेटा, वह फिर आएँगे… ऐसे लोग कभी पूरी तरह नहीं जाते। वे बार–बार आते हैं और अपने हिस्से की लडाइयां जारी रखते हैं। ये लडाइयां इसीलिए तो लगातार चलती रहती है। तुम्हारे पिता अकेले नहीं थे, हम सब उनके साथ हैं, उनकी लडाई में शामिल हैं। वे हमारे लिए लड़ते रहे। हम इस लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे। हम गाँव के लोग न्याय के लिए उनकी लडाई को अकारथ नहीं होने देंगे। नई पीढ़ी उनके काम को आगे बढ़ाएगी।”–उस बूढ़े की आँखों में अब दृढ निश्चय की चमक थी।

सच में उनका काम आगे बढ़ा भी था। सरकार झुकी थी और उनके उपजाऊ खेत कुछ दिन के लिए ही सही फिलहाल बच गए थे। सरकारी अफसरों ने उन्हें खेतों से बेदखल करने पर अदालती रोक को मान लिया था। उसके पास लगातार खबरें आती रहती लेकिन वह चाहकर भी आगे उनकी इस लड़ाई में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभा सका था। उसे परिवार की जिम्मेदारी निभाने वहाँ से यहाँ शहर में आ जाना पड़ा था।

तभी से वह यहीं का होकर रह गया था। पेट की भट्टी बुझाने के लिए वह कारखाने की भट्टी दह्काते रहता। भट्टी की आंच उसके चेहरे पर भी उभर आती। गाँव के लोग सच कहते हैं खूंखार आदमखोर जानवर की तरह शहर भी यहाँ आने वाले गाँव के लडकों को अपने खूनी पंजों में दबोच लेता है और फिर वे कभी वापस गाँव नहीं लौट पाते। शायद उसके साथ भी यही हुआ था। गाँव के मकान पर ताला ही लटका रह गया और वह यहाँ ही अटक गया है।

कई बार लोगों ने कहा भी कि गाँव का मकान बेचकर शहर में एकाध प्लाट अटका लो। कब तक किराये के घर में रहोगे। आगे–पीछे बसना तो यहीं है। बच्चों को यहीं पढ़ाना है। आए दिन लोग बताते कि शहर आकर बस जाने वाले कई युवक अपने मकान बेच रहे हैं। कोई खेत बेच रहे हैं तो कोई घर का सामान। यह ऐसा ही दौर था। अब अपने मकान या खेतों से किसी का कोई दिली जुड़ाव नहीं था और न ही अगली पीढ़ी के लिए कोई चिंता। नई पीढ़ी के सामने आज की ही चिंता बड़ी होकर बढती जा रही थी। भविष्य पर उनकी कोई नजर नहीं थी। वे सब कुछ बेच देने पर उतारू थे और बाज़ार की बेजान वस्तुओं से अपने घर ठसाठस भर लेना चाहते थे।

लेकिन उसके लिए यह इतना आसान कहाँ था। वह इस मकान को कैसे बेच दे, पिता ने कितनी हाड़तोड़ मेहनत से इसे बनाया था। छोटी-सी आमदनी में ईमानदारी और सादगी से छोटा-सा कच्ची भीतों और खपरैलोंकी छत का मकान बनाना भी कितना मुश्किल था, यह वे ही जान सकते थे। यह मकान तो उसके माँ–पिता के सपनों के सपनों की नींव पर खड़ा हुआ। उन दोनों ने अपनी आशाएं और इच्छाएँ यहीं बुनी। यहीं किसी खूंटी पर उन्होंने अपने हिस्से की निराशाओं, दुखों और बेबसियों की गठरी बाँध रखी होगी। विचारों की सान पर पिता की लड़ाई की धार यहीं तेज हुई और यहीं माँ ने उन्हें लोगों की लड़ाई के लिए भेजकर घर की जिम्मेदारी खुद अपने ऊपर ले ली थी। पिता की लड़ाई भले ही सामने दिखती रही हो, लोगों के सामने आती रही हो लेकिन अभावों और संघर्षों से जूझते घर को चलाना भी उसी बड़ी लडाई का हिस्सा थी, जो माँ अपने गुमनाम मोर्चे पर अकेली लड़ रही थी।

आज भी उस मकान में चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती है, खपरैलों से नीला आसमान झांकता  है, कुण्डी से पानीं उलीचती गिर्रियों की आवाजें गूंजती है, गर्मी की नीरस दोपहरियों में कोयल कूकती है। आँगन में रसीले अमरुद और आम टपकते हैं और देर रात तक ढोलक की थाप पर औरतों के गीत गूंजते हैं। वहाँ अपना घर ही अपना नहीं, पूरे गाँव के घर अपने ही लगते हैं। इसकी गंध उसकी देह गंध है। इसकी मिट्टी से ही उसकी देह बनी है। यहाँ उसे सुकून मिलता है, जैसे माँ के आंचल में।

बारिश फिर तेज हो गई थी। उसने सोचा, बारिश के बाद एक बार वह गाँव ज़रूर जाएगा और वहाँ उस खपरैलों वाले कच्चे मकान की कुछ दुरुस्तगी करवा देगा। इससे पहले भी कई बार वह ऐसा सोचता रहा है,समय की सुइयां टिक–टिक करती सरकती गई और वह नहीं जा सका। इस बार तो वह ज़रूर जाएगा लेकिन इस भयानक बारिश से कुछ बच पाएगा तब न…अचानक उसे लगा कि नहीं कुछ नहीं होगा। ऐसी बारिशें बीते बीस सालों में कितनी बार आई और चली गई. अब तक कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा। उसे लगा कि पिता के पसीने से गूंथे उस मकान का एक खपरैल तक नहीं गिरेगा।

दो महीने बाद जब गाँव जाना हुआ तो सच में उसका विश्वास जीत गया था। दीवारें कुछ बदरंग हुई थी लेकिन खपरैलों वाला वह घर किसी स्मारक की तरह सीना ताने उसके सामने उसी तरह खड़ा था, जैसा वह महीनों पहले छोड़ आया था। उसे लगा कि कुछ है जो हमेशा उसी तरह बना रहता है। कभी भरभराता नहीं है। अनायास उस बूढ़े की बात याद आती है –“बेटा, ये धरती सांप के फन पर नहीं, ऐसे ही लोगों के सत की धुरी पर टिकी है।“

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मनीष वैद्य
11 ए, मुखर्जीनगर, पायनियर चौराहा,
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