Saturday, July 18, 2026
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पद्मा मिश्रा की दो कवितायेँ

पीपल का पेड़,
टीलेके उस पार खड़ा ,
वह पीपल का पेड़, जिसकी पत्तियां
सुबह की रोशनी में,
पारे सी झिलमिलाती हैं,
नितांत अपना सा लगता है,
जिसके सूखे, लरजते पत्तों में,
नजाने कितनी यादें छिपी हैं,
यह पेड़
हमारी आस्था व् विश्वास का प्रतीक ही नहीं,
किसी बूढ़े, ज्ञानी, तपस्वी सा लगता है
.जिसने देखा है,
पीढ़ियों को जवान होते,
टूटते ,बिखरते,
उसने देखा है …
वर्षा की नन्हीं बूंदोंकी बौछार से,
आशा की लोउ जगाती,
नन्ही कोंपलों को जन्म लेते,
और फिर लता बन कर उपरी शाखों से लिपटते हुए
.पंछियों के घरौंदों से झांकती,
जीवन की अंगडाइयां ,
यहीं पर जवान होती हैं.
न जाने कितनी रहस्यमयी अनुभूतियाँ,
पलती हैं इसके दामन में,
इसने देखा है सदियों को ..
पलों में सिमटते हुए,
जिन्दगी के टूटते संबंधों के बीच,
किसी मजबूत सहारे का प्रतीक है,
..पीपल का यह पेड़….
कुछ बात करें
 इस तपती दोपहरी में
हरियाली की बात करें
मन की शीतलता पाने को
सावन की बदली की बात करें,
कुछ कमी नहीं इस मौसम में
बस खनक हरी चूड़ी की हो ,
आओ ,बैठें- गायें मिलकर,
बस  यूँ ही मुलाकात करें .
मन अनुरागी जब हो जाये,
पलकों पर स्वप्न संवरते हों ,
तब इन्द्रधनुष के रंगो में –
मृदु जीवन की शुरुआत करें
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