पुस्तक समीक्षा - सच कुछ और था - सुधा ओम ढींगरा... 5इस सादगी के सदके

– डाॅ0 सीमा शर्मा

कहानी संग्रह – सच कुछ और था
लेखक – सुधा ओम ढींगरा
मूल्य – 250 रूपये
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन, सीहोर (म0प्र0)

सुविख्यात लेखिका सुधा ओम ढींगरा का नवीनतम कहानी संग्रह ‘सच कुछ और था’ पढ़ रही थी, तो उसके अंत में दी गई विद्वानों की प्रतिक्रियाओं को पढ़ना भी स्वाभाविक ही था। इन्हीं के बीच ख्यातिलब्ध लेखिका सूर्यबाला जी की एक टिप्पणी भी सम्मिलित थी, जिसकी एक उक्ति ‘‘इस सादगी के सदके’’ मन को भा गई। सुधा जी की रचनाओं में यह सादगी उनके लेखन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। आपकी कहानी, उपन्यास एवं कविता आदि सभी रचनाओं में यह विशेषता देखने को मिलती है, स्वाभाविक सी बात है समीक्ष्य संग्रह भी इससे अछूता नहीं है। इस संग्रह की कुल ग्यारह कहानियाँ क्रमशः इस प्रकार हैं- ‘अनुगूँज’, ‘उसकी खुशबू’, ‘सच कुछ और था’, ‘पासवर्ड’, ‘तलाश जारी है’, ‘विकल्प’, ‘विष-बीज’, ‘काश ऐसा होता’, ‘क्यों ब्याही परदेश’, ‘और आँसू टपकते रहे’, तथा ‘बेघर सच’।

संग्रह की प्रथम कहानी ‘अनुगूँज’ में लेखिका ने एक ऐसी समस्या को उठाया है, जिससे हम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिचित है। एक विशेष वर्ग की विदेश जाने की चाह इतनी बलवती होती है जिसके लिए वे कुछ भी करने को तत्पर दिखाई देते हैं। उन्हें लगता है कि विदेश में सब कुछ अच्छा और सुखद है जबकि ऐसा होता नहीं क्योंकि हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। अनेक अप्रवासी भारतीयों के साथ ब्याही बेटियों की दुखद कहानियाँ सुनाई देती हैं और पंजाब में तो यह स्थिति कुछ अधिक है। लेकिन फिर भी लोग ‘‘बिना सोचे समझे विदेश के लालच में उसे अजनबी परिवार के हवाले कर देते हैं।’’ यह भी नहीं सोचते कि बेटी का जीवन जिस परिवार से जुड़ा है, उसके बारे में छानबीन कर लें। ‘अनुगूँज’ कहानी की नायिका मनप्रीत न जाने कितनी अभागी बेटियों की प्रतीक बन जाती है। प्रस्तुत संग्रह की नौवीं कहानी ‘क्यों ब्याही परदेश’ को ‘अनुगूँज’ के पूर्व भाग के रूप में भी देखा जा सकता है। जहाँ कहानी की नायिका गुड़िया अपनी माँ को लिखे पत्र के माध्यम से अपने संघर्ष, पीड़ा, उलझन और टकराव को प्रकट करती है। गुड़िया की भावनाओं को प्रस्तुत करती कुछ पंक्तियाँ- ‘‘मेरे लिए तो विशेष अंतर और होड़ दो देशों के परिवेश का है। दो संस्कृतियों के मूल्यों में सामंजस्य का, अजनबी देश और अजनबी लोगों में स्वयं की पहचान और अस्तित्व को बचाए रखने का प्रयत्न है। यहाँ हर मोर्चे पर तैनात नितांत अकेली खड़ी हूँ मैं।’’

‘बेघर सच’ में लेखिका ने एक स्त्री के जीवन और अस्तित्व से जुड़े ‘घर’ के गंभीर प्रश्न को उठाया है क्योंकि आज भी ‘घर’ एक स्त्री के लिए सबसे उलझा हुआ प्रश्न है; जिसे सुलझाने में उसकी न जाने कितनी पीढ़िया निकल गईं किन्तु प्रश्न जस का तस उसके सामने बना हुआ है। ‘और आँसू टपकते रहे..’ एक ऐसी कहानी है जो रेखांकित करती है कि तटस्थता भी गई बार अपराध से कम नहीं होती। ‘काश! ऐसा होता’ एक छोटी सी सकारात्मक कहानी है जो स्त्री और पुरूष के लिए निर्धारित अलग-अलग मानदण्डों का विरोध करती है।

प्रस्तुत संग्रह में ‘अनुगूँज’ और ‘क्यों ब्याही परदेश’ से इतर ‘पासवर्ड’ जैसी कहानी भी है जो दिखाती है कि कई बार अप्रवासी भी भारतीय लोगों के स्वार्थ का शिकार बनते हैं। लेखिका ने यहाँ स्त्री चेतना की आड़ लेकर आने वाली विसंगति की ओर संकेत किया है- ‘‘झण्डा वहाँ उठाया जाए, जहाँ पुरूष अपनी सत्ता का दुरूपयोग करें, जो पुरूष स्वयं ही इस सत्ता के विरूद्ध हो उसे तो इससे दूर रखा जाए।’’

‘उसकी खूशबू’ और विष-बीज’ मनोविश्लेषणात्मक कहानियाँ हैं। दोनों कहानियों में घटित अपराधों के पीछे एक विशेष विकृत मानसिकता दिखाई देती है। दोनों कहानियाँ नितान्त भिन्न है। दोनों के पात्र भी अलग ढंग के हैं। एक स्त्री तो दूसरा पुरूष। अपराध की प्रकृति भी एकदम अलग फिर भी एक स्तर दोनों कहानियों में साम्य दिखने लगता है वह है मनोविज्ञान के स्तर पर।

इस संग्रह की प्रतिनिधि कहानी ‘सच कुछ और था…’ भी मनोवैज्ञानिक ढंग से लिखी कहानी है जो यह रूपायित करती है कि सदैव आँखों देखा और कानों सुना सच नहीं है। सच ऐसा भी हो सकता है जो साधारण रूप से दिखाई न दे। किसी को मारने की क्रिया सामान्य नहीं होती, वह भी किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए। प्रस्तुत कहानी में मारने वाले की मनोदशा और वेदना तथा मरने वाले के व्यवहार का लेखिका ने सूक्ष्म अंकन किया है। ‘सच कुछ और था’ कहानी पत्रकारिता ंमें आई विकृति एवं उथलेपन पर भी चोट करती है। स्व-प्रचार के लिए विवाद उत्पन्न करने की प्रवृत्ति कई बार विकृति की सीमा तक जाती है। हम सभी इस तथ्य से परिचित हैं।

सुधा ओम ढींगरा की कहानियाँ मानवीय संबंधों को हर कोण से देखती हैं। उनकी दृष्टि केवल बाहरी नहीं है वे किसी घटनाक्रम की तहों को परत-दर-परत खोलती चलती हैं। आपकी कहानियों का उद्देश्य मात्र मनोरंजन न होकर ‘शिवेतर क्षतये’ की भावना है तथा उनके यहाँ सकारात्मक जीवन मूल्यों की पक्षधारता है। उनकी सादगी युक्त शैली एवं सहज भाषा पाठक को मोहती है।

 

पुस्तक समीक्षा - सच कुछ और था - सुधा ओम ढींगरा... 6डाॅ0 सीमा शर्मा
एल-235, शास्त्रीनगर,
मेरठ (उ0प्र0), E-mail: sseema561@gmail.com; फोनः 9457034271

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