मेट्रोनामा

  • देवेश चौबे

फुटपाथ पर जहाँ वो तीन ईंटें निकल गयी हैं वहीं पर वो सो जाता रात को….उसी निशान को उसने अपनी मिल्कियत बना रखा था..दिन भर इधर उधर भटकता रहता लेकिन शाम को सूरज ढलते ही अपने ठिकाने पर पहुँच जाता…। लोगों से जो भी मिलता उसको ही खा के सो जाता….ज़मीन बिस्तर थी उसकी …और आसमान चादर। दूसरी तरफ की सड़क के किनारे एक पगली रहती थी…न जाने क्या बड़बड़ाती रहती थी… कभी ज़ोर से हँसती तो कभी रोती रहती…कभी कभी तो उसकी आवाज़ इस तरफ़ के फुटपाथ तक आती..और रात के सन्नाटे में तो साफ़ सुनाई देती…!

वैसे भी दिल्ली जैसे शहर में रात को भी सड़क पर हलचल रहती ही है। एक दिन जब वो पगली रो रही थी तो सड़क के इस तरफ़ से उठकर वो उसके पास जाकर बैठ गया…पगली चुप हो गयी…और उसने सामने से एक पत्थर उठा के इसको मारा….वो भागकर अपनी जगह आ गया…! आज शाम जब वो फुटपाथ पर बैठा था तो एक कार से दो नन्हे हाथ बाहर निकले और उसकी तरफ पानी की एक बॉटल और एक बिस्किट का पैकेट गिरा गए…! अब ये चुपचाप बैठकर बिस्किट खाने लगा….खाते-खाते अचानक से रुक गया..कुछ देर तक कुछ सोचता रहा…और फिर पानी और बिस्किट लेकर पगली की तरफ गया…पगली ने उसको गालियाँ देनी शुरू कीं.. वो फ़िर भी वहीं बैठा रहा..पगली के चुप होते ही उसने बिस्किट और पानी उसके पास रख दिए और चुपचाप आके अपनी जगह पर लेट गया…!

थोड़ी देर बाद उठकर उस तरफ देखा तो पगली बिस्किट खा रही थी…. फिर ये मुस्कुराते हुए सो गया…अगली सुबह पगली वहाँ नहीं थी…शाम तक इंतज़ार करने पर आई…वो जाकर उसके पास बैठ गया…पगली चुप बैठी रही….!

कई दिनों तक ये चलता रहा…अब सड़क के मोड़ पर जो पीपल का पेड़ है ना…शाम को उसके नीचे एक चूल्हा जलता है… पगली रोटी बनाती है…वो दोनों साथ ही खाते हैं…! और हाँ…अब फुटपाथ की वो निकली हुई ईंटें सरकार ने ठीक करा दी हैं….!

मेट्रोनामा - लघुकथा - देवेश चौबे 3

देवेश चौबे

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