वन्दना यादव का स्तंभ ‘मन के दस्तावेज़’ – क्या हार मान ले कलमकार ?

उठाओ अपनी गांडीव सम कलम, और रचना शुरू करो। जीवन सीमित है। सांसें गिनती की हैं, सब तरह के उहापोह से बाहर निकल कर, वो करो जिसे करने का निर्णय लिया था तुमने। लेखन किसी का थोपा हुआ चरित्र नहीं है, जिसे जी रहे...

साहित्य से अछूता क्यों राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार!

आज सिनेमा मनोरंजन के सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है। एक सदी से अधिक लम्बे वक्फे से सिनेमा व उसमें निहित संगीत हमारे जीवन का अभिन्न अंग बना हुआ है। फिर चाहे कोई भी पर्व हो, तीज-त्यौहार हो या फिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक...

डॉ अरुणा अजितसरिया का लेख – मानवीय संबंधों में संपूर्णता की तलाश में बेचैन: मोहन राकेश

जो लोग ज़िंदगी से बहुत कुछ चाहते हैं उनकी तृप्ति अधूरी ही रहती है - इस अधूरेपन की बेचैनी को उपन्यास, कहानी, नाटक आदि विधाओं में संप्रेषणीयता प्रदान करने वाले मोहन राकेश हिंदी साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आधुनिक जीवन के असंतोष और...

डॉ अनुज प्रभात का लेख – खोता हुआ बचपन और उसकी यादें…!

देखा जाए तो शायद ही हम कभी अपने बचपन को याद करते हैं. वक़्त कहां जो बचपन की ओर झांकने की कोशिश भी करें.भाग-दौड़ ने जिंदगी को इतना उलझा दिया है कि सहज जीवन जीना अब सहज नहीं किसी के लिए. ऐसा इसलिए कि...

गोवर्धन दास बिन्नानी “राजा बाबू” का लेख – दसे दशहरा, बीसे दिवाली, छऊवे छठ

दसे दशहरा, बीसे दिवाली, छऊवे छठ  हमारे सनातन समाज में बहुत ही प्रचलित उक्ति है जिससे श्रावण माह पश्चात आने वाले प्रमुख त्यौहारों और उत्सवों के बारे में एक जानकारी मिलती है। क्योंकि श्रावण माह के बाद बाद आश्विन माह में १५ दिनों तक पितृ पूजन वाला कार्यक्रम चलता...

डॉ. आरती स्मित का शोधालेख – गाँधी की दृष्टि में हिंदी की महत्ता

गाँधी को समझने की प्रक्रिया ज़ारी है। गाँधी को समझने के लिए उनका स्वदेशप्रेम समझना ज़रूरी लगा मुझे। उनके स्वदेश प्रेम को समझने के लिए उनके बचपन से गुज़रते हुए, जब युवावस्था की दहलीज़ पर खड़े मोहनदास को इंग्लैंड यात्रा करते और वहाँ की...