लेखक अपने आप को सीमाओं में नहीं बांधता – रामदरश मिश्र

डॉ रामदरश मिश्र जी एक ऐसे  लेखक हैं जो कभी विवादों में नहीं रहे। सतत लिखते रहे। लगभग ६० वर्षों से अधिक लेखन करने के बाद भी उनमे एक बच्चे की भांति जिजीविषा है। उन्होंने अपने लेखन के लम्बे कालक्रम में अनेक बदलाव देखे।...

अकेला ही चला था…! : डॉ. फ़ीरोज़

‘वाङ्मय’ पत्रिका के सम्पादक डॉ. एम. फ़ीरोज़ खान एक चर्चित सम्पादक हैं। आप हाशिए के समाज के लिए सदैव तत्पर रहे हैं तथा उन लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए साहित्य के माध्यम से पुरज़ोर कोशिश भी कर रहे हैं। आपने किन्नर विमर्श,...

राजस्थानी सिनेमा के इतिहास के प्रथम योद्धा होंगे हम – पंकज सिंह तंवर

राजस्थान के सिनेमा के इतिहास में जो लम्बे समय से सूखा सा पड़ा हुआ था उसमें अब पिछले तीन-चार सालों से फिर सिनेमाई फूल खिलने लगे हैं। अब तेजी से विकास की ओर बढ़ने के साथ ही तेजी से फ़िल्में रिलीज़ करने जा रहे...

भोजन में जो महत्व नमक का है, वही महत्व साहित्य में यथार्थ जीवन का भी है – डॉ. रमेश यादव

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ रमेश यादव से बाल-साहित्य के  संदर्भ में युवा लेखक-संपादक डॉ. उमेश सिरसावरी की बातचीत  सवाल :- आप जाने-माने साहित्यकार हैं, आपने बच्चों के लिए भी लिखते रहना क्यों चुना ? जवाब - बाल साहित्य लिखने में एक अलग आनंद आता है। हां ये जरूर...

यौन विकलांगता व्यक्तित्व विकास में बाधक नहीं होनी चाहिए – लवलेश दत्त

डॉ० लवलेश दत्त हिंदी साहित्य जगत में तेजी से उभरने वाला एक सुपरिचित नाम है। आपके अब तक दो कविता संग्रह, तीन कहानी संग्रह, तीन संपादित पुस्तकें और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुका है। ट्रांसजेंडर वुमेन पर केंद्रित आपका उपन्यास 'दर्द न जाने कोई'...

लाइव आयोजनों में वक्ताओं को सुनने वाले न के बराबर होते हैं – प्रगति गुप्ता

जोधपुर की प्रगति गुप्ता पुरवाई की प्रतिष्ठित लेखिका हैं। अब तक उनके 6 कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह एवं एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। चंडीगढ़ के समाचारपत्र ट्रिब्यून में साहित्यिक समीक्षाएं लिखती हैं। प्रगति गुप्ता को बहुत से सम्मानों एवं पुरस्कारों से अलंकृत...