कहानी

                                                               गाँव का रास्ता 

  • गोविन्द उपाध्याय                                                                             

“अब उ गाँव कहाँ रह गया बाबू । रहिए दू-चार हफ्ता, अपने आप सब बूझ जाएंगे ।”जब राम लखन पाड़े यह बताए तब विनय पाड़े ने इतना गंभीरता से नहीं लिया ।  हर पीढ़ी को अपने अगली पीढ़ी से शिकायत होती है । फिर रामलखन बाबा तो सत्तर का पाला छूने वाले थे । लेकिन दो दिन में ही विनय पाड़े समझ गए कि पिछले पाँच साल में ही गाँव काफी बदल चुका है । दक्खिन टोला  का दुखहरन शराब बेचने लगा है । रेता से लाता है । फिर उसमें पानी मिला कर बेचता है । उसी के बदौलत उसने दो पक्की कोठरी खड़ी कर ली है । दुखहराना को देखकर कुछ और लोग भी यही काम शुरू कर दिए हैं । फुलेसर का विकलांग लड़का मंगल जो कि किसी काम का नहीं था । जिसकी दोनों टांगों में पोलियो था । हाथ वाले रिक्शे से चलता था । अब वह मोटर रिक्शा ले लिया था । बटन दबाते ही उसकी गाड़ी दौड़ने लगती । उसे कहीं दूर भी नहीं जाना पड़ता था । हाइवे वाले ईंट भट्ठे पर बनती थी कच्ची शराब। वहीं से लाता था । शाम को दक्खिन टोला शराबियों से भर जाता था । मंगल और दुखहरन पैसा चीर रहे थे और गाँव नशे के गर्त में डूब रहा था । गाँव के बारह साल के लड़के तक नशेड़ी हो चुके थे । सबसे बुरा हाल तो साठोत्तरी पीढ़ी की थी । वह बेबस और दयनीय थे । उनकी जुबान को लकवा मार चुका था । वह कुछ बोले नहीं कि नशेड़ी बेटा तो पीटता ही, शराबी पोते भी थपड़ियाना शुरू कर देते ।

विनय पाड़े सोच रहे थे कि रिटायरमेंट के बाद गाँव आकर ही रहेंगे । इसलिए इसबार एक महीने की छुट्टी लेकर आए थे । लेकिन गाँव की दशा देखकर असमंजस में पड़ गए थे । उन्हें लगा कि क्या गाँव में इस अराजकता का कोई विरोध करने वाला नहीं है?

“जो विरोध करेगा उसी की ऐसी-तैसी हो जाएगी । दुखहरन प्रधान जी का आदमी है । जितनी बार दबिश हुई । प्रधान जी पहिले से मौजूद रहे और मामला रफा-दफा करा दिया । मंगल तो शैलेश बाबू का खास आदमी है । कभी खुद ‘लकड़ी चोर के नाम से फेमस थे । अब जंगल माफिया है । खूब पैसा कमाया । अब प्रधान के भावी उम्मीदवार हैं । मंगल उनका खास आदमी है । दो बार हाई-वे पर ही पकड़ा गया था । लेकिन शैलेश बाबू उसकी गिरफ्तारी से पहले छुड़ा लाए,” का साहेब आप तो देख ही रहे हैं । लाचार आदमी है बेचारा । कवनो दू पइसा का लालच दिया होगा और ई … ससुरा बिना नियम कानून जाने-बूझे गलती कर बैठा ।”  दरोगा शैलेश बाबू को भी जानता था और मंगल को भी ।  मामला रफा-दफा तो हो गया । लेकिन अपनी बात कहने से चूका नहीं,”शैलेश बाबू आप ही जैसे सफेदपोश लोगों की वजह से ग्रामीण अंचल में शराब का कारोबार फल-फूल रहा है । और आप ही लोग  बाद में चिल्लाते हैं कि सरकार कोई कार्यवाही नहीं करती । क्या हमें पता नहीं आपके गाँव का हाल …।”

शैलेश बाबू दाँत निपोर कर रह गए थे । बातों का जूता तो चला ही दिया था दरोगा ।  साथ में गए आदमियों को इस बात को नमक मिर्च लगाकर गाँव में बताने का मौका नहीं देना चाहते थे शैलेश बाबू । इसके पहले कि कोई मुँह खोले, खुद ही गाँव पहुँचते ही चिल्लाना शुरू कर दिए,”आज ई सारे… मंगलवा के कारण दरोगा ने हमें का-का सुना दिया । गाँव का लरिका है, उहो दिव्यांग । सोचा कि जेल चला जाएगा तो इसकी जिनगी खराब हो जाएगी । लेकिन अब इस गाँव में शराब का कारोबार नहीं चलने दूंगा । पूरा जेवार में बदनामी हो रही है । पड़ुकिया में गैरकानूनी शराब का कारोबार चलता है ।  पूरा  गाँव शराबी हो चुका है । गाँव की नई पीढ़ी तो पूरी तरह से बिगड़ चुकी है । यही हाल रहा तो कोई अपनी बेटी इस गाँव में नहीं बिहयेगा ।”

सब जानते हैं कि शैलेश बाबू नौटंकी कर रहे हैं । दुखहरन और मंगली की दुकान चलती रहेगी । अगर दुकान बंद हो गयी तो उन्हें पूछेगा कौन…? और जब पूछेगा ही नहीं तो नेतागिरी किस बात की ।

विनय पाड़े को आए एक हफ्ता हो गया था । भाई-भतीजे नहीं चाहते थे कि वह शहर से गाँव  आएं और फिर जमीन का हिस्सा- बखरा लगे । हालांकि विनय पाड़े के मन में जमीन को लेकर कोई लालच नहीं । वह तो अपने जीवन का बचा हुआ समय गाँव में बिताने के इच्छुक  थे । पत्नी का इस बात पर सदा से विरोध था,” जीवन तो पूरा शहर में कट गया । अब बुढ़ापे में गाँव जाकर रहना बहुत कठिन है । भाई-भतीजा ही नोच खाएंगे । अभी जोशिआए हैं । बाद में पछताएंगे ।”

विनय पाड़े को लगता कि शहर में सेवानिवृत्ति के बाद रहने का भला क्या औचित्य है । समय काटना मुश्किल हो जाएगा । यहाँ रहेंगे तो चार आदमी बोलने बतियाने वाले मिल जाएंगे । समय आराम से कट जाएगा और गाँव का शुद्ध हवा-पानी तो मिलेगा ही ।

लेकिन यहाँ आकर उन्हें अब यही लगने लगा था कि पत्नी की बातों में दम है । वह नहीं रह पाएंगे । उनके घर के बगल से कोलतार की पक्की सड़क, पास के कस्बे तक जाती थी । लोगों के दरवाजे पर अब बैलों की जोड़ी नहीं थी । अब जो सम्पन्न थे, उनके पास ट्रैक्टर था । गाँवों में अब पक्के मकान ज्यादा थे । देखने में तो यही लग रहा था कि गाँव उन्नति कर रहा है । लेकिन नशा कुछ घरों को खंडहर बना रहा था ।

विनय पाड़े को सबसे तेज झटका तो तब लगा, जब उन्हें पता चला कि फउदी की तीनों लड़कियां शहर जाकर धंधा कर रही है ।  फउदी बहुत  मेहनती था । कुछ दिन उनके घर घरेलू नौकर का काम किया था । सांवला पर गठीला शरीर । तब वह चौदह-पन्द्रह साल का था । दोनों हम उम्र थे । विनय पाड़े पास के कस्बे में पढ़ने जाते थे और फउदी जानवरों के लिए चारा काटने खेतों में जाता । इसके बावजूद हम उम्र होने के कारण घनिष्ठता हो गई थी । फउदी की आवाज बहुत मीठी थी । उसे ढ़ेर सारे गीत याद थे । जिन्हें वह ढोलक के थाप के साथ गाता था । उसके पिता किसी नाच मंडली में काम करते थे । शायद उन्हीं से सीखा था उसने ढोल बजाना । उसकी आवाज में कुदरती मिठास थी । विनय पाड़े ने फउदी को कभी नौकर नहीं समझा । वह उनके लिए साथी और कलाकार रहा । फउदी कहता,”भाई बहुत मेहनत करना है । खूब पइसा कमाना है । अपनी नाच मंडली खड़ी करनी है । फिर देखना विनय भाई हमारा जलवा । जेवार का जितना मंडली चल रहा है न… सब बेकार हो जायेगा ।”

आगे की शिक्षा के लिए विनय पाड़े बनारस आ गए और फउदी किस्मत आजमाने मुंबई चला गया । फिर एक लंबे समय तक फउदी का कुछ अता-पता ही नहीं चला । कोई कहता किसी आर्केस्ट्रा में काम कर रहा है । देखते-देखते दस साल बीत गए । फउदी गाँव लौटा था ….बिलकुल फटेहाल। बहुत बीमार था वह । किसी बिल्डर के यहाँ मजदूरी करता था । बीमार पड़ा और नौकरी चली गई । विनय पाड़े आई ए एस की तैयारी करते- करते रेलवे में लिपिक बन गए । फउदी  गाँव में ही रह गया । गाँव से दो किलोमीटर दूर मौनी बाजार में उसने चाय-पकौड़ी की दुकान थी । सप्ताह में दो दिन बाजार लगता था ।दाल-रोटी आराम से चल रहा था । हां ! संघर्षो ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था । फउदी की तीन बेटियाँ ही थी । शायद पुत्र के लालसा में कुछ और बच्चे भी हो जाते, लेकिन पत्नी के बच्चेदानी में कोई विकार आ गया और वह लाख प्रयास के बाद भी उसे बेटा न दे सकी ।

फउदी की देर में शादी हुई । वह बूढ़ा पहले हो गया और बेटियां सयानी बाद में हुई । विनय पाड़े कई बार उन लड़कियों को सज-संवर कर कोलतार वाली सड़क पर पैदल जाता देखा था । लड़कियाँ सुंदर और शालीन दिखती थी । जब उन्हें यह पता चला कि शहर में धंधा करती हैं, बहुत दुःख हुआ था ।

विनय पाड़े को गाँव आए बीस दिन हो गए थे । गेहूँ कट चुका था । अनाज घर पर आ चुका था । भतीजा फिलहाल फुरसत में था । उनके पास बैठकर बतियाने लगा, “अब का बताएं काका जी, खेती में जरा भी दम  नहीं है । खाली पइसा झोंको । कभी-कभी लागत ही नहीं निकलता है ।”  सुनकर अजीब सा लगता है विनय पाड़े को । कभी इस घर में ठीक-ठाक साइकिल भी नहीं होती थी । आज दो-दो मोटरसाइकिल और एक ट्रैक्टर खड़ा था । यह जादू से तो आया नहीं ।

रामलखन पाड़े जब दूसरी बार मिले तो पहला सवाल उन्होंने यही दाग,”कइसा लग रहा है बाबू?”

विनय पाड़े कुछ देर तक रामलखन बाबा को देखते रहे । उनके चेहरे पर फीकी सी मुस्कराहट रेंग गई,”का बताए काका, बहुत हताश हूँ । गाँव में तो घुन लग गया है । जो धीरे-धीरे इसे खोखला कर रहा है । आइसा तो नहीं था अपना गाँव ।”

रामलखन बड़े जोर से हंसे,”नहीं इतना बिगड़ा भी नहीं । इसी गाँव के प्रदुमन राजधानी के बड़का डागदर बन गए । दर्शनवा का बेटा हाकिम बन गया । ई बात दूसर है कि ओकरे बाद कोई गाँव झांकने तक नहीं आया ।  तुमहू कहाँ आते थे..? अइसा थोड़े न होता है । यह तुम्हारा जनमभूमि है, इसके लिए तुम्हरा भी कुछो जिम्मेदारी बनता है कि नहीं ।”

विनय पाड़े निरुत्तर थे । सही कह रहे हैं रामलखन …। उसदिन वह काफी उदास से रहे । उन्हें लग रहा था कि पत्नी ही सही है । वह इस महौल में नहीं रह पायेंगे । शाम को फउदी आया था ,”का भाई एतना दिन से आए हो , हमें पता ही नहीं चला । इसबार हमरे दुकानी पर भी नहीं आए । तबियत ठीक है न….।”

विनय पाड़े क्या बोलते कि उसकी बेटियों के बारे में सुनकर उन्हें इतनी तकलीफ हुई कि उससे मिलने की इच्छा ही नहीं हुई । या यह बोल पाते कि मुंबई में ही मर-खप जाते । का जरूरत थी गाँव का नाम खराब करने की..,।”

लेकिन फउदी ने जो बताया वह कुछ और था । जिसे सुनकर विनय पाड़े भौच्चक रह गए । उसकी तीनों बेटियां कस्बे में पढ़ने जाती हैं ,” का बताएं विनय भईया, हमारे पास न पैसा है और न जांगर । मेरी बच्चियां जो भी कर पायी, यह उनकी इच्छा शक्ति है । बड़की ने बी ए किया और बैंक के बाबू वाला परीक्षा पास कर लिया है । बस कब्बो उसका नौकरी वाला चिठ्ठी आ सकता है । अभी उ एकठो अंग्रेजी वाला स्कूल में पढ़ाती है । मझली आई टी आई में  कटाई-सिलाई सीख रही है । छोटकी दसवीं में पढ़ती थी । विनय बाबू …हम त लिख लोढा, आ पढ़ पत्थर ठहरे । बेटियों को जरूर पढ़ा दिया । बाकी उनकर भाग्य । ”

विनय पाड़े को फउदी का एक-एक शब्द शहद जैसा मीठा लग रहा था, “वाह! भाई… वाह तुम  सचमुच कमाल कर दिए। तुम्हारी बेटियां काबिले तारीफ हैं। और तुम भी…। इस गाँव में जबसे आया हूँ पहिला बार कोई खुशी की बात सुना हूँ ।”

फउदी हाथ जोड़ लिए,” हम सब जानते हैं विनय बाबू । गरीब हूँ। लोग-बाग हमारे बेटियों के बारे में जो बोलते हैं । हम सब बूझते हैं । लेकिन हम किसका जुबान पकड़ेंगे । अब जबसे बड़की बैंक वाली परीक्षा पास की है … । लोगों के सोच में बदलाव आया ।”

विनय पाड़े को उस रात बढ़िया नींद आयी थी । उस रात पत्नी से काफी देर तक बात भी किए थे । वह इस समय इकलौती बेटी के पास दिल्ली में  थी। जहां वह उनके रिटायरमेंट के बाद स्थायी रूप से रहना चाहती थी ।

“आपको भी यही समय मिला था । शहर में तो बत्ती ठीक से मिलती नहीं है । गाँव का तो भगवाने मालिक है । ई सड़ी गर्मी में दुर्दसा ही है ।  जाइए आपो दू-चार दिन में लौट आयेंगे ।” पत्नी ने मना कर दिया था । लेकिन यहां बत्ती वाली तो कोई समस्या ही नहीं थी ।

दूसरे दिन वह फउदी की दुकान पर भी गए थे । दुकान उसकी ठीक चल रही थी । वह अपनी पत्नी के साथ लगातार व्यस्त बना रहा । उससे कोई खास बात नहीं हो पायी । चलते समय वह हाथ जोडकर बोला,”बाबू आज बाजार का दिन है । रोज से ज्यादा भीड़ रहती है । आपको समय नहीं दे पाए । इसके लिए क्षमा करियेगा । सुबह घर आइए न । बच्चे आपसे मिलकर खुश हो जाएंगे ।”

विनय पाड़े जानते थे कि वह औपचारिकता निभा रहा है । सच तो यह है कि पूरा परिवार एक बेहतर भविष्य के लिए सुबह से संघर्ष कर रहा है । इस संघर्ष के सफलता की आहट से वे उत्साहित भी हैं ।

लौटते समय  उन्होंने देखा कि एक जगह भारी भीड़ लगी है । उन्होंने पूछा तो पता चला कि कोई बारात जाने की तैयारी में है । नर्तकियों का नाच हो रहा था । जिसे देखने की भीड़ थी । एक ट्रक के ऊपर मंच बना था । जिसपर कुछ लड़कियां थिरक रही थी ।  उनके हाव-भाव अश्लील थे । भीड़ से भी अश्लील शब्द उझल रहे थे । मंच तक पहुंचना संभव नहीं था । उसके बावजूद भीड़ उन्हें छूने के लिए उछल रही थी । ट्रक के दोनों तरफ मंच पर दो मुस्टंडे भीड़ की निगरानी कर रहे थे।  विनय पाड़े के लिए यह नई चीज थी ।

उन्हें याद आता है । जब वे छोटे थे । शादी-विवाह में नाच बुक किया  आता था । लवंडे का नाच …। लड़का से औरत बनी नर्तकी का नाच देखने के लिए पूरा गाँव टूट पड़ता था । इन नचनियों के भी बहुत से दीवाने थे । रुपए और सिक्कों की बौछार होती थी ।  इस नाच मंडली का सबसे महत्वपूर्ण कलाकार होता था-विदूषक । वह इन नचनियों को छेड़ता और ऐसी बातें बोलता की भीड़ हंसने लगती । उसका काम होता था भीड़ को बांधे रखना ।  तब दो दिन बारात रुकती थी ।  फिर विवाह एक दिन में ही निपटने लगा । मंडली में धीरे-धीरे लड़कों की जगह हिजड़े आ गए । नकली स्तन और खरदुरे चेहरे वाले नर्तकियों की आपेक्षा वे ज्यादा आकर्षक थे । वह कोमल थे और उनके स्तन असली थे ।  शायद वह दौर भी समाप्त हो चुका था । समय ज्यादा तेजी से भाग रहा था । मोबाइल युग आ गया था । बाजार की माँग को देखते हुए लड़कियां आ गयी । अब सिर्फ फूहड़पन था । पूछने पर पता चला कि शादी-विवाह में इन नर्तकियों को बुलाना शान समझा जाता है । यदि फउदी की मंडली बन भी गयी होती तो वह इस माहौल में कबकी खत्म हो चुकी होती ।

यूँ तो हर गाँव के बाहर अब चाय-पकौड़ी की दुकान खुल गयी है । जहां दिनभर भीड़ रहती है । यहां बैठकर लोग लोकल से लेकर दिल्ली तक की राजनीतिक बातें होती हैं । सुबह से शाम तक अवनरत बातों का दौर चलता रहता है । लोग आते-जाते रहते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन बातों का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता है ।

विनय पाड़े को लगता कि यह जो भी परिवर्तन है। कहीं न कहीं रोटी से जुड़ा है । रोटी कमाने के दो रास्ते हैं । एक सीधा साफ सुथरा । जिसमें काफी श्रम लगता है । जिसपर फउदी और उसकी बेटियां चलने का प्रयास कर रही हैं । यह रास्ता लंबा जरूर है, लेकिन सम्मानजनक है । दूसरा शार्ट रुट है । जिसपर दुखहरन और मंगल जैसे लोग चल रहे । जो उन्हें अपराध से जोड़ता है । जिसका भविष्य सिर्फ अंधकार है ।

धीरे-धीरे विनय पाड़े को शहर वापस लौटने का दिन निकट आ गया । अब गाँव उन्हें उतना बुरा नहीं लग रहा था । गाँव में शराबियों की तादाद भले बढ़ी हो, फउदी जैसे लोग प्रगति की उम्मीद जगाए हुए हैं ।

जिस दिन विनय पाड़े शहर वापस लौटने वाले थे । उसी दिन दक्खिन टोला में पुलिस का छापा पड़ा था । पता चला कि दो दिन पहले ही जहरीली शराब पीने से पास के किसी गाँव में कुछ आदमी मर गए थे । बस पुलिस अवैध रूप से चलने वाले सभी ठिकानों पर छापे मारना शुरू कर दिया । कुछ लोग दक्खिन टोला के भी पकड़े गए थे । गाँव में खलबली मची थी ।

विनय पाड़े जानते थे कि उनके मुंह में खून लग चुका है । वह छूटकर आएँगे और फिर जहर के इस कारोबार में लिप्त हो जाएंगे । जो नौकरी करने बाहर जायेगा, वह वापस गाँव नहीं लौटेगा ।

विनय पाड़े भी शहर वापस लौट रहे थे । भतीजा स्टेशन तक छोड़ने आया था , “ यहां कुछ नहीं रखा है काका जी । मैं भी सोच रहा हूं कि कस्बे में कोई मकान ले लूं और बच्चों की पढ़ाई के लिए वहां रखूं । यहां रहेंगे तो बिगड़ जाएंगे ।”

विनय पाड़े जीप में बैठे आंख बंद किए, भतीजे की बात सुन रहे थे । इस समय उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था । आंख खोलकर जीप के बाहर देखा, चमकदार काली कोलतार की सड़क पर जीप स्टेशन की तरफ भागी जा रही थी । जिसका दूसरा छोर उनके गाँव तक जाता है ।

भतीजा अभी भी कुछ बोल रहा था । विनय पाड़े के होठों पर एक महीन मुस्कराहट रेंग गयी थी । गाँव काफी दूर निकल चुका था ।

पता: एफ  टी -211, अरमापुर इस्टेट, कानपुर-208 009गाँव का रास्ता - गोविन्द उपाध्याय (कहानी) 1

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