9-06-15

मंगलवार  

रात्रि -8:35

एक अनाहूत पीड़ा ने मुझे कई दिनों से अपने आगोश में ले रखा था। न चाहते हुए भी उसी में उलझा मैं अपना समय बर्बाद कर रहा था । यह और भी करता यदि आज अपने कुछ विद्यार्थियों से उसे साझा न करता । एक छात्रा ने मुझे लिखे पत्र में जीभ की बहुत सुंदर व्याख्या की थी। ताओ के कथन के माध्यम से जीभ की गुणवत्ता का बखान उसने किया था। उसमें उसने दाँतों को अपनी कठोरता के कारण जल्दी पतित होने और जीभ की कोमलता को उसके दीर्घजीवी होने का कारण बताया था।
बेशक जीभ में कोमलता ही नहीं और भी बहुत  सारे गुण हैं। पशु के पास वाणी भले नहीं है लेकिन वह भी इसी जीभ से चाटकर अपना वात्सल्य और प्रेम प्रकट करता है। एक माँ भले ही वह खूँखार शेरनी ही क्यों न हो अपनी जीभ से चाट कर अपने वात्सल्य के सुकोमल स्पर्श को नवजात बच्चे तक पहुंचाती है और उसको आश्वस्त करती है कि वह निश्चिंत रहे। कुत्ता अपने स्वामी को चाटकर उसके अपनी भक्ति और समर्पण प्रदर्शित करता है।
इतने ही नहीं जीभ के और भी सौ गुण होंगे कहाँ तक गिनाएँ पर इन सब  पर उसकी इकलौती खामी पानी फेर देती है। उसकी वह सबसे बड़ी खामी जो मैंने महसूस की है वह यह है कि जीभ यानी ज़बान अगर एक बार खुल जाती है तो बेलगाम घोड़ी की तरह भागती ही चली जाती है। खुलने बाद वह यह नहीं देखती कि सामने कुआँ है,खाईं है या पहाड़।सामने अपना है या गैर।वह चल पड़ी तो चल पड़ी।उसे तो बस अपनी सुनाने की पड़ी रहती है।सामने वाला मन से सुन रहा है या बेमन। इसका उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता।मुझे लगता है कि घोड़े की प्रजाति को यदि लगाम न लगाई जाती तो उसके पैरों की बिजली-सी गति भी यह निगोड़ी ज़बान हर ही लेती।
जीभ के पक्ष में खड़ा होता हूँ तो एक और बात सही पाता हूँ कि  मन मिलने पर ही यह खुलती है। लेकिन एक बार खुल जाने पर कहाँ रुकने वाली।सो उस खुली ज़बान से मैंने कुछ विद्यार्थियों से अपने दर्द को साझा किया । उनसे बात करते समय जो अपनापन मिला उस समय मैं बिल्कुल भूल गया कि सब के सब  एक जैसे नहीं होते।सबको एक तुला पर नहीं तोला जा सकता।सबके सब संवेदनशील भाव से आपको नहीं सुनते।”सुनि अठिलैहैं लोग सब”की तर्ज़ पर कुछ आपके दर्द को मज़े के लिए भी सुनते हैं।
सबके भाव और स्वभाव अलग -अलग होते हैं। तभी तो हमारे भीतर के जो भाव हैं,उन्हें स्वभाव कहा जाता है।यदि ऐसा नहीं होता तो पर भाव न कहा जाता।स्वभाव भी तरह-तरह का होता है।कोई अंतर्मुखी है तो कोई बहिर्मुखी।कोई चुप्पा है तो कोई वाचाल।कोई धूर्त है तो कोई निश्छल।कोई स्वभाव से कोमल है तो कोई  कठोर । इसीलिए तो इस प्राणिजागत में कोई हिरन  है तो कोई शेर।कोई गिलहरी-सा मेहनती,सहज और सरल है तो कोई कौए-सा कामचोर किंतु चालाक। इन्सानों में भी तरह-तरह के लोग हैं। कोई शेर का प्रेमी है तो कोई हिरन का।कोई शियार और लोमड़ी -सा चालाक है तो कोई हिरन-सा भला,भोला और सात्विक।एक शेर के शिकार का प्रशंसक है तो दूसरा हिरण के बच्चों की किलोलों का। सबकी अपनी-अपनी पसंद है। लेकिन जो मूल बात है वह यह कि शेरों के बच्चों की शिकार की क्रीड़ा की तुलना मृगछौनों की किलोलों से कभी नहीं की जा सकती।जो ऐसा करते हैं उन्हें अहिंसा और हिंसा के मूल चरित्र का ही नहीं पता होता।
शेर किसी को मार कर आनंद प्राप्त करता है तो हिरन अपने मे मगन रहकर।एक शिकारी है तो दूसरा शिकार। शिकारी से करुणा की आशा करना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है और मैं वही कर रहा था। यह सब करते समय मैं यह भी भूल कर रहा था कि इसी प्राणि जगत में शियार और लोमड़ी जैसे भी जानवर होते हैं जो इन शेरों के छोड़े हुए मांस पर जीते हैं। ये चटोरे होते हैं। इनकी नियति चाटुकारिता की होती है। ये अगर शेरों की चाटुकारिता नहीं करेंगे,उनके आगे दुम नहीं हिलाएँगे तो जूठन से वंचित हो जाएँगे। जूठन ही तो इनका जीवन है । जूठन से वंचित होकर ये जीवन से हाथ धो बैठेंगे । इसलिए इनकी जीभ को जिसका स्वाद लगा है,इनको  वही अमृत है।स्वाद में बदलाव इनके अपने अमृत-पान में बाधा डालना है।
भोले हिरन अपनी हमदर्द चिड़ियों की चहचहाहट पर अतिरिक्त रूप से सजग होकर कभी-कभी मौत की ओर ही दौड़ लगा लेते हैं।अतिरिक्त अपनेपन से उपजी सजगता में उन्हें होश ही नहीं रहता कि जिधर हम जा रहे हैं उधर ही घास में शेरनी हमारी ही फ़िराक में दुबकी बैठी है।उन्हें क्या पता कि सबके अपने-अपने सत्य होते हैं। कान के अलग सत्य हैं और आँख और जीभ के अलग।आँख देखकर किसी चीज़ को अनुमान के आधार पर कोमल या कठोर बता तो सकती है पर इस गुण को प्रमाणित नहीं कर सकती। प्रमाणित तो त्वचा ही करती है।स्वाद को जीभ ही प्रमाणित कर सकती है। ऐसे ही कान सुनकर किसी चीज़ की उपस्थिति का अन्दाजा तो लगा सकते हैं पर उसे प्रमाणित तो आँखें ही कर सकती हैं।  हर एक के लिए वही और उतना ही सत्य है जिस तक उसकी पहुँच है।सबकी इंद्रियों की क्षमता भी अलग-अलग होती है।चिड़ियोंकी आँखों की क्षमता हिरन में नहीं हो सकती।वे पेड़ पर से शेरनी को देख लेती हैं लेकिन हिरन नहीं।  इसलिए किसी की पहुँच से अधिक और आगे तक उसके सत्य को खींच के ले जाना न्यायसंगत नहीं है। इसमें देखने और दिखाने या सुनने और सुनाने वाले दोनों की शक्ति जाया होती है। दोनों का समय नष्ट होता है।एक दिन यह काम भी मैंने किया। कुछ भूखे पेट बच्चों को मैं मिनटों नहीं घंटों तक संवेदना की भागवत सुनाता रहा।
मेरी व्यथा-कथा सुनने वाले कुछ कोमल हृदय युवाओं के उदाहरण के बल पर हर किसी से  जो मेरा कोई नहीं उससे अपनापन चाहना मूर्खता नहीं तो और क्या है?यह मूर्खता भी अब तक मैं कर रहा था।यह उन बच्चों का अपनापन ही  है कि  उन्होंने बड़ी शिद्दत से मुझे सुना । उस समय मुझे लगा कि अपनेपन के लिए कतई  ज़रूरी नहीं कि वह समाज की दृष्टि में अपना समझा  जाने वाला सगोत्री ही हो।कहीं  पर भी और कभी भी  अपनापन उससे भी मिल सकता है जो  समाज की दृष्टि में सदैव गैर समझा जाता रहा है।प्रेमी-प्रेमिका या पति और पत्नी ज़रूरी नहीं कि एक ही जाति या धर्म के हों।लेकिन लाखों में एकाध अपवाद छोड़कर प्राय: सबका विश्वास और समर्पण असंदिग्ध है।इनका एक दूसरे को पहले से जानने का चलन भी अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है।आज से चालि-पचास साल पहले जीवन साथी का पहले कहीं देखा होना सौभाग्य की बात होती थी।लेकिन इनकी एक लयता और अपनापन जगज़ाहिर है और एक दूसरे के दु:ख -दर्द की साझेदारी भी माँ-बाप को छोड़ शेष औरों की तुलना में आज भी बेहतर ही मिलती है।
समय और समाज कोई भी हो छल-फरेब और षड्यंत्र सब ज़गह होते हैं।इसलिए स्थान का उल्लेख महत्त्वहीन मानते हुए मैं केवल मानवीय स्वभाव पर अपना ध्यान केंद्रित रखना चाहूँगा।इसी सूत्र के साथ समय,समाज और स्थान के उल्लेख को दरकिनार कर एक सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के मामले में जिसका मैं विशेषज्ञ था, एक पुरुष से छला गया।एक प्रोफेसर ने एक योग्य उम्मीदवार की लिखित परीक्षा में पूछे गए अनुवाद के हिस्से में मुझे लाल गोले लगाने को कहा।मैंने लगा दिया तो मेरे द्वारा पहले स्थान पर रखी गई उस योग्य उम्मीदवार का नाम अंतिम सूची से हटवा दिया।किसी पर विश्वास करने की अपनी ही गलती से मैं षड्यंत्र का शिकार हुआ और उससे आहत हुआ तो सीधे उच्चाधिकारियों के समक्ष मैंने अपनी बात रखी।वे मुझे चाहते थे या मेरी बेवकूफी भरी नेक नीयती को यह मैं नहीं जानता पर मेरी बात का मान रखा गया और देर से ही सही पर तीन महीने बाद योग्य उम्मीदवार को नियुक्ति मिली।लेकिन मुझे यह ज़रूर हिदायत दी गई कि,’ यदिआपको उस उम्मीदवार को रखना ही था तो उसपर गोल निशान न लगाते।’वह उम्मीदवार पी-एच डी थी।उसका विषय शायद सूर का विप्रलंभ शृंगार था।इससे षड्यन्त्री प्रोफेसर की उस चेली का चयन खटाई में पड़ गया था जिसके लिए उसने मेरे साथ शतरंजी चाल चलकर दो को एक साथ टारगेट किया था और मेरा परम शत्रु बन गया था।इस घटना के बाद दबे-छिपे ही सही पर कदम-कदम पर वह विरोध करता रहा और मैं अपनी चाल में आगे बढ़ता रहा।सजग होकर चलने के कारण मस्ती ज़रूर छिन गई थी।अलमस्त और निर्द्वन्द्व व्यक्ति की चाल और सजग व्यक्ति की चाल में अंतर दूर से ही पता चल जाता है।आप जैसे-जैसे सजग होते जाते हैं कौआ बनते जाते हैं और जैसे-जैसे मस्त वैसे-वैसे हंस और बोल- चाल में वह सब झलकने लगता है।
मैं हंस से कौआ होता जा रहा था।इसका दर्द भी था और इससे उबरने का द्वंद्व भी।मेरे इस दौरान के अंतर्द्वंद्व को कुछ लड़के और लड़कियाँ भाँप गए थे।लेकिन संतप्त हृदय को शीतलता पहुँचाने लड़कों में से तो कोई नहीं आया पर उसी  में से दो लड़कियाँ जब मैं व्यथित था तो मुझ तक ज़रूर आईं।मैं आवास पर नहीं मिला तो मेरे लिए लाए गए  मेरे प्रिय फल आम और उसके साथ मेरे सबसे प्रिय ब्रांड वाले बिस्कुट के पैकेट को एक पालीथीन में मेरे दरवाज़े पर लटका के चली गईं।मन खट्टा होने पर भी मैंने उस दिन आम ज़रूर खाया। आम ने मुझे अपनेपन की ऐसी मिठास से भर दिया,जिसका वर्णन गूँगे के गुड़-सा है। सच में वर्णनातीत । उस समय मुझे लगा कि स्त्री सच में सरिता होती है। उसका स्वभाव ही सींचना है। पुरुष तो जन्म-जन्म से प्यासा रहा है। किसी की करुणा पी गया तो किसी की ममता। न जाने कितनी बार और कितनी सरिताएँ इन्हीं स्वार्थी पुरुषों के द्वारा पूरी की पूरी पी ली गई हैं।
अपनापन एक मलहम  है। भावों के घावों को भरने वाला मलहम। कैसा भी गहरा घाव क्यों न हो अपनापन उसे भर देता है। कभी-कभी बाज़ार में बनावटी मलहम भी आ जाते हैं।वे घाव को और हरा कर देते हैं। जगा देते हैं।तुरंत आराम तो देते हैं पर थोड़ी देर बाद उनमें चिनचिनाहट वाली असलियत और उसकी बू के आलावा कुछ भी शेष नहीं रह जाता। भावों के मलहम के साथ भी कभी-कभी कुछ ऐसा ही घटित हो सकता है। लेकिन इससे असली मलहम का मूल्य कम नहीं हो जाता।अपनेपन की अहमियत नहीं घट जाती।मेरे घावों पर दोनों तरह के मलहम लगे। एक अपनेपन से भरी शीतलता वाले तो दूसरे चिनचिनाहट से भरे।इसपर इतना ही कहा जा सकता है कि स्वार्थ के कुएँ अगर मुँह तक भी लबालब भरे होंगे तो भी उतना सुख नहीं दे पाएँगे जितना कि अपनापन लिए हुए अंजलि भर शीतल जल।इन बच्चियों का यह अंजलि भर अपनापन मेरे द्वंद्व के टीले को बहा ले गया था।इन्हीं में से एक रूपा है जिसने मुझे भावुक पत्र भी लिखा-
“प्रिय शर्मा जी,
नमस्ते। 
आपका पत्र पढ़कर मुझे  लगता है कि  आप दुखी हैं। पर,यह न भूलें कि सभी व्यक्तियों  को अपने जीवन में अनिवार्य रूप से किसी न किसी  दुःख का सामना करना पड़ता है।यह  अवश्य है कि हममें से अधिकतर लोग गहरे गम और गुस्से में गोता लगाकर अपना  जीवन व्यर्थ कर रहे  हैं।किन्तु  जो अधिक महत्वपूर्ण चीज़ है वह ये है कि यह बेकार व बुरा भाव जितनी जल्दी संभव हो अपने मन से निकाल दें ताकि  अपने मन में  शांति रखी जा सके। इसीलिए मैं  आशा करती हूँ कि आप अपने मन में शांति और प्यार रखेंगे।जब दिन हमेशा नहीं रहता तो रात हमेशा कैसे रह सकती है। चिंता न करें धीरे-धीरे  सब कुछ ठीक हो जाएगा।
All is well !!
आपकी
रूपा”
इसका उत्तर मैंने कुछ इस तरह दिया था कि जैसे किसी समाज के एक व्यक्ति के कर्म के लिए अकेले वही नहीं अपितुवउसका पूरा समुदाय ज़िम्मेदार हो।यही कारण है कि उसकी किसी-किसी बात का ऐसे खंडन किया था कि जैसे वह पत्र लिखने वाली मेरी हमदर्द न होकर मेरे प्रतिपक्षी की वकील हो-
“प्रिय रूपा जी ,
स्नेह!
तुम्हारा पत्र पढ़कर बहुत खुशी हुई। मैं अपना जीवन व्यर्थ नहीं सार्थक कर रहा हूँ। व्यर्थ वे कर रहे हैं जो किसी को बुरा-भला कहते हैं और उसका नुकसान सोचते हैं। मैं सबका भला सोचता भी हूँ और अपनी क्षमता के अनुसार  करता भी हूँ। मैं किसी की झूठी तारीफ करके उसे बिगाड़ता नहीं।रूपा जी केवल रास्ते छोटे कर लेने (shortcuts)से बड़ी मंज़िल नहीं मिल जाती। उसके लिए बड़े श्रम(labour) और साधना की आवश्यकता होती है,जो तुम कर रही हो। देखना एक दिन तुम्हारी भाषा और भावों के सामर्थ्य के सामने भाषा-ज्ञान का झूठा(false) दंभ (proud)भरने वाले तथाकथित भाषा विज्ञानी प्रोफेसर पानी भरेंगे।
हम शिक्षक हैं । किसी को केवल लुभाना (to attract)हमारा धर्म नहीं होना चाहिए। हमारा धर्म शिष्य को सही रास्ता बताना होना चाहिए। जब मैं किसी शिक्षक को लुभाने वाली शैली (style)में पढ़ाते देखता हूँ तो मुझे पीड़ा होती है। आपने एक कहावत /लोकोक्ति (saying/proverb )सुनी होगी ,’हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती।’ऐसे ही हर लुभावना शिक्षण सुनने में जितना अच्छा लगे उतना उपयोगी(useful) भी  हो ,यह ज़रूरी नहीं। आपको बता दूँ कि सालों तक  आपको बस समाचार सुनाता रहूँ और लिखना-पढ़ना न सिखाऊँ यह मुझे आपके प्रति अन्याय लगता है। भाषा-शिक्षण में लिखना और पढ़ना भी आना चाहिए ,नहीं तो सारी शिक्षा व्यर्थ जाएगी। यह तभी होगा जब भाषा के नियमों की   जानकारी होगी। सुनने में दूसरे की सहायता की कम ज़रूरत होती है। सुन तो आप स्वयं भी सकती हैं । लेकिन समझने में सहायता की ज़रूरत होती है।अतः  किसी भी शिक्षक की भूमिका(role) विद्यार्थी की समझ विकसित करने वाली होनी चाहिए उसे देखने -सुनने में अच्छी लाग्ने वाली चीज़ें दिखा-सुनाकर बरगलाने वाली नहीं।
ऐसे ही लिखती-पढ़ती रहो। इससे भाषा सुंदर होगी।  तुम्हारे पत्र के भाव बहुत सुंदर हैं। विचारों (thoughts)में गहराई है।
तुम्हारा गुरु
डॉ गंगाप्रसाद शर्मा
रूपा (उसका मूल नाम याद नहीं) और शान्ति (झान्ग्छिन) जिसने मुझे जीभ की तरह रहने की सलाह दी थी,दोनों इसलिए बेचैन थीं कि मैं अपनी भाषा या ज़बान में बेलगाम था। बेधड़क भाव से कहीं भी स्वतंत्र विचारों का उद्घाटन मेरा अपना स्वभाव रहा है।इसलिए जो नापसंद होता भले ही वह कितने बड़े कद वाले से संबंधित हो,उसका ज़िक्र कभी-कभी तो भरी कक्षा में भी कर दिया करता था।इतना ही नहीं किसी का भी जो कार्य-व्यवहार पसंद नहीं आता उसके लिए प्राय: निषेध या नकार की वर्जित खाँटी देसी शैली वाली शब्दावली भी प्रयोग करता रहा हूँ।वह इसलिए कि जो ‘मौन होते हैं समय उनका भी अपराध लिखता है।’ इससे इन्हें चिंता थी कि अगर विवाद बढ़ा तो मेरा नुकसान ज़्यादा होगा। शायद इसीलिए उन्होंने मुझे पत्र लिखे थे और सामने पड़कर समझाते हुए फिर से मुझे अपनेपन से भिगो दिया था।वातावरण काफ़ी नम हो चुका था लेकिन मैं बरसने से बचता रहा। बाहर की आँखें जल्दी गीली होकर हमारा भेद खोल देती हैं। इसलिए अच्छा यही होता है कि ऐसे संकटकाल में बाहर की आँखों का दायित्व भीतरी आँखों को दे दिया जाए। प्रायः मैं यही करता हूँ। आज भी मैंने  यही किया । भीतर की नम आँखों से उनसे विलग हुआ।
मैं उनसे विलग होते समय बहुत भावुक था।लेकिन थोड़ी ही दूर पर उपस्थित औरवकुछ ही पलों के अंतराल में उन तरुणियों के बीच में से एक चिरपरिचित तरुण के ठहाकों ने  मेरे छालों को फिर से छील दिया। वह शायद उँ तरुणियों के विपरीत मुझे गैर समझ रहा होगा।जिसे गैर समझ लो उसके प्रति संवेदना नहीं होती और जिसे अपना बना लो उसे रत्ती भर का कांटा चुभने पर भी आह निकल पड़ती है।इस गैर के ठहाके से क्या तरुणियों का अपनापन संदिग्ध हुआ है। नहीं, कदापि नहीं। तो फिर? मैं परशुराम भी नहीं कि बात-बात में फरसा उठा लूँ।
हाँ,जिस किशोर स्वर को मैं अब तक निश्छल कोमल  और भावुक समझ रहा था वह उसका मुखौटा था,जो अभी-अभी उसके चेहरे से गिर गया है। पीठ पीछे होते हुए भी उसे भीतर की आँखों ने देख लिया है।ज़रूरत पड़ने पर ‘तेजसां वय: न समीक्ष्यते।’ में किसी ऐसे कम वय वाले दुष्ट के लिए चेतसां की ज़गह ‘दुष्टानां’ रखकर भी देख सकते हैं। वैसे भी बीस-इक्कीस वर्ष की उम्र षड्यंत्र की समझ और क्रियान्वयन के लिए कोई बहुत कम भी नहीं होती।वह पुरुष ही नहीं परुष भी निकला।वह विचारों से कोई तरुण नहीं रहा था। वह प्रौढ़ पुरुष बन चुका था।उसका परुष स्वर ज़रूर संदिग्ध हुआ है जो पीठ पीछे बड़ी निर्दयता से अपने झूठे मरहम से घावों को सहलाने के बजाय रगड़  गया है।उसके गुरु ने जो छाले दिए थे इसके मरहम से वे फूट चले हैं।घाव फिर हरे हो गए हैं जिनकी पीड़ा असमय हुई बरसात से दरार पड़ी दिल की छत से रिसने  लगी है। पता नहीं यह डायरी उसी गैर के लिए लिख रहा हूँ या फिर जहाँ कहीं और जिस किसी में अपनापन मिला हो उसके लिए।छाले तो छाले हैं।वे होंगे तो जलेंगे ही।
इससे क्या  उसके मुँह में मुँह जोड़े और स्वर से स्वर मिलाती जाती उन तरुणियों के नेह की गागर फूट गई ?नहीं … वह कैसे फूट सकती है ?वह तो अभी भी उसी अमरस की मिठास से लबालब भरी महमह महक रही है जिसका अव्याख्येय आस्वाद उनके लाए आमों से मिला था।

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