Sunday, May 10, 2026
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डॉ. आरती स्मित का लेख – परंपरा और आधुनिकता के निकष पर पं. विद्यानिवास मिश्र

मिश्र जी के वैचारिक लेखन में राहुल जी के सान्निध्य का प्रभाव है, जो उन्हें दो  विपरीत राहों पर समन्वय स्थापित करते हुए चलने की प्रेरणा देता रहा। वर्तमान मूल्यहीनता से व्यथित होकर ही उन्होंने कहा होगा,  “मूल्यों का नाटक  बड़ा महँगा सौदा है, इससे मूल्य नहीं गिरते, मूल्यों के लिए सच्चे न्योछावर का चाव गिर जाता है।”  वे वर्तमान में उत्पन्न संवादहीनता की स्थिति से संतप्त रहते थे। ये समस्त भाव, समस्त पीड़ा उनके वैचारिक निबंध का आधार बनीं। उन्होंने स्वीकारा भी, “रचना का उद्देश्य कुछ कर पाने की बेचैनी को उकसा भर देना है, क्योंकि जब तक दर्द है तब तक सृजन है।”
आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रखर चेता, विविध आयामों के पुंज पं. विद्यानिवास मिश्र , जो काल की गति को कभी जीवनचक्र में शामिल करते तो कभी उससे उपजी परिस्थिति की खबर लेते प्रतीत होते हैं; जो एक ओर खानपान, रहनसहन,बोलीव्यवहार, संस्कार, मर्यादा के परिप्रेक्ष्य में परंपरा के प्रति पूर्ण निष्ठावान, तो दूसरी ओर घिसीपिटी अवधारणाओं को, वैयक्तिक संकीर्णताओं और धर्म के नाम पर संप्रदाय के शोले भड़काने वाली, मूल्यहीन सिद्ध होती तथाकथित पारंपरिक हवाओं को झोलझोलकर, धक्का देकर उसका मुँह दूसरी ओर करने वाले आधुनिक विचारवान के रूप में नज़र आते हैं। नज़र आते हैं परकाया प्रवेश करते हुए और यह प्रवेश उनकी प्रत्येक रचना में नज़र आता है, तभी सहृदय उनकी हर रचना में धँसता जाता है, धँसता जाता है…. तब तक जब तक कि उससे एकाकार हो जाए। 
मिश्रजी ने स्वयं माना है, सहृदय ही साहित्यकार को मंजूरी देता है, क्योंकि रचना हृदय से ह्रदय को संबोधित होती है और संबोधित होते ही यदि दोनों के तार क्षणभर को मिल जाएँ तो रचना कृतकार्य हो जाती है। रचनाकार का इसके बाद नया दायित्व जाता है।
निरालाजी के शब्दों में,   “कहा जो कहो नूतन प्राण अपने गान रच दो…
साहित्यकार के दायित्व की पड़ताल करते हुए पंडित जी ने कहा था “…..  दायित्व जाता है नई आँच में पककर द्रव बनने का, द्रव बनकर फिर उमड़ने का। दायित्व जाता है कालशक्ति के चरणरागरंजित मरण के वरणऔर उसके बाद के पुनरुत्थान का, नवसर्जन का। इस दायित्व की जितनी बार पहचान होती है, उतनी बार रचनाकार अहंकार की मृत्यु में नए प्राण पाता है।पंडितजी ने  लिखने की ज़रूरत पर बल देते हुए कहा था  ” अपने को समझाने के लिए, अपनी समझ की अर्थवत्ता पहचानने के लिए, खो जाना चाहता हूँ अपने संबोध्य समाज में और खोकर पाना चाहता हूँ अपने भीतर के उस अंश को जो मेरे बावजूद है, जो मुझे नकार के है, जो उतना ही मेरा है जितना सबका। उस सबके टुकड़े के तकादे के कारण लिखता हूँ।” 
लिखने की यह व्यग्रतायह ज़रूरत वही महसूस कर सकता है, जो  स्वयं को उनकी तरह खोने और खोकर पाने को तैयार हो, हर एक से यह साधना संभव नहीं।                         
मिश्र जी के वैचारिक लेखन में राहुल जी के सान्निध्य का प्रभाव है, जो उन्हें दो  विपरीत राहों पर समन्वय स्थापित करते हुए चलने की प्रेरणा देता रहा। वर्तमान मूल्यहीनता से व्यथित होकर ही उन्होंने कहा होगा,  “मूल्यों का नाटक  बड़ा महँगा सौदा है, इससे मूल्य नहीं गिरते, मूल्यों के लिए सच्चे न्योछावर का चाव गिर जाता है।  वे वर्तमान में उत्पन्न संवादहीनता की स्थिति से संतप्त रहते थे। ये समस्त भाव, समस्त पीड़ा उनके वैचारिक निबंध का आधार बनीं। उन्होंने स्वीकारा भी, ” रचना का उद्देश्य कुछ कर पाने की बेचैनी को उकसा भर देना है, क्योंकि जब तक दर्द है तब तक सृजन है।
     गद्य की लगभग सभी विधाएँख़ासकर जिनमें कम लिखा गया है, मिश्रजी के भाव और विचार की संवाहक बनीं। निबंध मिश्रजी का प्रमुख आयुध बना। चाहे वह  वैचारिक हो, ललित हो या संस्मरणात्मक, या अन्य किसी रूप में, सभी एक दूसरे से गूँथे हुए हैं—  वैसे ही जैसे उनके आधुनिक तर्कशील विचार के साथ उनके परंपरागत संस्कार; करुणापूरित हृदय तो हर विषय पर सवाल खड़े करता सचेत मस्तिष्क। उनके  तरकश में तीरों की कमी नहीं, हर तीर अपनी विशिष्ट गुणवत्ता लिए हुए। किसीकिसी पर व्यंग्य की कलगी भी सुशोभित है। ये बातें भारतीय इतिहास बोध और भारत का प्रबुद्ध मानस‘, ‘गांधी का करुण रस’, ‘रहिमन पानी राखिए’, ‘बसंत : नए होने का दर्द’ ,  ‘अग्निरथ’ , ‘आदर्शों का द्वंद्व’ , ‘पूरब और पश्चिम’, ‘तकनीक और आदमी’ ,’बीज में वृक्ष : वृक्ष में बीज’ , ‘भारतीयता की पहचान’ से लेकर परंपरा बंधन नहीं’ और आधुनिकता मेरी नज़र में‘  आदि निबंधों की अंत:यात्रा करने पर ही महसूस की जा सकती हैं, हाँ महसूसने का ख़तरा तो उठाना होगा, तभी भारतीय इतिहास बोध और भारत का प्रबुद्ध मानसमें (परंपरा बंधन नहीं  से) अपने गौरवपूर्ण इतिहास को पूरी तरह जान पाने की स्थिति में भारतीयमानस में उत्पन्न संकोच भाव को समझ पाएँगे; तभी गाँधी का करुण रसनिबंध में गाँधी जी के आदर्शपरक जीवन की विडंबना का कच्चा चिट्ठा पढ़ने के साथ ही उसमें प्रवाहित करुण धार से सराबोर हो सकेंगे और आज के इस सच से रूरू हो सकेंगे कि गाँधी के विचार, उनके संकल्पउनके आदर्श और स्वतंत्र भारत देश के मूलभूत उत्थान के निमित्त उनके स्वप्न लोप हो गए, रह गए सिर्फ़ गाँधीचित्र में ,रुपये पर, ( अब तो रुपये पर भी उनका चश्मामात्र टंकित रह गया ); सड़क की होर्डिंग पर और विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों में अपने नाम के साथ टंगे हुए। गाँधी टाँग दिए गए हैं अपने आदर्शों और उसूलों के साथ और उनके नाम के खोल में बाज़ार ने अपनी पैठ बना ली है।
     मिश्र जी मानते थे किगाँधी जी के पास दुर्दम्य आस्तिकता का संबल था और यह आस्तिकता भी स्वतंत्र भारत में करुणान्त ही सिद्ध हुई।”  गाँधीजी का जीवन उनके संवेदनशील मन को सोचने पर विवश करता रहा  कि कितनी दूर तक लोक की चिंता हो और कितनी दूर तक अपने निजी संबंधों की चिंता? क्या इन दोनों में विरोध है? यदि है तो क्या उसका समाधान नहीं है? एक और प्रश्न उन्हें  सालता रहा  कि जिस स्वदेशी का दर्शन गाँधी ने दिया वह स्वदेशी देश के सौष्ठव से कितना जुड़ा? ….स्वतंत्र देश में गाँधी स्वयं को अप्रासंगिक मानने लगे, यहाँ  एक आम आदमी प्रश्न करता  है कि क्या जीवन को निरंतर मंथन बनाने वाला गाँधी जैसा आदमी अप्रासंगिक हो सकता है? मिश्र जी की उक्ति, “भारत जीतकर हारता रहा है और हारकर जीतता रहा है। इसकी संस्कृति की बुनावट में कहीं गहरी करुणा के बीज हैं।  समझने के लिए परंपरा और आधुनिकता के मूलार्थ को समझना अपेक्षित है।
देश के प्रति, देश की नैसर्गिक धरोहर के प्रति, देश की पुरातन,अव्यक्त परंपरा के प्रति, शाश्वत मूल्यों के प्रति, मानवीय मूल्यों के हिमायती युगद्रष्टाओं के प्रति पंडित विद्यानिवासजी की आसक्ति उन्हें परंपरावादी व्यक्तित्व मानने का भ्रम भले ही देती हो, किंतु उनकी रचनाओं से गुज़रने वाला हर सहृदय यह स्वीकारने को विवश होगा कि मिश्र जी कोरे परंपरावादी कभी नहीं रहे। उनके लिए परंपराथिर जलनहीं, बहती वेगवती धारा है, जिसमें  मानव समाज या कि समूची वसुंधरा के लिए अनुपयुक्त विषयवस्तुओं को त्याग कर, लोक कल्याण के निमित्त सामग्री साथ लेकर आगे बढ़ते जाना ही उसका प्रयोजन है। मिश्रजी ने भारतीय विचारधारा को परंपरा माना था, परंपरावादी नहीं। हमारा देश हर आधुनिक मूल्य को सहज भाव से स्वीकार कर भी परंपरा से विलग नहीं होता   अपने देश की गौरवमयी परंपरा,से अनजान होने के कारण अपनी परंपरा को संकीर्ण, कुत्सित मानने और प्रगति के लिए पश्चिम का मुँह देखनेवाले भारतीय बंधु को मिश्रजी के निबंध परंपरा बंधन नहींका अवगाहन अवश्य करना चाहिए। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वाहवाही लूटनेवाले कुछ लोग वास्तव में किस तरह संप्रदायी हैं और किस तरह वे भारतीय जीवनदृष्टि की सबसे बड़ी विशेषताअशेष उदारता को दुर्बलता कहकर त्याग देते हैं। इसी का दुष्परिणाम है कि स्वाधीन भारत में शासक और शासित, उद्योगीकरण और कृषि, शहर और गाँव के बीच गहरी अनदेखी खाई है, जिसे समझने के लिए परंपरा का सही अर्थ  समझना ज़रूरी है।
मिश्र जी के ही शब्दों मेंपरंपरा का अर्थ है : पर के भी जो परे हो, श्रेष्ठ से भी जो श्रेष्ठतर हो, जो कभी भूत हो भविष्यत्, जो सतत वर्तमान हो, जो कभी सिद्ध हो, निरंतर साध्य हो।
इसलिए उन्होंने परंपरा को साधना का पर्याय माना, साथ ही उस पर आचार का अनुशासन भी स्वीकारा, ताकि परंपरा एकाग्र होकर, सत्यनिष्ठ प्रवाह को साधे रहे, विचारों को कभी जड़ होने दे और वर्तुल गोलाइयों में ऊर्ध्वगामी हो। वे यह भी मानते रहे कि परंपरा मनुष्य को विचारों से नहीं, विचारों से मनुष्य को बाँधती चलती है। हर परंपरा पुराणी युवतीहै …. वह बिना मरे नया जन्म लेती है। 
मिश्र जी के चिंतन में धर्म की एक व्यापक अवधारणा सजगता से उपस्थित है, जो प्रत्येक को परिचालित करती है। उनका मानना था, धर्म जड़ है समाज और संस्कृति ही ये सभी जीवंत प्रवाह हैं और उनका शोधन होता रहता है। इसलिए परंपरा प्राचीन की थाती मात्र नहीं है। वह बाद में आनेवाले को श्रेष्ठ के रूप में ग्रहण करती है उन्होंने परंपरा के नाम पर शामिल दुर्बलताओं की ओर स्पष्टत: इशारा किया और यह समझाने की कोशिश की कि धर्म के कई अंगों में अनुष्ठान भी एक अंग है मगर इससे भी महत्वपूर्ण हैजीवन के प्रति सम्मानभाव।  
पंडितजी की यही स्वीकारोक्ति रही कि वे स्वयं परंपरा की कचोट को जीते रहे हैं, उनकी विसंगतियों में सुलगते रहे हैं, और इसी प्रक्रिया में बारबार स्वयं को खोकर पाते रहे हैं, उस खोने और पाने को बटोरने की कोशिश करते रहे हैं, किंतु वे परंपरा के भीतर गुज़र करके उसका अतिक्रमण भी करते रहे। उन्होंने अतिक्रमण की राह हमेशा उसके भीतर पाई, बाहर नहीं। ऐसे में उन्हें  निरा परंपरावादीमानना मूढ़ता है और कुछ नहीं। उन्होंने कहा भी है,       
वादी के ऊपर एक संवादी भी होता है। मैं वस्तुत: परंपरा संवादी ही नहीं, नवनवोत्तरवादी संवादी भी हूँ।यह भी किपरंपरा मुझे पीछे नहीं ले जाती, निरंतर आगे की ओर धकेलती है…” परंपरा उनके लिए केवल पोथी नहीं थी, केवल वाचिक गूँज या अनुगूँज नहीं भी नहीं थी,वह जीवित शरीर समान थी। (जीवन की प्यास का आमंत्रण)
इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य पर उन्होंने जनसामान्य का ध्यान खींचा, वह यह कि देश या जाति के लिए हिंदुस्तान या हिंदू नाम देने वाले बाहरी थे।मनु ने धर्म का एकमात्र नाम दिया : मानव। कुछ ने आर्य कहा। बौद्धों ने सद्धर्म कहा। वैदिक या स्मार्त नाम भी आए, पर धर्म को देशबद्ध या विश्वासबद्ध या जातिबद्ध नाम किसी विचारक ने नहीं दिया देश को भौगोलिक सीमा में सिमटाने की प्रक्रिया बाद में शुरू हुई।भारत एक  विशेष परंपरा का वाचक है। इसलिए उसकी धारणा के भीतर वृहत्तर भारत भी समा सका।”  
मिश्र जी ने मध्यकालीन संतकवियों ने सकल मानव, समाज सकल धरा की बात की।  इतिहास सदैव वैर की याद दिलाता है ,अलगाव की बात दुहराता है जबकि  परंपरा सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा पर बल देती है। मिश्र जी इसी परंपरागत उदारता का सोता हर भारतीय के हृदय में बहाना चाहते थे। और सदैव  इस बात के आकांक्षी रहे  कि हम भय या आशंका से नहीं, दिखावे के लिए नहीं, सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा के लिए मज़हबनिरपेक्ष दृष्टि अपनाएँ और इस पर दृढ़ रहें क्योंकि हमारी परंपरा मनुष्य का विराट रूप है। वह अपने को काटकरतोड़कर आगे बढ़ती है। वह बंधन नहीं है, वह मनुष्य की मुक्ति की निरंतर तलाश है।  
प्रकृति के कणकण से नेह करने वाला यह निबंधकार जब विश्वभर में व्याप्त तमाम वादों और उनके माननेवालों  की संकीर्णता से पीड़ित हुआ, जब अपने देशवासियों को वैश्विक समाज में व्याप रही असमानता का अनुचर बनते देख क्षुब्ध हुआ, जब प्रगति के नाम पर प्रकृति का दोहन और धर्म की अज्ञानता के मारे तथाकथित सुधारकों/ ठेकेदारों द्वारा धर्म के नाम पर मानवमानव के बीच वैमनस्य की उत्कट ज्वाला  दहकाते देखा, जब काग़जी टुकड़े के पीछे उन्मत्त जनसमूह को प्रकृति के अनछुए सौंदर्य और अभिव्यंजित संदेश को अनसुना कर दौड़तेभागते, रोबोट बनते पाया तो उनका हृदय विदीर्ण हुआ,जब आधुनिकता के  नाम पर  सोचे समझे बिना, शाश्वत मूल्यों का त्याग कर स्वार्थ की अंधी दौड़ में शामिल अपने लोगों(भारतीयों) को रोक नहीं पाआ तो हृदय विदीर्ण हुआ और ऐसी स्थिति में उनके भावभिव्यक्त हुए
मैं मानवतावादी नहीं हूँ और वादी होकर मानवेतर प्राणी की उपेक्षा करने वाला नहीं हूँ। मनुष्य के भीतर से ही सही, कभीकभी  पर विश्व को आत्मीयता की उत्कंठा से झाँकनेवाले अंतर्मनुष्य का आराधक हूँ।” 
    ‘आदर्शों का द्वंद्वनिबंध भारतचीन की विचारधाराओं के संघर्ष के संदर्भ को समझने की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। मिश्र जी ने जिस तरह परतदर परत विषयवस्तुओं को /तथ्यों को अनावृत किया है, वह उनके गहन अन्वेषण को दर्शाता है,यों तो उनके प्राय: सभी वैचारिक निबंधों में गहन अन्वेषण, पुरातात्विक खोज की झलक मिलती है। यह खोज केवल बाह्य स्तर पर नहीं अपितु भीतरी स्तर भी चलती रहती है, अंतर्गुहा में छिपी रोशनी को ढूँढ़ निकालने जैसा ही कुछ। वे वर्तमान समय में भारत की बदलती मनोवृत्ति और आचार के प्रति चिंतित थे। उनकी चिंता यह भी रही कि जो भारतीय संस्कृति विदेशी आक्रमणों से नहीं टूटी, वह अब टूटने के कगार पर है, क्योंकि हमारे सामने उसका कोई चित्र ही नहीं है। 
     लेखक की पीड़ा वैयक्तिक कारणों से रही हो, ऐसा जान नहीं पड़ता। वे व्यष्टि में समष्टि समाहित करनेवाले युगचेता थे। अग्निरथमें फागुन के बहाने बसंत के उधमी रूप , फूलते रक्ताभ पलाश, छतनार छिउला की छपक की छांह और होली को संदर्भित करते हुए महानगरीय कृत्रिमता पर उनकी उद्विग्नता प्रकट  हुई है  ” अब कोई याद दिलाए भी कि फिर देखो फागुन गया, हर मन पर, प्राण पर, हर अस्तित्व पर डाक पड़ने लगी है, तुम्हारी हैसियत अब इतनी है, तो सुनता कौन है ? अब सब खरीदार हैं, भले ही किसी किसी दूसरी अदृश्य सत्ता के हाथों पहले से  बिके हुए।” 
     ‘बसंत : नए होने का दर्द‘  वसंत में नवसृजन की दारूण प्रक्रिया को आत्मसात् कर, उसे सकल सृष्टि में सकल सृष्टि के लिए की गई सारगर्भित अभिव्यंजना है।  बसंत के साथ नव वर्ष / संवत्सर का आरंभ भारतभूमि के नव साजसज्जा और प्रकृति के कणकण की पुलकन का प्रतीक है। मिश्र जी वन, क्षण और मन का और से और हो जाने को बसंत की पहचान मानते थे वर्तमान में उनकी पीड़ा यही रही कि “यह सब देखनेवाली आँखें अब कुछ विजड़ित हो गई हैं। ….  उन आँखों से झाँकने वाला नागर मन मनुष्य की पहचान भूल गया है।परिवर्तन में ही सनातनता  देखनेवाला देश अब वस्तुवाद की जड़ता में फँसकर एकदम निश्चेष्ट हो गया है।” 
      वस्तुत: पं. विद्यानिवास का संवेदनशील मन बसंत के स्वभाव को भारतीय संस्कृति के मूल स्वभाव के रूप में देखता रहाअपना ही अतिक्रमण, छोटे से रागरंग के रहते हुए महाराग के लिए अपना विसर्जन। उनके अंदर का सच्चा लेखक अपने पोरपोर को  उद्भिन्न करके कुछ और होना जानता था और उद्भिन्न होना बसंत की आवश्यक शर्त है। 
     इसी प्रकार, ‘क्या पूरब क्या पश्चिममें सांस्कृतिक आचारविचारों में तादात्म्य और भिन्नता से व्यक्तित्व पर पड़ते प्रभावों की व्यापक जाँचपड़ताल की गई है। भारतीयता की पहचान के अंतर्गत जाति, नस्ल, प्रांत,क्षेत्र के नाम पर अपनी पहचान को संकुचित बनाते व्यक्ति की मनोवृत्ति के कारण पनपते दुष्प्रभाव को रेखांकित करते हुए भी, विश्व भर में हमारे सहज आचरण किस प्रकार हमें भारतीयता की पहचान देते हैं, मिश्र जी ने इसे अपने जीवन में घटित प्रसंगों के दृष्टांत द्वारा बेहतर उकेरा है। जैसे आदमी प्यार करता है तो वह आँखों में जाता है, क्रोध करता है चेहरे पर जाता है, वैसे ही भारतीयता भी व्यक्त हुए बिना नही रहती। (नैरंतर्य और चुनौती)
    ‘तकनीक और आदमीमें अंधाधुंध तकनीकी विकास द्वारा मानव जीवन को सुविधाजनक बनाने की समझदारी के प्रति उन्हें गहरी चिंता थी जिसकी वजह से कहीं कहीं मनुष्य के अंदर का मानव मिट गया या अधमरी हालत में पहुँच गया।  मिश्र जी ने सृष्टि के कणकण के साथ अपनी संवेदना को एकाकार किया था। जीवमात्र की सुरक्षा, उनकी सुखसुविधा, प्रकृति के प्रत्येक अंग, चाहे वह वृक्ष हो, फूल हो, फल हो या हवापानी, और सूरजचाँद से धरा पर उतर आती रोशनीहर एक के साथ मानव जीवन के अटूट संबंध तथा मानव के निसर्ग मन को टटोलने के साथ ही प्रकृति के आईने में मानव की उत्तरोत्तर बदलती छवि की मीमांसा की है।
   रहिमन पानी राखिए में इस विलक्षण रचनाकार ने वर्तमान समाज में मानवीय मूल्यों के हो रहे हनन और देश के विकास के नाम पर उत्पन्न भ्रामक स्थिति को लक्ष्यकर ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में अपनी बात रखी। वे वैज्ञानिक विकास के विरोधी नहीं थे, मगर विकास के  प्रत्यक्ष स्वरूप से असंतुष्ट होकर ही उन्होंने बारबार प्रश्न खड़े किए कि आज इतना साहित्य लिखा जा रहा है और उसमें से कितना है जो आँखों में पानी भर सके, कितना है जो पूरी तरह भीतर से झकझोरकर रख दे, हर शिक्षा को झनझना दे? और उन्हें बारबार एक ही उत्तर मिलता रहा , “वह ताप नहीं है जो द्रव की रचना करता है, वह तप नहीं है जो पानी बनता है।निस्संदेह, मिश्र जी कृत्रिम विकास और ओढ़ी गई आधुनिकता के विरोध में खड़े थे , कि वैचारिक स्तर पर मौलिक आधुनिकता के जो देश को वास्तविक विकास दे।
     बीज में वृक्ष : वृक्ष में बीज निबंध में मिश्र जी का सूक्ष्म पर्यवेक्षण नज़र आता है। बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया के साथ ही वृक्ष में बीज अर्थात् नव सृष्टि की संभावना के माध्यम से उन्होंने भारतीय चिंतनधारा को समझाने का प्रयास किया, वह चिंतनधारा जिससे हम तथाकथित आधुनिक, स्वयं को अनजान रखकर तथा उससे विमुख रहकर अपनी आयातित बौद्धिकता का परिचय देते हैं। वृक्ष और बीज दोनों बदल जाते हैं। जो नहीं बदलता, वह है नए संस्कारों को लेकर नवसंस्कृत के रूप में बदलने का स्वभाव।इस  विचार की पुष्टि उन्होंने ज्ञान के संदर्भ में भी की है।” (भारतीय चिंतनधारा)
   कुछ एक बुद्धिजीवियों के अनुसार मिश्रजी परंपरावादी हैं आधुनिकतावादीवे  पलायनवादी हैं ;उनकी आधुनिकता किताबी और परंपरा अदृश्य है , तभी तो  किसी और को नहीं दिखती ! मिश्रजी की  संवेदना व्यथित होती है ऐसे प्रश्नों पर ,अपनी परंपरा के गहरे जाकर अन्वेषण करने वाला और तर्कतुला पर नापतौल कर अपने विचार रखनेवाला निश्चल और पारदर्शी मन कहीं कहीं से टूटता है और तब उनकी व्यथा इस रूप में फूट पड़ती है,
   “कैसे कहूँ कि जड़ें दिखें तभी पेड़ की ज़िंदगी है, जड़ें उघर जाएँ तो पेड़ मर जाए! मैं कैसे कहूँ कि किताबें इतनी जड़ नहीं होतींवे गूँज होती हैंउन गूँजों में आदमी अपना खोया स्वर वापस पा जाता है।”  (अंगद की नियति
    पंडित जी परंपरावादी माने जाने  के कारण ख़ारिज़ किए जाने की चर्चा से व्यथित नहीं होते थे ,पर इस बात को लेकर चिंतित अवश्य होते रहे कि कोई परंपरावादी सही परंपराविवादी ही बने किंतु उससे तटस्थ कैसे रहे जो उसकी ज़मीन है। उनका तर्क सदैव यही रहा कि अपने पहले का अनुभव, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी प्रक्रिया, यह सब इसलिए तो दिया हुआ नहीं है कि कूड़ेदान में बिना जाँचेसमझे डाल दिया जाए। वे बारबार कहते रहे, “आप स्वयं जाँचोफिर जो चाहे सो करो। पर दूसरों के फतवे पर अपने घर को पराए से बदतर मान लेना कहाँ तक उचित हैइस पर ज़रा सोच लो।”  इसी संदर्भ में उन्होंने स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रगति के नाम पर मूल संस्कृति पर हो रहे आघात और सामाजिक असमानता के बढ़ते ग्राफ़ की ओर जनसाधारण का ध्यान खींचा। कईएक तथ्योंप्रसंगों और घटनाओं के जीवंत दृष्टांतों द्वारा उन्होंने सिद्ध किया किइस प्रौद्योगिकी और समृद्धि ने जो संस्कृति के नाम पर परोसा है, वह एक सीमित और आधीअधूरी दृष्टि है जो दिग्भ्रमित करती है और जीवन की संभावनाओं को क्षीण करती है।” 
  अपने ऊपर लगाए गए आक्षेपों से वे कभी विचलित नहीं हुए, वही कहा, जो उन्होंने महसूस किया। और यह अनुभूति उनके गहन अध्ययन, विषयों का सूक्ष्म पर्यवेक्षण, देशदेशांतर भ्रमण का परिणाम है। ‘आधुनिकता मेरी नज़र में में उन्होंने जो भाषा शैली  अपनाई, वह उनकी सहज अभिव्यक्ति, अभिव्यंजनाकौशल  और उत्कृष्ट सम्प्रेषणक्षमता की परिचायक है। कहना होगा कि वे भाव और कला के पारखी होने के साथ ही  भाषामर्मज्ञ भी थे। बानगी देखें,  ” ‘आधुनिकताएक बहुत ही सताया हुआ शब्द है। हर अटपटापन आधुनिकता के नाम से ऐसा चटपट बिक जाता है कि खरीदार निराश लौट जाते है।”  
     व्यंग्य का परिधान ओढ़े यह निबंध अपने अंदर इतने गहरे विचार का शरीर धारण किए हैइसमें बिना प्रवेश किए,बिना उतरे कोई नहीं कह सकता। मिश्र जी ने खुले तौर पर कहा,
 ” आधुनिकता काल की चेतना है, पर काल की रूढ़ि नहीं है, यह बात अगर समझ ली जाए तो बहुत सारे भ्रम इस संबंध में अपने आप छँट जाएँ।वे मानते थे कि आधुनिक होने का अर्थ अपनी आधारभूमि और अपने आसपास के वातावरण, उसकी आबोहवा को पहचानने के साथ ही अपनी गति और गति की वस्तुस्थिति की पहचान करना है। वे यह भी मानते थे कि  “यह पहचानना कभी भी चुकता नहीं, इसलिए देश और काल बदल सकते हैं, पहचानने का भाव  नहीं बदलता, क्योंकि वह तो प्रक्रिया है, पहचानी जानेवाली परिस्थितियाँ  बदलती हैं, पहचानना बना रहता है।
     किंतु यह भी कोरा सच है, जब व्यक्ति पहचानना छोड़ देता है तब वह वर्तमान के मोहपाश में घिरा, विभ्रम को जीता है और ऐसी स्थिति में  वह आधुनिक नहीं रह जाता, उसका आभास बन जाता है। मिश्र जी आधुनिकता को सजगता मानते थे जो अपने  परिवेश, समाज, समाज द्वारानियत मार्ग, निजी क्षमता और अक्षमता के प्रति होती है। उन्होंने मध्ययुगीन उन संतों की आधुनिकता का संकेत दिया जिन्होंने पुरानी मान्यताओं के चोले को उतार फेंका और दिगंबर हो गए। उन्होंने यह स्वीकारा कि आधुनिकता किसी जानेमाने मूल्य की हीनता पहचान लेती है और ही मूल्य के फ़रेब से छूटना चाहती है और इस संदर्भ में धूमिल के विचार के साथ अपने विचार का तादात्म्य स्थापित करते हैं। 
   धूमिल के शब्दों में— “आज किसी भी स्तर पर आदमी जीवित रहना चाहता है और इसके लिए वह प्रयत्नशील है। यह मूल्यहीनता नहीं है, केवल स्वीकृत मूल्यों से इसका तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। खड़ा रह सकने के लिए वह भाग रहा है और यह तथ्य अब आम हो गया है कि आज का आदमी अपने वातावरण से पलायन नहीं कर रहा , बल्कि अपने वातावरण के साथ पलायन कर रहा है।” 
 मिश्र जी के लिए आधुनिकता का अर्थ पश्चिमी बाना धारण करना मात्र नहीं है। उनकी दृष्टि में आयातित विषयवस्तु को अपने देशकालगत परिस्थिति में रखकर उसकी मूल्यवत्ता का परीक्षण करना आधुनिकता की पहली शर्त है, कि नकल करनासाथ ही अपने सामाजिक परिवेश की संवेदना की कसौटी पर कसकर देखना भी अनिवार्य है, इसके उपरांत ही उस विषयवस्तु को अंशत: या पूर्णत: अपनाने  या छोड़ने का  निश्चय करना आधुनिकता है। अज्ञेय की भाँति ही वे भी मानते थे  कि हम भारतीय काल की निरवधि शाश्वत आयाम में और आधुनिक इतिहास की सतही समयबद्धता मेंअब भी एक साथ जी सकते हैं क्योंकि हमारी आस्था इतिहास में नहीं सनातन लीला में रही, इसलिए हमारी आधुनिकता इतिहास के प्रति आस्थावान होते हुए भी उसे बोझ की तरह ढोते पश्चिम की अपेक्षा अधिक सार्थक होगी। उनका आत्मकथ्य
  मेरी आधुनिकता आपके ओढ़े हुए संशय में छेद करने वाले संशय से शुरू होती है। …… मैं …… श्रीकृष्ण को ….. प्रश्वसित होने होने से प्रमाणित या अप्रमाणित अपने जीवन में करना चाहता हूँ, अपने समाज के साथ इनकी कितनी एकात्मकता है, इससे करना चाहता हूँ।…… जिनको आप निपट गँवार समझते हैं,उनके पास भी समझदारी है, उस समझदारी में विनम्र होकर साझीदार बनने के लिए वृंदावन जाता हूँ। मेरी वृंदावनयात्रा पलायन नहीं, साक्षात्कार है अपना और अपने समाज का। …. जाहिल जपाट आदमी की अचेत विश्वदृष्टि को—–  उसके सचेत जीवन में उभारना चाहता हूँ और सचेत साक्षर आदमी को उन अचेतों की आँख देना चाहता हूँ। दे पाऊँ, यह मेरी कमजोरी है और इस कमजोरी का एहसास, इसकी तड़पन मेरी आधुनिकता है।
     उनके इस आत्मकथ्य के बाद इस विवाद के लिए कोई जगह नहीं बचती कि वे परंपरावादी थे या आधुनिकतावादी। वे वस्तुत: दोनों के बीच का सेतु थे जिसे शिक्षाविद् प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र जी ने स्वीकारते हुए कहा, “उनकी रचनाओं में विचारों से टकराव भी है और नए ढंग से सोचने का आमंत्रण भी जीवन के छोटेबड़े हर तरह के सुखदुख से रूरू कराते उनके निबंध आत्म साक्षात्कार कराते हैं और उसी के माध्यम से विश्वचेतना या सर्वात्मा के साथ जोड़ते भी हैं।” (विद्यानिवास मिश्र रचना संचयन ; चयन एवं संपादनगिरीश्वर मिश्र )
 मिश्र जी क्या थे, क्याक्या थे? कितने ऊँचेकितने गहरे? कितने प्रकटकितने गूढ़? इसे समझनासमझ पाना क्या इतना आसान है? नहीं! वैचारिक निबंधों की बात करूँ तो कतई नहीं। उसके लिए रसज्ञ सुधी पाठकों को  किसी भी पूर्वाग्रह से स्वयं को मुक्त रखते हुए, मेरे साथ  बस जल में उतर जाना होगा और तब तक आगे बढ़ते जाना होगा जब तक कि आकंठ निमग्न हो जाएँ। आकंठ निमग्न होना भी कहाँ इतना आसान है! कभीकभी इसके लिए स्वका चोला उतारना होता है, कँटीले पौधों से छिलनेरक्त रंजित होने को तैयार रहना होता है,तब कहीं जाकर गहरी पैठ होती है ,फिर सुनाई पड़ती है वह अनकही ध्वनि जिसे किनारे बैठ, सुन पाना असंभव है। मिश्र जी की रचनाओं की अंतर्गूंज को सुन पाने में असमर्थ बुद्धिजीवी ही उन्हें किसी वाद की संकीर्ण परिसीमा में क़ैद करने की कोशिश करते हैं या उन्हें पलायनवादी कहने की हिमाक़त करते हैं। मिश्र जी परंपरा और आधुनिकता का अनुपम समावेश हैं। विचार और हृदय का अतुल समन्वय इनकी प्रत्येक रचनाओं में विद्यमान है। यही कारण है कि तो ललित निबंध विचारशून्य हैं, वैचारिक निबंध बौद्धिकता से बोझिल। हृदय और मस्तिष्क दोनों का समायोजन कर दृष्टि को तथ्यों/ तत्वों की विराटता के दर्शन हेतु स्वतंत्र छोड़ने और उसके कहे को जाँचपरखकर आत्मसात करने और पुन: संसार के समक्ष रचना के रूप में समर्पित करने का उनका भाव और रचनाकौशल उन्हें श्रेष्ठ शिल्पी के रूप में प्रस्तुत करता हैपत्थर को काटछील कररगड़ कर , उसमें निहित अमूर्त्त को मूर्त कर, उसे नवजीवन देनेवाला शिल्पी। शिल्पी ही तय करता है कि पत्थर को पूजायोग्य बनाना है या सजावट योग्य। पत्थर वही होता है, शिल्पी की कारीगरी ,उसकी कलाकारी हमारे अंदर भावना का संसार रचती है। ठीक यही शिल्प मिश्र जी की रचनाओं में दिखता है।
     निबंधकार के शब्दों में,  ” मेरा परिवेश मैं स्वयं हूँ, क्योंकि मैंने जिस जगह को , जिस आदमी को, जिस संस्कृति को जितना जिस रूप में पाया है, उतना ही तो मेरे लिखने में आया है। मिट्टी अपनी है, चाक अपना है, रस अपना हैअपना सिर्फ़ वह ताप है, जो रचना और रचनाकार दोनों को निर्धूम आग में जलाता है और तब रंग देता है।….. इस रंग का मज़ा तो उस रसिया को मिलेगा, जो इसमें भरेगा, उससे अधिक उसे मिलेगा जो उसे मिएगानए सकोरे में तर किए जल को, जल को ही नहीं, मेरी गरम उसांसों की सोंधी गंध को भी, मेरी संपूर्ण इयत्ता को।” (कहो कैसा रंग है ; अंगद की नियति)
संदर्भ
पं. विद्यानिवास मिश्र की कृतियाँ 
1.गाँधी का करुण रस 
  1. वसंत गया पर कोई उत्कंठा नहीं
  2. छितवन की छांह
  3. फागुन दुई दिना रे
  4. भारतीय संस्कृति के आधार
  5. रहिमन पानी राखिए
  6. तुम चंदन हम पानी
  7. विद्यानिवास मिश्र रचना संचयन : संचयन संपादनप्रो. गिरीश्वर मिश्र; साहित्य अकादेमी, दिल्ली
डॉ. आरती स्मित  
पता : डी 136, द्वितीय तल, गली . 5, 
गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स    
दिल्ली-110092 
मोब. . 8376836119 
ईमेल : [email protected] 
ब्लॉग : smitarti.wordpress.com 


आरती स्मित
आरती स्मित
तीन कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, दो बाल साहित्य, दो आलोचना संग्रह, 40 से अधिक पुस्तक अनुवाद, धारावाहिक ध्वनि रूपक एवं नाटक, रंगमंच नाटक लेखन, 20 से अधिक चुनिंदा पुस्तकों में संकलित रचनाएँ, बतौर रेडियो नाटक कलाकार कई नाटकों में भूमिका. विभिन्न उच्चस्तरीय पत्रिकाओं में सतत लेखन. सत्यवती कॉलेज,दिल्ली में अध्यापन. सम्पर्क - [email protected]
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