कश्मीर धरती का स्वर्ग है यहां औरत का घर की चारदीवारी से निकलना एक सामाजिक आंदोलन है? कुछ अजीब -सी बात है ना! लेकिन चौंकाने की बात नहीं है नटीपुरा श्रीनगर की महिलाओं ने अपनी शक्ति को पहचान है। अपने पिछड़ेपन पर लात मारने अपना विरोध व्यक्त करने और उन जंजीरों को तोड़ने का जिनमें वे जकड़े हुए हैं कोई -ना कोई तरीका महिलाएं निकल ही लेती हैं कभी-कभी यह तरीका अजीबो-गरीब होता है।
कश्मीर में औरतें अपनी बात कह नहीं सकती थी धर्म के नाम पर समाज के नाम पर उनके पैरों में बेड़िया डाली जाती आजादी और गतिशीलता को अभिव्यक्त करने के लिए प्रतीक के रूप में अपने अंदर छुपे हुनर” खाना” बनाने को उन्होंने चुना।
अगर हम दस वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को अलग कर दे तो इसका अर्थ यह होगा कि यहां महिलाओं के एक चौथाई हिस्से ने स्वादिष्ट खाना बनाना अपनी नानी, दादी, मां से सीख लिया और इन महिलाओं में से सतर हजार से भी अधिक महिलाओं ने प्रदर्शन एवं प्रतियोगिताओं जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़े गर्व के साथ अपने नए कौशल का प्रदर्शन किया।
नटीपुरा, बारामूला के मुख्य इलाकों से अत्यंत रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से आई युवा मुस्लिम लड़कियां अपने हाथ का बना हुआ गरम-गरम खाना लोगों को खिलाती हैं।


You are the best shine bright like a diamond we are proud of you mama
Best wishes from Vrishty ❤️
कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद एक बदलाव यह भी आया कि सात पर्दों के अंधेरे में दम तोड़ती मुस्लिम महिलाएं भी अब दुनिया के उजाले में आ रही हैं, अपनी आर्थिक दुनिया खड़ी कर रही हैं.
मुक्ति जी ने इस बदलाव को रेखांकित करने का अच्छा प्रयास है.
जी बहुत बहुत धन्यवाद,आप को रिपोर्ताज पसंद आया
Well done ✅✅ mukti jee proud of you.
Thxs tejender jii
उत्कृष्ट आलेख
बहुत बढ़िया आलेख सूचनाप्रद.
बहुत बहुत धन्यवाद
आदरणीय मुक्ति जी !
इसे पढ़कर बहुत अच्छा लगा, आश्चर्य भी हुआ और उतनी ही अधिक खुशी भी हुई। कश्मीर जैसी जगह के लिए यह पढ़ना आश्चर्य जनक है! किंतु फिर भी किसी क्षेत्र में तो मुस्लिम महिलाएँ आगे बढ़ीं। उन्होंने अपनी अहमियत और आजादी के महत्व को समझा। भले ही वह खाना बनाने का काम क्यों ना हो। सदियों से बेड़ियों में जकड़ी हुई मुस्लिम महिलाओं ने अपने अस्तित्व को पहचाना। संसार में अपने होने को महसूस किया। सच में बहुत ही अधिक अच्छा लगा! इस बेहतरीन रिपोर्ताज के लिए,कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं की इस पहल और आजादी के लिए, अपने महत्व को समझने के लिए, स्वयं को पहचानने के लिए ,अपने स्वाभिमान को जाग्रत करने के लिए,तहेदिल से बधाइयाँ और अंतर्मन से उनके लिए शुभकामनाएँ हैं। ईश्वर उनके हर काम में सहायक हो।
मुक्ति के माध्यम से, मुक्ति की लेखनी से, कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति की बात को सुनकर बहुत अच्छा लगा।
इस रिपोर्ताज के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ आपको मुक्ती जी!
काश कभी हम भी कश्मीर घूमने जा पाएँ और आपसे मुलाकात हो पाए। पर यह संभव लगता नहीं!
प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का बहुत-बहुत शुक्रिया!
पुरवाई का आभार तो बनता ही है!
जी बहुत बहुत धन्यवाद, आप को रिपोर्ताज पसंद आया।
पाठकों का प्यार यूं ही मिलता रहे। कश्मीर में आपका स्वागत है।
बहुत सुंदर लिखा आपने .काश्मीर की.महिलाओं का दर्द हमेशा अछूता रहा है.अब उनका जीवन भी संवर रहा है.वे.प्रगति और विकास की.भाषा समझने लगी है .वह भी अपने हौसलों और दृढ़ संकल्प के बल पर।जो.हुनर उनके पास पीढियों से है वही उनका संबल बन गया है।साधुवाद मुक्ति जी.आपने इन पर कलम चलाकर सबको प्रेरणा दी है कि जब कठिन संघर्ष और चुनौतियों का सामना कर काश्मीर की महिलाए आगे बढ सकती हैं तो विकास संभव है।बहुत बहुत बधाई. शुभ कामनाए..
बहुत बहुत धन्यवाद
कश्मीर की महिलाओं ने इस ओर रुख अपनाया है अपनी तरक्की का, अपनी आजादी का– यह बहुत ही प्रसन्नता की बात है! मैं भी कश्मीर में ही रहती हूं उम्मीद है एक दिन मैं भी यह देख पाऊंगी। फिलहाल आपको बधाई है यह रिपोर्ट देने के लिए।
बहुत बहुत धन्यवाद,आप को रिपोर्ताज पसंद आया