साहित्य अपने समय विशेष की राजनीतिक, सामाजिक ,धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों के परिणाम स्वरुप सृजित होता है। वह मानव जीवन के विविध पक्षों को सत्यता और कल्पना के मणिकांचन योग से इस प्रकार उद्घाटित करता है कि प्रत्येक पाठक को वह अपना जीवन सत्य लगने लगता है। परिस्थितियों के साथ साहित्य में भी बदलाव देखा गया। इसी प्रकार राष्ट्र किसे कहते हैं? इस संदर्भ में भी परिभाषाओं में परिवर्तन आया। गोविंद राम शर्मा का अभिमत है कि राष्ट्र के व्यक्तियों के एक साथ मिलकर रहने और सामूहिक रूप से अपने देश की उन्नति के विषय में सोचने की इच्छा ही राष्ट्रीय भावना कहलाती है।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्थ में देश की जनता में स्वाधीनता अथवा राष्ट्रीयता की भावना अधिक विकसित होने लगी। प्रथम विश्व युद्ध (1914 – 1918 ) के उपरांत राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में तीव्रता से परिवर्तन आया। भारत में भी जनांदोलन का आरंभ हुआ। सन् 1916 में गांधी जी के प्रभाव स्वरूप यह आंदोलन शिक्षितों , मजदूरों और किसानों के मध्य फैल गया और दासता से मुक्ति की इच्छा बलवती होने लगी। सभी मानने लगे कि जिस समाज में रूढ़ियों, सड़ी गली मान्यताओं और परंपराओं का प्राचुर्य होगा वह समाज राष्ट्र को भी पतनोन्मुख करेगा।
आधुनिक काल में स्वाधीनता संग्राम ने संपूर्ण हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का विकास किया। स्वतंत्रता प्राप्ति तक कविताओं के माध्यम से कवियों ने जनमानस में राष्ट्रीय चेतना को प्रज्ज्वलित किया। छायावाद भी इसका अपवाद नहीं है। छायावाद 1918 – 1936 के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का अभिमत है कि “वह कविता छायावादी है जिसमें मानवतावाद, शास्त्रीय कठिनाइयों के प्रति अनास्था, सांस्कृतिक चेतना व आध्यात्मिक व्याकुलता की अभिव्यक्ति है।” (1)
छायावादी कविता में राष्ट्रीय जागरण और स्वतंत्रता प्रेम की अविरल धारा प्रवाहित होती दिखाई देती है। इस समयावधि में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई यथा जलियांवाला बाग हत्याकांड, महात्मा गांधी द्वारा प्रारंभ किया गया असहयोग आंदोलन , लाजपत राय द्वारा साइमन कमीशन का बहिष्कार इत्यादि । इन सभी घटनाओं ने इस समय के कवियों को प्रेरित किया। छायावाद के प्रमुख चार स्तंभों–प्रसाद ,पंत ,निराला और महादेवी के साथ–साथ छायावादी अन्य कवियों ने भी स्वतंत्रता को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा। इन्होंने समस्त दीन–दुखियों–पीड़ितों के संत्रास को अपनी कविताओं में वाणी देने का प्रयास किया।
छायावादी कवियों ने अपनी रचनाओं में राष्ट्रीय जागरण की बात की है। वर दे वीणा वादिनि वर दे (निराला),
जागो फिर एक बार (प्रसाद ),
अरुण यह मधुमय देश हमारा (प्रसाद, चन्द्रगुप्त नाटक)
आदि रचनाएं इसी बात का प्रमाण हैं। माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा नवीन, श्यामनारायण पाण्डे, केदारनाथ मिश्र इत्यादि ने भी राष्ट्रीय बोध से ओतप्रोत रचनाएं लिखी। इस दृष्टि से माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा महत्वपूर्ण है। युगयुगान्तर तक जनमानस इससे देशभक्ति की प्रेरणा ग्रहण करेंगें।
“चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी–माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक”(2)
मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कविताओं में अतीत का चित्रण कर भारत को सर्वशक्तिमान बताया है। देश विदेश से लोग यहां आकर ज्ञान विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करते हैं। भारत देवलोक के समान सुन्दर है, अतः इसके गौरव की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का प्रथम कर्तव्य है।
“देखो विश्व में हमारा कोई उपमान नहीं था
नर देव थे हम , और भारत देव लोक समान था। (3)
गुप्त जी ने अपनी रचनाओं में राम–कृष्ण की वीरता का अनुपम गौरवगान किया है; जिससे भारतीय नौजवानों में वीरता के भाव जागृत हो सकें और वे अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और सम्मान को वापस ला सकें। जयद्रथ–वध (खंडकाव्य) में उन्होंने महाभारत कालीन वीर योद्धाओं की वीरता को लिपिबद्ध करते हुए सबको उन जैसा बनने की प्रेरणा दी है।

बहुत अच्छा लेख है रुचिरा जी आपका! हमने बिल्कुल पूरा का पूरा पढ़ा।छायावादी चार स्तंभों के दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया। जितने भी उदाहरण आपने उद्धृत किए सब एक से बढ़कर एक हैं।कुछ पढ़े हुए हैं कुछ बिना पढ़े हैं ,लेकिन उस समय की रचनाएं इतनी अधिक श्रेष्ठ होती थीं व समयानुकूल थीं जिनको पढ़कर आज भी मन आप्लावित हो जाता है। आपका यह लेख बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण है। काफी मेहनत की है आपने इस पर। काश आज का भारत इन चीजों को समझ पाए। जिन नेता लोग इन चीजों को पढ़ ही नहीं पाए हैं वह क्या शासन को संभालेंगे, फिर चाहे वह कोई भी हो।
बेहद बेहद शुक्रिया आपका इस लेख के लिए।