Saturday, May 16, 2026
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डॉ. (प्रो.) रुचिरा ढींगरा का लेख – समकालीन कहानियों में बदलते मूल्य और संवेदनहीनता

मनुष्य जब तक स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति  का परित्याग नहीं करेगा तब तक नैतिक मूल्य कहीं ना कहीं दबे रह जाएंगे। आज के युग में मूल्य अपना अस्तित्व कहीं खो रहे हैं। हम भूल रहे हैं कि प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा इत्यादि शाश्वत मूल्य ही हमें मनुष्य बनाते हैं और जब मनुष्य जीवन में इन मूल्यों का विघटन होता है तब व्यक्ति पशुत्व से भी कहीं नीचे चला जाता है।
हेतु भारद्वाज कीअनुबंधरचना नारी के त्याग और उदात्त  चरित्र को रेखांकित करती है। अविवाहित अर्चना मूल्य संक्रमण के युग में भी अपनी पवित्रता को बनाए हुए है।  वह अपने ऑफिस में बॉस के बच्चों के साथ ममत्व पूर्ण संबंध रखती है। बॉस की पत्नी के देहावसान के उपरांत वह बच्चों के प्रति अपने प्रेम के कारण उनसे विवाह का प्रस्ताव रखती है। स्वीकृति मिलने पर वह अपने मातापिता और छोटे भाई बहनों के प्रति अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखकर बॉस के सामने एक शर्त रखती है कि -“मेरी भी एक शर्त है। मैं नौकरी नहीं छोडूंगी और अपने वेतन से एक भी पैसा आपको नहीं दूंगी। वह मैं अपने पिता को भेजूंगी “(1) कुलदीप बग्गा कीउपयोगपुरुष सत्तात्मक समाज में पुरुष के नारी के प्रति दृष्टिकोण को बताती है। जितेन्द्र मानता है कि नारी की सार्थकता केवल अपने जीवन में आए पुरुष को प्रसन्न रखने में है इसलिए वह अपनी सुन्दर पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध नौकरी करने के लिए बाध्य करता है।
मणि मधुकर कीसत्यवानदरकते दाम्पत्य जीवन को सफलतापूर्वक उद्घाटित करती है। दाम्पत्य संबंधों में विश्वास एक निष्ठता का होना अनिवार्य है। यदि ये दोनों मूल्य हों तो संबंधों में आई दरार को खाई बनते देर नहीं लगती।  कहानी में प्रोफेसर सत्यवान शुक्ला की पत्नी कपिला के एक मंत्री के साथ अनुचित संबंध हैं। वह अपने पति से मुक्त होने के लिए उसे विष  देने में भी संकोच नहींकरती।  भाग्यवश शुक्ला बच जाता है। अपने कृत्य को छुपाने के लिए कपिला उसे समझाती है कि वह उससे बहुत प्रेम करती है और हॉस्पिटल का डीलक्स रूम मंत्री की कृपा से ही प्राप्त हुआ है। शुक्ला जी को उन पर संदेह नहीं करना चाहिए।
पारिवारिक संबंध निरंतर बिगड़ रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी बना दिया है कि संबंध उसके लिए सिर्फ सेतु का काम करते हैं। भीष्म साहनी कीचीफ की दावतमें अनपढ़, ग्रामीण, बूढ़ी मां  श्यामनाथ के लिए, घर के फालतू सामान की तरह हो गईं थीं, जिन्हें बॉस से छुपाना अनिवार्य था। इसी प्रकारबीच के लोग‘, ‘वापसीकहानियों में धन, प्रभुत्व की कामना के कारण घर में बुजुर्गों से युवा पीढ़ी बगावत और अभद्र व्यवहार करती है। पिछली पीढ़ी को भी यह समझना होगा कि समय के साथ उन्हें भी बदलना है परिवर्तन शाश्वत सत्य है। यदि अभिभावक हर समय बच्चे को ग़लत घोषित करते रहेंगे तो बच्चे भी एक सीमा के उपरांत उनसे अलग हो जायेंगे। रमेश बक्शी कीपितृ ऋणमें पिता बेटे से केवल इसलिए क्षुब्ध हैं क्योंकि वह प्रेम विवाह करना चाहता है। इनकी ही अन्य कहानीपिता दर पितामें पितापुत्र के मध्य का तनाव इतना बढ़ जाता है कि दोनों के मध्य की दरार खाई का रूप ले लेती है। यहां तक कि बेटा सोचने लगता है कि – “मैं किसी भी पुत्र के रूप में जब अपने को देखता हूं और पिता के कारण खंडहरों में बैठे अपने अकेले भविष्य की तस्वीर सामने आती है तो इतना बूढ़ा हो जाने पर भी एक ही तबीयत होती है कि किसी पिता की हत्या कर दूं।” (2) कहानी में नायिका तो अपने पिता के संबंध को अंकुश मान लेती है महीप सिंह कीकीलमें भी पिता पुत्र के प्रेमविवाह करने के निर्णय से असहमत है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत निकटतम संबंधों में भी स्वार्थ ने जन्म ले लिया। अब पतिपत्नी, मांबच्चों के बीच देनलेन का रिश्ता रह गया है। कमलेश्वर कीदेवा की मां‘, शिव प्रसाद सिंह कीदादी मां‘, मोहन राकेश कीआर्द्राइन सभी कहानियों में त्यागमयी, ममतामयी मां और बच्चों के संबंधों को लिपिबद्ध किया गया है। ज्ञान रंजन  कीअमरूद का पेड़‘  में मां की रुढ़िवादी सोच उसके और पुत्र के मध्य एक तनाव और ऊब उत्पन्न कर देती है। दूधनाथ सिंह कीरक्तपातमें, पुत्र अपनी मां की पीड़ा को समझता है किंतु इतना भावुक भी नहीं है कि उसके लिए सबकुछ छोड़ दे। विजय चौहान कीमुक्तिमें मां अतिशय पुत्र मोह के कारण उसपर आधिपत्य स्थापित करना चाहती है; किंतु पुत्र का ऐसे में दम घुटता है। वह सोचता है कि – “जो स्त्री उसके सामने बैठी थी, वह कभी उसकी मां थी, वह उस मां को प्रेम करता है जब वह जवान थी, सुंदर थी, लेकिन वर्तमान में ऐसा कुछ नहीं है अतः मां  से प्यार नहीं करता है।“(3)
ईश्वर शरण सिंहल  कीनहींनहींकी नायिका  ‘मणि’, पुत्र को सुरक्षित उज्जवल भविष्य देने केलिए पति के देहांत के उपरांत रोना छोड़कर, अपने भविष्य की  चिंता नहीं करती और नौकरी करने लगती है। बेटे को डॉक्टर बनाती है;  किंतु वही बेटा विवाह के बाद अपनी मां को अकेला छोड़कर चला जाता है। 
मां बेटी के संबंधों को व्यक्त करने वाली कहानियों में अमरकांत की कहानीअसमर्थ हिलता हाथ‘, भीष्म साहनी कीकटघरे‘,  गिरिराज किशोर कीचूहेइत्यादि को लिया जा सकता है। इनमें रूढ़िवादी सोच के परिणाम स्वरूप मां अपनी बेटी के प्रेम संबंधों को स्वीकार नहीं कर पातीं और उसे मारती हैउसपर अत्याचार करती हैं या बुराभला कहती हैं। अतः बेटी भी सभी मर्यादाओं को त्याग कर, प्रतिकार करती है। गिरिराज किशोर की चूहेकहानी कीसविता’, अपनी मां के व्यवहार से इतना आक्रोश में भर उठती है कि उसे बिना किसी संकोच के जवाब देती है– ‘आप हमेशा यही समझती हैं, लड़कालड़की मिलते ही वही सब कुछ करने लगते हैं। जब उसकी मां उसके पिता के साथ होती हैं तो वह उनसे बदला लेने के लिए कमरे की बत्ती जलाकर चीखने लगती है। इन सभी कहानियों में परंपरागत मूल्यों से मुक्त होने की तिलमिलाहट दिखाई देती है।
समकालीन  कहानीकारों ने कुछ नवीन संवेदनाओं को अपने लेखन का आधार बनाया है, यथा प्रेम संबंधी नवीन मूल्यों, दाम्पत्य जीवन में तनाव, संबंधविच्छेद की स्थिति, नारी का आर्थिक दृष्टि से सक्षम होना, ऊब, घुटन, कुंठा, संत्रास इत्यादि। जगदीश चतुर्वेदी कीफ्लर्टकहानी में लेखकीय उक्ति है – “केवल चार
पांच कच्ची पक्की रोटियां दोनों टाइम खाने और खानदान चलाने के नाम पर व्यभिचार करने के सिवाय और क्या मिलता है शादी से“(4)
वर्तमान संदर्भ में प्रेम की परिभाषा ही बदल गई है। प्रेम आज शारीरिक या मानसिक धरातल पर केंद्रित रहकर आर्थिक संपन्नता पर निर्भर करता है। कहानीकार माहेश्वर ने अपनी कहानीबंदमें लिखा है कि – “प्यार के चुनाव का हमारा आधार शारीरिक या मानसिक  सौंदर्य पर उतना नहीं, जितना आर्थिक दायरे और सुविधाओं पर आधारित होता है। सुविधाओं की यह न्यूनतम गारंटी हमें जब मिलती है तो हम सोचते हैं, हमारा प्यार हो रहा है; और सुविधाएं प्यार नहीं होतीं।  इसलिए विवाह में प्रेम का भ्रम बहुत शीघ्रता से टूट जाता है।“(5)
वर्तमान समय में लोग अर्थ की दृष्टि से अधिकाधिक लोभी होते जा रहे हैं। वे संवेदनहीन होते जा रहे हैं। महेंद्र मानव की कहानीसंस्कार‘,  पतिपत्नी के मध्य के अमर्यादित संबंधों पर प्रकाश डालती है। अमरेश पदोन्नति  की चाहत में अपने बॉस मिस्टर गांगुली को अपने घर चाय पर बुलाता है और बिना किसी संकोच के किसी वस्तु की भांति अपनी पत्नी बिटो को उन्हें परोस देता है। बॉस की उक्ति इस लेनदेन की प्रक्रिया को स्पष्ट कर देती है– “अमरीश असिस्टेंट की जगह क्वालिफाइड नहीं है किंतु मैं आपके लिए उसे नौकरी पर लगा दूंगा।“(6)
भारतीय संस्कृति में भाईबहिन का संबंध बहुत पवित्र और पूजनीय होता है। किंतु आधुनिकता की अंधी दौड़ में ये संबंध भी कलंकित हो गए हैं। मणि मधुकर की कहानीचंद्रग्रहण‘ में अनाथ बालिका, जुगनी की कथा है; जो अपनी जीजी के साथ रहती है। जीजी का मुंहबोला भाई मनसा अक्सर उनके घर आता था। एक दिन जुगनी को उन दोनों के मध्य के रागात्मक संबंधों के विषय में पता चल जाता है और उसी दिन जीजी कुंए में कूदकर अपने प्राणों का अंत कर लेती है। रमेश गुप्ता की कहानी,अंतिम संस्कारभी आर्थिक तनाव से ग्रस्त परिवार की व्यथाकथा को व्यक्त करती है। परिवार का मुखिया दो समय का भरपेट भोजन भी अपने परिवार के लिए उपलब्ध नहीं करा पाता है। वह ईश्वर से कामना करता है कि भूख से मरने से तो अच्छा है उसके परिवार को मृत्यु जाए। परिवार में भतीजे रामू की मौत एक तरफखाना खाने के लिए एक मुंह कम हुआकी सोच के कारण मुखिया को आश्वस्त करती है तो दूसरी ओर उसके अंतिम संस्कार की चिंता उभर आती है। परिवार का मुखिया सोचता है कि क्रियाकर्म केलिए पैसे जुटाने से तो अच्छा है कि लाश को बेचकर परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कुछ दिनों के भोजन की व्यवस्था कर दी जाए। मणि मधुकर कीआखिरकारमें कथानायक नौबत राम आर्थिक तंगी के कारण अपनी पत्नी और बेटी को शुमार खान के हाथ बेचने के लिए विवश हो जाता है। चौदह वर्षों उपरांत पत्नी के मिलने पर वह अपनी व्यथाकथा इस प्रकार सुनाता है– “तुम्हें पता है मैंने यह फैसला कितनी कठिनाई से लिया  था। आठ बरस तक जमीन को सूखाकर इन्दर राजा ने बरसात दी और मेरा खेत बिना बीज के बुवाई के तरसता रहा। जो हल की मूठ पर हाथ रखे, वह हलधर ही क्या? मैंने हरीलाल महाजन के पाँव पकड़े, चिमना चौधरी के आगे नाक रगड़ी, पिरभूसिंघ के रावले में रातभर गिड़गिड़ाता रहा पर कोई टस से मस नहीं हुआ। तब मेरे सामने इसके सिवा और क्या चारा था कि अपनी लुगाई को बेच दूँ और बदले में जो कुछ मिले, उससे बीज मोल लेकर हल की मूँठ पकड़ लूँ। सालों बाद तो यह इन्दर राजा किरपा करें और तब भी किसी की भौंम अनजोती रह जाए, फिर उस पर क्याक्या नहीं गुजरेगी।“(7)
रमेश उपाध्याय की कहानीबदलाव के पहले‘, पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी की दोयम स्थिति को समाप्त कर उसे समानाधिकार देने की बात करती है। जितेन्द्र भाटिया कीशहाजदनामामें अमरजीत अपने मजदूर भाई कीमतीलाल का हाथ मशीन में कटने से मुआवजे की बात करता है। परिणाम स्वरुप कंपनी वाले उसे कास्टिक टैंक में डलवा कर मार डालते हैं और दुर्घटना का रूप दे देते हैं।  
महानगरीय जीवन में व्यक्ति अपने आर्थिक स्तर को ऊंचा करने में इतना व्यस्त हो जाता है कि संबंधों में स्वार्थ, दिखावा, औपचारिकता, संवेदनहीनता धीरे से अपना स्थान बना लेती हैं। हिमांशु जोशी कीकोई एक मसीहाकहानी का सुरेश, अपनी बेटी की उम्र की बच्ची के साथ संबंध बनाता है; क्योंकि उसकी मां को पैसे की आवश्यकता थी।  राकेश वत्स कीसमझौतामें भी दो भाइयों के मध्य के आर्थिक संबंध को उजागर किया गया है। सम्पन्नचावला’, पैतृक संपत्ति में से कुछ भी अपने छोटे भाई को देना नहीं चाहता।काफ़ी विरोध और विवाद के बाद छोटा भाई सात हज़ार रुपए लेकर  समझौता कर लेता है।
गांव से शहर आया व्यक्ति यह सोचता है कि शहर में उसे गांव जैसा अपनापन, पैसाऐश्वर्या सब कुछ मिलेगा। किंतु महानगरीय जीवन धीरेधीरे उसे अपने परिवेश से काटकर अकेलापन और परायापन दे देता है। जबतक वह समझ पाता है कि शहरों में संबंध खोखले, औपचारिक और स्वार्थ पर केंद्रित होते हैं, तब तक कुंठा, हताशा, ऊब, ठंडापन और निराशा उसे दबोच चुकी होती है। खोई हुई दिशाएं ‘, ‘अपना एकांत‘ (कमलेश्वर),’पांचवें माले का फ्लैट‘(मोहन राकेश), ‘सन्नाटा‘, ‘ठंड़क‘ (महीप सिंह), ‘परिंदे‘(निर्मल वर्मा) इत्यादि कहानियों को उदाहरणार्थ लिया जा सकता है।
कमलेश्वर कृतखोई हुई दिशाएंअपने परिवेश से अलग हुए चंदन की घुटन को अभिव्यक्त करती है।  चंदन को महानगरीय भीड़ बेचैन करती है; क्योंकि उसे वहां कोई अपना नहीं दिखता। वह सोचने पर विवश हो जाता है कि -“तमाम सड़के हैं जिन पर वह जा सकता है, लेकिन वे सड़के कहीं नहीं पहुंचाती। उन सड़कों के किनारे घर हैं, बस्तियां हैं पर किसी घर में वह नहीं जा सकता। उन घरों के बाहर फाटक हैं जिन पर कुत्तों से सावधान रहने की चेतावनी है। फूल तोड़ने की मनाही है और घंटी बजाकर इंतजार करने की मजबूरी है।“(8)
अपना एकांतकहानी में कथानायकसोम’,  किसी परिचित या अपरिचित व्यक्ति के होने पर घायलावस्था में अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में खुद ही पहुंचकर अपने विषय में पूरे तथ्य लिखवाता है और ऑपरेशन थिएटर तक पहुंचतेपहुंचते बेसुध होकर दम तोड़ देता है। उसका पार्थिव शरीर स्वयं ही शवदाह गृह जाकर रजिस्टर में अपना नाम लिखने से पहले गार्ड से कहता है कि वह जानता है कि उसकेफूल‘(अस्थियां) लेने कोई नहीं आएगा इसलिए वह  उन्हें समुद्र में विसर्जित कर दे।
महीप सिंह कीसन्नाटाकहानी, मांबेटी के मध्य पसरे परायेपन को उद्घाटित करती है।  महानगर में लोग एक ही छत के नीचे अलगअलग कमरों में रहते हैं। अपने कमरों तक सिमटे सदस्यों के मध्य कई बार महीनों तक किसी भी प्रकार का संवाद स्थापित नहीं हो पाता। यह मौन तब तक रहता है जबतक कोई तीसरा व्यक्ति आकर उनसे कुछ पूछता नहीं है। कहानी में मां इस अजनबीपन और अकेलेपन से घबरा कर कहती हैं– “कैसी अजीब बात है। हमारे बीच जब तक कोई तीसरा व्यक्ति ना आए, हमें यह एहसास नहीं होता कि हम मांबेटी हैं। हमें आपस में कोई बात किए हफ़्तों  गुज़र जाते हैं। फ्लैट में एक दूसरे की छाया देखकर हमें बस एकदूसरे के होने का एहसास होता है।  अलगअलग कमरे, अलगअलग बाथरूम।“(9)
कोई एक मसीहा‘( हिमांशु जोशी) के,सुरेश भाई’ की पहुंच दिल्ली तक है। इसलिए लाभु सरकारी अनुदान प्राप्त करने के लिए आश्रम की कन्या सावित्री को उन्हेंभेंटकरती है। रात भर उसकासदुपयोगकरने के उपरांत सुरेश भाईसावित्री बिटियाको उपहार स्वरूपखादर की धोतीआशीर्वाद स्वरूप देते हैं।
लक्ष्मी कैद है‘( राजेंद्र यादव), कहानी में लक्ष्मी का पिता धनाभाव के कारण अपनी पुत्री का विवाह नहीं करना चाहता। उसे लगता है कि बेटी की विदाई के साथ ही उसका रहा-सहा धन भी समाप्त हो जाएगा। कहानीकार श्रीकांत कीलाल और सफेद खून का फ़र्क‘ कहानी में तीन भाइयों के स्वार्थ के कारण संयुक्त परिवार विघटित हो जाता है। मंझला भाई आर्थिक दृष्टि से अपने दोनों भाइयों से कम है। अतः सबसे छोटा भाई गोविंदा, पूर्व के उसके त्याग और सेवा को याद कर उसकी सहायता करता है। किंतु सबसे बड़ा भाई तटस्थ ही रहता है।
सबसे जटिल पतिपत्नी का संबंध होता है। जहां घृणा, त्याग, विश्वास, प्रेम आदि भावनाएं एकसाथ देखी जा सकती हैं। स्वातंत्र्योत्तर नारी अपने पति की परछाई बनकर जीना नहीं चाहती। वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व के विषय में सोचने लगी है। अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं को महत्व देने लगी है। इस नई उभरती नारी को लेखकों ने अपनी कहानियों में अंकित किया है। राजेंद्र यादव कीएक कमजोर लड़कीदाम्पत्य जीवन में तीसरे के आने से उभरने वाले तनाव को अभिव्यक्त करती है। नायिकासविता’ अपने पति लोकेश के साथसाथ प्रेमी नेता प्रमोद से भी संबंध बनाए रखती है। परिस्थितियों के मध्य से उभरते यथार्थ को अभिव्यक्त करतीमहेंद्र भला’ की रचना,एक पति के नोट्समें एक ही छत के नीचे रहते हुए पति अपनी पत्नी से इस सीमा तक ऊब जाता है कि उसके साथ रागात्मक संबंध बनाते समय भी उसे किसी अन्य स्त्री की परिकल्पना करनी पड़ती है।एक यात्रा सतह के नीचेशिव प्रसाद सिंह की कहानी है; जिसमें बेरोज़गारी के कारण अवधू और उसकी पत्नी उपेक्षित जीवन जीने के लिए बाध्य हैं। घरपरिवार का कोई भी सदस्य उनसे बात करना पसंद नहीं करता। यह उपेक्षा उनके अंदर पीड़ा, कुंठा, संत्रास को जन्म देती है। धर्मवीर भारती कीसावित्री नं. दोकी सावित्री, अपने निष्ठावान चरित्रवान पति पर अकारण संदेह करती है और इसी चिंता में घुलती रहती है। मोहन राकेश कीएक ओर जिन्दगीमेंबीना’ के अहंकार के कारण वह और उसके पति प्रकाश अलगअलग रहने लगते हैं। एक बच्चा हो जाने पर भी उनके मध्य की दूरी कम नहीं होती।पतिपत्नी को  यह अकेलापन इतना तनावग्रस्त कर देता है कि दम्पति अपने संबंधों का विच्छेद कर अन्यत्र विवाह कर लेते हैं, किंतु कई बार वे इस घुटन, संत्रास, कुंठा से बचने के लिए बिना किसी कानूनी औपचारिकताओं के अलगअलग रहने लगते हैं और बच्चों का पालन मिल कर करते हैं। 
रवींद्र कालिया कीनौ  साल छोटी पत्नी‘  में पत्नी पारंपरिक रीतिरिवाजों को मानती है; जबकि उसका पति आधुनिक विचारधारा का है। अतः भिन्न मानसिकता के कारण दोनों में अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। राजेंद्र यादव कीटूटनाकहानी में निम्न वर्गीय किशोर और संपन्न परिवार की लीना, प्रेम के बंधन में बंधकर कोर्ट मैरिज कर लेते हैं। किंतु किशोर की आर्थिक स्थिति लीना की ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली को पूरा करने में असमर्थ थी। अतः दोनों में विच्छेद हो जाता है। इस ऊब का एक कारण यह भी होता है कि विवाह के कुछ वर्षों उपरांत पतिपत्नी एक दूसरे को आकर्षित करना छोड़ देते हैं। यहसहजता इतनी बढ़ जाती है कि पुरुष उस आकर्षक को घर से बाहर ढूंढने लगते हैं। गंगा प्रसाद विमल की कहानीसिद्धार्थ का लौटनाइसी तथ्य को उजागर करती है। दूधनाथ सिंह,दिनचर्याकहानी में प्रेमिका के पत्नी बनते ही उसमें आए परिवर्तन को बहुत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। पति अपनी पत्नी, जो पूर्व में उसकी प्रेमिका थी को लिखे प्रेमपत्र पढ़ते हुए सोचता है कि– “क्या यह इबारत इसी औरत को लिखी गई थी, जो चरबी से थलथला रही है। जो दिन का अधिकतर भाग सिर्फ पेटीकोट में बिताती है, जो सुन्न है। जो अपने पैसे और वक्त का हर लमहा तुरंत भुना लेने पर आमदा रहती है और कभी गफ़लत में नहीं पड़ती। जो सिवा झिड़की, आदेश और रोजमर्रा के ब्यौरों के कुछ भी याद नहीं रखती। जिसके ब्यौरे थर्रा देने वाले होते हैं। जिसके ब्यौरे हर रविवार को अपने जबड़े फाड़कर सारे घर में बैठ जाते हैं।“(10)
समकालीन कथा लेखन में राजनीतिकसामाजिक विसंगतियों, अनास्थाभ्रष्टाचार, मूल्य विघटन, नारी जागरण, सांप्रदायिक तनाव, कुंठा, निराशा, अकेलापन इत्यादि को केंद्र में रखकर कहानियों का सृजन किया गया। इस दृष्टि से जहां लक्ष्मी कैद है‘ (राजेंद्र यादव)’, टापू पर अकेले ‘(से.रायात्री),’ फ़र्क ‘(इसराइल ), ‘जलते हुए डैने‘(हिमांशु जोशी), ‘एक ईश्वर की मौत‘ ( राज किशोर), ‘कोई एक मसीहा‘ (हिमांशु जोशी), ‘मंत्री पद‘; ‘ततैया‘, ‘समागम‘ (गिरिराज किशोर), ‘मज़मेबाज‘(हबीब कैफ़ी), ‘कचकौंध‘(गोविंद मिश्र), ‘ग्यारहवीं कहानी ‘(रघुवीर सहाय), ‘कांचघर ‘(पृथ्वीराज मोंगा) इत्यादि महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।  कान्हजी तोमर की रचनाआंदोलनभ्रष्ट राजनीति को आधार बनाकर लिखी गई है। क्रांतिकारी दल के सदस्य का छोटा बेटा पुलिस द्वारा मारा जाता है। वह न्याय के लिए संघर्ष करता है पर असफल रहता है। वह दलितों के साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध अपने संघर्ष में दूसरे बेटे को आगे कर देता है। उसकी उक्ति है– “हमारी सरकार चंबलघाटी के डाकुओं से ज्यादा खतरनाक हो गई है, उनको झुका लेना आसान है, लेकिन सरकार को नहीं।“(11)।  ‘मंत्री पदऔर ततैया‘(गिरिराज किशोर), कहानियों में भ्रष्ट नेताओं की करतूतों को बताया गया है। विभिन्न पदों पर भर्ती अफ़सर सरकारी कामों के लिए मिले रुपयों और गाड़ियों को कैसे अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए प्रयुक्त करते हैं, इसका यथार्थ अंकनसमागमकहानी में मिलता है।  डॉ. पुष्पाल सिंह के मतानुसार– “कमीनापन सारी व्यवस्था के लिए टॉनिक बन गया है।“, “घूसखोरी सबका धर्म हो गया है“,  “हरामजादों ने सारे देश को अनाथालय बना डाला है।“(12) ‘पेपरवेट‘ (गिरिराज किशोर) में कहानीकार ने नेताओं की स्वार्थी मनोवृत्ति, अनैतिकता, अहंकार पर व्यंग्य किया है। ईमानदार मंत्री मृणाल भ्रष्टाचार से लड़ नहीं पाता और कुंठित हो जाता है।इंटरव्यू‘ (अमरकांत) में लेखक ने व्यवस्था पर अपना आक्रोश व्यक्त किया है। साक्षात्कार में प्रतिभागी एकदूसरे की योग्यता और चयनकर्ताओं की निष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्ष निर्णय क्षमता पर शंकित रहते हैं।
महीप सिंह कीसहमे हुएमें धर्मान्धता के कारण उत्पन्न सामाजिक संकीर्णता तनाव को व्यक्त किया गया है। चार विभिन्न धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले चार मित्र मिलकर संप्रदायवाद का अंत करना चाहते हैं। कहानी में शर्मा जी का कथन है– “झगड़ों के बीज हमारी पृष्ठभूमि में पता नहीं कब, किसने, क्यों बो दिए थे। उस बोई हुई फसल को हम सब काट रहे हैं, काटते चले रहे हैं, काटते चले जाएंगें। मनुष्य अवश्य लड़ेगा। वह अकेलेअकेले लड़ता है तो लोग उसे झगड़ालू , गुंडा और बदमाश कहते हैं। वह झुंड बनाकर लड़ता है तो देशभक्त, धर्मवीर और गाज़ी कहलाता है। उसे सम्मानित किया जाता है। आखिर मनुष्य यह सम्मान क्यों ले।“(13)
स्वातंत्र्योत्तर  कहानियों में विभाजन की पीड़ा, अपना वतन छूटने की विवशता बाध्यता को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।  समकालीन कथाकारों ने भारतपाकिस्तान विभाजन की त्रासदी को अपनी कहानियों में व्यक्त किया है।  ‘कितने पाकिस्तान‘ (कमलेश्वर), ‘अमृतसर गया‘ (भीष्म साहनी), ‘पानी और पुल‘ (महीप सिंह), ‘शरणदाता‘(अज्ञेय), ‘तीन बच्चे‘ (डॉ. नरेश), ‘मलबे का मालिक‘ (मोहन राकेश), ‘मुक्ति‘ (देवेंद्र इस्सर) इत्यादि कहानियों को उदाहरणार्थ लिया जा सकता है। इन सभी कहानियों में विभाजन के समय होने वाली नृशंसता, यंत्रणाएं, भ्रष्टाचारदरकते रिश्तों, महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार इत्यादि से उत्पन्न पीड़ासंत्रास, चिंता को व्यक्त किया गया है।
महीप सिंह की रचना,पानी और पुलमें सराई स्टेशन पर विभाजन के चौदह साल उपरांत लेखक अपनी मां  अन्य लगभग तीन सौ लोगों को लेकर वहां पहुँचते हैं। लेखक के मन में विभाजन के समय होने वाले दंगों उसके परिणाम घर, गाँव सबका जलकर राख होना  का भय व्याप्त था किंतु वहां माँ को मिलने वाले सम्मानप्रेम, आत्मीयता और आवभगत से उन्हें अनुभव हो जाता है किपुलों के नीचे से  पानी के बह जाने पर भीमानवीय रिश्तों में  आत्मीयता आज भी देखी जा सकती है।  कहानी से निम्नलिखित पंक्तियां दृष्टव्य हैं– “गाड़ी छोटे से स्टेशन पर रुक जाती है, लोगों का कोलाहल सुनाई देता है।इस गाड़ी में कोई सराई का है? तब माँ झट से कहती हैहाँ हम इस गाँव के हैं। सराई गाँव के लोगों को डिब्बे में देख बहुत से लोग इकट्ठा हो जाते हैं, अतापता पूछते हैं। सरदार मूलसिंह, खेल सिंह आदि के बारे में कुशलक्षेम पूछते हुए कुछ पोटलियाँ भेंट स्वरूप प्रदान करते हैं, जिसमें बादाम, अखरोट, किशमिश आदि मेवे हैं। इतना ही नहीं माँ को भरजाई संबोधित करते हुए वापस अपने गाँव लौट आने की याचना करते हैं।“(14)
स्वातंत्रोत्तर  भारत में  हर क्षेत्र में विसंगतियां , हिंसात्मक प्रवृत्तियां और मूल्यों में विघटन  दिखाई देने लगा था। ऐसे वातावरण में कुछ साहित्यकारों ने गांधीवादी विचारधारा (नारी जागरण, बेरोजगारी, अहिंसा, मूल्य विघटन, अस्पृश्यताभ्रष्टाचार इत्यादिको अपने साहित्य में स्थान दिया। इनकी कहानियों में ऐसे पात्रों की योजना की गई जो अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर हो लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। इस प्रकार की रचनाओं में– ‘जलते हुए डैने‘( हिमांशु जोशी), ‘हथियारों की वापसी‘  (मिथिलेश्वर), ‘फ़र्क‘( इसरायल), ‘फ़रिश्ते की मौत‘ (मनीष राय यादव), ‘टापू पर अकेलेतथा  ‘जन्नत ना गयी‘( से.रा.यात्री), ‘गाड़ी पर किसका पैर‘(विवेकी राय)’,  गिद्ध‘( राधेश्याम), ‘हरिजन सेवक‘( मधुकर सिंह)नाच्यौं बहुत गोपाल‘ (अमृतलाल नागर ),’ ‘ एक टुकड़ा इतिहास‘(गोपाल उपाध्याय) आदि को उदाहरण स्वरूप लिया जा सकता है।
जलते हुए डैने‘ (हिमांशी जोशी),  कहानी मेंशिवदा’ अहिंसात्मक आंदोलन  द्वारा व्यवस्था से लड़ने का प्रयास करता है। जनसमर्थन मिलने पर भी उसे कारावास में डाल दिया जाता है और अंततः जेल में ही उसका प्राणांत हो जाता है।  इसरायल कृतफ़र्ककहानी केबेनी बाबू’ को शीघ्र ही यह अनुभव हो जाता है कि वे जिनके लिए अहिंसात्मक संघर्ष कर रहे थे वे हिंसा का अवलंब लेना चाहते हैं; अतः वे हिंसा से न्याय प्राप्त करने के इच्छुक किसानोंमजदूरों को समझाने के लिए धरने पर बैठ जाते हैं।गिद्धकहानी (राधेश्याम), के गांधीवादी विचारधारा को मानने वालेनरेश दा’ अपनी दमित वासनाओं के वशीभूत, पूर्व प्रेमिका नीलिमा से एकांत में संपर्क स्थापित कर आत्मग्लानि से भर उठते हैं। अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए वे सात दिवसीय उपवास करने का निर्णय लेते हैं।हत्यारों की वापसी‘ (मिथिलेश्वर), में गांधी जी के हृदय परिवर्तन के सिद्धांत को उद्घाटित किया गया है। नवकुबेर के कहने पर कुछ गुंडे जिसे समाज द्रोही समझकर मारने उसके घर जाते हैं वह वास्तव में निर्धन और विवश लोगों का शुभचिंतक था। उस व्यक्ति के संघर्ष का उद्देश्य जानकर उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक परिस्थितियों के कारण जब जन-जीवन में निराशा, कुंठा, अनास्था उपस्थिति हो जाती है तब साहित्यकारों द्वारा अस्तित्ववादी साहित्य का सृजन किया जाता है। मोहन राकेश के मतानुसार– “हर जीवित इंसान के चेहरे पर एक कहानी लिखी रहती है, जो उसके चेहरे की झुरियां में, उसकी पलकों के निमेषों में और उसके माथे की सलवटों में पढ़ी जा सकती है।“(15)
हिंदी की कथासाहित्य में ईश्वर धर्म के प्रति उपेक्षा, शून्यता, अनास्था, भ्रष्टाचार, संबंधों में अजनबीपन, एकाकीपन, असुरक्षा, मृत्यु से भय, रिक्तता को उजागर किया गया है। उदाहरणार्थ निम्नलिखित रचनाओं को लिया जा सकता है – ‘रोज‘, ‘ हीली बोन की बतखें, (अज्ञेय ), ‘रत्न प्रभा ‘ (जैनेंद्र), ‘एक ईश्वर की मौत‘ (गिरिराज किशोर), ‘कस्बे का एक दिन‘(अमृत राय), ‘थानेदार साहब‘, ‘दिल्ली में एक मौत‘ ( कमलेश्वर ), ‘इंटरव्यू‘(अमरकांत), ‘सहज और शुभ‘ ( मार्कंडेय ), ‘परिंदे‘(  निर्मल वर्मा),  ‘ युद्धमन‘ (महीप सिंह), ‘मिस पॉल‘, ‘ठहरा हुआ चाकू‘( मोहन राकेश), ‘पारदर्शक‘(महेश सिंह), ‘अंगारों का खेल(राजेंद्र यादव), ‘मरीज नंबर सात‘(धर्मवीर भारती), ‘आदमी‘, ‘ग्लास टैंक‘, ‘खाली मरुस्थल‘, ‘जंगला‘ (मोहन राकेश),
मोहन राकेश कीठहरा हुआ चाकूका कथा नायक असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है। वह इतना द्वंद ग्रस्त है कि कोई भी निर्णय ठीक प्रकार से नहीं ले पाता।
वर्तमान समय में मनुष्य इतना संवेदनहीन हो चुका है कि किसी अपने की मृत्यु भी उसमें  बेचैनी उत्पन्न नहीं करती। कमलेश्वर की कहानीदिल्ली में एक मौतमें इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि, मौत जैसा संवेदनशील विषय भी आज स्वार्थ के तराजू पर तोला जाता है। लोग अपनी दिनचर्या में इतने व्यस्त हो गए हैं कि किसी की मौत की ख़बर सुनकर वो कुछ समय के लिए सब के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य की इति श्री मान लेते हैं और तत्पश्चात अपनेअपने कामों पर निकल जाते हैं।
निष्कर्ष: समकालीन दौर में कहानी लेखन के क्षेत्र में नवीन परिवर्तनों ने जन्म लिया। इस समय के कहानीकार संबंधों के खोखलेपन, औपचारिकता, अकेलापन, झूठे आश्वासनों, भ्रष्टाचार, अस्तित्व के प्रति सजगता, ईश्वर के प्रति अनासक्ति, मूल्य विघटन, नारी जागृति, अनुशासनहीनता, अस्पृश्यता इत्यादि को केंद्र में रखकर रचनाओं का सृजन कर रहे थे। इस समय की कहानियां निश्चित रूप से अपने आप में महत्वपूर्ण रचनाएं हैं जिनके द्वारा समाज और परिवेश को सहजता से देखा समझा जा सकता है।

संदर्भ—
  1. भारद्वाज, हेतु ,अनुबंध कहानी ,पृष्ठ 11
  2. बक्शी रमेश, पिता दर पिता
  3. उद्घृत , वीरवाल,पंकज, शिवानी के कथा साहित्य में संवेदना और शिल्प, सुभद्रा पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रिब्यूटर्स,2016, पृष्ठ 59
  4. चतुर्वेदी जगदीश, फ्लर्ट (निहंग), पृष्ठ 104
  5. माहेश्वर, बंद कहानी , स्पर्श , पृष्ठ 42 
  6. मानव महेंद्र, संस्कार, संचेतना, जनवरी 1976, पृष्ठ 29
  7.  मधुकर मणि, आखिरकार, पृष्ठ 61

  8.  कमलेश्वर,खोई हुई दिशाएं, पृष्ठ 31
  9.  सिंह,महीप, सन्नाटा, पृष्ठ 25
  10. सिंह दूधनाथ, दिनचर्या, सारिका, फरवरी 1972
  11.  सिंह,  तोमर, कान्हा जी, आंदोलन, सारिका, दिसंबर 1974, पृष्ठ 37
  12. उद्घृत, सिंह,पुष्पाल , समकालीन कहानी:युगबोध का सन्दर्भ, पृष्ठ 240
  13.  सिंह महीप,सहमे हुए, इक्यावन कहानियां, पृष्ठ 393
  14. सिंह,महीप,  ‘ पानी और पुल‘  कहानी,   https://www.hindisamay.com  
  15. राकेश मोहन, नये बादल, भूमिका, पृष्ठ 5
डॉ. रुचिरा ढींगरा
डॉ. रुचिरा ढींगरा
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, शिवाजी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। दूरभाष.9911146968 ई.मेल-- [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. डॉ.रुचिरा ढींगरा जी ! आधुनिक हिंदी कहानी पर आपकी यह विस्तृत समीक्षा जीवन के अनेक पक्षों को छू रही है। लगभग सभी कहानीकारों की कहानियों का यथार्थवादी विवेचन और विश्लेषण बहुत ही उपयोगी है। इस लेख से शोधार्थियों को बहुत लाभ होगा।

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