Tuesday, March 10, 2026
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प्रकाश मनु की कलम से : ‘बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर…!’ – धर्मवीर भारती की कविताई

इलाहाबाद में काफी पुस्तकालय थे जो किशोर वय में भारती जी को अपनी ओर आकर्षित करते थे। पिता गुजर चुके थे, और घर की हालत दारुण था। इतने पैसे भी उनके पास न थे कि पुस्तकालय की सदस्यता लेकर, पुस्तकें घर लाकर पढ़ लें। इसलिए वहीं बैठकर घंटों पढ़ते रहते। हिंदी के अलावा विश्व की अन्य भाषाओं का साहित्य भी पढ़ा। खूब पढ़ा। लगा, जैसे दिमाग की नई खिड़कियाँ खुल रही हैं। लाइब्रेरी खुलते ही पहुँच जाते और जब लाइब्रेरियन कहते कि बच्चा, अब उठो, पुस्तकालय बंद करना है, तब बड़ी अनिच्छा से उठते।

जुलाई 1989। बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। तीन-तीन ज़बरदस्त हार्ट अटैक, एक के बाद एक। एक तो ऐसा कि नब्ज़ बंद, साँस बंद, धड़कन बंद। डॉक्टरों ने घोषित कर दिया कि अब प्राण नहीं रहे। पर डॉक्टर बोर्जेस ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी थी। उन्होंने नौ सौ वॉल्ट्स के शॉक्स दिए। भयानक प्रयोग। लेकिन वे बोले कि यदि यह मृत शरीर मात्र है तो दर्द महसूस ही नहीं होगा, पर यदि कहीं भी ज़रा भी एक कण प्राण शेष होंगे तो हार्ट रिवाइव कर सकता है। प्राण तो लौटे, पर इस प्रयोग में साठ प्रतिशत हार्ट सदा के लिए नष्ट हो गया। केवल चालीस प्रतिशत बचा। उसमें भी तीन अवरोध (Blockage) हैं। ओपेन हार्ट ऑपरेशन तो करना ही होगा, पर सर्जन हिचक रहे हैं। केवल चालीस प्रतिशत हार्ट है। ऑपरेशन के बाद न रिवाइव हुआ तो? तय हुआ कि अन्य विशेषज्ञों की राय ले ली जाए, तब कुछ दिन बाद ऑपरेशन की सोचेंगे। तब तक घर जाकर बिना हिले-डुले विश्राम करें।
बहरहाल, ऐसी अर्द्धमृत्यु की हालत में वापस घर लाया जाता हूँ। मेरी ज़िद है कि बेडरूम में नहीं, मुझे अपने किताबोंवाले कमरे में ही रखा जाए। वहीं लिटा दिया गया है मुझे। चलना, बोलना, पढ़ना मना। दिन-भर पड़े-पड़े दो ही चीज़ें देखता रहता हूँ, बाईं ओर की खिड़की के सामने रह-रहकर हवा में झूलते सुपारी के पेड़ के झालरदार पत्ते और अंदर कमरे में चारों ओर फ़र्श से लेकर छत तक ऊँची, किताबों से ठसाठस भरी अलमारियाँ। बचपन में परी कथाओं में जैसे पढ़ते थे कि राजा के प्राण उसके शरीर में नहीं, तोते में रहते हैं, वैसे ही लगता था कि मेरे प्राण इस शरीर से तो निकल चुके हैं, वे प्राण इन हज़ारों किताबों में बसे हैं जो पिछले चालीस-पचास बरस में धीरे-धीरे मेरे पास जमा होती गई हैं। कैसे जमा हुईं, संकलन की शुरुआत कैसे हुई, यह कथा बाद में सुनाऊँगा। पहले तो यह बताना ज़रूरी है कि किताबें पढ़ने और सहेजने का शौक़ कैसे जागा।…”
ये पंक्तियाँ हिंदी के यशस्वी कवि और संपादक धर्मवीर भारती (1926-1997) की हैं, जिन्होंने एक ओर कनुप्रिया, सात गीत वर्ष और अंधा युग सरीखी कृतियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया, तो दूसरी ओर धर्मयुग जैसी ख्यात पत्रिका के जरिए हिंदी पत्रकारिता में एक नया शिखर रचकर, सब ओर हिंदी की कीर्ति-पताका फहरा दी।
अपने आत्मकथ्य मेरा छोटा सा निजी पुस्तकालय में वे शुरुआत उस त्रासद हृदयाघात से करते हैं, जिससे उनका बच पाना ही कठिन था। एक नए जन्म सरीखा। तब भी किताबें उन्हें खींच रही थीं। किताबों का मोह उन्हें खींच रहा था, और किताबों की बात करते-करते वे बचपन में पहुँच जाते हैं, जब किताबों के लिए उनके मन में विचित्र दीवानगी थी। और ये किताबें ही जाने-अनजाने उन्हें एक बड़ा कवि-लेखक और संपादक बनने के लिए तैयार कर रही थीं, गो कि उन्हें तो इसकी दूर-दूर तक कल्पना ही न थी कि वे आगे चलकर इतने बड़े और संवेदनशील कवि और संपादक बनने वाले हैं, कि उन्हें हिंदी और हिंदी साहित्य का कीर्ति-स्तंभ कहा जाएगा।
अलबत्ता, जिस बचपन का जिक्र भारती जी करते हैं, वह आर्य समाज के सुधारवादी आंदोलन की छाँह में पला। उनकी माँ और पिता दोनों आर्य समाजी थे। पिता आर्य समाज रानीमंडी के प्रधान थे और माँ ने स्त्री-शिक्षा के लिए आदर्श कन्या पाठशाला की स्थापना की थी। पिता की अच्छी-खासी सरकारी नौकरी थी। पर गाँधी जी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी, और घर एकाएक आर्थिक कष्टों से घिर गया। तब भी घर में आर्य समाज की पत्रिकाओं के अलावा सरस्वती पत्रिका नियमित आती थी। साथ ही दो बाल पत्रिकाएँ खासकर उनके लिए मँगाई जातीं, बालसखाऔर चमचम। भारती जी तब कोई छह-सात बरस के बालक रहे होंगे। पर उस वय में भी अक्षरों की दुनिया का चस्का उऩ्हें लग गया था। वे उन पत्रिकाओं को पढ़ते तो एक नए विचारों की दुनिया के साथ-साथ कल्पना का एक ऐसा संसार उन्हें मोहता, जिसमें वे बिन पंखों के उड़ सकते थे। और जब उड़ने लगते तो उसमें इतने खो जाते कि फिर वापस लौटना उन्हें याद ही न रहता।
माँ थोड़ी चिंतित थीं। बच्चा साहित्य-रस में इतना खो जाता है कि स्कूली पढ़ाई का तो उसे होश ही नहीं। भला ऐसा कैसे चलेगा? कक्षा दो तक की पढ़ाई घर पर ही हुई। स्कूल में तीसरे दर्जे में भरती हुए, तो उस दिन शाम को पिता उँगली पकड़कर उन्हें घुमाने ले गए। रास्ते में एक दुकान से ताज़ा अनार का शरबत मिट्टी के कुल्हड़ में पिलाया। फिर सिर पर हाथ रखकर बोले, बेटा, वायदा करो कि स्कूल की किताबें भी इतने ही ध्यान से पढ़ोगे, ताकि माँ परेशान न हो। 
पिता का आशीर्वाद। बच्चे ने जी-तोड़ मेहनत की। तीसरे, चौथे में उसके अच्छे नंबर आए और पाँचवें में तो वह फ़र्स्ट आया। माँ ने आँसू भरकर गले लगा लिया, पिता मुसकराते रहे, कुछ बोले नहीं।
आगे की कथा बड़ी रोचक है। अर्थपूर्ण भी, क्योंकि वह धर्मवीर भारती के लेखक होने की कथा है। या उसकी पहली सीढ़ी कहिए। पर उसे आप भारती जी से ही सुनिए— 
चूँकि अँग्रेज़ी में मेरे नंबर सबसे ज़्यादा थे, अत: स्कूल से इनाम में दो अँग्रेज़ी किताबें मिली थीं। एक में दो छोटे बच्चे घोंसलों की खोज में बाग़ों और कुंजों में भटकते हैं और इस बहाने पक्षियों की जातियों, उनकी बोलियों, उनकी आदतों की जानकारी उन्हें मिलती है। दूसरी किताब थी ट्रस्टी द रगजिसमें पानी के जहाज़ों की कथाएँ थीकितने प्रकार के होते हैं, कौन-कौन-सा माल लादकर लाते हैं, कहाँ से लाते हैं, कहाँ ले जाते हैं, नाविकों की ज़िंदगी कैसी होती है, कैसे-कैसे द्वीप मिलते हैं, कहाँ ह्वेल होती है, कहाँ शार्क होती है।
इन दो किताबों ने एक नई दुनिया का द्वार मेरे लिए खोल दिया। पक्षियों से भरा आकाश और रहस्यों से भरा समुद्र। पिता ने अलमारी के एक खाने से अपनी चीज़ें हटाकर जगह बनाई और मेरी दोनों किताबें उस खाने में रखकर कहाआज से यह खाना तुम्हारी अपनी किताबों का। यह तुम्हारी अपनी लाइब्रेरी है।
यहाँ से आरंभ हुई उस बच्चे की लाइब्रेरी। बच्चा किशोर हुआ, स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से युनिवर्सिटी गया, डॉक्टरेट हासिल की, युनिवर्सिटी में अध्यापन किया, अध्यापन छोड़कर इलाहाबाद से बंबई आया, संपादन किया। उसी अनुपात में अपनी लाइब्रेरी का विस्तार करता गया।

यहाँ विचारशील पिता की उस समझदारी पर भी ध्यान जाए बिना नहीं रहता, जिससे वे जाने-अनजाने बच्चे के उजले भविष्य की नींव रख रहे थे।
पर अभी इस प्रश्न का उत्तर तो अधूरा ही है, कि किताबें इकट्ठे करने का शौक उन्हें कैसे हुआ? इसके लिए फिर उनके बचपन में ही जाना होगा।
इलाहाबाद में काफी पुस्तकालय थे जो किशोर वय में भारती जी को अपनी ओर आकर्षित करते थे। पिता गुजर चुके थे, और घर की हालत दारुण था। इतने पैसे भी उनके पास न थे कि पुस्तकालय की सदस्यता लेकर, पुस्तकें घर लाकर पढ़ लें। इसलिए वहीं बैठकर घंटों पढ़ते रहते। हिंदी के अलावा विश्व की अन्य भाषाओं का साहित्य भी पढ़ा। खूब पढ़ा। लगा, जैसे दिमाग की नई खिड़कियाँ खुल रही हैं। लाइब्रेरी खुलते ही पहुँच जाते और जब लाइब्रेरियन कहते कि बच्चा, अब उठो, पुस्तकालय बंद करना है, तब बड़ी अनिच्छा से उठते। 
घर में आर्थिक संकट इतना कि फ़ीस जुटाना तक मुश्किल था। पुरानी किताबें खरीदकर पढ़ते, और किसी तरह काम चला लेते। फिर अगली क्लास में आने पर वे ही किताबें बेचकर, अगली कक्षा की पुरानी किताबें खरीद लेते। इसी सिलसिले में एक दफा पता नहीं कैसे दो रुपए बच गए। ये तरुणाई के प्रारंभ के दिन थे। सामने के सिनेमाघर में देवदासफिल्म लगी थी। मन को वह खींच रही थी। लेकिन माँ को फिल्म देखना पसंद न था। तो चाहते हुए भी उसे देखने नहीं गए। उसमें सहगल का एक गाना था, दुख के दिन अब बीतत नाहीं। उसे वे अकसर गुनगुनाते रहते। कभी-कभी गुनगुनाते हुए आँखों में आँसू आ जाते। 
एक दिन माँ ने सुना तो बोलीं, दुख के दिन बीत जाएँगे बेटा, दिल इतना छोटा क्यों करता है? धीरज से काम ले! फिर जब माँ को मालूम हुआ कि यह तो फिल्म देवदासका गाना है तो उन्होंने कहा, अपना मन क्यों मारता है? जाकर पिक्चर देख आ। पैसे मैं दे दूँगी।
पर पैसे तो उनके पास थे ही। किताबों से बचे दो रुएए। वही दो रुपए का नोट लेकर माँ की सहमति से तरुण वय भारती जी फिल्म देखने गए। तभी किताबों की दुकान नजर आई, जहाँ से वे पुरानी किताबें खरीदते थे। सहसा उऩ्हें काउंटर पर रखी शरत की पुस्तक देवदास नजर आ गई। दाम केवल एक रुपया। भारती जी ने पुस्तक उठाकर उलटी-पलटी, तो दुकानदार ने कहा, तुम विद्यार्थी हो। यहीं अपनी पुरानी किताबें बेचते हो। तुमसे अपना कमीशन नहीं लूँगा। केवल दस आने में यह किताब दे दूँगा।
भारती जी ने दस आने में देवदासखरीदी, और वापस घर की ओर चल पड़े। देह-मन में थर-थर सी। जीवन में अपनी रुचि की यह पहली किताब उन्होंने खरीदी थी। वह भी अपने प्रिय लेखक शरत की। जल्दी से घर आए। दो रुपए में से बचे एक रुपया छह आना माँ के हाथ में रख दिए। माँ ने पूछा, अरे, तू लौट कैसे आया? पिक्चर नहीं देखी?” और नवतरुण धर्मवीर भारती का जवाब था, नहीं माँ! फ़िल्म नहीं देखी, यह किताब ले आया, देखो!”
सुनकर माँ की आँखों में आँसू आ गए। अलबत्ता, वह अपने पैसों से ख़रीदी, भारती जी की अपनी निजी लाइब्रेरी की पहली किताब थी।
उसके बाद भारती जी कैसे साहित्यकार बने, और उनका निजी पुस्तकालय कैसे बढ़ते-बढ़ते विश्व की ख्यात पुस्तकों से भरता गया, यह अलग कहानी है। पर किताबों की तड़प ने ही उनमें लेखक होने की तड़प पैदा की, और जीवन की कितनी ही करुण विडंबबनाओँ और आर्थिक मुश्किलों के बीच से गुजरते हुए भी उनका संकल्प डिगा नहीं। आखिर वे उस मुकाम पर पहुँचे जहाँ धर्मवीर भारती अपने चमकते हुए नाम के साथ अलग नजर आते हैं, सबसे अलग। और दूर-दूर तक कोई नहीं, जिससे उनकी तुलना की जा सके। 
उनसे प्रेरणा और रोशनी लेने वाली एक पूरी पीढ़ी थी, और मेरी तरुणाई तो कनुप्रिया के सम्मोहन में ही गुजरी, जिसने मेरे हृदय में कविता का ऐसा महाराग पैदा किया, कि मैं अकेले में ही चलते, उठते-बैठते भावमुग्ध सा उसकी पंक्तियाँ दोहराता था, और हृदय रोमांच से भर जाता था। 
तब से बरसों-बरस गुजरे, और आज मैं पचहत्तर को छू रहा हूँ। पर सच कहूँ तो आज भी भी रात के अँधेरे में उसके शब्द मुझे दिप-दिप करते नजर आते हैं, और मैं सिर झुकाकर भारती जी को प्रणाम कर लेता हूँ।  
[2]
अलबत्ता, मेरी पीढ़ी के लेखकों का कैशोर्यकाल जिन कवियों को बड़ी स्पृहा के साथ पढ़ते, सराहते और उनकी कविता की पंक्तियों को गुनगुनाते हुए, एक अजब से विद्रोह और नोस्टैल्जिया के साथ इस दुनिया के साथ झगड़ते और एक अलग सी दुनिया बसाने के सपनों के साथ बीता है, उनमें धर्मवीर भारती अव्वल हैं। बाद में वहीं अज्ञेय, सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय और विजयनारायणदेव साही आए, मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और केदार आए, पर शुरुआत हममें से ज्यादाकर ने भारती जी से ही की। 
वे इतने सहज लगते थे कि पढ़ते हुए उनकी कविताएँ दिल में उतर जाती थीं और काव्य-भाषा के अनजाने से खुमार के साथ-साथ उनके बिंबों का जादू दिल में नक्श हो जाता था। खासकर भारती जी की कनुप्रिया तो सुकुमार कल्पनाओं के जिस अगम्य मायालोक में ले जाती थी और वहाँ जिस अद्भुत रस को अपने बहुतेरे कवि मित्रों के साथ-साथ खुद मैंने बड़ी शिद्दत से महसूस किया, उसे मैं आज तक कोई नाम नहीं दे सका। शायद कभी दे भी नहीं सकूँगा। यह एक ऐसी अद्भुत प्रगीतात्मक कृति है, जिसे धर्मवीर भारती ही लिख सकते थे। बल्कि कहना होगा, सिर्फ और सिर्फ भारती ही लिख सकते थे।
अरसे बाद भारती जी की कविताओं को फिर से पढ़ते हुए आज भी मन दौड़-दौड़कर पुराने दिनों की ओर जाता है। और मन पर पड़े उनके प्रभाव को याद करते हुए हर बार एक ही बिंब आँखों के आगे तिरता है—वह भी उन्हीं की एक विस्मयकारी पंक्ति के साथ—बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर…!” इसमें बाँसुरी का संगीत, उसकी मन को लहर-लहर कर जाती आकुल पुकार और एक किस्म की रूमानियत के साथ-साथ भागवत की आध्यात्मिक पवित्रता—ये दोनों भाव एक साथ आते हैं, बल्कि कहना चाहिए कि एकमेक होकर आते हैं।
जहाँ तक याद पड़ता है, अज्ञेय के दूसरा सप्तक से भारती जी को पहलेपहल जाना था, जहाँ उनकी कविताओं की भाषा की रवानगी और गहरी रूमानियत कभी मुग्ध तो कभी चकित करती थी। पर साफ कहूँ तो उनके आकर्षण के साथ-साथ कुछ-कुछ अधूरेपन की-सी प्रतीति होती थी, जैसे कवि शरीरी आस्वाद में कैद होकर रह गया है और चाहकर भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहा। पर फिर हाथ लगी कनुप्रियाऔर सब कुछ बदल गया। कनुप्रियाको पढ़ा तो लगा कि मेरे भीतर-बाहर बहुत कुछ बदल-सा गया और भारती जी भी मेरे लिए पहले सरीखे नहीं रह गए। वे कुछ से कुछ और हो गए हैं। अभी तक जाने हुए भारती जी से बहुत बड़े। कनुप्रिया पढ़ते हुए अठारह-उन्नीस बरस की उस तरुणाई में मैं कैसे बौरा गया था, इसकी अब भी याद है। सोते-जागते, उठते बैठते कनुप्रिया की संवेदना और उसके मुग्ध कर देने वाले अछूते बिंब साथ चलते थे, मन को कोमल, बहुत-बहुत कोमल, मृदुल और उदार बनाते हुए। कनुप्रिया कविता पुस्तक नहीं, एक देहधारी अस्तित्व बनकर मेरे सामने थी और घड़ी-घड़ी मेरे तसव्वुरात में दस्तक दे रही थी। 
मुझे महसूस हुआ कि कविता के अभी तक के बने-बनाए फ्रेम तड़के हैं और बहुत-कुछ जो उनके आरपार था, चुपके से झाँकने लगा है। लगा कि कविता की भाषा हवा जैसी हलकी और उत्फुल्ल भी हो सकती है। संजादगी और पवित्रता की सुवास से मढ़ी हुई। और पहली बार यह रहस्य भी जाना कि अच्छी कविता बिल्कुल अनजाने में सदेह होकर आपके भीतर का एक हिस्सा हो जाती है।
यों दूसरा सप्तक में शामिल भारती जी की कविताओं में भी एक दुर्वह आकर्षण था, और उनमें रूमानियत का नशा-सा था, पर जब कनुप्रिया पढ़ी तो मैं एकदम उनका होकर रह गया था और बहुत दिनों तक किसी और कवि को पढ़ने की तबीयत ही नहीं हुई। आप किसी अच्छे कवि की कोई विमुग्ध कर देने वाली कविता पढ़ते हैं, तो मन कृतज्ञता के बोझ से कुछ दब सा जाता है। कनुप्रिया पढ़कर एक पाठक के रूप में मैंने भारती जी के प्रति बड़ी कृतज्ञता महसूस की थी, कि उन्होंने एक इतनी बड़ी कृति दी—इसकी अब भी अच्छी तरह याद है। 
और फिर धर्मयुग तो था ही, जो हमें पूरी तरह भारती जी से एकरूप ही लगता था। और उफ, कैसी बेसब्र प्रतीक्षा हम उसकी करते थे। वह था भी कुछ ऐसा ही। सिर्फ एक पत्रिका नहीं, बल्कि हर अंक एक संपूर्ण कृति सरीखा, जिसमें कविता, कहानियों, लेखों, फीचर आदि-आदि में भारती जी कहीं न होते हुए भी हमें सबसे ज्यादा वही नजर आते थे। हर अंक किसी कसे हुए सितार जैसा, जिसमें एक भी तार ढीला नहीं। फिर चाहे गीत-कविताओं की बेहद कलात्मक प्रस्तुति हो, या फिर पाठकों के दिलों को छूती कहानियाँ, धारावाहिक उपन्यास, लेख और फीचर। कोई पत्रिका कैसे किसी लेखक की मुकम्मल रचना हो सकती है, इसकी धर्मयुग जैसी मिसालें हमारे यहाँ कम हैं। 
खासकर जिन दिनों बांग्ला देश के लिए लड़ाई जोरों पर थी, धर्मयुग के अंक इतना कुछ लेकर आते थे कि उसके हर अंक का शब्द-शब्द हम पीते थे। लगता था, धर्मयुग अब एक पत्रिका नहीं रही, न्याय के लिए लड़ते हुए देश का राष्ट्रदूत हो गया है। और ऐसा, एक नहीं, बहुत बार देखा, जब धर्मयुग ने पूरी जनता की लड़ाई, तेवर और भावनात्मक आँधी को आवाज दी और उसे दिशा-दिशा में गुँजाया। लगभग उन्हीं दिनों भारती जी की बातचीत के लहजे में खुली अभिव्यक्ति और जादुई लय वाली कविताओं की ओर ध्यान गया तो लगा, हाँ सचमुच, इतना बड़ा रचनाकार ही पाठकों को धर्मयुग सरीखी बड़ी रचना-कृति दे सकता है!
फिर तो सात गीत वर्ष’, ठंडा लोहा, गुनाहों का देवता—एक-एक कर उनकी सारी रचनाएँ पढ़ीं। तब साहित्य की बहुत ज्यादा समझ तो नहीं थी, पर मन की किसी स्वाभाविक अंतःप्रेरणा से इतना जरूर समझ में आ जाता था कि गुनाहों का देवता पढ़ने में कैसा ही बाँध लेने वाला उपन्यास हो, पर वह कनुप्रिया सरीखी बड़ी रचना नहीं है, जिसमें कविता, प्रेम, अध्यात्म—सभी एकमेक हो जाते हैं और यह सब किसी शास्त्रीय संगीत के आलाप की तरह मन में तरंगित हो उठता है। और गीत और कविताओं में फिरोजी होंठों से ज्यादा नया रस और प्रमथ्युगाथा मन को छूती थी।
मुझे याद है, कनुप्रिया जब पहली दफा पढ़ी थी तो बड़ा अचरज हुआ था कि अरे, इन खुली और मुक्त छंद-लय में बहती हुई कविताओं को गीत कहा गया है। क्यों भला? यह कोई छंदबद्ध रचना तो नहीं। पर फिर भीतर मन से ही जवाब आया— नहीं मित्र, जरा गौर से देखो, ये कुछ और ही तरह के गीत हैं। गीत भी जिस अनुभूति-रस और तरल संवेदन के लिए तरसते हैं, उस अनुभूति और संवेदन से छल-छल करते, बहुत-बहुत आर्द्र और कोमल गीत। मन हैरान था कि वही शब्द हैं जिन्हें हम रोज बरतते हैं, पर एक सिलसिले में आकर ये एक-दूसरे से ऐसे अदृश्य तार से बँध गए हैं कि लगता है, अरे, ये तो ऐसे ही—बस ऐसे ही पास आने के लिए बने थे। आप इनकी तरतीब थोड़ी बदल दीजिए और आप देखेंगे कि इनका सारा जादू नष्ट हो गया है। इस पुष्पित डाल के सारे फूल बेनूर होकर जमीन पर आ गिरेंगे। 
कनुप्रिया को इस बार फिर पढ़ा तो लगा कि यह कविता नहीं, महाराग की अभिव्यक्ति है। वह महाराग जिससे यह सारी सृष्टि संचालित होती है और जिसके लिए आचार्य द्विवेदी के उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा की भट्टिनी कहती है कि बाण, यह सृष्टि आनंद से जन्म लेती है और अंत में आनंद में ही इसका पर्यवसान होता है। इसके अलावा भला इसका और क्या निमित्त हो सकता है! कनुप्रिया महज कोई स्त्री नहीं है और कृष्ण केवल पुरुष नहीं। ये दोनों तो उस महाराग के नाभिकेंद्र में केलिरत दो अलौकिक लहरें हैं। कनुप्रिया का पहला गीत ही पार्थिव से अपार्थिव की ओर उड़ चलने के लिए पंख दे देता है। यहाँ राधा के अशोक-वृक्ष से कहे गए शब्द हैं, जो मानो अशोक से नहीं, खुद से ही कहे जा रहे हों। और यहाँ अशोक-वृक्ष से जुड़ी एक कौतुक भरी कल्पना सामने आती है कि किसी सुंदर युवती के चरणों के आघात से यह वृक्ष एकाएक पुष्पित हो उठता है—ओ पथ के किनारे खड़े/ छायादार पावन अशोक-वृक्ष/ तुम यह क्यों कहते हो कि/ तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में/ जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे!” और आगे कनुप्रिया जो कहती है वह एक स्त्री के रागात्मक मन की समूची कहानी है— 
तुमको क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए—
धूल में मिली हूँ
धरती में गहरे उतर
जड़ों के सहारे
तुम्हारे कठोर तने के रेशों में
कलियाँ बन, कोंपल बन, सौरभ बन, लाली बन—
चुपके से सो गई हूँ
कि कब मधुमास आए और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन में छा जाओ।
यानी असल में तो यह कनुप्रिया—एक प्रेम-मग्न स्त्री ही है जो किसी अशोक-वृक्ष में कलियाँ बन, कोंपल बन, सौरभ बन, लाली बन मधुमास की तरह छा जाती है—और हम कहते हैं कि पेड़ फूलों से लद गया है!
कनुप्रिया के दूसरे गीत में उसका एक ऐसा अद्भुत आत्म-साक्षात्कार है, जिसमें कृष्ण बाहर नहीं, उसे अपने आप में समा गए लगते हैं—
यह जो अकस्मात्
आज मेरे जिस्म के सितार के
एक-एक तार में तुम झंकार उठे हो—
सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
तुम कब से मुझमें छिपे सो रहे थे।
यहाँ शृंगार कुछ-कुछ अध्यात्म के नजदीक पहुँच जाता है, जहाँ गहरी आकुलता के क्षणों में सारे आवरण हट जाने पर ही आप आत्म से मिल पाते हैं— पर हाय मुझे क्या मालूम था,/ कि इस वेला जब अपने को,/ अपने से छिपाने के लिए मेरे पास,/ कोई आवरण नहीं रहा,/ तुम मेरे जिस्म के एक-एक तार से झंकार उठोगे…” 
कनुप्रिया प्रेम-तन्मयता का काव्य है, जिसमें मन और देह के बीच के फासले भी मिटने लगते हैं। प्रेमल क्षणों में अपने आप को घंटों निहारना दरअसल खुद को नहीं, उसे निहारना है, जिसका प्रेम हमारे भीतर-बाहर व्याप्त है और जिसने हमारे जीवन को अर्थ दिया है। कनुप्रिया कृष्ण के आगे एक सवाल रखती है—यह जो दोपहर के सन्नाटे में/ यमुना के इस निर्जन घाट पर अपने सारे वस्त्र/ किनारे रख/ मैं घंटों जल में निहारती हूँ/ क्या तुम समझते हो कि मैं इस भाँति खुद को देखती हूँ?” और फिर इस सवाल का जवाब भी वही देती है—
नहीं मेरे साँवरे
यमुना के नीले जल में
मेरा यह वेतसलता सा काँपता तन-बिंब, और उसके चारों
ओर साँवली गहराई का अथाह प्रसार, जानते हो कैसा लगता है—
मानो यह यमुना की साँवली गहराई नहीं है
यह तुम हो जो सारे आवरण दूर कर
मुझे चारों ओर से कण-कण रोम-रोम
अपने श्यामल आलिंगन में पोर-पोर
कसे हुए हो।
और कनुप्रिया में स्त्री का एक आत्मविश्वासी रूप वह भी है, जिसमें समय को उसने अलकपाश में बाँध लिया है और अब इस निखिल सृष्टि के विस्तार में केवल उसी का होना है—आओ मेरे अधैर्य/ दिशाएँ घुल गई हैं/ जगत लीन हो चुका है/ समय मेरे अलकपाश में बँध चुका है/ और इस निखिल सृष्टि के/ अपार विस्तार में/ तुम्हारे साथ मैं हूँ—केवल मैं/ तुम्हारी अंतरंग केलिसखी!”
लेकिन अफसोस! इतिहास की यह कैसी अजब विडंबना है कि जो प्रेम, ऊर्जा और शक्ति की अक्षय स्रोत है, वही प्रेम-संगिनी आगे चलकर सबसे निरर्थक हो जाती है। जाने वाला उस पर पग रखकर चला जाता है, युग का नया इतिहास रचने—और जिसने अपनी हृत्तंत्री के तार-तार से उसे बल दिया, धरती और इतिहास को उथल-पुथल करने की महाशक्ति दी, वही नेपथ्य में रह जाती है, अकेलेपन की पीड़ा, उदासी और अंतहीन टूटन के साथ। हाँ, पर विदग्ध राधा का एक सवाल ऐसा है, जो इतिहास के उदात्त कथानकों और महा चरित्रों के आभामंडल के आगे जरूर एक अनुत्तरित सवाल की तरह खड़ा रहेगा—
सुनो कनु, सुनो
क्या मैं सिफ एक सेतु थी तुम्हारे लिए
लीलाभूमि और युद्धक्षेत्र के
अलंघ्य अंतराल में?
बहुत सीधे-सादे अल्फाज में पूछा गया एक महाप्रश्न! और यह सवाल इतना बड़ा है कि लगता है, एक स्त्री ने केवल कृष्ण ही नहीं, राजनीति के बड़े-बड़े महारथियों, धुरंधर विद्वानों और सारी पुरुष-सत्ता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस सवाल की गूँज-अनुगूँज ऐसी है कि वह कल भी सुनाई देती है, आज भी सुनाई देती है और आगे आने वाले समयों को भी अपनी संवेदना के ताप से प्रश्नांकित करती रहेगी। यही वह बिंदु है, जहाँ भारती जी की काव्य-नायिका प्रेम, अध्यात्म और यथार्थ तीनों का एक अद्भुत संधिस्थल बन जाती है। 
सच तो यह है कि कनुप्रिया में ऐसे बहुत क्षण हैं, जहाँ कविता मानो एक महाकाश हो जाती है। यही दूर तक व्यप्ति भारती जी को अपने समय के दूसरे कवियों से अलग, अद्वितीय और कहीं ज्यादा स्वीकार्य बनाती है।
[3]
भारती जी के एक और बहुचर्चित संग्रह सात गीत वर्ष में भी ऐसा बहुत कुछ है, जिसमें उनकी सदेह उपस्थिति महसूस होती है। उनके जाने के बाद भी। सात गीत वर्ष के गीतों में खासी विविधता है, पर पाठकों के दिल के तारों को छेड़ते हुए, एक हलचल पैदा करने की उनकी कूवत तो एक जैसी है। और वही इस संकलन को एक पुख्ता आधार देती है। साथ ही एक अलहदा मिजाज भी, जिससे यह महज कविता संकलन न होकर एक संपूर्ण कृति का अहसास कराता है।
सात गीत वर्ष के गीतों में एक गहरी प्रश्नाकुलता के साथ-साथ कहीं-कहीं बाहर से भीतर की यात्रा दिखाई देती है और वही सबसे ज्यादा मुग्ध करती है। देह की मांसलता की जगह प्रेम यहाँ एक अचरज की तरह है, जिसे शायद ठीक-ठीक कभी नहीं समझा जा सकता—
प्रभु,
इस रस को
इस नए रस को क्या कहते हैं
जिसमें शृंगार की आसक्ति नहीं
जिसमें निर्वेद की विरक्ति नहीं
जिसमें बाँहों के
फूलों जैसे बंधन के
आकुल परिरंभण की गाढ़ी तन्मयता के क्षण में भी
ध्यन कहीं और चला जाता है
तन पिघले फूलों की
आग पिया करता है
पर मन में प्रश्नचिह्न उभर आते हैं
यह सब क्या है/ क्यों है
साथ ही यहाँ ऐसे बिंब नजर आने लगते हैं, जो नई कविता में बहुत चर्चित और बार-बार उद्धृत हुए। उनमें नयापन भी था और एक अदा भी। शाम : एक थकी लड़की ऐसी ही कविता है, जिसकी शुरुआती पंक्तियाँ ही बाँध लेती हैं—
नींद भरी तरलायित बड़री कटावदार आँखें मूँद
शाम
एक सफर में थकी हुई लड़की सी
आई और मेरे पास बैठ गई।
भारती जी के ठंडा लोहा संकलन का मिजाज भी इससे काफी मिलता-जुलता सा है। खास बात यह है कि इसमें दूसरा सप्तक में शामिल बहुत-सी कविताएँ आ गई हैं। इन कविताओं में ये शरद के चाँद से उजले धुले से पाँव, मेरी गोद में तथा इन फिरोजी होंठों पर बर्बाद मेरी जिंदगी सरीखी काव्य-पंक्तियाँ उसी देह गंध और रोमानियत से सराबोर नजर आती हैं, जो भारती जी की शुरुआती कविताओं का एक खास आकर्षण भी है। पर संकलन की शीर्षक कविता ठंडा लोहा एकदम ढंग की और सही अर्थ में एक शक्तिशाली कविता है। एक ऐसी कविता, जो उस रोमान से बहुत परे जाकर जिंदगी की जड़ता के खिलाफ तनकर खड़ी होती है और एक बड़ी पुकार लिए हुए है।
कहना न होगा कि ठंडा लोहा उस बड़े दृष्टिफलक को सामने रखती है, जो भारती जी के काव्य को विस्तार ही नहीं देता, बल्कि उसे जमीनी यथार्थ से भी जोड़ता है। वे यहाँ भी अपनी आत्मा की संगिनि को पुकारते हैं, पर अब पुकार ही नहीं, उसकी भाषा भी बदल गई है। यह सचमुच बदलते समयों से मुठभेड़ करके, कहीं भीतर ही भीतर टूट रहे कवि की आवाज है— 
ओ मेरी आत्मा की संगिनि
अगर जिंदगी की कारा में
कभी छटपटाकर मुझको आवाज लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको निगल चुका है
इस बस्ती में कोई दीप जलाने वाला नहीं बचा है
सूरज और सितारे ठंडे
राहें सूनी विवश हवाएँ
शीश झुकाए खड़ी मौन हैं
बचा कौन है
ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!
हालाँकि इस संकलन में प्रेम के ऐसे क्षण भी हैं, जो अध्यात्म की सी उदात्तता लिए हुए हैं। ऐसा ही एक बड़ा अद्भुत भावनात्मक मुक्तक—याद पड़ता है—जब पहलेपहल पढ़ा, तभी से मेरे भीतर मानो नक्श हो गया है— 
तप्त माथे पर नजर में बादलों को साधकर
रख दिए तुमने सरल संगीत से निर्मित अधर,
आरती के दीपकों की झिलमिलाती छाँह में
बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर।
कहना न होगा कि यह प्रेम का देह से परे जाकर सृष्टि के कण-कण में गूँजता संगीत बन जाना है। तप्त माथे पर आकर टिक गए सरल होंठ ऐसे लगते हैं—बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर! समूची नई कविता में ऐसा बिंब और ऐसी प्रेम-तन्मयता शायद ही कहीं और मिले। और सचमुच भारती जी की कविता की अंतर्धारा भी यही है—बाँसुरी रक्खी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर…!” यह महाराग ही उन्हें जीवन देता है और बार-बार कुछ और रचने के लिए प्रेरित करता है। यहाँ तक कि उनका विद्रोह भी यहीं से शक्ति, ऊर्जा और लड़ने की ताकत लेता है। 
इसीलिए तो हर क्षण सृजन में लीन, थके हुए कलाकार को उम्मीद बँधाने के लिए वे बड़ी आत्मीयता से कंधे थपथपाते हुए, जैसे उसके मन की सारी थकान उतार देना चाहते हैं। अभी तो धरा अधबनी है और चाँदनी के सपने दूर हैं। अभी तो धरती पर स्वर्ग उतारने के लिए बहुत कुछ किया जाना है। तो कोई सृजनशील आदमी थककर कैसे बैठ सकता है? भारती जी के शब्द यहाँ गहरी संवेदना में डूबे हुए हैं, इसीलिए दिल में गहरी हलचल भी पैदा करते हैं—
सृजन की थकन भूल जा देवता,
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी।
इसी से कुछ-कुछ मिलती-जुलती कविता फूल, मोमबत्तियाँ, सपने शहर के उस मध्यवित्त युवक को संबोधित करके लिखी गई है, जिसे लगता है कि दफ्तरी रूटीन में उसके सपने कैद होकर टूट और बिखर रहे हैं। सब कुछ तबाह हुआ जा रहा है। पर भारती जी की कविता यहाँ दर्द के गहरे उतरने पर मिलने वाली एक ज्योति की ओर इशारा करती है, जिसके मंजुल प्रकाश में सब के अर्थ नए खुलने लगते। जरा इन पंक्तियों में छिपी सहानुभूति की आर्द्रता देखें— 
यह फूल मोमबत्तियाँ और टूटे सपने
ये पागल क्षण
यह कामकाज, दफ्तर फाइल उचटा सा जी
भत्ता वेतन
ये सब सच हैं, इनमें से रत्ती भर न किसी से कोई कम…
ओ मेजों की कोरों पर माथा रखकर रोने वाले,
यह दर्द तुम्हारा नहीं सिर्फ, यह सबका है
सबने पाया है प्यार, सभी ने खोया है
सबका जीवन है भार और सब जीते हैं
बेचैन न हो
यह दर्द अभी कुछ गहरे और उतरता है
फिर एक ज्योति मिल जाती है
जिसके मंजुल प्रकाश में सब के अर्थ नए खुलने लगते…
यह एक ऐसी कविता है, जिसमें यथार्थ से भिड़ने की कूवत तो है ही, पर साथ ही जिंदगी की एक नई शुरुआत के लिए वह पहला कदम बन जाती है, और एक नई इमारत के लिए नींव का पत्थर भी। बेशक भारती जी की कविताओं और काव्य-चेतना में आ रहे बदलाव की भी यह गवाह है, और इशारों में ही बता देती है कि एक युग जा रहा है और एक नया युग जन्म लेने को आतुर है। 
भारती जी की कविता का यह एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण मोड़ है, जिसे गौर से देखने, समझने की जरूरत है।
[4]
सन् 1993 में धर्मयुग से मुक्त होने के बाद भारती जी का नया संकलन सपना अभी भी सामने आया। कोई चौंतीस बरस बाद। इसी पर उन्हें 1994 में व्यास सम्मान से विभूषित किया गया। संकलन की भूमिका बहुत संक्षिप्त पर मानीखेज है। इसमें भारती जी के दिल की बड़ी कचोट, पीड़ा, उदासी तथा बदले हुए समय और हालात में खुद पर हलका सा अविश्वास भी सामने आता है। वे बहुत सीधे, सहज लहजे में लिखते हैं—
एक लंबे बहुत लंबे अरसे के बाद मेरा कविता-संकलन आपके हाथों में है। वैसे भी कविताएँ लिखने के बीच-बीच में पहले भी बहुत अंतराल छूटते थे, लेकिन इस अवधि में तो एक कविता और दूसरी कविता के बीच में कभी-कभी तो वर्षों का अंतराल रहा है। इस संकलन में सन् 59 से लेकर सन93 तक की कविताएँ हैं—चौंतीस लंबे वर्ष यानी दो बनवासों की अवधि से भी ज्यादा। इन दो बनवासों की समवेत अवधि के बाद भी घर लौट पाया हूँ या नहीं—पता नहीं। 
जरा गौर कीजिए, यह घर लौटना क्या है? भारती जी जब धर्मयुग में थे, तो कहा जाता था कि उन्होंने अपनी संपूर्ण सृजनात्मकता धर्मयुग पर निसार कर दी है और इसीलिए उनका अपना लेखन कुछ थम सा गया है। तो क्या यह घर लौटना एक हलके से पछतावे के साथ फिर से कविता की राह पर आ जाना था, जो शुरू से उनमें बह रही थी और हर दुख और मुश्किल में उनकी ताकत बनकर साथ खड़ी हो जाती थी? धर्मयुग से मुक्त होकर भारती जी फिर से उसी कविता के साथ हो लेते हैं। उनके मन में भले ही संदेह की हलकी झाँईं हो, पर न कविता ने उन्हें छोड़ा और न कविता से वे कभी दूर हो सके। कविता एक अंतःसलिला की तरह उनके भीतर हमेशा बहती रही और उनके जीने की शक्ति बन गई। 
सपना अभी भी में कुछ कविताएँ भारती जी की पुरानी रंगत यानी हलके जरतारी मिजाज की हैं। पर इसी संकलन में ऐसी बहुत कविताएँ हैं, जो न सिर्फ समय के साथ-साथ उनके बदलते हुए मिजाज की गवाह हैं, बल्कि उनमें एक लंबी यात्रा के अनुभूतिपरक पड़ाव भी देखे जा सकते हैं। जाहिर है, संकलन की ज्यादातर कविताएँ मुंबई में जाने के बाद लिखी गई हैं। इनमें दीदी के धूल भरे पाँव कविता मन को सहज ही पकड़ लेती है। कविता अच्छी तो है ही, पर वह इसलिए भी ध्यान खींचती है कि वह मंबई में जाने के बाद लिखी गई पहली कविता है और इसमें हाथ उठाकर पुकारता अपना गाँव, दीदी के धूल भरे पाँव और अगहन की कोहरीली भोर समेत ऐसा बहुत कुछ पीछे छूट जाने की कसक है, जिससे जीवन को अर्थ मिलता है। और उसकी जगह यह जो महानगर की चाकचिक्य है, बहुत झूठी और निरर्थक लगती है—
एक लाख मोती, दो लाख जवाहर
वाला, यह झिलमिल करता महानगर
होते ही शाम कहाँ जाने बुझ जाता है—उग आता है मन में
जाने कब का छूटा एक पुराना गँवई का कच्चा घर
जब जीवन में केवल इतना ही सच था :
कोकाबेली की लड़, इमली की छाँव!
इसी तरह एक कविता इलाहाबाद पर में भी भारती जी अजित कुमार को भेजे गए खत में पुराने इलाहाबाद के दिनों की जिंदादिली और मस्ती को पूरी शिद्दत से याद करते हैं—
वही जाड़े की धूप जरतार
जोगिया नैस्टर्शियम अलसाई जमुना
काँपता कोहरा, सड़कें छायादार
अपने पुराने शहर में
सब कुछ वही है प्रिय अजित कुमार,
मगर कुछ है जो अब वहाँ नहीं रहा
चला गया हमारे तुम्हारे गिरधर सर्वेश्वर रमानाथ के साथ
कभी-कभी वापस न लौटने के लिए
मोहन राकेश पर लिखी गई खाली हाथ तुम्हारे लिए भी एक उदास कविता है, जो धीरे से दिल में उतर जाती है। मीर की किसी दर्द भरी गजल की तरह, एक गहरी कसक लिए। यहाँ भी पुराने इलाहाबाद की यादें साथ नहीं छोड़तीं और वे बड़ी बेसब्री से दिलो-दिमाग में मँडराती रहती हैं—
काश, मैं तुम्हें दे सकता आज
इलाहाबाद की वह सर्द सुबह
जब काँपती धूप हमारे साये कितनी दूर तक फेंकती थी
काश, मैं ला सकता तुम्हारे लिए
अपनी उसी टूटी साइकिल पर लादकर
वह छत की दोपहर
बेमतलब घूमना, ठहाके, वे निश्छल
धड़कनें विश्वास भरे दिल की
अंतरात्मा : एक खाली शाम की बातचीत में आत्मा की चर्चा चलने पर भारती जी थोड़े नैराश्यपूर्ण लहजे में अपने भीतर गहरे झाँककर उसकी खोज करते हैं, तो सड़कों पर टुटही साइकिल दौड़ाता एक लड़का नजर आता है, जिसकी शक्ल उनसे बहुत मिलती है। फिर अगले ही क्षण उसके चेहरे पर इलाहाबाद के पीछे छूट गए गर्दिश के दिनों की धूल भी नजर आ जाती है— 
एक टुटही साइकिल पर
हवाओं को चीरता
फूलों और कोहरे की परतों में से
हैंडिल सँभालकर गुजरता हुआ
एक लड़का याद आता है…
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्यायों में से है। अफसोस, बहुत से जाने-माने लेखक-साहित्यकार अपने अचूक अवसरवादी रवैए के कारण इस तानाशाही दमन के पक्ष में खड़े हो गए थे। पर भारती जी उस समय मुनादी लिख रहे थे—जनता की आवाज को बुलंद करते हुए सड़कों पर निकल आए एक बहत्तर बरस के बूढ़े आदमी का अभिनंदन करते हुए। और साथ ही तानाशाही के चेहरे को अपने तीखे व्यंग्यात्मक शब्दों की मार से किरच-किरच करते हुए— 
खलक खुदा का मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का…
हर खासोआम को आगाह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से
कुंडी चढ़ाकर बंद कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है।
कवि के रूप में भारती जी की कविता की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उस जमाने में जब कविता सिर्फ कवियों के बीच पढ़ी जा रही थी और आम आदमी से लगभग कट चुकी थी, उन्होंने फिर से कविता को सहज स्वीकार की भाषा दी। ठूँठ किस्म की बौद्धिकता परोसने तथा किस्म-किस्म के ऊटपटाँग प्रयोग करने के बजाय उनकी कविता प्रेम, सौंदर्य, राग-विराग और मानवीय संवेदना की गहनतम अनुभूतियों से जुड़ती है। इसीलिए जो नई कविता से बिदकने वाले साहित्यमना लोग थे, उन्होंने भी भारती जी को बहुत रुचि से पढ़ा और सराहा। बल्कि जो पाठक छायावाद, उत्तर-छायावाद, प्रगतिवाद और गीत-कविता के घोर हिमायती थे, उनमें से भी हम बहुतों का भारती जी की ओर झुकाव देखने लगते हैं। 
सच तो यह है कि दिनकर, बच्चन, नागार्जुन, सर्वेश्वर और भवानी भाई के साथ-साथ धर्मवीर भारती भी उन बड़ी रेंज वाले कवियों में से हैं, जिन्होंने कविता की सीमित हदबंदियों और फेंसेज को तोड़कर उसे आम जनता के बीच ले जाने का बड़ा काम किया। नहीं तो हिंदी में ऐसे कवियों की कमी नहीं थी—आज भी नहीं है जिन्हें सिर्फ उनके मित्र-कवि ही पढ़ते और सराहते हैं और अपनी इस महानता से वे कुछ-कुछ आक्रांत भी रहते हैं, कि देखिए जी, हमने क्या लिख दिया जिसे समझने के लिए बहुत बड़ा दिमाग चाहिए!
यों भारती जी ने हिंदी कविता में लोगों की आस्था को बचाया, यह खुद में एक बड़ी बात है। इस लिहाज से उनकी कविता की एक और चमत्कारिक शक्ति है, उनकी लय और अभिव्यक्ति का खुलापन। एक ऐसा जादू जो पाठकों को बाँध लेता है और हमेशा के लिए भारती जी की कविता उनके दिल में घर बना लेती है। नई कविता और समकालीन कविता के नाम पर निरा बे-ताल गद्य परोसने की सुविधा कवियों को मिल गई है और बहुतेरे कवि उसी में अपने कवि-कर्म की इतिश्री समझ लेते हैं। पर भारती जी स्वच्छंद तबीयत के कवि हैं और दिल से दिल की राह कैसे बनती है, यह उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। लिहाजा वे यह अच्छी तरह समझते हैं कि बँधे-बँधाए छंद-विधान से हम भले ही मुक्त हो जाएँ, पर कविता ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुँचे, इसके लिए उसमें लयात्मकता का जादू तो होना ही चाहिए। एक भिन्न और लचीले किस्म की छांदिकता के बगैर आज भी कविता की गुजर नहीं। 
इधर तो कविता को बिल्कुल गद्य के पैराग्राफ की तरह लिखकर खुद ही पढ़ने और पढ़कर खुश हो लेने वाले कवियों की लगभग बाढ़ आ गई है। ऐसे में भारती जी की कविता को पढ़ना एक राहत भरे सुकून की तरह है, जिसमें कविता सीधे दिल को छूती है और मन की उन परतों तक चली जाती है, जिनके अँधेरे, वीरान कोनों और उदासियों से बात करने वाला कोई नहीं है। भारती जी की कविता हमारे नजदीक आती है तो पूरी तरह हमें अपना बना लेती है। उनमें और हममें कोई दूरी नहीं रह जाती। बहुत आमफहम शब्दों से बुनी गई उनकी कविता में बड़ी सहजता है, पर भूलना नहीं चाहिए कि कविता की यह सादगी भरी बुनावट किसी कवि में छंद, लय और भाषा की उस्तादी के बगैर नहीं आ सकती। और भारती जी में वह है। इसीलिए जितनी बार उन्हें पढ़ें, हर बार वह कविता नए-नए ढंग से हमें छूती और खुद हमारे भीतर के बहुत से अनजाने अर्थों को प्रकाशित करती चलती है। 
एक बात और। भारती जी ने कविताओं के अलावा गुनाहों का देवता जैसा अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास, गुलकी बन्नो सरीखी गहरी संवेदना से छलछलाती कहानियाँ, अंधा युग सरीखा युद्ध और जीवन के बड़े प्रश्नों से टकराता नाटक और सूरज का सातवाँ घोड़ा सरीखी अपने ढंग की निराली कथाकृति हमें दी। वे बड़े संपादक भी हैं। पर इसमें दो राय नहीं कि मूलतः तो वे कवि ही हैं। सबसे पहले वे कवि हैं, फिर कुछ और। उनके कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और यहाँ तक कि संपादक में भी उनके कवि की ही व्याप्ति है। बल्कि सच तो यह है कि भारती जी के ये सारे ही रूप, जिनसे उन्हें अपार ख्याति मिली, उनके कवि के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं, जिलके बिना न वे बड़े संपादक हो सकते थे, न कथाकार, नाटककार और संपादक। 
भारती जी के कवि ने ही उन्हें इतनी व्यापक दृष्टि, संवेदना और उदारता दी कि धर्मयुग की लोकप्रियता को बरकरार रखते हुए उन्होंने उसे नव्यतर लेखन के साथ-साथ हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों की एक से एक उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों से सजाया। विचारधारा आदि के सारे पूर्वग्रहों को एक ओर रख, उन्होंने जहाँ से जो बेहतर मिल सकता था, उसे बड़ी विनय और शिष्टता के साथ लिया और पत्रिका में बहुत सम्मान के साथ छापा। 
हर कोई जानता है कि भारती जी इलाहाबाद में परिमल गुट के लेखकों में थे, और परिमल वाले लेखक प्रगतिवादियों के दूसरे ध्रुव पर थे। पर कोई आश्चर्य नहीं कि रामविलास शर्मा सरीखे ख्यात प्रगतिवादी साहित्यकार के भाषा-समस्या पर लिखे गए अधिकतर लेख उन्होंने धर्मयुगमें छापे। रामविलास जी ने एक बार भारती जी की चर्चा चलने पर मुझे बताया था कि वे अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले मेरे घर आए। व्यास सम्मानग्रहण करने के बाद वे यहाँ मुझसे मिलने आए थे और जहाँ आप बैठे हैं, वहीं बैठे थे। उन्होंने यह बात कही थी कि मुझसे जो लोग मिलने आते हैं, उनमें अस्सी प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं, जिन्होंने भाषा-संबंधी आपके विचारों को पढ़ा है और उन्हें पसंद करते हैंया जो मार्क्सवाद के बारे में आपकी व्याख्याओं से सहमत हैं। इसी तरह लखनऊ में हुए एक लेखक-सम्मेलन में भारती जी ने सुझाव दिया कि हिंदी-उर्दू का एक सम्मिलित इतिहास लिखा जाना चाहिए, और यह काम रामविलास शर्मा ही कर सकते हैं।
मैं इसे एक संपादक की मुक्तावस्था कहता हूँ कि जहाँ से जो भी अच्छा मिलता है, उसे वह झोली में भर लाता है तथा साहित्य और कला के एक से एक बेशकीमती नगीनों से अपनी पत्रिका को सजाकर पाठकों के आगे पेश करता है। भारती जी की झोली बड़ी—बहुत बड़ी थी, इसलिए वे अंत तक एक से एक सुंदर रचनाओं से धर्मयुग को सँवारते रहे। 
धर्मयुग में भारती जी का युग भारती-युग कहा जा सकता है और बेशक हिंदी पत्रकारिता का वह स्वर्ण युग था। पर जाने क्यों मुझे लगता है, भारती जी इतने बड़े कवि न होते, तो उनकी झोली इतनी बड़ी और इतने बेशकीमती रत्नों से भरी न होती, जिसके कारण आज भी हम उन्हें संपादन-कला का आचार्य कहते हैं और शायद आज से सौ बरस बाद भी कहेंगे!
प्रकाश मनु
545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
मो. 09810602327
ईमेल – prakashmanu334@gmail.com
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14 टिप्पणी

  1. आदरणीय आपका संस्मरण मन को दूर कहीं टाइम मशीन में ले कर वहीं ले गया,जहां यह सब हुआ करता था।
    बेहद मृसणता से परिपूर्ण लालित्य आलेख।

  2. बहुत-बहुत आभार भाई सूर्यकांत जी। लेख जिस भावना से लिखा गया, आपने बहुत करीब से उसे देखा, समझा। महसूस किया। जानकर बहुत अच्छा लग रहा है।

    मेरा स्नेह और साधुवाद,
    प्रकाश मनु

  3. धर्मवीर भारती जी के जीवन से उनके पुस्तक प्रेम से संबंधित अनुपम जानकारी पूर्ण संस्मरण.

  4. भारती जी के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा पुराने धर्मयुग ं की यादें ताजा हो गई। बहुत बढ़िया मुझे संस्मरण पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

    • धन्यवाद भाग्यम जी। मेरे साथ-साथ आपने भी भारती जी की सम्मोहक शख्सियत और उस दौर के ‘धर्मयुग’ को इतनी शिद्दत से याद किया। जानकर बहुत अच्छा लग रहा है। अब मुझे वाकई यकीन हो गया है, कि वे हजारों, लाखों के दिल में बसे हुए थे, जो उन्हें कभी नहीं भूल पाएंगे।

  5. आदरणीय मनु जी नमस्कार
    भारती जी पर समग्र- आलेख बहुत सुंदर ,विशाल और गहरा है ।आज की पीढ़ी को ऐसी शख्सियत के बारे में जानकारी इस संस्मरण के द्वारा प्राप्त होगी ।
    साधुवाद
    Dr prabha mishra

  6. जी, प्रभा जी। यह भावपूर्ण लेख लिखते हुए यही आकुलता मन में थी कि धर्मवीर भारती कितने बड़े लेखक और संपादक थे, और ‘धर्मयुग’ के जरिए कितना बड़ा काम उन्होंने किया, यह आज की पीढ़ी जान सके।

    ‘धर्मयुग’ हमारे समय में हिंदी की एक अंतर्राष्ट्रीय ओपन एयर यूनिवर्सिटी सरीखा था। कोई भी, कहीं भी इसमें शामिल हो सकता था, और‌ ‘धर्मयुग’ के जरिए हिंदी और हिंदी साहित्य के बारे में बहुत कुछ जान और सीख सकता था, और अपनी प्रतिभा को निखार सकता था।

    ‘धर्मयुग’ के जरिए भारती जी ने हिंदी की कितनी बड़ी सेवा की, आज इस बारे में सोचना ही रोमांच पैदा करता है!

    मेरा स्नेह,
    प्रकाश मनु

  7. अब तक भारती जी के विषय में जितना जाना, ऐसा लगा अब तक केवल एक बून्द ही हिस्से आई थी, इतना कुछ जानने को बाकी था
    आभार आप का

  8. प्रकाश मनु जी ने धर्मवीर भारती जी के कृतित्व पर गहन पड़ताल की है। ऐसी पड़ताल वही कर सकता है जो उनसे बहुत करीब से जुड़ा रहा हो। इस आलेख में आपने इस बात का यत्र-तत्र जिक्र भी किया है। उनके बारे में, उनकी रचनाओं के बारे में काफी जानकारी उपलब्ध कराई है आपने। कहीं कुछ तो नहीं छूट पाया है इस आलेख में। उनकी रचना चाहे कनुप्रिया हो, सात गीत वर्ष हो, ठंडा लोहा हो या गद्य आदि की रचनाएं सभी को आपने अपनी दृष्टि से देखकर उनका सम्यक विवेचन किया है। उनके उद्देश्य और सार्थकता पर भी कलम चलाई है। उनके बारे में आपका अध्ययन बहुत है इसलिए आप उन पर इतना अच्छा लिख पाए हैं।
    आलेख के शुरुआत में उनके कोमा में जाने का जिक्र बहुत ही कसक उठाने वाला है। सहृदय पाठक उसे पढ़कर गमगीन होता है। इन्वर्टेड कोमा में लिखा पूरा वाक्य जहां उनका हृदय का 40% भाग ही सही बचा हुआ था, लगता था कि अब बचने की गुंजाइश नहीं है। पर ईश्वर जिसे जीवन देने पर आता है तो उसे पानी में डूबे हुए को भी जीवित कर देता है।
    लेकिन इसके बाद आपने उनका बचपन वाला पूरा संस्मरण ज्यों का त्यों उतार दिया है। इससे आलेख बड़ा हो गया है। आप उसे अपने शब्दों में लिखकर छोटा कर सकते थे। अगर बहुत जरूरी भी था तो उसे इन्वर्टेड कोमा में बंद करते। आपने यह तो लिख दिया है कि -‘ अलबत्ता जिस बचपन का जिक्र भारती जी करते हैं वह——–।’
    आपने इस आलेख से धर्मवीर भारती जी को जानने का अवसर प्रदान कराया, इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद

  9. आदरणीय प्रिय मनु सर, धर्मवीर भारती जी के बारे में आपका विस्तृत आलेख बताता हे कि आपके दिल दिमाग पर उनके व्यक्तित्व कृतित्व का कितना गहरा असर हे ,कनुप्रिया के बारे में विस्तृत चर्चा भी इस बात का द्योतक हे ,धर्मयुग मेरे पिता की पसंदीदा पत्रिका थी,साथ ही दिनमान साप्ताहिक हिंदुस्तान भी
    एक उस वक्त सोवियत संघ ,रूस से भी कोई पत्रिका आती थी।
    धर्मयुग से ही पत्रिकाएं पढ़ने की रुचि जाग्रत हुई थी हालांकि ज्यादा समझ न थी ,आपने उनकी कविताओं की कई पंक्तियां को इस आलेख में उदघृत किया हे वे सभी दिल को छूने वाली हैं कविताओं में जो बिंब हैं वे यकीनन अनूठे हैं
    बांसुरी रखी हो जैसे भागवत के पृष्ठ पर ,इन पंक्तियों के भाव हृदय के स्नेहिल झरते प्रेम का आध्यात्म की पवित्रता से संगम पंक्तियों की अभिव्यक्ति की ऊंचाई की पराकाष्ठा हे
    गुनाहों का देवता जैसा उपन्यास जिसे।पढ़कर जो रोमांच सिहरन पाठकों ने महसूस की होगी आज के उपन्यासों से उसका कोई मुकाबला नहीं,
    सच हे वे पहले कवि उपन्यासकार कहानीकार ही हे जिनकी संवेदनाओं ने पाठकों को साहित्य में रुचि प्रदान की अथवा जाग्रत की ,केदार नागार्जुन त्रिलोकी सहाय तो ,भारती जी के बाद ही आए,आपके इतने समग्र आलेख ने एक बार फिर मन को उनकी तरफ उन्मुख करने की प्रेरणा दी हे ,उनके साहित्य को पढ़ने की दिशा दी हे,उनका जज्बा किताबों के प्रति शरीर में दिल के धड़कने जैसा था ,उनकी अस्वस्थता और किताबों से अनन्य प्रेम आपके आलेख से जन पाए
    धर्मवीर भारती जी को कोटि कोटि नमन,आपको आदरणीय मनु जी कोटि आभार इस आ लेख के लिए।

  10. जितेन्द्र भाई: धर्मवीर भारती जी पर लिखे प्रकाश मनु जी के लेख को पुरवाई के माध्यम से साझा करने के लिए बहुत बहुत साधुवाद, धन्यवाद और आभार। भारती जी के बारे में मेरी अपनी बहुत ही लिमिटेड जानकारी होते हुए भी मैं ने इस लेख को जितनी बार भी पढ़ा भारती जी के जीवन से कुछ न कुछ सीखने को मिला। मुझे याद है जब वर्ष 2010 में हिन्दी राइटर्स गिल्ड के सौजन्य से ‘अन्धा युग’ नाटक के कुरूक्षेत्र में हुए भीषण सँग्राम का मँचन किया था। यह नाटक बहुत सफ़ल रहा। बाद में टौरॉन्टो के इस्कॉन सैन्ट्र के अनुरोध पर ‘अन्धा युग’ का दोबारा मँचन किया गया। हर पात्र के मुंह से निकला इस नाटक का एक एक संवाद बहुत प्रभावशाली था। दुर्योधन के शब पर हृदय विदारक स्वर में माता गाण्धारी का कृषण जी को शाप देना: –
    ‘सुनो कृषण / प्रभू हो या परात्पर हो / सारा तुम्हारा वँश इसी तरह परस्पर मारा जाएगा/ तुम ख़ुद उनका विनाश करके / वर्षों बाद मारे जाओगे साधारण व्याध के हाथों / प्रभू हो या परात्पर हो / पर मारे जाओगे पशुओं की तरह।
    बाद में कृषण जी का शाप को स्वीकार करना और माता गान्धारी का ‘यह क्या किया मैं ने’ कहकर फूट फूट कर रोना देखकर हॉल में शायद ही कोई एसी आंख होगी जो नम न हुई हो।
    आपातकाल में ‘मुनादी’ कविता में सब को बाहर जाने से मना करके अन्त की दो लाइने बहुत अच्छी लगी।
    एक बहतर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमज़ोर आवाज़ में
    सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है।
    भारती जी के उपन्वास ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ के आधार पर श्याम बैबेगल ने इसी नाम से मूवी बनाई थी। मुझे इस मूवी की कॉपी मिल गई है। मेरा अगला प्रॉजैक्ट इस मूवी को देखना है।
    पुष्पा भारती द्वारा संपादित भारती जी की दस प्रतिनिधी कहानियाँ पुस्तक में उन्हीं की हस्तलिपी में ‘एक छोटी मछली की कहानी’ पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
    अन्त में पुरवाई के माध्यम से, आपको और पुरवाई के सभी पाठकों को नय़े वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

  11. जी,मैं भारती जी को मन से पढ़ता रहा हूं।वे कहीं भीतर तक छूते हैं।आप ने उनकी रचनात्मकता को अत्यन्त महत्वपूर्ण ढंग से रेखांकित किया है।उनको पढ़ने की बहुत–सारी स्मृतियां ताज़ा हो गईं।हार्दिक शुभकामनाएं।

  12. अत्यंत हृदयस्पर्शी रचनात्मकता है… अद्भुत एवं असीम भाव से परिपूर्ण… सर्वदा स्मृति में रहेंगे….

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