Friday, March 13, 2026
होमलेखराजेन्द्र सिंह गहलौत का लेख - कहानी अपने प्रारंभ से आज तक

राजेन्द्र सिंह गहलौत का लेख – कहानी अपने प्रारंभ से आज तक

कहा जाता है कि कहानी कहन से जन्मी तथा कथा कथन से लेकिन न तो हर कहन को कहानी माना जा सकता है और न हर कथन को कथा। जब तक  कहन मे कोई घटना या अनुभव कल्पना का पुट देते हुये अभिव्यक्त न हो तब तक उस कहन को कहानी कैसे माना जा सकता है? इसी भांति जब अतीत का कोई आख्यान विशिष्ट शिल्प के कथन में अभिव्यक्त होता है तो वह श्रोताओं के लिए कथा बन जाता है। 
जबकि अगर यह कहा जाये कि कहानी का जन्म भाषा के जन्म के काफी पहले से हो गया था तो संभवतः गलत न होगा। भाषा के जन्मने के काफी पहले जब आदि-मानव आखेट युग मे जी रहा था तब वह अपने आखेट के अनुभव की कहानी गुफा में चित्र-लिपि में अंकित कर अभिव्यक्त करता था जिसके कि प्रमाण वर्तमान में भी प्राचीन गुफाओं में अंकित शैल-चित्र के रुप में मिलते है। 
भाषा के जन्म के साथ ही कहानी लोक जगत में अलाव के चारों ओर बैठ कर कही और सुनी जाने लगी तो घर में बूढ़ी दादी नानी द्वारा भी सुनाई जाने लगी । इतना ही नहीं राजा महाराजाओं बादशाहों के दरबारों तक कहानी जा पहुंची और वहां बाकायदा किस्सागो नियुक्त किये जाने लगे। किस्सा कहने की विशिष्ट किस्सागोई कला जन्मी । इसी किस्सागोई कला से कही गई किस्सा कहानियों ने सनकी बादशाह शहरयार से हर रात अपनी नवविवाहिता को कत्ल करने की सनक से उसकी बेगम शहरजाद को जीवनदान मिला । 
भाषा की लिपि के जन्मने के साथ जब कहानियां लिखी जाने लगी तो भारत में कहानियों का प्रचलन बीसवीं सदी से माना गया । जब कि इस संबंध में प्रतिष्ठित साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन है – “ जिस देश की “पंचतंत्र”, “हितोपदेश”, “ वृहत्कथा”, “बेताल पच्चीसी”, “सिंहासन बत्तीसी” की कथाएं सारे विश्व की भाषाओं में रच बस गई हो उसकी कहानियों का इतिहास मात्र बीसवीं सदी से कैसे माना जा सकता है ।“ दरअसल प्राचीन भारत में कहानियां सिर्फ मनोरंजन के लिए कहीं सुनी नहीं जाती थी बल्कि हिन्दू धर्म की विधियों, नीतियों, राजनीति तथा व्यवहारिकताओं की जटिलताओं को सरलीकृत कर शिक्षण देने के उद्देश्य से भी कहानियां प्रचलन में आई थी जिसके प्रमाणस्वरूप “पंचतंत्र”, “हितोपदेश” की कथाओं एवं मिथकों का जहां जिक्र किया जा सकता है वहीं हिन्दू धर्म की विधियों के शिक्षण  के संबंध में कहानियों की भूमिका के बाबद राधावल्लभ त्रिपाठी के आलेख “भारतीय कथा परंपरा” का यह अंश प्रस्तुत किया जा सकता है –“ ब्राम्हण ग्रंथों में यज्ञों की विधियां बताने के प्रसंग में अथर्ववेद की दृष्टि से इतिहास पुराण या आख्यानों की कहानियां प्रस्तुत की गई है जिनसे कथा कहने की प्राचीन शैली का पहली बार परिचय मिलता है ।“
हिन्दी भाषा में कहानी लेखन के साथ ही हिन्दी की पहली कहानी किसे माना जाये तब से अब तक विवादित है। हिन्दी भाषा की पहली कहानी की दौड़ में शामिल कहानियों में “रानी केतकी की कहानी (1803 या 1808 ई.)”, नई खोज के अनुसार “एक जमींदार का दृष्टांत(1871 ई.)”, “राजा भोज का सपना (1887 ई.)”, “इंदुमती (1900 ई.)” एवं “टोकरी भर मिट्टी (1901 ई.) का जिक्र किया जा सकता है । सैय्यद इंशाअल्लाह खां द्वारा लिखी कहानी “रानी केतकी की कहानी” फारसी लिपि में लिखी गई थी तथा अमेरिकन पादरी जे. न्यूटन की कहानी “एक जमींदार का दृष्टांत” महज़ ईसाई धर्म की प्रचारगाथा है । अतः इन्हें हिन्दी की पहली कहानी न मान कर सन् 1887 में शिवप्रसाद सितारे हिंद द्वारा लिखी कहानी “राजा भोज का सपना” को हिन्दी की पहली कहानी माना जाना चाहिये लेकिन वामपंथ से प्रभावित प्रतिष्ठित साहित्यकार कमलेश्वर ने “सारिका” में आयोजित एक लंबी बहस के बाद “राजा भोज का सपना” कहानी के काफी बाद के कालखंड सन् 1901 में प्रकाशित माधवराव सप्रे की कहानी “टोकनी भर मिट्टी” को हिन्दी की पहली कहानी माना। 
लघुकथा से थोड़े से बड़े आकार की इस कहानी में जमींदार द्वारा गरीब वृद्धा के शोषण का कथानक शायद उन्हें वाम-पंथ की विचारधारा के अनुकूल लगा । जबकि “राजा भोज का सपना” कहानी का कथ्य धर्म, दान, मंदिर निर्माण आदि में आडंबर, आत्मप्रशंसा, दिखावा की प्रवृत्ति का विरोध करता है । “राजा भोज का सपना” कहानी के इस कथ्य को “टोकनी भर मिट्टी” कहानी के कथ्य के सामने इतना हल्का कर के नहीं देखा जा सकता कि उसे “हिन्दी की पहली कहानी” के सिंहासन से उतार कर गुमनामी के अंधेरे में फेंक दिया जाये। जबकि कई पृष्ठों की वह एक मुकम्मल कहानी है जिसमें एक पठनीय रोचक कथानक में उसके कथ्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है जो वर्तमान में भी प्रासांगिक है । लेकिन सन् 1907 में महिला कहानीकार राजेन्द्रबाला घोष (बंग महिला) की कहानी “ दुलाईवाली” को किसी महिला कहानीकार की प्रथम कहानी के रुप में निर्विवादित रुप में स्वीकारा जा सकता है ।
हिन्दी कहानी के सफर की शुरुआत बीसवीं सदी से मान कर यदि हम उसके साथ चले तो बीसवीं सदी के प्रथम दशक में लिखी गई कहानियों मे मास्टर भगवानदास की “प्लेग की चुड़ैल (सन 1902)”, गिरिजादत्त वाजपेई की “पंडित और पंडिताइन (सन 1903)”, पं. महेंद्रलाल गर्ग की “पेट की आत्मकथा ( सन 1904)”, माधव प्रसाद मिश्र की “लड़की की बहादुरी (सन 1905)”,  वृंदावन लाल वर्मा की प्रथम ऐतिहासिक कहानी “राखीबंद भाई (सन 1907), हेमंत कुमारी चौधरानी की “घूंघटवाली (सन 1908)”, जयशंकर प्रसाद की कहानी “ग्राम” एवं “आकाशदीप” (सन् 1911) , राधिकारमण सिंह की कहानी “कानों में कंगना (सन 1913)” आदि कहानियों का जिक्र किया जा सकता है । जबकि सन् 1900 में  लिखी बाबू केशव प्रसाद की रचना “चंद्रलोक की यात्रा” को हिन्दी की पहली वैज्ञानिक कहानी के बतौर स्वीकारा जा सकता है । 
इसी समय प्रेमचंद अपनी रचनाओं से बतौर कहानी उपन्यास सम्राट के रुप में तत्कालीन साहित्य जगत में स्थापित हुए ऐसी स्थिति में आजादी के पूर्व की कहानियों को दो खंडों में विभक्त किया जा सकता है । पहला प्रेमचंद के पूर्व की कहानियां तथा दूसरा प्रेमचंद परावर्ती कहानियां । प्रेमचंद ने अपना प्रारंभिक लेखन उर्दू भाषा में किया था तथा सन् 1908 में उनका पहला कहानी संग्रह “सोजेवतन” प्रकाशित हुआ जिसमें संग्रहित पांचों कहानियां मूलतः उर्दू भाषा में ही लिखी गई थी। जबकि प्रेमचंद की हिन्दी भाषा में लिखी पहली कहानी “बडे घर की बेटी” है जो सन 1910 में जमाना पत्रिका में प्रकाशित हुई थी तथा उनका पहला हिन्दी भाषा का कहानी संग्रह “सप्त सरोज” सन् 1917 में प्रकाशित हुआ था । 
प्रेमचंद को मुख्यतः: ग्रामीण अंचल के प्रमुख कुशल चितेरे कहानीकार के बतौर जाना जाता है तथा ग्राम्य जीवन पर केंद्रित उनकी प्रमुख कहानियों में “पूस की रात”, “सवा सेर गेहूं”, “ईदगाह”, “बैर का अंत”, “पंच परमेश्वर” आदि है । जबकि उन्होंने अपने युग के हर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अपनी कहानियों में किया है । स्वाधीनता प्राप्ति का उदघोष करती उनकी कहानियां “दुनिया का अनमोल रत्न”, “जुलूस”, “ समरयात्रा” आदि है तो ऐतिहासिक कहानियों में “व्रजपात”, “रानी सारंधा” “शतरंज के खिलाड़ी” आदि का नाम लिया जा सकता है वहीं “मंदिर”, “ठाकुर का कुआं”, “सदगति”, “शूद्रा”, “घासवाली”,  आदि कहानियां उस युग में अछूतों, दलितों की  दयनीय दशा को चित्रित करती है। इतना ही नहीं उन्होंने नगरीय जीवन तथा उद्योगों में श्रमिकों के जीवन पर भी कई कहानियां लिखी है जिसमें से “मिल मजदूर” तथा “डामुल का कैदी” कहानी का जिक्र किया जा सकता है। प्रेमचंद का अंतिम कहानी संग्रह “कफ़न” था जिसमें 13 कहानियां संग्रहित हैं ।
बीसवीं सदी के दूसरे दशक में सन 1913 में “रक्षाबंधन” कहानी से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक ने कहानी जगत में प्रवेश किया । इसी कालखंड में सन 1915 में गुलेरी जी की प्रसिद्ध कहानी “उसने कहा था” सरस्वती में प्रकाशित हुई जो कि संभवतः साहित्य जगत की एकमात्र युद्धकथा है  इसी समय लगभग 500 कहानियां लिखने वाले चर्चित कहानीकार उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन की कहानी “दुखवा मैं कासे कहूं सजनी” प्रकाशित हुई तथा बीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में सन 1920 में सुदर्शन की बहुचर्चित आदर्शवादी कहानी “हार की जीत “ प्रकाशित हुई जिसके पात्र बाबा भारती एवं डाकू खड्ग सिंह पाठकों की स्मृतियों में सुरक्षित हो गये ।
बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक  की कहानियों की प्रमुख उपलब्धि पांडेय बेचने शर्मा “उग्र” एवं जैनेन्द्र की कहानियां हैं । इस काल खंड में जहां उग्र की अमर कहानी “ उसकी मां” प्रकाशित हुई वहीं सन् 1927 में उनकी बहु विवादित एवं अश्लीलता के लिए चर्चित कहानी “ चाकलेट” भी प्रकाशित हुई । जबकि सन् 1929 में जैनेन्द्र का पहला कहानी संग्रह “ फांसी” तथा सन् 1930 में “वातायन” प्रकाशित हुआ । जैनेन्द्र ने बाल मनोविज्ञान से संबंधित कहानियां “खेल”, “पाजेब” “इनाम” आदि भी लिखी ।
प्रेमचंद ने समाज के लगभग सभी वर्गों पर कहानी लिखी लेकिन उनकी लिखी हुई आदिवासी वर्ग पर कोई कहानी नजर नहीं आती । लेकिन इस कालखंड में सन 1924 में आदिवासी जीवन पर वैद्यनाथ पोद्दार की पहली कहानी, “छोटा नागपुर” पत्रिका में प्रकाशित हुई तथा सन् 1929 में मोहनलाल महतो की आदिवासी जीवन पर केंद्रित कहानी “वनवासी” प्रकाशित हुई । उसके बाद वर्तमान तक कई कहानीकाऱों ने आदिवासी जीवन पर कहानियां लिखी जिनमें से नमिता सिंह की “जंगलगाथा”, शानी की “मछलिया” एवं “बोलने वाला जानवर”, मिथिलेश्वर की “सिंगाबोगा की वापसी”, सी भास्कर राव की “जोहार गोपम दा”, राकेश कुमार सिंह की “हांका” आदि कहानियों का नाम लिया जा सकता है । इसी कालखंड में हास्य रस की कहानियां लिखने वाले जी. पी. श्रीवास्तव ने भी अपना खाता खोला ।
दूसरे महायुद्ध से देश की आजादी तक के कालखंड में बंगाल का भीषण अकाल, देश का बंटवारा, शरणार्थी समस्या, सांप्रदायिक दंगे, राजनीतिक उथल-पुथल, मंहगाई, कंट्रोल सभी के पदचिन्ह उस काल में लिखी गई कहानियों में उभरते हुए दिखलाई पड़े । देश के बंटवारे का दर्द सबसे अधिक पंजाब ने झेला जिसका प्रतिबिंब पंजाब के कहानीकारों की कहानियों में अधिक दिखलाई पड़ता है। इस संबंध में पंजाब के कहानीकार कृष्ण चंदर की “पेशावर एक्सप्रेस” तथा भीष्म साहनी की “अमृतसर आ गया” एवं  उनकी अन्य कहानियों का जिक्र किया जा सकता है वहीं देश विभाजन के बाद पाकिस्तान गये कहानीकार सआदत हसन मंटो की “खोल दो”, “ठंडा गोश्त” आदि कहानियों का भी जिक्र किया जा सकता है। 
इस युग में यशपाल, रांगेय राघव, गुरुदत्त, अमृतलाल नागर, अमृत राय, उपेन्द्र नाथ अश्क, इलाचंद्र जोशी विष्णु प्रभाकर, बेनीपुरी आदि की कहानियां सामाजिक दायित्व के लिए प्रयत्नशील रही। प्रेमचंद के छोटे बेटे अमृत राय ने सन 1938 से “हम रखैल” और “मरुस्थल” से कहानियों का लेखन प्रारंभ कर लगभग 125 कहानियां लिखी । महादेवी वर्मा ने रेखाचित्र और स्मृतियों को संयुक्त कर कथा का रूप दिया उनके संग्रह “अतीत के काल चित्र (1941)”, तथा “ स्मृति की रेखाएं (1943) चर्चित हुए। जबकि सुभद्रा कुमारी चौहान की “राही” तथा “तीन बच्चे” कहानी सराही गई ।
आजादी के बाद सन् 1955-56 में “नई कहानी आंदोलन” उभरा तथा कहानी के स्वरूप में परिवर्तन आया । कहानीकार राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन की त्रयी के रुप में जाने गये । कमलेश्वर ने 300 से अधिक कहानियां लिखी तथा उनकी कहानी “राजा निरबंसिया”, “कस्बे का आदमी”, “खोई हुई दिशायें” अधिक चर्चित हुई वहीं राजेन्द्र यादव की जहां “लक्ष्मी कैद है”, “प्रतीक्षा”  आदि कहानियां चर्चित हुई वहीं उनकी अंतिम कहानी “हासिल” समीक्षकों एवं पाठकों द्वारा नकारी गई तथा मोहन राकेश की चर्चित कहानियों में “इंसान के खंडहर” , “नये बादल” “ जानवर और जानवर” आदि का नाम लिया जा सकता है। 
लेकिन नई कहानी आंदोलन के लगभग 12 वर्ष पूर्व ही सन् 1938 में “हंस” मे प्रकाशित भुवनेश्वर की कहानी  “भेडिये” ने राजेन्द्र यादव सहित लगभग सभी यथार्थवादी कहानीकारों को प्रभावित किया । इसी काल खंड में यथार्थवाद की अवधारणा स्थापित एवं प्रसारित की जाने लगी । लेकिन फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी कहानियों में आंचलिकता तथा ग्राम्य परिवेश को यथार्थवाद से बचा कर रखा तथा उसे अपनी कहानियों में मौलिक स्वरूप में प्रस्तुत किया । उनकी पहली कहानी “बट बाबा” है तथा अंतिम कहानी “अग्निखोर” है। उनने कुल 63 कहानियां लिखी जिसमें से “तीसरी कसम”, “पंचलाइट”, “ रसप्रिया” आदि कहानियां अधिक चर्चित हुई।  
दूसरी ओर प्रगतिशील विचारधारा के प्रमुख कथाकार ज्ञानरंजन ने “पिता”, “बहिर्गमन” “फेंस के इस पार उस पार” सहित लगभग कुल 25 कहानियां लिखी उसके बाद “पहल” पत्रिका के प्रकाशन से ही साहित्य जगत में वे अपनी उपस्थिति दर्ज करते रहे । दूधनाथ सिंह और काशीनाथ सिंह ने इस दौर में रचनात्मक कहानियां लिखी जबकि र्निमल वर्मा की कहानियां स्वयं अपने आप से बात करती है तथा उनके पात्र विचित्र सन्देश दे जाते हैं । अज्ञेय की “हीलबोंन की बतख” तथा अश्क की “पलंग” कहानी मनोविश्लेषणात्मक स्वरुप में प्रस्तुत होती है। संजीव एवं स्वयं प्रकाश ने भी अपनी कहानियों से अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति साहित्य जगत में दर्ज की ।
इस बीच कहानी आंदोलनों एवं प्रयोगों की चपेट में आ गई । “नई कहानी” के बाद “समानान्तर कहानी”, ”सक्रिय कहानी”, “जनवादी कहानी”,”प्रगतिशील कहानी” आदि आंदोलनों के साथ ही “अकहानी” का भी प्रयोग किया गया । इसके साथ ही साहित्य में कहानी के क्षेत्र में विशेष विचारधारा, यथार्थवाद एवं विमर्शों के परचम लहराये जाने लगे साथ ही कहानियां ही नहीं कहानीकार भी अलग-अलग खेमों में बंटते चले गये। 
रोज नये नये विमर्शों के स्वर साहित्य जगत में उभरने लगे । “दलित विमर्श”, “स्त्री विमर्श”, “अल्पसंख्यक विमर्श” के साथ ही “किन्नर विमर्श” भी वर्तमान साहित्य जगत में प्रभावी हो गया। जबकि “पुरुष विमर्श” की भी कुलबुलाहट के स्वर सुनाई पड़ने लगे । दूसरी ओर भारतीय साहित्य पर सप्रयास “अति यथार्थवाद” की विचारधारा भी लादी जाने लगी । 
दरअसल “अति-यथार्थवाद” फ्रांस में जन्मा एक साहित्यिक आंदोलन था । सन 1917 में फ्रांसिसी लेखक आलोचक गिलौम अपोलिनेयर ने सर्वप्रथम उसका उपयोग किया था । अति-यथार्थवादियों ने यथार्थ का स्वरूप भौतिक एवं मानव प्रकृति में नहीं बल्कि उसके विपरीत जीवन की विकृतियों में खोजा । इस वाद में अनीश्वरवाद के समर्थक  तथा जो कुछ परंपरा में है जो कुछ  प्राचीन है और जो कुछ रूढ़ियों और  व्यवस्था में बंधा हुआ है उसको समूल नष्ट कर देना अपना उद्देश्य माना । इसके तहत स्थापित नैतिकता और सामाजिक मानकों का खंडन किया जाता है । 
भारतीय साहित्य में इस अति-यथार्थवादी विचारधारा के समर्थक लेखन ने नैतिकता तथा विशेष तौर पर अपमानजनक ढंग से हिन्दू धर्म का विरोध करने में जहां कमर कस ली वहीं यौन स्वच्छंदता, अश्लीलता तथा अप्राकृतिक यौन संबंधों के समर्थन के पुरजोर स्वर साहित्य जगत में उभरे जिनसे कहानियां भी प्रभावित हुई । इस दिशा में प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका “हंस” तथा उसके तत्कालीन संपादक राजेंद्र यादव ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की । उन्होंने एवं उनकी पत्रिका “हंस” ने “ स्त्री यौन स्वातंत्र्य”  एवं “देंह विमर्श” के नाम पर “विवाहेत्तर यौन संबंध”, “स्वच्छंद यौन संबंध”, “लिव-इन रिलेशन” आदि के समर्थन के नारे बुलंद करने प्रारंभ  कर दिये जिससे “विवाह” का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया । 
इन सब का ऐसा प्रतिबिंबन वर्तमान साहित्य की प्रगतिशील कहानियों में होने लगा कि पाठक हतप्रभ रह गया । कई पुरुषों से देह संबंध बनाने की वकालत जहां कतिपय प्रगतिशील महिला कहानीकार करने लगी वहीं सिर्फ चर्चित होने के लिये अवैध देह-संबंधों की कथा कहती हुई उन्होंने मां और पुत्र के यौन संबंधों की भी कहानी लिख डाली तथा पत्रिका में ही प्रकाशित नहीं की बल्कि उस देह की गणित की कहानी को सोशल मीडिया में पोस्ट कर शान से चर्चित होने लगी । दूसरी ओर कई प्रगतिशील महिला कहानीकार यथार्थवाद का नारा बुलंद करते हुये स्त्रीत्व को अपमानित करने वाली अश्लील गालियों को  भी धड़ल्ले से अपनी कहानियों में लिखने लग गई जिससे साहित्यिक अभिरुचि के शिष्ट शालीन पाठकों ने ऐसी कहानियां ही नहीं जिन पत्रिकाओं में ऐसी कहानियां प्रकाशित हो रही थी उनको पढ़ने से भी तौबा कर ली ।
वर्तमान कहानीकारों का एक वर्ग पाश्चात्य कहानियों के शिल्प एवं कथानक से प्रभावित होकर उनका अनुकरण करने लग गया । विशेष तौर पर काफ्का की “मेटामारफोसिस” एवं चेखव की “डेथ आफ ए गवर्नमेंट क्लर्क” कहानी का कई भारतवासी कहानीकारों ने अनुकरण कर भारतीय परिवेश की कहानियां लिखी जबकि मार्केज के “जादूई यथार्थ” के शिल्प का अनुकरण करते हुये प्रतिष्ठित कहानीकार उदय प्रकाश ने विवादित एवं चर्चित लंबी कहानी  “वारेन हेस्टिंग्स का सांड” तथा “मोहनदास” कहानी लिखी । उन कहानियों पर टिप्पणी करते हुए प्रतिष्ठित समालोचक विजयमोहन सिंह ने कहा –“ काफ्का के बाद मार्केज ने इस फैंटेसी को जादूई यथार्थ में बदल दिया और कहानीकारों को नया नुख्सा मिल गया…। वह “वारेन हेस्टिंग्स के सांड” पर बैठ कर इतिहास का अतिक्रमण करता हुआ, विश्व भ्रमण करता रहा और उसने मुक्तिबोध को “ मोहनदास” के पास ला कर बैठा दिया ।“ (नया ज्ञानोदय, अगस्त 2008, पृष्ठ 120)
जबकि दलित साहित्यकारों की रचनाओं में जातिगत विसमता का दर्द स्वानुभूति के स्वरों में मुखरित हुआ तथा दलित आत्मकथाओं ने वर्तमान साहित्य में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की जिनमें से अक्कारमाशी (शरण कुमार लिंबाले)अपने अपने पिंजरे (मोहनदास नैमीशराय) तथा जूंठन (ओमप्रकाश वाल्मीकि) का नाम लिया जा सकता है। लेकिन वहीं सवर्णो द्वारा अतीत में दलित स्त्रियों से किये गये यौन शोषण से आक्रोशित हो कर वर्तमान में दलित विमर्शवादी कहानीकारों ने स्वर्ण वर्ग से प्रतिशोध के स्वर अपनी कहानियों में मुखरित करते हुये ऐसी कहानियां लिखी जिनमें दलित पुरुषों द्वारा उच्च सवर्ण वर्ग की स्त्रियों से यौन संबंध बनाने के दृश्य चित्रित किये गये । इस संदर्भ में सूरज पाल चौहान की कहानी “तिरस्कृत” तथा उदय प्रताप की कहानी “पीली छतरी वाली लड़की “ का जिक्र किया जा सकता है । जबकि इसके विपरीत वर्तमान में सशक्त दलितों द्वारा कमजोर सवर्ण वर्ग के व्यक्तियों के शोषण उत्पीडन की घटनाएं भी आये दिन सुनाई पड़ रही है जिसका चित्रण प्रसिद्ध कहानीकार ह्रदयेश ने अपनी कहानी “मनु” में किया है। 
वर्तमान साहित्य में वाद, विमर्श, विशेष विचारधारा आदि से बिना प्रभावित हुए सहज स्वाभाविक रुप से भी प्रभावशाली कहानियां  समाज के हर क्षेत्र पर लिखी जा रही है तथा पाठकों को उनसे प्रभावित होकर उन्हें सराहते हुए भी देखा जा रहा है। वर्तमान प्रगतिशील कहानीकारों ने स्त्री विमर्श के नाम पर स्त्री यौन स्वातंत्र्य तथा देह विमर्श का जिस भांति वर्तमान साहित्य में परचम लहराया है उससे उनके “स्त्री विमर्श” से अलग “स्त्री हित-चिंतन वाली कहानियों” को विश्लेषित करने की आवश्यकता महसूस होने लग गई है जो उनके जीवन की मूलभूत समस्याओं, भावनाओंआत्मनिर्भरता, पुरुष वर्ग से समानता के अधिकार तथा सुरक्षा आदि पर विचार करती हो। 
इस संबंध में ध्यान वर्तमान साहित्य में लिखी गई इस तरह की कहानियों की महिला कहानीकार मालती जोशी के तरफ जाता है , जिन्होंने अपनी लगभग सारी कहानियां मध्य-वर्गीय महिलाओं के घरेलू जीवन तथा उनकी मनोव्यथा पर लिखी है । उनके चर्चित कहानी संग्रह “वो तेरा घर ये मेरा घर”, “मोरी रंग दे चुनरिया” आदि है तथा प्रमुख कहानियों में “मन न भाय दस बीस”, “ वितृष्णा”, “वसीयत” आदि का नाम लिया जा सकता है। 
मालती जोशी की ही भांति ही वर्तमान की बहुत सारी महिला कहानीकारों ने महिलाओं के हित चिंतन करते हुये कहानियां लिखी है जिनमें से चित्रा मुद्गल की “प्रेतयोनि”, “ अपनी वापसी”, “दुल्हिन”, डां. सूर्यबाला की “आखरी विदा”, “ रमन की चाची”, “गीता चौधरी का आखरी सवाल” तथा स्त्री मनोविज्ञान को रेखांकित करती सुषमा मुनीन्द्र की कहानी “विजेता” का नाम लिया जा सकता है। 
सिर्फ हिन्दू महिलाओं के जीवन का ही लेखा-जोखा वर्तमान कहानियां नहीं बांचती बल्कि प्रतिष्ठित कहानीकार नासिरा शर्मा के कहानी संग्रह “खुदा की वापसी” की कहानियां मुस्लिम महिलाओं के जीवन को रेखांकित करती है तथा उनके मजहब के रिवाजों, कुरीतियों से संघर्ष करते हुये उनके अधिकारों को उन्हें दिलाने हेतु प्रयास करती है । जबकि भीष्म सहानी की “चीफ की दावत” तथा  महावीर राजी की “तुम्हारे हिस्से में” कहानियां परिवार में वृद्ध महिलाओं के उपेक्षित जीवन को रेखांकित करती है तथा पारितोष चक्रवर्ती की कहानी “सोनपत्ती”  वृद्ध महिला की अपने ही हमउम्र वृद्ध से भावनात्मक मैत्री संबंधों की कथा सुनाती है ।
सिर्फ वृद्ध महिलाएं ही नहीं बल्कि वृद्ध पुरुष भी अपने परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षित तथा निर्वासित किये जाते हैं इस कड़वी हकीकत से रूबरू कराती है उर्मिला शिरीष की कहानी “निर्वासन” तथा घर से निष्कासित माता पिता को वृद्धाश्रम  भेजने की व्यथा कथा सुनाती है सुधा गोयल की कहानी “मैं आ रहा हूं नयनतारा”। हिस्सा-बांट कराने के लिए पुत्र अपने पिता को प्रताड़ित करते हुए उसे मिर्ची और लोबान का धुंआ देते हैं शोभनाथ शुक्ल की कहानी “हांडी भरी यातना” में संवेदन-शून्यता की हद पार करती है।  
पुत्रों द्वारा माता पिता को उपेक्षित  करने के बाद भी उनका पिता अपने छोटे पुत्र के हार्ट अटैक की खबर पा कर पत्नी को लकवा की हालत में नर्स के भरोसे छोड़ कर , शीत लहर की परवाह न करते हुये   उसको देखने जाता है पिता की इन भावनाओं एवं पुत्र के प्रति पिता के कर्तव्यबोध की कहानी सुनाती है रुपसिंह चंदेल की कहानी “पिता”। जबकि काफी पहले ही पिता पुत्र के भावनात्मक संबंधों की चर्चित कहानी “डिप्टी कलेक्ट्री” प्रतिष्ठित कहानीकार अमरकांत लिख चुके थे साथ ही मध्य-वर्गीय गरीब परिवार के दोपहर के भोजन में परिवार के हर सदस्य द्वारा भरपेट भोजन न कर परिवार के अन्य सदस्यों के लिये भोजन बचाने की मार्मिक स्थिति का दृश्य चित्रण उनकी अन्य चर्चित कहानी “दोपहर का भोजन” में दिखलाई पड़ता है ।  एक अलग ही तरह की प्रेम कहानी शेखर जोशी की कहानी “कोशी के घटवार” सुनाती है तो उनकी “बदबू” एवं “दाज्यू” कहानियां अलग अलग संदर्भों में प्रभावित करती है ।    
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वर्तमान भारत के ग्रामों के हालात सुधरे हैं । अब देश के ग्राम प्रेमचंद के युग के ग्राम नहीं रह गये है लेकिन अभी भी अरुण प्रकाश की कहानी “भैया एक्सप्रेस” के विसुनदेव को अपनी बदहाली एवं कर्ज मे डूबी स्थितियों से उबरने के लिए बिहार से पंजाब जाना पड़ता है। अमर गोस्वामी की कहानी “कल का भरोसा” के निखलिश को उत्तरप्रदेश के अपने ग्राम से महाजन से शोषित एवं पुलिस से प्रताड़ित हो कर पलायन करते हुये महानगर जाना पड़ता है । जहां जाते हुये उसे ट्रेन में बैठने के लिए “चड्डी भर जगह” तथा महानगर में रहने के लिए “झुग्गी भर जगह” मिल ही जाती है।
अरुण प्रकाश की कहानी के “बिसुनदेव” एवं अमर गोस्वामी की कहानी के “निखलिश” के चेहरे क्या प्रेमचंद के उपन्यास “गोदान” के युवा पात्र “गोबर” के चेहरे से मिलते जुलते प्रतीत नहीं होते? लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान युग के ग्रामों के परिवेश में जहां परिवर्तन आया है वहीं ग्रामवासियों की संस्कृति एवं सोच में भी बदलाव आया है जिसकी झलक ऊषा किरण खान की कहानी “दूब धान”, काशीनाथ सिंह की कहानी “एक लुप्त होती नस्ल”, मिथलेश्वर की कहानी “रैन भई चहुं देश” , नीरजा माधव की कहानी “ताकि” आदि में देखी जा सकती है ।
सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र ही नहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की अवधि में नगर महानगरों के जीवन पर भी प्रचुर मात्रा में कहानियां लिखी गई है। जिनमें से रवीन्द्र कालिया की कहानी “सिर्फ एक दिन”, “बड़े शहर का आदमी”, “ सड़क पर अंधेरा था” एवं कमलेश बख़्शी के कहानी संग्रह “महानगर की श्रेष्ठ कहानियो” में संग्रहित कहानियों का जिक्र किया जा सकता है । जबकि हरिचरण प्रकाश की वर्तमान साहित्य में प्रकाशित कहानी “ स्वयंवरा माइरा मालिनी“  में जहां महानगरों के अभिजात्य वर्ग के विवाह समारोह का एक दृश्य प्रस्तुत होता है वहीं महानगर की नवयुवतियों की विवाह के प्रति बदलती विचारधारा भी प्रस्तुत होती है ।
हिन्दी कहानी के प्रारंभ से लेकर अब तक के सफर पर चर्चा करते हुये हिन्दी कहानी के इतिहास में भारतीय मूल के प्रवासी कहानीकारों के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता । भारत से जा कर विदेश में बस जाने के बावजूद भी हिन्दी भाषा में उनका कहानी लेखन उनके भारतीय संस्कृति एवं हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग का परिचायक है । भारतीय प्रवासी हिन्दी कहानीकारों की सूची लंबी है । वे विदेश में अमेरिका, ब्रिटेन, पोलैंड, कनाडा, डेनमार्क फ्रांस, नॉर्वे, मॉरीशस, सूरीनाम आदि देशों में रहते हुये भी हिन्दी भाषा में कहानी लेखन तथा साहित्य की अन्य विधाओं में साहित्य सृजन कर रहे है ।
भारतीय प्रवासी कहानीकारों पर चर्चा करते हुए सबसे पहले हमारा ध्यान मॉरीशस में रह रहे भारतीय मूल के साहित्यकार अभिमन्यु अनत की ओर जाता है । उनके पूर्वज अन्य भारतीयों के साथ अंग्रेजों द्वारा मारीशस में गन्ने की खेती के लिए बतौर मजदूर लाये गये थे । मॉरीशस में जन्म के बावजूद अभिमन्यु अनत ताउम्र हिन्दी साहित्य के प्रति समर्पित रहे। उन्होंने हिन्दी भाषा की विभिन्न विधाओं में 59 पुस्तकें लिखी जिनमें से 5 पुस्तके कहानी संग्रह की थी । मॉरीशस में अभिमन्यु अनंत का रचना काल “अभिमन्यु अनत युग” के रुप में जाना जाता है । उनकी रचनाये भारत की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई तथा उन पर केंद्रित कुछ पत्रिकाओं के विशेषांक भी प्रकाशित हुए।
अभिमन्यु अनंत के बाद प्रवासी हिन्दी कहानीकारों में सबसे अधिक चर्चित नाम ब्रिटेन के तेजेन्द्र शर्मा का है। वे हिन्दी साहित्य के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय सम्मान “इंदु शर्मा अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान” प्रदान करने वाली संस्था “कथा यू. के.” के महासचिव तथा अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका “पुरवाई” के संपादक है। वैश्विक स्तर पर वे हिन्दी के एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें हिंदी साहित्य सेवा के लिए ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ ने वर्ष 2017 में मेंबर ऑफ़ दि ब्रिटिश एम्पायर की उपाधि से लंदन के बकिंघम पैलेस में अलंकृत किया था। उसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय स्पंदन कथा सम्मान, प्रवासी भारतीय भूषण सम्मान तथा डॉ. हरिवंश राय बच्चन सम्मान आदि से भी वे सम्मानित हो चुके हैं। उनकी 101 कहानियां 9 कहानी संग्रहों में प्रकाशित हो चुकी हैं।
अन्य प्रवासी हिन्दी कहानीकारों में से कुछ प्रवासी कहानीकारों एवं उनकी कहानियों का उल्लेख करते हुये  सुषम बेदी (“चिड़िया और चील” चर्चित कहानी संग्रह), हरचरण चावला (ढाई आखर), ज़किया ज़ुबैरी (साँकल, दोनों आसमानों का रंग), उषा राजे सक्सेना (प्रवास में), कृष्ण बिहारी (दुश्मन से दोस्ती), शैल अग्रवाल (सूखे पत्ते), सुरेश चंद्र शुक्ल (दुनिया छोटी), सुधा ओम ढींगरा (सूरज क्यों निकलता है), डां सुदर्शन प्रियदर्शिनी (अखबारवाला, अवैध नगरी) आदि का नाम लिया जा सकता है ।
प्रवासी भारतीय कहानीकारों की कहानियों में दो संस्कृतियों की सिर्फ झलक भर नहीं मिलती है अपितु दो संस्कृतियों के बीच मुठभेड़ भी दृष्टिगोचर होती है। जबकि विदेश में भी विमर्श-वादी लेखन किया जा रहा है लेकिन उनके स्वरूप में परिवर्तन है तथा बिखरते परिवार टूटते वैवाहिक संबंधों की समस्या विदेशों में अधिक ही प्रभावी है । 
इस संदर्भ में म. प्र. राष्ट्र भाषा परिषद की पत्रिका “अक्षरा” के “प्रवासी कलम” स्तंभ के तहत मई जून 2012 के अंक में प्रकाशित रीनू पुरोहित की कहानी “ल्यूमिनिता (नन्ही रोशनी)” में दो संस्कृतियों के बीच जहां मुठभेड़ दृष्टिगोचर होती है वहीं भावनाओं की मार्मिकता की भी झलक मिलती है। हाईकोर्ट जज ओंकारनाथ त्रिपाठी विदेश में कार्यरत अपने पुत्र मानव के अपने द्वारा भारतीय परिवार में निश्चित किये गये रिश्ते को ठुकरा कर उसके विदेशी लड़की से विवाह कर लेने से जहां नाराज हैं और कई वर्षों तक उससे बात भी नहीं करते वहीं उसके जीवनोपरांत उसकी पुत्री को अपना लेते है।
जनवरी 2023 के अंक में दिव्या माथुर की कहानी “ई प्रेम पत्र” में विदेश में बिखरते परिवार टूटते वैवाहिक संबंधों की बात जहां दर्ज है वहीं टूटने के करीब पहुंचे वैवाहिक संबंधों को उनकी पुत्री अपनी सहेली के साथ मिल कर ई पत्रों के माध्यम से फिर से मधुर संबंधों में बदल देती है तथा उसी अंक में तेजेन्द्र शर्मा की कहानी “गंध” में दलित विमर्श का एक नया ही विदेशी स्वरुप उभर कर सामने आता है जबकि उनकी एक अन्य कहानी “कोख का किराया” में सरोगेट मदर बनने का जो पहलू प्रस्तुत हुआ है वह मनोविश्लेषणात्मक पहलू है जबकि भारत में सरोगेट मदर बनने के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण ही अधिक दृष्टिगोचर होता है। 
हिन्दी साहित्य का यह सुखद पहलू है कि विदेशों में भी भारतीय प्रवासी साहित्यकारों द्वारा कई  साहित्यिक पत्रिका में हिन्दी भाषा में प्रकाशित की जा रही है उनमें पुरवाई के अतिरिक्त, हिन्दी गौरव (लंदन, यूके), हिन्दी दर्पण (सिंगापुर), हिन्दी साहित्य समीक्षा, विभोम स्वर (यूएसए) तथा वसुधा (कनाडा) का नाम लिया जा सकता है । भारत के साहित्य जगत में प्रवासी भारतीय कहानीकारों की कहानियों पर अलग से समीक्षात्मक विश्लेषण किया जाना नितांत आवश्यक है।
वर्तमान साहित्य के कहानी लेखन में विविधता है तथा लगभग सभी क्षेत्रों का प्रतिबिंबन इस युग के कहानीकारों की कहानियों में हुआ है लेकिन वर्तमान साहित्य की कहानियों में आश्चर्यजनक वृतांत की कहानियों का अभाव खलता रहा है । इस अभाव की पूर्ति करने का प्रयास प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका “कथा-देश” ने सन 2014-15 एवं 2015-16 में जापान की “सर्नुनोस” संस्था के साथ मिलकर “रहस्य कल्पना कथा प्रतियोगिता” आयोजित कर किया जिसमें प्रतिभू बनर्जी की कहानी “सफर इशारों का” एवं नंदिता जेना की कहानी “बिसात पर सजी मोहरें” पुरस्कृत हुई थी । जबकि वृंदावन लाल वर्मा के बाद  ऐतिहासिक कहानियों के लेखन का अभाव  वर्तमान कहानियों में खलता है ।
चलते-चलते इतना ही कहूंगा कि वर्तमान कहानियों की पठनीयता एवं लोकप्रियता की अभिवृद्धि के लिए जरूरी है कि उसे विशेष विचारधारा, वाद एवं विमर्शों के बंधनों से मुक्त किया जाये । वैसे भी बिना विमर्शों के भी समाज के हर वर्गों के उत्थान हेतु सदा से कहानीकार जागरूक रहे तथा हर वर्गों के शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ उन्होंने पूरी संवेदनशीलता के साथ अपनी कहानियों में विरोध के स्वर मुखर किये है। 
जब दलित शब्द जन्मा भी न था तब सन 1927 में प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका “चांद” का “अछूत विशेषांक” प्रकाशित हुआ था जिसमें पूरी संवेदनशीलता के साथ अछूतों की समस्याओं को रेखांकित किया गया था । इस संबंध में इसे बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है तथा ग्रामीण जगत, सांप्रदायिक सद्भाव, एवं स्त्री हित हेतु सदा से कहानियां लिखी जा रही है । जबकि विमर्श-प्रियता एवं वाद-मुग्धता में सप्रयास कहानी लेखन में ना विचारों की मौलिकता रहती है और ना ही सच्ची संवेदनशीलता तथा एक ही तरह के कथानक के बारंबार पुनरावृत्ति से कहानियां पाठकों हेतु उबाऊ हो जाती है  जिसका असर वर्तमान में कहानी के पाठकों के अभाव के रुप में स्पष्टतः दृष्टिगोचर हो रहा है ।
राजेन्द्र सिंह गहलौत
सुभद्रा कुटी”
बस स्टैंड के सामने
बुढार 484110
जिला शहडोल (म. प्र.)
मोबाइल : 9329562110
RELATED ARTICLES

8 टिप्पणी

  1. राजेन्द्र सिंह गहलोत जी का कहानी के इतिहास पर लिखा गया आलेख शोध पूर्ण है। उन्होंने सृष्टि के शुरुआत से अब तक की यात्रा में बहुत कुछ समेट लिया है। कहानी के किसी भी युग को छोड़ा नहीं है। कुल मिलाकर सब कुछ समेटने का प्रयास किया गया है।
    कुछ और भी कहानीकारों को इसमें जोड़ते तो ज्यादा ठीक रहता। आपने अपने आपको भी छोड़ दिया है। बढ़िया लेख के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

  2. राजेन्द्र सिंह गहलोत जी का सारगर्भित और महत्वपूर्ण आलेख पढ़ा।श्रमसाध्य, निश्पक्ष और प्रशंसनीय कार्य। लंबे समय बाद बिना भेदभाव वाला लेख पढ़ने को मिला। उन्हें हार्दिक बधाई।

  3. शोधपरख कहानी केंद्रित आलेख अनवरत स्वाध्याय एवं परिश्रम की अभिव्यक्ति है। लगभग सभी कहानीकारों को कवर किया है।
    आप स्वयं भी कहानीकार है किंतु उल्लेख भी नहीं किया।

  4. कहानी की यात्रा आधारित आलेख शोधपरख है। लेखक के अनवरत स्वाध्याय एवं चिंतन की सहज अभिव्यक्ति प्रशंसनीय है।
    आप स्वयं कहानीकार है यह अलग बात है उन्होंने उसका उल्लेख नहीं किया।

  5. अदभुत आलेख और कथा, कहानी एवं किस्से की बेपाक जन्म कुंडली।

  6. आपका आलेख कहानी लेखन के महत्वपूर्ण पक्ष को नये ढंग से देखने की दिशा दे गया! साधुवाद!

  7. बढ़िया विश्लेषणात्मक आलेख। निश्चित रूप से आप बधाई के पात्र हैं। कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest