Monday, August 10, 2026
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संपादकीय – नकारात्मक शक्तियों की लड़ाई

हमारे हिसाब से वर्तमान युद्ध को रोकने का एक ही तरीका है कि तमाम इस्लामिक देश इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार करें, और अपने यहाँ से चलने वाले आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाएँ। दूसरी तरफ़ अमेरिका विश्व का चौधरी बनने का नाटक बंद करे और दुनिया को चैन से जीने दे।

गणित हमें बहुत भ्रामक सूचनाएँ देता है। यहाँ दो निगेटिव मिलकर एक पॉज़िटिव हो जाते हैं, मगर असल जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता। यहाँ जब नकारात्मक शक्तियाँ आमने-सामने होती हैं तो विश्व विनाश के कगार पर आ खड़ा होता है।
अमेरिका और ईरान के युद्ध पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले हमें समझना होगा कि इन दोनों देशों की भीतरी सच्चाई क्या है। समस्या यह हो जाती है कि अमेरिका बात तो करता है लोकतंत्र और आज़ादी की, मगर उसके कारनामे बिल्कुल अलग तरह के होते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की भूमिका बहुत विवादास्पद रही है। सी.आई.ए. द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि-
1953 में ईरान में तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद मोसादेक ने खनिज तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया। सी.आई.ए. तुरंत हरकत में आ गई और ऑपरेशन एजेक्स में जुट गई। प्रधानमंत्री मुहम्मद मोसादेक को सत्ताच्युत कर दिया गया और उनके स्थान पर तानाशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को गद्दी पर बिठा दिया गया।
1954 की बात है, जब ग्वाटेमाला में राष्ट्रपति याकोबो आर्बेन्स ने भूमि सुधार के नियम लागू करने की घोषणा की, जिनके कारण यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के मुनाफ़ों पर असर पड़ने लगा। सी.आई.ए. ने ऑपरेशन पी.बी. सक्सेस के ज़रिए राष्ट्रपति याकोबो को सत्ता से बाहर कर दिया। उनके स्थान पर सैनिक तानाशाही लागू कर दी गई। दो लाख से अधिक ग्वाटेमाला के नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।
1961 में कांगो में वहाँ के प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा ने यूरेनियम का राष्ट्रीयकरण करने की घोषणा की। सी.आई.ए. द्वारा जारी किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहॉवर ने लुमुम्बा की हत्या के निर्देश जारी कर दिए। लुमुम्बा को फाँसी दे दी गई और उनके शरीर को तेज़ाब में डालकर गला दिया गया। सी.आई.ए. ने उनके स्थान पर जोज़ेफ़ मोबुतु को गद्दी पर बिठा दिया। जोज़ेफ़ एक तानाशाह था, जिसने 34 वर्ष तक राज किया।
1963 में वियतनाम के राष्ट्रपति न्गो दिन्ह दियेम ने अमेरिकी आदेश मानने से इंकार कर दिया। सी.आई.ए. ने विद्रोह की स्थिति पैदा की और राष्ट्रपति एवं उनके भाई की हत्या कर दी। अमेरिका ने वियतनाम में पाँच लाख सैनिक तैनात कर दिए, जिसके बाद लाखों लोगों की जानें गईं। अमेरिका को अंततः अपना मुँह छिपाकर वहाँ से भागना पड़ा।
1966 में पश्चिमी अफ़्रीकी देश घाना के राष्ट्रपति क्वामे एनक्रूमाह ने पश्चिमी देशों के बैंकों और आई.एम.एफ़ से नाता तोड़ लिया। सी.आई.ए. द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों से साफ़ हो जाता है कि उनके विरुद्ध सैनिक विद्रोह में सी.आई.ए. का हाथ था। जब राष्ट्रपति क्वामे चीन की यात्रा पर थे, उन्हें पद से अपदस्थ कर दिया गया।
1973 की बात है, जब चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर एलेंडे  ने कॉपर की खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। आँकड़े बताते हैं कि सी.आई.ए. ने उस समय राष्ट्रपति साल्वाडोर को सत्ता से हटाने के लिए लगभग 80 लाख डॉलर ख़र्च कर डाले। जनरल ऑगस्तो पिनोशे ने तख़्तापलट करते हुए सत्ता हथिया ली। राष्ट्रपति साल्वाडोर एलेंडे इस विद्रोह में मारे गए और करीब चालीस हज़ार चिली के लोगों की जनरल पिनोशे की तानाशाही के काल में हत्या की गई।
2003 में अमेरिका ने इराक़ पर हमला कर दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने सामूहिक विनाश के हथियारों का निर्माण कर लिया है। सद्दाम हुसैन को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। बाद में अमेरिका ने माना कि सामूहिक विनाश के हथियारों वाली सूचना ग़लत थी। अमेरिका की इस कार्रवाई में दस लाख से अधिक इराकियों की हत्या हो गई। इराक़ आज भी अस्थिरता से भरा हुआ देश है।
2011 में लीबिया के राष्ट्रपति मुअम्मर मुहम्मद अबू मिन्यार अल-ग़द्दाफ़ी ने डॉलर के स्थान पर एक नई मुद्रा की घोषणा करने की ग़लती कर दी। यह मुद्रा सोने पर आधारित एक अफ़्रीकी करेंसी बनने वाली थी। नाटो देशों और अमेरिका ने लीबिया पर बमबारी शुरू कर दी। ग़द्दाफ़ी को लीबिया की सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर मार दिया गया। उसके बाद से आज तक लीबिया में ऐसी अव्यवस्था फैली हुई है, जो अब तक ठीक नहीं हो पाई।
अमेरिका ने यही हाल चे ग्वेरा (क्यूबा – 1967), निकारागुआ, ग्रेनेडा और पनामा के साथ भी किया। अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेनाओं को हराने के लिए अमेरिका ने मुजाहिदीन का साथ लिया और बाद में वही तालिबान बनकर अमेरिका के विरुद्ध खड़े हो गए। वेनेज़ुएला की घटना तो अभी हमारे दिमाग़ में ताज़ा ही है कि कैसे वहाँ के राष्ट्रपति को बंदी बनाकर अमेरिका लाया गया।
और अब अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर हमला बोला है और वहाँ के सुप्रीम नेता 86 वर्षीय अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी। इस समय इस युद्ध को लगभग 15 दिन हो चुके हैं। ईरान अभी तक हारा नहीं है, बल्कि पूरा क्षेत्र ही असुरक्षित हो चुका है।
अब हम बात करते हैं ईरान की। 1979 तक ईरान में माहौल काफ़ी खुला था और महिलाएँ पश्चिमी परिधान पहना करती थीं। मगर 1979 में आयतोल्ला ख़ुमैनी की इस्लामी क्रांति ने ईरान के पूरे स्वरूप को ही बदल दिया। अब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक बन चुका था। इसकी हज़ारों साल पुरानी सभ्यता से इसका नाता लगभग टूट गया था। अब ईरान वह ईरान नहीं था, जिसके भारत के साथ पुराने रिश्ते थे। अब ईरान शरिया क़ानून वाला ईरान बन गया था।
5 नवंबर 1979 को आयतोल्ला ख़ुमैनी के हवाले से कहा गया कि- “अमेरिका एक महान शैतान है… घायल साँप है।” इन शब्दों का इस्तेमाल इस्लामी क्रांति के दौरान और उसके बाद व्यापक रूप से किया जाता रहा। बल्कि आज भी ईरान के कुछ राजनीतिक हलकों में इसका प्रयोग किया जाता है।
अली ख़ामेनेई, रूहोल्लाह ख़ुमैनी के क़रीबी थे, जो क्रांति के प्रमुख नेता और ईरान के पहले सर्वोच्च नेता बने थे। 1989 में ख़ुमैनी की मृत्यु के बाद ख़ामेनेई को उनका उत्तराधिकारी चुना गया। सर्वोच्च नेता बनने से पहले ख़ामेनेई ईरान के राष्ट्रपति रह चुके थे। समय के साथ उन्होंने राजनीति, सेना और अदालतों पर अपना नियंत्रण और भी मज़बूत कर लिया। आलोचकों का कहना था कि उनके शासनकाल में ईरान एक सैन्य तानाशाही जैसा बन गया था।
ईरान की 1979 की क्रांति ने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के 40 साल पुराने शासन को गिरा दिया था। उस समय उनके बड़े बेटे रज़ा पहलवी सिर्फ़ 16 साल के थे, तेल से समृद्ध, हज़ारों साल पुराने साम्राज्य के उत्तराधिकारी। आज 65 साल की उम्र में, लगभग आधी सदी बाद, वे अपने देश ईरान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। उनकी एक आवाज़ पर देश के युवा सड़कों पर उतर आए हैं और फिर से इतिहास दोहराने की तैयारी कर रहे हैं।
अब बात करते हैं इज़राइल की। सबसे पहले हम आपको बता दें कि इज़राइल का क्षेत्रफल महज़ 21,937 वर्ग किलोमीटर है। इसके मुकाबले भारत का क्षेत्रफल इससे लगभग 150 गुना ज़्यादा है। भारत का कुल क्षेत्रफल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर है। यानी इज़राइल का आकार भारत का लगभग 0.67 प्रतिशत है। भारत की जनसंख्या लगभग 140 करोड़ है, जबकि इज़राइल की आबादी लगभग 1 करोड़ के आसपास है।
क़ुरआन शरीफ़ में भी इज़राइल और यहूदियों का ज़िक्र मिलता है। सच तो यह है कि हज़रत ईसा मसीह भी जन्म से यहूदी ही थे। ज़ाहिर है कि वे उसी क्षेत्र की भाषा में ही बात भी करते होंगे। विश्व में लगभग 57 इस्लामी देश हैं और सौ से अधिक ईसाई बहुल देश हैं, मगर एक ही छोटा सा देश है जो सदियों के निर्वासन के बाद यहूदियों को नसीब हुआ है। जब से यह देश बना है, इसे कई इस्लामी देशों ने स्वीकार नहीं किया है। वैसे इस मामले में हिंदू यहूदियों से भी अधिक बदनसीब हैं, क्योंकि वर्तमान में उनके लिए विश्व भर में एक भी अलग राष्ट्र-राज्य नहीं है।
अली ख़ामेनेई ने इज़राइल के बारे में कई बार कहा कि- “अब समय आ गया है कि इज़राइल को दुनिया के नक्शे से मिटा दिया जाए।” उन्होंने हमेशा अमेरिका को भी धमकाया। अपने आख़िरी सार्वजनिक बयान में ईरान के स्वर्गीय सुप्रीम लीडर आयतोल्ला अली ख़ामेनेई ने अमेरिका को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा था कि “अमेरिकी साम्राज्य पतन की ओर बढ़ रहा है” और दशकों की कोशिशों के बावजूद अमेरिका ईरान को खत्म नहीं कर पाया।
उन्होंने डॉनाल्ड ट्रंप की सैन्य धमकियों को खारिज करते हुए दावा किया कि ईरान किसी भी बाहरी दबाव के सामने झुकेगा नहीं और इस्लामिक रिपब्लिक को खत्म करना असंभव है। यह भाषण उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले दिया गया था और सच तो यह है कि पूरा का पूरा मध्य-पूर्व संकट से घिरा हुआ है।
पुरवाई पत्रिका का मानना है कि किसी भी देश को विश्व में दादागिरी करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। अमेरिका का रुख़ शुरू से ही भारत और पाकिस्तान के मामले में हमेशा भारत के विरुद्ध रहा है। अमेरिका कहने को एक लोकतांत्रिक देश है और भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, मगर अमेरिका सदा ही पाकिस्तान के तानाशाहों के समर्थन में खड़ा दिखाई देता रहा है।
हमारे हिसाब से वर्तमान युद्ध को रोकने का एक ही तरीका है कि तमाम इस्लामिक देश इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार करें, और अपने यहाँ से चलने वाले आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाएँ। दूसरी तरफ़ अमेरिका विश्व का चौधरी बनने का नाटक बंद करे और दुनिया को चैन से जीने दे।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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47 टिप्पणी

  1. इन दिनों युद्ध तो समूची मानवता और प्रकृति को नष्ट करने की कवायद में लगा है।सम्पादकीय में इससे छुटकारा पाने की बात है पर स्थिति निराशा जनक दिख रही है किसी को किसी की सत्ता स्वीकार्य नहीं ।
    भविष्य अनिश्चित है ।
    Dr Prabha mishra

  2. अरे सर!आज का संपादकीय पढ़कर आनंद आ गया । ईरान अमेरिकी युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाना शुरू कर दिया है। तेल और गैस की आपूर्ति के लिए देशों की सांसें अटक गई है। हर देश अपना हित साधने में लगा हुआ है। ईरान ने जिस तरह की चाल चली है, उससे इजरायल, अमेरिका अकेले हतप्रभ नहीं है बल्कि पूरी दुनिया संशय में पड़ चुकी है।
    इस युद्ध के विषय में न जाने कितने चैनल, यूट्यूब वीडियो, समाचार पत्र अपने-अपने स्तर से खबरें दिखा सुना रहे हैं। ईरान युद्ध ने पूरी सोशल मीडिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
    आज का संपादकीय इन खबरों से हटकर है। युद्ध का मूल कारण क्या है, इसकी गहन पड़ताल की गई है। इस पड़ताल ने अमेरिका की वास्तविकता उजागर कर दी है। अमेरिका बहुत ही ख़तरनाक देश है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से असलियत पता चल जाती है।
    अमेरिका द्वारा अन्य देशों की सत्ता पलटने की वीभत्स मानसिकता का जो विवरण सामने रखा है वह डरावना है। उसके लिए इंसानों की मौत का कोई मूल्य नहीं है। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए लोकतांत्रिक देशों को तानाशाही के हवाले करना उसके बाएं हाथ का खेल बन चुका है। ताजा घटनाओं में पड़ोसी देश उसके शिकार हो चुके हैं।
    भारत देश इसकी वक्र दृष्टि से बचा रहा, यह हमारे लिए सौभाग्य की बात रही है। मुझे लग रहा है कि ईरान युद्ध के बाद भारत को अस्थिर करने की कोशिश जरूर होगी।
    डोनाल्ड ट्रम्प यह तो अच्छी तरह से समझ गए है कि मैं जैसी डुगडुगी बजाऊंगा, भारत के कुछ लोग उसी में नाचने लगते हैं। सरकार को सतर्क रहना होगा। भारतीय लोकतंत्र दुनिया के लिए नजीर बना हुआ है। इसे बचाए रखना हमारा मुख्य कर्तव्य होना चाहिए। वरना हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। फिलहाल केन्द्र में बैठी सरकार सतर्क तो नज़र आ रही है।
    ईरान युद्ध का क्या परिणाम निकलेगा, यह तो समय बताएगा। मुझे ऐसा लगता है कि माइनस, माइनस प्लस हो जाएगा। गणित के नियम सार्वभौमिक सत्य होते हैं।
    प्रकृति अपने को समयानुकूल सजाती संवारती रहती है। क्या पता इसी में ही वह अपनी साफ-सफाई कर ले।
    हमारे यहां आशावाद कूट-कूट कर भरा होता है। ऐसी परिस्थिति में आमजन गाने लगता है –
    निश्चित होगा अंत एक दिन,
    जग से अत्याचारी का।
    फूल फूलना बंद न होगा,
    वीरों की फुलवारी का।।
    इस विषय पर संपादकीय लिखना बहुत कठिन था। आपने इस विषय को संपादकीय का विषय बनाकर मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है।
    बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखन लाल पाल जी आपने कहा है कि, “इस विषय पर संपादकीय लिखना बहुत कठिन था। आपने इस विषय को संपादकीय का विषय बनाकर मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। बढ़िया संपादकीय…”

      आपकी टिप्पणी हमारे लिए ऑक्सीजन से अधिक महत्वपूर्ण है। हार्दिक धन्यवाद।

  3. सादर नमस्कार सर…
    युद्ध पर यह संपादकीय अत्यंत सार्थक और सफल रहा। शोधपूर्ण ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए साधुवाद सर। अमेरिका चौधरी बनने में कितना सफल होगा यह तो समय बताएगा… पर आपने जो आंतकवाद की बात की है इसको बंद करना अत्यंत आवश्यक है। भारत में इस युद्ध का प्रभाव जिस प्रकार दृष्ट होता है यह भी चिंता का विषय है..।
    वैश्विक पटल पर इतनी निर्भयता से लिखना सराहनीय है…सर
    अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है….

  4. अंत जो बात कही बड़ी अच्छी बात कही लेकिन अच्छी बाते मानी जाती तो दुनिया जन्नत ना हो जाती, इसे तो लोग नर्क बनाने में लगे हैं

  5. इस बार का संपादकीय बहुत सरल भाषा में सिलसिलेवार तरीके से अमरीका की तानाशाही का कच्चा चिट्ठा खोलता चला जाता है।विश्व पटल पर तानाशाही रवैया हमेशा मौत का तांडव,धन की बरबादी और सामाजिक/राजनैतिक उथल-पुथल एवं अस्थिरता ही लेकर आया है ,यह तथ्य आपने बहुत स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त किया है।ट्रम्प की
    विकृत सोच एवं रवैया विश्व के लिए मुसीबतें ही खड़ी करने वाला है।यह भयभीत करने वाला सत्य है।पहले तो इसका इलाज करने की आवश्यक्ता है।
    एक सशक्त, सार्थक संपादकीय के लिए तेजेन्द्र जी को बधाई।

  6. आपने विश्व के इतिहास में अमरीका द्वारा अपने फायदे के लिए हमेशा से हर क्षेत्र में अशांति फैलाए रखने के अनथक अमानवीय प्रयत्नों को सिलसिलेवार बेनकाब किया है और इसराइल और अरब दुनिया के बीच चिरकाल से चले आ रहे सीमा विवाद, और इसराइल की अपने अस्तित्व की लड़ाई को समाप्त करने के एकमात्र दिखाई देते तर्कपूर्ण हल की ओर इशारा किया है। अरब दुनिया के लिए इसराइल के अस्तित्व के अधिकार को स्वीकृति देना ही विश्व शांति के लिए इस समस्या का स्थाई हल है। जोर्डन, सऊदी अरबिया, यूनाइटेड एमिरेट्स और ओमान इस तथ्य को समझ चुके हैं। बेहतर होगा तुर्कीए, कतार, यमन और पाकिस्तान और ईरान जैसे भी हकीकत को मान लें। इस युद्ध से अमरीका को भी खूब सीख मिली है कि हर क्षेत्र में मात्र अपना वर्चस्व या बेहतर कहिए दादागिरी बनाए रखने की नियत से हर किसी से दुश्मनी मोल लेना ठीक नहीं है और दुश्मन को कम आंकना अक्लमंदी नहीं है। समय की मांग है कि दुनिया के देश मिल कर दूषित पर्यावरण, खाद्य कमी, गरीबी, बीमारी और भुखमरी जैसी वैश्विक समस्याओं का निदान सोचें न कि सामूहिक विनाश के हथियारों के विकास और आज ऐसी स्थितियों में अपने वर्चस्व की साख बचाने के लिए मानव जाति के अस्तित्व को ही इस स्वर्ग-तुल्य धरती पर 1945 को दोहराते हुए किसी भयंकर खतरे में डाल दें।

    • बिमल सर, आपकी टिप्पणी के पीछे क्योंकि एक अनुभवी अधिकारी की सोच भी होती है, इसलिए उसके मायने विशेष महत्व रखते हैं। हार्दिक धन्यवाद।

  7. बहुत बढ़िया सम्पादकीय। मेरे जैसे लोगों के लिए आपने एक कठिन विषय पर बेबाक़ी से पूरे तथ्यों के साथ इतिहास बताया हैं कि स्थिति समझ में आ गई है। काश इन सिरफिरे नेताओं की बुद्धि आपका सुझाव मान ले। सम्पूर्ण मानवता के लिए यही श्रेयस्कर है, नहीं तो विनाश के कगार पर तो खड़े ही हैं। बेहतरीन सम्पादकीय के लिए आपका साधुवाद।

      • बहुत ही महत्वपूर्ण संपादकीय। आपने इतने विस्तार से अमेरिका की कार गुज़ारियों को गिनाया है, कि दांत पीसते पीसते जबड़े दुख गए। यह क्यों सबका सत्यानाश करने पर उतारू है। बहरहाल आपके संपादकीय द्वारा 1953 से अब तक का इतिहास और अमरीका की दखलंदाजी की प्रवृत्ति को जाना। हमेशा की भांति इस बार भी आपकी रिसर्च के मुरीद हो गये।

        • सरस जी प्रयास रहता है कि जो भी विषय उठाया जाए, उसे पूरी तरह से खंगाला जाए। आपका स्नेह बना रहे।

  8. बेहद महत्वपूर्ण और गहन भू-राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा आप का संपादकीय अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच तनाव को ऐतिहासिक घटनाओं के आईने से दिखा रहा है जो समसामयिक प्रसंग में अति आवश्यक है l यह गणितीय सादृश्य से शुरू होकर वर्तमान युद्ध की जटिलताओं की जड़ों तक जा रहा है जिसमें दोनों पक्षों की आलोचना संतुलित रूप से की गई है। संपादकीय में वर्णित CIA के हस्तक्षेप—जैसे 1953 का ईरान ऑपरेशन एजेक्स, 1954 ग्वाटेमाला, 1961 कांगो, 1973 चिली और इराक़-लीबिया के उदाहरण—वास्तविक ऐतिहासिक घटनाएँ हैं, जो अमेरिकी विदेश नीति की विवादास्पद भूमिका को रेखांकित करते हैं। ये राष्ट्रों के संसाधन राष्ट्रीयकरण के खिलाफ पश्चिमी हितों की रक्षा दर्शाते हैं, जिससे तानाशाही शासनों का उदय हुआ। ईरान की 1979 इस्लामी क्रांति ने भी शाह के पश्चिमी समर्थन वाले शासन को उखाड़ फेंका, लेकिन ख़ुमैनी-ख़ामेनेई युग में धार्मिक कट्टरता ने देश को अलग-थलग कर दिया। आपके अनुसार अमेरिका-इज़राइल का ईरान पर हमला मध्य-पूर्व को अस्थिरता की चपेट में डाल रहा है, जैसा हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं। ईरान की आंतरिक असंतोष—युवाओं और महिलाओं के विद्रोह—शाह रज़ा पहलवी के पुत्र के समर्थन में उभर रहा है, जो 1979 क्रांति का पुनरावृत्ति संकेत देता है। इज़राइल का छोटा आकार (भारत के 0.67%) बावजूद उसके अस्तित्व का प्रश्न वैध है, पर ख़ामेनेई के “इज़राइल मिटाने” वाले बयान ने तनाव बढ़ाया।
    भारत के संदर्भ में, अमेरिका का पाक-समर्थन ऐतिहासिक है, लेकिन वर्तमान में भारत ने तटस्थता अपनाई है—ईरान से तेल आयात और होरमुज़ जलडमरूमध्य में सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया गया। आपकी सक्षम लेखनी के माध्यम से पुरवाई पत्रिका का “दादागिरी बंद” सुझाव बेहद व्यावहारिक है l आतंक पर लगाम लगाएँ; अमेरिका हस्तक्षेप रोके। फिर भी, युद्ध रोकने के लिए बहुपक्षीय कूटनीति (UN, भारत-रूस मध्यस्थता) ही समाधान है, न कि एकतरफा आरोप। यह टिप्पणी वैश्विक शांति की पुकार है, पर वास्तविकता में शक्ति-संतुलन निर्णायक है। अति अनिवार्य और समाज सापेक्ष ही नहीं विश्व सापेक्ष संपादकीय के लिए साधुवाद आपको l स्वस्थ रहें सक्रिय रहें l

    • किरण जी, आपने संपादकीय के हर पहलू पर अपनी बेश्कीमती राय रखी है। हार्दिक धन्यवाद।

  9. आपका संपादकीय नकारात्मक शक्तियों की लड़ाई बेहद समसामायिक और विश्लेषण से परिपूर्ण है। आपने अमेरिका की दादागिरी तथा उसके फलस्वरूप
    विश्व के कई देशों पर उसके प्रभाव का विस्तृत, ऐतिहासिक तथ्यों के साथ सिलसिलेवार वर्णन किया है। अमेरिका का यह व्यवहार किसी भी देश की स्वायत्ता और संप्रभुता को चुनौती देता है जो कि हर स्थिति में गलत है। पहले टैरिफ़ का दबाव अब यह थोपा हुआ युद्ध…
    नागासाकी और हीरोशमा पर परमाणु हमले के दुष्परिणाम दुनिया देख ही चुकी है। डर है तो सिर्फ इतना कि कहीं नाक की इस लड़ाई में कहीं यह हथियार फिर से न प्रयोग किया जाये।

    भारत को भी अमेरिका धमका ही रहा है कि उसे तीसरी अर्थव्यवस्था नहीं बनने देंगे। इसी कारण वह प्रारम्भ से ही भारत के विरुद्ध चीन और पाकिस्तान को हथियार के रूप में प्रयोग करता रहा है।

    इस्लामिक देशों को इजराइल को स्वीकार करने के साथ आपने ठीक ही कहा है कि अमेरिका विश्व का चौधरी बनने का नाटक बंद करे और दुनिया को चैन से जीने दे।

    • सुधा जी, हमेशा की तरह आपने संपादकीय को खंगाल कर एक सार्थक टिप्पणी लिखी है। हार्दिक धन्यवाद।

  10. वर्षों से चली आ रही तानाशाही की बेबाक ज्ञानवर्धक जानकारी देते हुए आज की ज्वलंत समस्या के निराकरण के उपायों को अपने संपादकीय में बटोर कर निर्भीकता से पेश कर जन – जन में जागरुकता लाने के आपके प्रयास पर आपको हार्दिक साधुवाद सर.

  11. इस विषय पर इससे बेहतर संपादकीय क्या होगा। इसमें इतिहास, भूगोल से लेकर समस्या के हर पहलू पर निष्पक्ष होकर विश्लेषण किया गया है। सादर प्रणाम।

  12. 15.3.26
    आदरणीय संपादक जी
    नमस्कार,
    आज का संपादकीय पढकर, युद्ध का चित्र, चलचित्र की तरह हमारे सामने आ गया । क्रमबद्ध, वर्षों में हुई घटनाओं को, इस तरह से रखा गया है जैसे इतिहास का कोई अध्याय । जैसे वर्ष 1953 में ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक ने खनिज तेल का राष्ट्रीयकारण कर दिया । इसके लिए उन्हें पद से हटाकर तानाशाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को गद्दी पर तैनात कर दिया गया । वर्ष 1954 में ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति याकोबो आरबेन्स ने भूमि सुधार नियम बनाने की घोषणा की, इससे यूनाटेड फ्रूट कंपनी के मुनाफे पर असर पडा । इसके लिए उन्हें सत्ता से अलग कर दिया गया और
    सैनिक तानाशाही लागू कर दी । इस घटनाक्रम में ग्वाटेमाला के दो लाख से भी अधिक नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया । इसी तरह वर्ष 1961, वर्ष 1963, वर्ष 1966, वर्ष 1973, वर्ष 2003, वर्ष 2011 का घटनाक्रम बताया गया है । यह विवरण इतिहास के छात्रों को बहुत उपयोगी होगा ।

    आपके लेख से ही जानकारी मिली कि विश्व में, सत्तावन मुस्लिम देश और सौ ईसाई देश हैं । …. और… विश्व का सबसे बड़ा गणतन्त्र, हिन्दू बहुल देश भारत का एक भी हिन्दू देश नहीं है !!!
    … और जो शांति के जो लिए युद्ध चल रहा है, उसे नियंत्रण में करने का एक ही रास्ता नजर आता है, अमेरिका दूसरे देशों के कार्य विधि में हस्तक्षेप करना छोड़ दे । सीधी साधी भाषा में कहें तो टांग अड़ाना छोड़ दे, सभी देश अपने अपने हिसाब से चलें । मुस्लिम देशों को चाहिए कि इज़राइल जैसे छोटे से देश को मान्यता दे दें ।

    सादर,

    धन्यवाद जी,

    उषा साहू, मुंबई

    • आदरणीय उषा जी, पुरवाई का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को हर बार कुछ नया दिया जाए और शोध अवश्य किया जाए। आपको पसंद आया बहुत-बहुत शुक्रिया।

  13. जितेन्द्र भाई: बहुत ही सुन्दर सम्पादकीय। इस विषय से मेरी बहुत काफ़ी घनिष्टता है क्योंकि 1976 – 1979 तक मैं, परिवार सहित, अपनी कैनेडियन कम्पनी द्वारा, ईरान में पोस्टेड था। उस समय की क्रान्ती को भुगता भी है और जिया भी है। हालात बहुत अधिक ख़राब होने के कारण 1979 में ईरान छोड़ना पड़ा। मौजूदा जो हालात चल रहे हैं उस से नज़दीकी इस लिए है कि यह सब हमारे पड़ौसी देश के राष्ट्रपति की देन है। आजकल टीवी पर अधिक्तर अमरीका-ईरान के युद्ध के समाचार सुनने को मिलते हैं। आज 15 मार्च को ऑस्कर ceremony है। इस में यदि झूट बोलने पर पुरस्कार होता तो वो आज ट्रंप को ही मिलता। ट्रंप के हर झूट का यदि किसी ने पर्दाफ़ाश किया है तो वो हैं हमारे प्रधान मन्त्री मार्क कार्नी। ट्रंप महाश्य को अपनी आवाज़ से इतना प्यार है कि इन्हें पता ही नहीं चलता कि कब कहाँ और कैसे क्या बोलना है। इनके डीफ़ैंस सैक्रेट्री तो अपने आप में एक नमूना हैं। चाहें या न चाहें, यह ड्रामा तो रोज़ देखने को मिलता है।
    आपने USA के कार्नामों की इतनी बड़ी फ़हरिस्त बनाई है। हालांकि, यह बात सिद्ध नहीं हो पाई लेकिन भारत के डाक्टर भाभा की मृत्यु के कारण का शक CIA पर जाता है।
    USA की बम्बारी से हज़ारों लोगों की जानें चली जाएँ, इसका इन्हें कोई फ़रक नहीं पड़ता। हाँ अगर इनके छ: सिपाही भी मारे जाएँ तो वो बहुत बड़ी ख़बर बन जाती है। यह समाचार सुन कर एकाएक मेरे दिमाग़ में सॉहराब मोदी की 1958 की फ़िल्म ‘यहूदी’ का डायलॉग याद आ जाता है।
    तुम्हारे ही लिए पैदा हुए दुनिया के नतारे – चमकते हैं तुम्हारी रौशनी से चाँद और तारे
    तुम्हारा ग़म है ग़म, औरों का ग़म वो कहानी है – तुम्हारा ख़ून है ख़ून, हमारा ख़ून पानी है

    जँग कोई नही चाहता। इसी बात को लेकर साहिर लुध्यान्वी ने कितना बढ़िया लिखा है।

    ख़ुदा-ए बर्तर तेरी ज़मीं पर, ज़मीं की ख़ातिर जँग क्यों है,
    हर एक फ़तह-ओ-ज़फ़र के दामन पे ख़ून-ए-इन्सां का रँग क्यों है।
    ज़मीं भी तेरी, हम भी तेरे, यह मिल्कियत का सवाल क्या है,
    ये कत्ल-ओ-ख़ूँ का रिवाज़ क्यों है, ये रस्म-ए-जँग-ओ-जदाल क्या है,
    जिन्हें तलब है जहान भर की, उन्हीं का दिल इतना तँग क्यों है।
    ख़ज़ा के रस्ते पे जाने वालो को बच के आने की राह देना,
    दिलों के गुलशन उजड़ न जाएँ मुहब्बतों को पनाह देना।
    जहाँ में जशन-ए-वफ़ा के बदले, ये जशण-ए-तीर-ओतफ़ँग क्यों है।

    • विजय भाई आपने सोहराब मोदी का संवाद – “तुम्हारा ग़म है ग़म, औरों का ग़म वो कहानी है – तुम्हारा ख़ून है ख़ून, हमारा ख़ून पानी है” और फ़िल्म ताजमहल की साहिर साहब की नज़्म का हवाला दे कर पुरवाई के संपादकीय को नये आयाम दिये हैं। दिल से शुक्रिया।

  14. समीचीन संदर्भों को रेखांकित करता,बेबाक और दोटूक और औचित्यपूर्ण संपादकीय है।इतिहास और वर्तमान का समन्वय करता हुआ यह संपादकीय अमेरिकी करतूतों का कच्चा चिट्ठा है। विश्व के किसी भी देश को जिसने अमेरिकी दादागिरी को नहीं माना उसे गृह युद्ध और उसके राजनेताओं को मौत! निर्वासन! की सी यातनाएं झेलनी पड़ी।
    यह संपादकीय आँखें मूंद कर ट्रंप की मानिंद बात नहीं करता वरन तथ्यपूर्ण अंदाज़ में वर्तमान में चल रहे युद्ध के देशों की भी कुंडली खंगालता है।इजरायल की उत्पत्ति उसकी स्थिति बताने के साथ साथ ईरान की भी स्थिति का जायजा लेकर अपने पाठकों को नीरक्षीर विवेकी दृष्टि से लैस करता है।
    पत्रकारिता के तकाज़े को पूरा करते हुए यह संपादकीय अमेरिकी को बेवजह हस्तक्षेप,
    मुस्लिम देशों को इजरायल को पूर्ण मान्यता देने और आतंकवादी गतिविधियों को अविलंब रोकने और युद्ध रोकने का समाधान भी प्रस्तुत करता है ।
    संपादक और पुरवाई पत्रिका को बधाई हो ।

    • भाई सूर्यकान्त जी, आपने संपादकीय को हमेशा की तरह संपूर्णता में समझा है और उस पर सार्थक टिप्पणी लिखी है। पुरवाई की ओर से विशेष धन्यवाद।

  15. इजरायल ने अपनी सीमाओं के विस्तार में फिलिस्तीन पर अतिक्रमण का भी तो प्रयास किया है, उनके पास अब जगह खत्म हो रही है। अमेरिका इजरायल को सपोर्ट तेल के कारण करता है अपनी दादागिरी कायम करता है लोकतंत्र का बहाना है उसे अपनी आर्थिक मजबूती चाहिए। ईरान वर्षों से लड़ रहा है इस्लामिक फोबिया अमेरिका की देन है। इस्लामिक राष्ट्र के बनाम भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में घोषणा देना भी ठीक नहीं क्योंकि यहां संविधान यह मान्यता नहीं देता। भारत की अलग छवि और समस्याएं है उसे आर्थिक स्तर पर मजबूत होना चाहिए ना कि धर्म का डंका पीटना या पीटते रहना। इतनी ऊर्जा देश के बेहतर काम में लगाएं तो हम कुछ कर सकते हैं। ऐप्सटिन का प्रभाव खत्म हो इसलिए भी युद्ध जरूरी था एक तरफ वे लोग हैं जो मानवता के घातक हैं जो आईलैंड पर मानवता का मखौल उड़ाते हैं पहले सज़ा उनको मिले तो बेहतर है। शक्तियाँ आम लोगों को गुमराह करती हैं ताकि वे सत्ता में बने रहें हो यही रहा है लोग युद्ध में उलझ गए असली मुद्दा भटक गया। आपको सादर अभिवादन संपादक प्रासंगिक है।

    • ख़ान भाई आपको संपादकीय प्रसांगिक लगा धन्यवाद। इस संपादकीय में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के विषय में एक भी वाक्य नहीं लिखा गया है। आपको यह आभास कैसे मिला?

  16. तेजेन्द्र जी…आपका संपादकीय समकालीन वैश्विक राजनीति, विशेषकर अमेरिका-ईरान युद्ध पर एक तीखा और विचारोत्तेजक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इतिहास के विभिन्न उदाहरणों, जैसे-ईरान, इराक, चिली, वियतनाम आदि के उल्लेख में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि वैश्विक शक्तियाँ किस प्रकार अपने हितों के लिए हस्तक्षेप करती रही हैं। “नकारात्मक शक्तियों की टकराहट” अंततः विश्व को विनाश के कगार पर पहुँचा देती है।संपादकीय बिना किसी लाग-लपेट के अमेरिका की नीतियों की आलोचना करते हुए ईरान की आंतरिक परिस्थितियों पर सरल भाषा में प्रवाहपूर्ण व संवादात्मक शैली के कारण पाठक को बाँध लेती है। कुल मिलाकर, आपका संपादकीय पाठक को सोचने पर मजबूर करता है और वैश्विक राजनीति के जटिल पहलुओं को समझने की प्रेरणा देता है।

  17. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस संपादकीय पर कुछ भी कहने के पहले एक बात कहना हमें ज्यादा सही लग रहा है कि इस बार का संपादकीय एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है जिसे पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाना चाहिये।

    दूसरी बात जिसने प्रभावित किया कि गणितीय सूत्र के तुलनात्मकता में कहना कि जिंदगी के गणित में सिद्धांत किस तरह से उलट जाते हैं! गणित के सिद्धांत में दो नेगेटिव मिलकर एक पॉजिटिव हो जाते हैं लेकिन वास्तव में असली जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं होता। जब दो नकारात्मक शक्तियाँ आमने-सामने होती है तो विश्व विनाश के कगार पर खड़ा होता ही नजर आता है,जैसा कि वर्तमान में दिखाई दे रहा है। बहुत सामयिक विषय पर लिखा गया है यह संपादकीय।

    इस संपादकीय ने वास्तव में सोचने पर विवश किया है।तथ्य पूर्ण सच्चाइयों से अवगत कराते हुए इस ऐतिहासिक महत्व वाले संपादकीय ने भविष्य के प्रति चिंतित किया व सचेत भी!
    सी आई ए के द्वारा ऑपरेशन पी बी सक्सेस के जरिये
    याकोबो को सत्ता से बाहर कर तानाशाही के चलते 2 लाख से अधिक ग्वाटेमाला के नागरिकों को मौत के घाट उतारना बेहद दर्दनाक प्रसंग लगा।

    इंसान राक्षस बनने पर तुला हुआ है।
    लुमुम्बा को फाँसी देकर उसके शरीर को तेजाब में डालकर गलाना बेहद वीभत्स लगा….
    किस हद तक अमेरिका क्रूर हो सकता है, इस संपादकीय को पढ़कर समझ में आया।
    एक झूठी खबर ने सद्दाम हुसैन से फाँसी पर चढ़ाया गया
    उसके बाद अमेरिका की इस कार्यवाही में मारे गए 10 लाख से अधिक इराकियों की जो हत्या हुई ,क्या वापस अमेरिका उन्हें जिंदा कर सकता है?
    युद्ध किसी भी हालत में किसी भी देश के लिए नुकसानदायक ही
    है।
    युद्ध की स्थितियाँ पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाती हैं।
    अहं की तकरार में आम इंसान का जीवन कीड़े- मकोंड़ों से भी बदतर होता जा रहा है।
    आपने सही कहा, कि किसी भी देश को दुनिया में दादागिरी दिखाने का अधिकार नहीं होना चाहिये।
    आने वाला समय कैसा होगा कोई नहीं जानता।
    कितनी अजीब बात है! कितने देवी देवता! कितने धर्म! आराधना के कितने प्रकार और अटूट विश्वास! दुश्मन मानवता को श्रेष्ठ बताया है पर उसके बाद भी वर्चस्व की लड़ाई! समझ में ही नहीं आता कि जीवन के लिए युद्ध जरूरी है या भोजन और अनैतिकता जायज है या नैतिकता?हिंसा जरूरी है या शांति!!!!!
    इंसान सब कुछ बना जा रहा है बस इंसान ही नहीं बन पा रहा।
    ऐतिहासिक महत्व वाले इस संपादकीय के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

    • आदरणीय नीलिमा जी, हमेशा की तरह आपने संपादकीय पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी लिख कर पुरवाई का उत्साह बढ़ाया है। हमारा प्रयास रहता है कि अपने पाठकों तक हर विषय को कम और सरल शब्दों में पहुंचा सकें। हार्दिक धन्यवाद।

  18. आपने ऐतिहासिक तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान अमेरिका – इजराइल – युद्ध के हालात को अच्छी तरह समझाया है। अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ भी जो किया वह भी उचित नहीं था। वह हर जगह अपनी नाक घुसेड़ता है मगर जहां तक इस्लामिक देशों की स्थिति है वे भी कम अराजक नहीं हैं और शेष विश्व के लिये खतरनाक बने हुये हैं। 1979 के बाद के ईरान की कट्टरता एक उदाहरण है जिसने सामान्य मानवीय रहन सहन पर भी इस्लामी चाबुक चला दी। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज हटते ही लोगों को हवाई जहाज के पंखो से लटक कर भागने के हौलनाक दृश्य कंपाने वाले थे। इस्लामी शासन का डर इस कदर हावी था। इस्लामी जेहाद की तुलना में अमेरिका फिर भी ठीक है। मगर भारत को भी अतिशय सावधान रहना होगा।

  19. आपने बिलकुल सही समाधान सुझाया लेकिन ये दोनों नकारात्मक शक्तियां समझने वाली नहीं हैं. सच्चाई यही है कि इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार करना ही पड़ेगा. ईरान अभी युद्ध करने के लिए मजबूर है.किसी को भी तो सद्बुद्धि आये.

  20. आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
    आपके इस बार के संपादकीय पर लिखने में थोड़ा विलंब हुआ। कारण, ‘उद्धव गीता’ को अंतिम रूप दे रहा था। “राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम॥” जब पुस्तक प्रेस में चली गई, तब जाकर राहत मिली है।
    आपका इस बार का संपादकीय- ‘नकारात्मक शक्तियों की लड़ाई’- वर्तमान वैश्विक परिदृश्य का एक अत्यंत साहसिक, निष्पक्ष और मर्मभेदी विश्लेषण है। आपने बड़ी ही कुशलता से राजनीति और इतिहास के उन पन्नों को पलटा है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में हाशिए पर रख दिया जाता है। यह संपादकीय केवल सूचनाओं का पुलिंदा नहीं है, बल्कि सत्ता के अहंकार और वैचारिक कट्टरता के बीच पिसती मानवता की एक तार्किक पुकार है, जो पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि क्या वास्तव में दो नकारात्मक शक्तियाँ मिलकर कभी सकारात्मक परिणाम दे सकती हैं।
    इस संपादकीय की सबसे बड़ी शक्ति इसका ऐतिहासिक संदर्भों के साथ किया गया प्रहार है। आपने अमेरिका के उस ‘लोकतांत्रिक मुखौटे’ को बेनकाब किया है, जिसके पीछे दशकों से विस्तारवादी और विनाशकारी नीतियां छिपी रही हैं। 1953 के ईरान से लेकर ग्वाटेमाला, कांगो, वियतनाम, चिली और हालिया इराक व लीबिया तक का जो कच्चा चिट्ठा यहाँ खोला गया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि कैसे विश्व का स्वयंभू ‘चौधरी’ अपने निजी स्वार्थों के लिए निर्वाचित राष्ट्राध्यक्षों की हत्या और सैन्य तख्तापलट जैसे कृत्यों में संलिप्त रहा है।
    वहीं दूसरी ओर, संपादकीय में ईरान के भीतर आए सभ्यतागत बदलावों पर भी उतनी ही प्रखरता से टिप्पणी की गई है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का एक प्राचीन सभ्यता से शरिया कानून वाले ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ में तब्दील होना और वहाँ के युवाओं की छटपटाहट को आपने बड़ी संवेदनशीलता से उकेरा है। आयतोल्ला खुमैनी और अली ख़ामेनेई के युग की चर्चा करते हुए यह संपादकीय यह समझाने में सफल रहा है कि जब वैचारिक कट्टरता और परमाणु महत्वाकांक्षाएँ आपस में मिलती हैं, तब वे पूरे क्षेत्र को असुरक्षित बना देती हैं।
    इज़राइल के अस्तित्व को लेकर आपका दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक और न्यायसंगत है। विश्व भर के ईसाई और मुस्लिम बाहुल्य देशों के बीच एक छोटे से यहूदी राष्ट्र की स्थिति और उसके विरुद्ध उठने वाली विनाशकारी धमकियों का ज़िक्र कर, आपने वैश्विक न्याय प्रणाली के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाया है। भारत के संदर्भ में अमेरिका की दोहरी नीति, जहाँ वह एक तरफ लोकतंत्र की दुहाई देता है और दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे देशों के तानाशाहों का साथ देता है, का उल्लेख करना आपकी गहरी राजनीतिक सूझबूझ का परिचायक है।
    कहना अनुचित नहीं होगा कि यह संपादकीय शांति का एक ऐसा ठोस समाधान प्रस्तुत करता है, जिसे नज़रअंदाज़ करना कठिन है। आपका यह कहना कि ‘किसी भी देश को विश्व में दादागिरी करने का अधिकार नहीं होना चाहिए’, आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। शांति का मार्ग तभी प्रशस्त होगा, जब इस्लामिक देश इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार कर आतंकवाद पर लगाम लगाएँगे और अमेरिका विश्व का चौधरी बनने का स्वांग बंद करेगा। अपनी प्रखर भाषा और तथ्यात्मक गहराई के कारण यह संपादकीय समकालीन पत्रकारिता का एक उत्कृष्ट नमूना है।
    पुनश्च,
    विजय विक्रांत जी (कैनेडा) ने आपके संपादकीय पर 15 मार्च को (10:32PM) को अपना पक्ष रखते हुए आपको ‘तेजेन्द्र’ से ‘जितेन्द्र’ बना दिया है; इस संदर्भ में कहना चाहूंगा कि आप वास्तव में ‘जितेंद्र’ हैं। अनजाने में हुई यह भूल मन में गुदगुदी करने के साथ ही बदले संदर्भों में आपके इस नये नाम की प्रासंगिकता को चरितार्थ करती है।

    • भाई चन्द्रशेखर जी, आपकी टिप्पणी के बिना संपादकीय पूरा ही नहीं लगता है। आपने बिल्कुल ठीक कहा कि कनाडा के विजय विक्रान्त जी मुझे जितेन्दर ही कहते हैं।

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