Thursday, March 5, 2026
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संपादकीय – पैसे निकालने की जादुई मशीन

जिस तरह से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास हो रहा है, हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि भविष्य में एटीएम मशीनों का स्वरूप क्या रहेगा। हमने देखा है कि हमारे सामने टेप रिकॉर्डर, वीसीआर, पेजर, फ़्लॉपी, सीडी और डीवीडी जैसे आविष्कार आए और फिर हमारे जीवन से ग़ायब हो गए। जिस गति से तकनीकी विकास हो रहा है, उसका असर एटीएम मशीनों पर भी अवश्य पड़ेगा।

जीवन में हमें कुछ चीज़ों के इस्तेमाल करने की इतनी आदत हो जाती है कि हम भूल जाते हैं कि इन सुविधाओं के बिना भी हम जीवन ठीक-ठाक बिता लिया करते थे। मगर आज वही सुविधा हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है…और सच तो यह है कि जिस प्रकार तकनीकी प्रगति जारी है, हमें यह भी ज्ञान नहीं है कि यह सुविधा कब तक अपने अस्तित्व को बचाए रख सकेगी।
जी हाँ, आज हम बात कर रहे हैं बैंकों के बाहर लगी एटीएम मशीन की, जिसमें से हम जब चाहें डेबिट या क्रेडिट कार्ड डालकर पैसे निकाल सकते हैं। न तो बैंक के भीतर जाने का चक्कर और न ही कैशियर के सामने कतार में खड़े होने का झंझट। एटीएम मशीन का अर्थ है ‘ऑटोमेटेड टेलर मशीन’ (Automated Teller Machine)। यानी वह मशीन, जो बिना किसी मानवीय सहायता के स्वयं ही आपके आदेश पर करारे नोट आपके सामने प्रस्तुत कर देती है।
एक ज़माना था जब बैंक में ‘लेजर’ में प्रविष्टि करने वाले कर्मचारी अलग होते थे और कैशियर एकदम अलग सुरक्षित केबिन में बैठा करते थे। भारत के बैंकों में आप अपना चेक जाकर लेजर-कीपर को देते थे। उसके बाद वह आपको एक टोकन देता था। आपके चेक को लेजर में दर्ज करने के बाद वह एक छोटी कॉपी में आपका विवरण लिखकर अकाउंटेंट के पास भेजता था। अकाउंटेंट उसे पास करके हस्ताक्षर करता था और फिर कैशियर के पास भेज देता था। अंततः कैशियर आपको पैसे देता था।
इस पुरातन विधि से छुटकारा तब मिला, जब कैशियर को नया नाम दिया गया- टेलर’। इस सुविधा के तहत आप सीधे कैशियर के पास जाते और उसे अपना चेक देते। वह स्वयं ही चेक को लेजर में दर्ज कर आपको पैसे दे देता। अब बैंक में एक चमत्कारी बदलाव हो चुका था। आपके और कैशियर के बीच के बिचौलिये हटा दिए गए थे और आपका समय बच रहा था।
ग्राहक-सुविधा का रथ कहीं रुकता नहीं है, वह बस आगे बढ़ता चलता है। हम भारत के लोग बहुत संतुष्ट किस्म के होते हैं, मगर पश्चिमी देशों के लोग बहुत आगे की सोचते हैं। लंदन में एक व्यक्ति था-जॉन शेफर्ड बैरन। वह एक बैंक-नोट बनाने वाली कंपनी में काम करता था। जब वह शनिवार को बैंक से पैसे निकालने आता, तो वहाँ एक लंबी कतार लगी होती। उसे उस कतार में खड़े होने पर बहुत परेशानी होती थी। कई बार ऐसा होता कि उसकी बारी आने से पहले ही बैंक बंद होने का समय हो जाता और वह पैसे निकाल ही नहीं पाता था।
एक ऐसे ही शनिवार को जब जॉन शेफर्ड बैरन बैंक से पैसे नहीं निकाल पाए, तो वे इस परेशानी का हल खोजने के बारे में सोचने लगे। कभी-कभी ऐसा होता है कि श्रेष्ठ विचार गुसलख़ाने में नहाते समय ही आते हैं। जॉन शेफर्ड बैरन को भी एक विचित्र-सा विचार आया। वे सोचने लगे कि आजकल ऐसी मशीनें लगा दी गई हैं, जिनमें सिक्के डालने पर चॉकलेट बाहर आ जाती है। तो क्यों न एक ऐसी मशीन बनाई जाए, जिसमें चेक डालें और पैसे बाहर आ जाएँ। स्मरण  रहे कि यह 1967 का ज़माना था और अभी बैंक कार्ड का दौर नहीं आया था। यह ज़माना चेक-बुक और कैशियर का था।
सेना में काम कर चुके जॉन शेफर्ड बैरन ने एक ऐसी मशीन के बारे में सोचा, जिसमें एक पिन डाला जाए और पिन को पढ़कर समझने के बाद मशीन ग्राहक को पैसे दे दे। फ़ौजी व्यक्ति ने अपने आर्मी नंबर को ही पिन के रूप में इस्तेमाल किया। पिन छह अंकों का था। यहाँ भी उनकी पत्नी ने आपत्ति जताई कि छह अंकों का पिन याद करना कठिन है, तो जॉन शेफर्ड बैरन ने चार अंकों वाले पिन की ईजाद कर दी।
मगर इस समय तक मशीन में कार्ड का इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ था। मशीन से भी चेक द्वारा ही पैसे निकाले जाते थे। इन विशेष प्रकार के चेकों पर एक रेडियो-एक्टिव पदार्थ लगा होता था, जिसे मशीन पढ़ लेती थी। चेक लगाने के बाद ‘पिन’ एंटर करना होता था।
जॉन शेफर्ड बैरन ने इस तरह की छह मशीनें बनाईं और उन्हें अलग-अलग जगहों पर लगाया गया। सबसे पहली मशीन लंदन के एनफ़ील्ड इलाके में स्थित बार्कलेज़ बैंक में 27 जून 1967 को लगाई गई। इस मशीन के सबसे पहले ग्राहक बने ब्रिटिश कॉमेडी अभिनेता रेग वार्ने । उन्होंने इस मशीन से दस पाउंड निकाले। और हाँ, इस मशीन से एक बार में अधिकतम 10 पाउंड (आज के हिसाब से करीब 1,000 रुपये और 1967 के हिसाब से करीब 180 रुपये) ही निकाले जा सकते थे।
मेरा मानना है कि विश्व के सबसे बड़े दो आविष्कार हैं- पहिया और बिजली। जब पहिए में बिजली लग गई, तो इंसान का जीवन बदलता चला गया। तकनीक के विकास में बिजली का अद्भुत योगदान है। 27 जून 1967 से शुरू हुई एटीएम की यात्रा आज कहाँ तक पहुँच चुकी है, यह हमें हैरान करने के लिए काफ़ी है।
पहला आधुनिक, चुंबकीय पट्टी वाला कार्ड-आधारित एटीएम 1969 में न्यूयॉर्क के रॉकविल सेंटर में केमिकल बैंक द्वारा स्थापित किया गया था। यह दीवार में निर्मित था और केवल नकदी (कैश) निकालने का काम करता था। वर्ष 1971 तक ऐसा एटीएम नहीं बनाया गया था, जो आज के “संपूर्ण कैशियर” के सभी कार्यों को करने में सक्षम हो।
धीरे-धीरे संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और जापान में 1970 के दशक में दूसरी पीढ़ी के एटीएम स्थापित किए गए, जिनमें नकद जमा करवाने की सुविधा भी मुहैया करवाई गई। 1995 में स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ अमेरिकन हिस्ट्री ने डोक्यूटेल और वेट्ज़ेल को नेटवर्क्ड एटीएम के आविष्कारक के रूप में मान्यता दी, और आज दुनिया भर में लाखों इकाइयाँ एक साथ जुड़ी हुई हैं।
आज भारत में भी हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में से एक है ‘एटीएम’, और इस मशीन का इस्तेमाल लगभग हर दिन होता है, चाहे हमें पैसे निकालने हों, जमा करने हों, बैलेंस चेक करना हो या पैसे ट्रांसफ़र करने हों। एटीएम मशीनें अब नए बैंकिंग सिस्टम का एक अटूट हिस्सा बन चुकी हैं।
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली रिसर्च फ़ाउंडेशन के अनुसार, भारत में पहला एटीएम 1987 में HSBC बैंक ने अपनी मुंबई शाखा में लगाया था। भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, आज देश में 2 लाख से अधिक एटीएम मौजूद हैं, जिनके ज़रिए लाखों ग्राहक हर दिन अपनी बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।
वर्तमान में हम एटीएम के माध्यम से डेबिट या एटीएम कार्ड और पिन का उपयोग करके बैंक से नकदी निकाल सकते हैं, मिनी स्टेटमेंट ले सकते हैं, खाते का बैलेंस पता कर सकते हैं और कुछ उन्नत मशीनों में पैसे तथा चेक जमा भी कर सकते हैं। अब ऐसी मशीनें भी बन चुकी हैं, जिनमें खातों के बीच पैसे ट्रांसफ़र करना, कुछ बिलों का भुगतान करना या पिन बदलना जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।
बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र भारत में ट्रेन में एटीएम लगाने वाला पहला बैंक बन गया है। पंचवटी एक्सप्रेस में बैंक ऑफ महाराष्ट्र का एटीएम यात्रियों की सुविधा के लिए लगाया गया, जो एक पायलट प्रोजेक्ट था। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो अन्य भारतीय रेलों में भी यह सुविधा उपलब्ध करवाई जा सकेगी।
याद रखने योग्य बात यह है कि बैंकों ने एक दिन में एटीएम से निकाली जाने वाली राशि की सीमा तय कर रखी है। जैसे लंदन में आप एटीएम से तीन सौ पाउंड की राशि एक दिन में निकाल सकते हैं, मगर अपने बैंक की किसी भी शाखा के एटीएम से पाँच सौ पाउंड निकालने की सुविधा है। भारत में यह भी सुनने में आ रहा है कि अब एटीएम से पैसे निकालने पर भी शुल्क लगाने के बारे में विचार किया जा रहा है।
स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने लद्दाख के लेह में स्थित खारदुंग ला दर्रे पर 18,379 फीट की ऊँचाई पर एक एटीएम का उद्घाटन 14 जुलाई, 2021 को किया। यह एटीएम भारत का सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित एटीएम है, और इस तरह के चुनौतीपूर्ण स्थान पर ऐसी सेवा प्रदान करने वाला यह पहला बैंक है। यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने आई.एन.एस. विक्रांत पर भी एटीएम मशीन लगाकर एक प्रकार का रिकॉर्ड कायम किया।

 

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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25 टिप्पणी

  1. वाह क्या कहने! इस संपादकीय को पढ़ने से कोई भी पाठक अचंभित हुए नहीं रह सकता।
    ATM का कितना सुंदर सहज परंतु सार्थक वर्णन। यह संपादकीय किशोरों और युवाओं को बहुत भाएगा।आम जन को भी एक नायाब जानकारी से लैस कर दिया है ।

    • भाई सूर्यकान्त जी, यही प्रयास रहता है कि संपादकीय सभी उम्र के लोगों को अपना सा लगे।

  2. तकनीकी तो अब अलाउद्दीन का चराग
    होती जा रही है आने वाले समय में और भी चमत्कार नज़र आने वाले हैं ।
    रोचक सम्पादकीय
    Dr Prabha mishra

  3. विषय-विशेष विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद। याद आता है कि मैने अपना पहला अकाउंट 1973 में कॉलेज के दिनों, पंजाब नेशनल बैंक के साथ खोला था, और पहली बार ATM का उपयोग 1991 में कनॉट प्लेस में किया था क्योंकि ATM मशीनें गिनती भर की हुआ करती थी। खाता खोला क्योंकि दिल्ली प्रेस प्रकाशन गृह खुले दिल से एक आलेख के तीस रुपए का भुगतान चेक के माध्यम से किया करते थे। वो अकाउंट अभी भी रखा हुआ है।

    • बिमल जी इतनी प्यारी टिप्पणी के लिये दिल से धन्यवाद… पढ़ते हुए बहुत अच्छा लग रहा था।

  4. आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
    ​आपका यह संपादकीय पढ़कर मन स्मृतियों के उन गलियारों में डोलने लगा, जहाँ बैंक की लंबी कतारें, लेजर-कीपर का वह भारी-भरकम रजिस्टर और टोकन मिलने का वह अंतहीन इंतज़ार जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा हुआ करता था।
    ​इस तरह के कठिन अनुभवों और यंत्रणाओं के दौर से मैं स्वयं भी कई बार गुज़रा हूँ और अपने भीतर उन दुखद यादों को समेटे हुए हूँ। मुझे आज भी याद है, जब चिलचिलाती धूप और लू के थपेड़ों के बीच, अपने गाँव से नौ किलोमीटर दूर मरदह बाज़ार स्थित एकमात्र बैंक के एटीएम से निराश होने के बाद, मैं बीस किलोमीटर दूर मऊ शहर की ओर रुख करता था। शहर में भी राहत नहीं थी, क्योंकि वहाँ भी एटीएम एक-दूसरे से काफी दूरी पर स्थित थे।
    ​इस पूरी मशक्कत में मैंने पिताजी की सन् ’62 वाली पुरानी ‘बुढ़िया’ साइकिल से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी (आना-जाना) तय की थी। वह 24 इंच के ऊँचे फ्रेम वाली साइकिल, जिस पर बैठते समय मेरे पैर पावदान तक भी मुश्किल से पहुँचते थे और जमीन को छूने की तो कल्पना भी बेमानी थी। नब्बे के दशक का वह दौर, जब साइकिल को ‘धुर्रे’ (धूरी) पर पैर रखकर दौड़ते हुए चढ़ना और उतरते समय उसे एक तरफ झुकाकर जमीन तक पहुँचने की कला में महारत हासिल करना किसी युद्ध जीतने जैसा था। सड़कें भी नाममात्र की थीं—ऊबड़-खाबड़ और कंकड़ों से भरी, जो कागज़ों पर तो दुरुस्त थीं, पर हकीकत में वे केवल शारीरिक कष्ट और साइकिल की लंबी सीट के दबाव से जंघों में लगने वाली ‘कचट’ का कारण बनती थीं।
    ​पारिवारिक परिस्थितियों के कारण न तो कोई दूसरा साधन था और न ही विकल्प। भूख-प्यास से बेहाल जब मैं लंबी कतारों के बाद एटीएम तक पहुँचता, तो अक्सर मशीन खराब मिलती, कैश खत्म हो जाता या बिजली गुल हो जाती। बार-बार विफल होकर जब मैं घर लौटता, तो तकनीकी खामियों को न समझ पाने के कारण पिताजी की डाँट और कभी-कभी ‘मार’ मेरी नियति बन जाती थी। हम आज की ‘जेन-जी’ (Gen Z) पीढ़ी की तरह नहीं थे जो पिता की डांट को गिनें या याद रखें, हमारे लिए तो वह अनुशासन का एक हिस्सा था जिसे हम बस सह लिया करते थे। मुझे विश्वास है कि मेरी और आपकी पीढ़ी के अनगिनत लोग इस तरह के संघर्षों से निश्चित ही दो-चार हुए होंगे।
    ​यही कारण है कि आपने जिस आत्मीयता और सूक्ष्मता के साथ ‘पैसे निकालने की जादुई मशीन’ के बहाने तकनीक और समय के बदलते पहिए का चित्रण किया है, वह हृदय को छू लेने वाला है।
    ​आपने संपादकीय के प्रारंभ में ही टेप रिकॉर्डर, वीसीआर और फ्लॉपी डिस्क जैसे उदाहरण देकर हमें एक बहुत बड़े सत्य से रूबरू कराया है—परिवर्तन ही शाश्वत है। यह पढ़कर मन में एक सिहरन सी होती है कि जिन सुविधाओं को हम आज अपने अस्तित्व का अनिवार्य अंग मान चुके हैं, वे भविष्य की गर्त में कब विलीन हो जाएँगी, इसका हमें आभास तक नहीं है। तकनीक के प्रति आपकी यह दूरदृष्टि वर्तमान पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है और सीख भी।
    ​विशेष रूप से जॉन शेफर्ड बैरन के उस शनिवार वाले प्रसंग को आपने जिस तरह से साझा किया, वह किसी कहानी जैसा रोचक बन पड़ा है। उस घटना को याद करते हुए आपने कितना सुंदर चित्रण किया है कि, “जब वे शनिवार को बैंक से पैसे निकालने आते, तो वहाँ एक लंबी कतार लगी होती। उन्हें उस कतार में खड़े होने पर बहुत परेशानी होती थी। कई बार ऐसा होता कि उनकी बारी आने से पहले ही बैंक बंद होने का समय हो जाता और वे पैसे निकाल ही नहीं पाते थे।”
    ​जब वे इस परेशानी का हल खोजने के बारे में सोचने लगे, तब उनके मस्तिष्क में आए उस अद्भुत विचार को आपने बहुत ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है। आपने बताया कि किस तरह उन्हें गुसलखाने में नहाते समय एक विचित्र-सा विचार आया कि “आजकल ऐसी मशीनें लगा दी गई हैं, जिनमें सिक्के डालने पर चॉकलेट बाहर आ जाती है। तो क्यों न एक ऐसी मशीन बनाई जाए, जिसमें चेक डालें और पैसे बाहर आ जाएँ।” एक साधारण सी असुविधा और चॉकलेट मशीन से मिली प्रेरणा कैसे एक वैश्विक क्रांति का बीज बो सकती है, यह आपके शब्दों में बखूबी निखर कर आया है।
    ​पिन कोड के छह अंकों से चार अंकों तक सिमटने के पीछे उनकी पत्नी की याददाश्त वाला वह कोमल मानवीय प्रसंग पढ़कर अनायास ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। यह आपके लेखन की विशेषता है कि आप शुष्क तकनीकी तथ्यों में भी संवेदनाओं के रंग भर देते हैं। आपने जिस सरलता से ‘लेजर-कीपर’ से लेकर ‘टेलर’ और फिर ‘ऑटोमेटेड टेलर मशीन’ तक के क्रमिक विकास को समझाया है, वह आधुनिक बैंकिंग के इतिहास का एक मुकम्मल दस्तावेज़ है।
    ​एटीएम की इस ऐतिहासिक यात्रा को आपने केवल पश्चिम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि भारत की मिट्टी और यहाँ की प्रगति के साथ इसका जो तारतम्य बिठाया है, वह सराहनीय है। लंदन की सड़कों से शुरू होकर लद्दाख के 18,379 फीट ऊँचे खारदुंग ला दर्रे तक और आई.एन.एस. विक्रांत की विशालता के बीच लगी एटीएम मशीन का उल्लेख देश के बढ़ते कदमों की गौरवगाथा कहता है। आपने जिस प्रकार बिजली और पहिए के मिलन को मानव सभ्यता का सबसे बड़ा आविष्कार बताया, वह आपके विचारों की व्यापकता को दर्शाता है।
    ​इस संपादकीय का सबसे मार्मिक पक्ष वह है, जहाँ आप उन दिनों को याद करते हैं जब एक-एक नोट के लिए मानवीय स्पर्श और लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था। आज जब हम बिना किसी शोर-शराबे के मशीन से ‘करारे नोट’ निकलते देखते हैं, तो वह वाकई किसी जादू जैसा ही लगता है। लेकिन साथ ही, बैंक शुल्कों और बढ़ती सीमाओं के प्रति आपका संकेत हमें वास्तविकता की धरातल पर भी टिकाए रखता है।
    ​आपका यह संपादकीय मात्र सूचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह समय की बदलती करवटों का एक सुंदर दस्तावेज़ है। आपकी भाषा की तरलता और भावों की गहराई ने इस विषय को इतना सहज बना दिया है कि हर पाठक इसे अपने स्वयं के अनुभव से जोड़कर देख सकता है। इस सुंदर और ज्ञानवर्धक प्रस्तुति के लिए आपका हृदय से आभार।

    • प्रिय भाई चंद्रशेखर जी, इतनी सृजनात्मक टिप्पणी को पढ़ने के बाद लगता है कि आपको स्वयं इस विषय पर एक आलेख लिखना चाहिये। आपके अनुभवों की ख़ुश्बू संपादकीय को नये आयाम प्रदान कर रही है।

  5. हमारी पीढ़ी ने लम्बी क़तारों में खड़े होकर पैसे निकालने की प्रतिक्रिया को झेला है और फिर नए-नए आविष्कारों का इस्तेमाल करते-करते यहाँ तक पहुँच गए हैं, जहाँ पैसे निकालने की कम ही आवश्यकता पड़ती है। ऐटीएम की सुविधा के साथ पे टी एम के माध्यम से बड़े भुगतान तो करते ही हैं, टिप लेने वालों और भिखारियों के पास भी यह सुविधा है।
    हम नई सुविधाओं का उपयोग तो कर लेते है, लेकिन उनके पीछे छुपे इतिहास को जानने की कोशिश नहीं करते। आप बड़े सरल, सहज और रोचक ढंग से तथ्यों को बताते है,जिसमें आपका शोध और परिश्रम झलकता है तथा हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है । साधुवाद तेजेंद्र जी।

    • सुदर्शन जी, आपने लिखा है कि – “हम नई सुविधाओं का उपयोग तो कर लेते है, लेकिन उनके पीछे छुपे इतिहास को जानने की कोशिश नहीं करते। आप बड़े सरल, सहज और रोचक ढंग से तथ्यों को बताते है,जिसमें आपका शोध और परिश्रम झलकता है तथा हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है । साधुवाद तेजेंद्र जी”। – इस स्नेह से परिपूर्ण टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  6. कहा जाता है कि आवश्यकता आविष्कार को जननी होती है। जॉन शेफर्ड बैरन ने जिस मुश्किल का सामना कर एटीएम ईजाद की वह आज सभी के लिए आवश्यक है। जब यह मशीन नई नई आयी थी तब बहुत उत्सुकता रहती थी।जब यह छोटे छोटे जिलों में भी लग गई तब उससे रुपए निकाल कर लाने वाला व्यक्ति सबको किस्सा सुनाता था।
    पर दुर्भाग्य यह भी कि कुछ गलत नीयत वाले लोग उस मशीन को ही उखाड़कर ले जाते हैं।
    तेजेन्द्र जी को धन्यवाद उन्होंने एटीएम को विकासयात्रा बताई।

  7. आपका संपादकीय किसी रोचक कहानी से कम नहीं होता। बेहतरीन जानकारी हार्दिक बधाई

  8. आजकल तकनीकी विकास का समय है। रोज़ नई नई तकनीकों से सामना हो रहा है।आपका संपादकीय हमेशा ही ज्ञानवर्धक और विस्तृत जानकारी से युक्त होता है और विषय भी रूचिपूर्ण होता है।
    ए टी एम की यात्रा कराने हेतु आपका हृदय तल से धन्यवाद।

    • भाई कृष्ण कुमार गुप्ता जी, इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  9. जितेन्द्र भाई: एटीएम की इतनी बढ़िया यात्रा वृतांत के बारे में बहुत बहुत साधुवाद। जिस तेज़ी से दुनिया आगे बढ़ रही है उसI तेज़ी की इस भागा दौड़ में लोगों के पास अगर किसी चीज़ का अभाव है तो वो है वक्त। किसी शायर ने ठीक कहा है कि; “वक्त से वक्त कि क्या शिकायत करें/वक्त ही न रहा वक्त की बात है”। भाग दौड़ के इस माहॉल में एटीएम ने काफ़ी हद तक, कम से कम, बैंकों में जो समय लगता था, उस में तो काफ़ी कमी कर दी है। यही नहीं, इसके फ़ायदें भी बहुत हैं। तेल देखो/तेल की धार देखो। कुछ पता नहीं, हो सकता है आने वाले कल के एटीएम में आप को, घर बैठे, केवल फ़ोन करने की आवश्यक्ता होगी और रोबोट साहब, अपनी इलैक्ट्रिक कार में बैठकर, आपके घर आप के पैसे पहुँचा देंगे।

  10. पुरवाई पत्रिका के इस बार के संपादकीय का विषय ‘पैसे निकालने की जादुई मशीन’ है। बैंकों में जमा पैसा निकालने की चरणबद्ध प्रक्रिया को संदर्भों के साथ विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण में इतिहास सहजता से कदम मिलाकर चल पड़ता है।
    आविष्कार अपनी पूर्णता के लिए लंबी यात्रा करता है। शुरुआत कच्चेपन से होती है, इसके बाद उसमें निरंतर परिपक्वता आती चली जाती है। मैं समझता हूं कि उस कच्चेपन में भी उस समय पूर्णता ही होती जब तक कि उससे बेहतर आविष्कार न हो जाए।
    आपका ये मानना कि पहिया और बिजली के आविष्कार विश्व के सबसे बड़े आविष्कार है। यह बात सही व तर्क संगत है। पहिए के आविष्कार ने जहां मानव सभ्यता को जन्म दिया वहीं बिजली के आविष्कार ने मानव को ऊंची उड़ान भरने की क्षमता प्रदान की।
    संपादकीय को पढ़कर विगत जीवन से लेकर अब तक की सारी घटनाएं मन में उभर रही हैं। बैंकों की लाइनों में खड़े होकर पैसा निकालना मुश्किल नहीं तो कठिन जरूर था। आज ATM ने इस कठिनाई को दूर कर दिया है।
    कुछ लोग कठिनाई देखकर रोना रोते हैं और कुछ उसका समाधान ढूंढते हैं। रोने वाले ज्यादा होते हैं, समाधान ढूंढने वाले कम।
    जाॅन शैफर्ड बैरन को हम नहीं जानते हैं। लेकिन उनके द्वारा ईजाद किया गया ATM हर किसी की जुबान पर चढ़ गया है। छै अंकों के कोड की जगह चार अंकों के कोड रखने की पत्नी द्वारा दी गई सलाह सारी मानवता के लिए वरदान साबित हुआ है। मुझे अपने ATM का कोड बार-बार ध्यान में आ रहा है। पति कितना भी बड़ा आविष्कार क्यों न करे पर उसमें से सहूलियत पत्नियां ही निकाल पाती हैं। उनकी सहूलियत हम सबकी सहूलियत जो बन चुकी है।
    आधुनिक विश्व के लगभग सारे आविष्कार पश्चिम ने ही किए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने इन आविष्कारों का अकेले उपयोग नहीं किया है बल्कि सारी दुनिया को निहाल कर दिया है।
    सर आपकी संपादकीय में गहराई होती है। विषय विविधता और नवीनता पाठक को सोचने पर विवश करती है।
    जानकारी से परिपूर्ण संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।

    • प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, आपने कहा है कि, “संपादकीय को पढ़कर विगत जीवन से लेकर अब तक की सारी घटनाएं मन में उभर रही हैं। बैंकों की लाइनों में खड़े होकर पैसा निकालना मुश्किल नहीं तो कठिन जरूर था। आज ATM ने इस कठिनाई को दूर कर दिया है। कुछ लोग कठिनाई देखकर रोना रोते हैं और कुछ उसका समाधान ढूंढते हैं। रोने वाले ज्यादा होते हैं, समाधान ढूंढने वाले कम।” आपकी टिप्पणी की हम हमेशा प्रतीक्षा करते हैं। आप जिस गहराई से संपादकीय पढ़ते हैं, उससे हमारी टीम का उत्साह बहुत बढ़ता है। हार्दिक धन्यवाद।

  11. आवश्यकता अविष्कार की जननी है, यह बात आपने अपने संपादकीय ‘पैसे निकालने की जादुई मशीन’ के द्वारा सिद्ध कर दी है जिसमें आपने ATM मशीन की विस्तृत यात्रा का वर्णन किया है। इस मशीन ने बैकों में लगने वाली लाइनों से तो निजात दिलवाई ही, साथ ही कहीं से भी पैसे निकालने की सुविधा भी दिलवाई।
    मुझे याद है सन 2000 में ज़ब मेरे बच्चे बंगलौर में पढ़ने के लिए आये थे तब हम नागपुर में थे। हमने एक ATM कार्ड उनको दे रखा था। ज़ब उन्हें आवश्यकता होती वे पैसे निकाल लेते थे वरना मनी आर्डर या ड्राफ्ट से पैसा भेजना पड़ता।

    यह भी सच है कि ज़ब नई वस्तुओं का अविष्कार होता है तो कभी उपयोगी लगती चीजें अनुपयोगी होती जाती हैं।

    वैसे भी आज ऑन लाइन खरीददारी की वजह से आज घर में कैश रखना कम होता जा रहा है। हमारी तो मैड भी अपना वेतन ऑनलाइन लेना पसंद करती है।

    रोचक, जानकारी से भरपूर संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी, आप हमेशा पुरवाई के संपादकीय पर सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी भेजती हैं। हम आपके अनुगृहीत हैं।

  12. एटीएम के विकास पर जानकारीभरी पोस्ट। हलांकि अब तो यूपीआई प्रणाली ने एटीएम को भी पीछे छोड़ दिया। बैंक जाने की जरुरत कमतर होती जा रही है।

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