Thursday, April 16, 2026
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संपादकीय – क्या लाश के साथ बलात्कार अपराध है ?

मनोचिकित्सक कहते हैं कि नेक्रोफीलिया एक बेहद गंभीर किस्म की मानसिक बीमारी कही जा सकती है क्योंकि इसमें शव के साथ यौन संबंध बनाने की इच्छा में मरीज किसी की हत्या करने से भी गुरेज नहीं करता है। यानी अगर किसी मरीज की शव के साथ यौन संबंध बनाने की इच्छा हो रही है और उसे शव ना मिले तो वो किसी की हत्या करके उसके शव के साथ यौन संबंध बनाने का काम भी कर सकता है। आंकड़े देखने के बाद मनोचिकित्सकों का कहना है कि ये गंभीर बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा देखी गई है।

जीवन में कुछ कृत्य ऐसे सुनने को मिलते हैं जिनको सुन कर हैरानी भी होती है और उसके करने वाले से वितृष्णा भी। चाहे देश और समाज कोई सा भी हो कुछ एक बातें ऐसी होती हैं जो किसी भी समाज को मान्य नहीं होती हैं। ऐसी ही एक विकृति है नेक्रोफ़ीलिया – (शव के प्रति सेक्सुअल आकर्षण)। मुझे याद है जब मैं कालेज के समय नाटक कंपीटीशन में भाग लिया करता था तो एक ऐसे विषय पर लघुनाटक देखने को मिला था। हैरानी भी हुई कि ऐसा भी हो सकता है। 
पुरवाई के पाठक अवश्य सोच रहे होंगे कि आज यह किस प्रकार की बातचीत शुरू कर दी गई है। भला एक आम आदमी को ऐसे विषयों में क्या रुचि हो सकती है। मगर हमारा समाज और उसकी संस्थाएं कभी-कभी ऐसे काम कर जाते हैं कि इन्सान सोचता रह जाता है कि क्या हमारे न्यायाधीश किसी भिन्न प्रकार के हाड़-माँस के बने होते हैं!
उच्च-न्यायालय यानी कि हाई कोर्ट चाहे किसी भी राज्य की क्यों ना हो उसका रुतबा बहुत ऊंचा होता है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक ऐसा निर्णय दिया जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। फ़ैसले में कहा गया कि “वर्तमान भारतीय कानून व्यवस्था में शव के साथ दुष्कर्म (नेक्रोफीलिया) को अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। इसलिए इस आधार पर किसी को सज़ा नहीं दी जा सकती है।”
जस्टिस न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने टिप्पणी की है कि बलात्कार के अपराध के लिए पीड़िता का जीवित होना जरूरी है। छत्तीसगढ़ HC कोर्ट ने इस मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट की ओर से रंगराजू बनाम कर्नाटक राज्य (2023) के मामले में दिए गए फैसले का जिक्र करते हुए कहा “भारतीय कानून शव के साथ यौन संबंध को ‘बलात्कार’ नहीं मानते और IPC की धारा 376 के तहत अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए इसे उपयुक्त मानदंड नहीं मानते।”
पुरवाई के पाठकों को बता दें कि 18 अक्टूबर, 2018 को छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में  नौ साल की एक बच्ची का शव सुनसान इलाके में मिला था। इस मामले में 22 अक्टूबर, 2018 को आरोपित नीलकंठ उर्फ़ नीलू नागेश को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। मामला थोड़ा पेचीदा है।
निचली अदालत में जब मामला पेश हुआ तो पता चला कि नितिन यादव नाम के पुरुष ने नौ साल की बच्ची को अगवा करके उसके साथ दुष्कर्म किया और उसकी गला दबा कर हत्या भी कर दी। हत्या करके वह बच्ची के शव को अपने घर ले आया और अपने दोस्त नीलकंठ उर्फ़ नीलू नागेश को मामले की जानकारी दी और शव को ग़ायब करने में मदद मांगी। 
दोनों ने बच्ची के शव को उठाया और पहाड़ी पर ले गये। वहां पहाड़ी पर नीलकंठ उर्फ़ नीलू नागेश ने बच्ची के शव के साथ दुष्कर्म किया और अंततः दोनों ने बच्ची के शव को पहाड़ी पर ही दफ़ना दिया। जब ट्रायल कोर्ट ने नितिन यादव को उम्र कैद और नीलकंठ उर्फ़ नीलू नागेश को सात साल क़ैद की सज़ा सुनाई तो बच्ची की माँ ने हाई कोर्ट का रुख़ किया। 
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बलात्कार के मामले में एक अहम फैसला सुना दिया कि “देश में प्रचलित कानून में शव के साथ दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। मौजूदा कानून में नेक्रोफ़ीलिया अपराध नहीं है। वर्तमान कानून में शव के साथ दुष्कर्म करने वाले को सजा देने का प्रावधान नहीं है।”
प्रश्न यह उठता है कि आख़िर नेक्रोफ़ीलिया है क्या? नेक्रोफीलिया दरअसल एक घिनौना मनोविकार यानी मेंटल डिसऑर्डर कहा गया है। इस विकार से ग्रस्त व्यक्ति मृत लोगों के शवों के साथ यौन संबंध  बनाकर सुख प्राप्त करता है। नेक्रोफीलिया शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसमें ‘नेक्रो’ का मतलब है शव और ‘फ़ीलिया’ यानी प्यार। इस प्रकार ग्रीक भाषा में नेक्रोफीलिया का अर्थ होता है मृत लोगों के साथ यौन संबंध बनाकर सुख लेना। 
पिछले कुछ दिनों में इसके कई मामले सामने आए हैं जिसमें नेक्रोफीलिया से पीड़ित लोगों ने मृत युवतियों के शव को कब्र से निकाल कर उनके साथ यौन संबंध स्थापित किया है। इसी डर से लोग अपनी मृत बेटियों की कब्र पर ताले लगा रहे हैं ताकि मरने के बाद उनकी बेटी के शरीर की दुर्गति ना हो सके।
नेक्रोफिलिया को अन्य भी कई नामों से पुकारा जाता है… इसे नेक्रोफिलिज्म, नेक्रोलाग्निया, नेक्रोकाइटस, नेक्रोक्लेसिस और थानाटोफिलिया  भी कहा जाता है।
मनोचिकित्सक कहते हैं कि नेक्रोफीलिया एक बेहद गंभीर किस्म की मानसिक बीमारी कही जा सकती है क्योंकि इसमें शव के साथ यौन संबंध बनाने की इच्छा में मरीज किसी की हत्या करने से भी गुरेज नहीं करता है। यानी अगर किसी मरीज की शव के साथ यौन संबंध बनाने की इच्छा हो रही है और उसे शव ना मिले तो वो किसी की हत्या करके उसके शव के साथ यौन संबंध बनाने का काम भी कर सकता है। आंकड़े देखने के बाद मनोचिकित्सकों का कहना है कि ये गंभीर बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा देखी गई है।
कुछ समय पहले कंबोडिया में एक ऐसा ही मामला सामने आया था जब एक 47 वर्षीय व्यक्ति चेन चियान पकड़ा गया था। चेन चियान एक लड़की के शव के साथ सेक्स करने के इरादे से उसके ताबूत में घुस गया। लेकिन वो वहीं उस ताबूत में सो गया। उसकी इस हरकत ने उसे फंसा दिया। जब गाँव वाले वहां पहुंचे तो वह आराम से क़ब्र में सो रहा था और उसका एक पाँव कब्र से बाहर निकला हुआ था।
चिन चियान एक दिन पहले उस लड़की के अंतिम संस्कार में शामिल भी हुआ था। उसने पुलिस को बताया कि उसने रात दस बजे ताबूत खोदना शुरू किया था। उस ताबूत में एक 17 वर्षीय युवती का शव रखा गया था। 
चियान ने पुलिस को अपने बयान में कहा कि वह युवती के शव के साथ सेक्स नहीं कर पाया क्योंकि ताबूत बहुत छोटा था। अंततः वह थक कर शव के ऊपर ही लेट गया और थकावट के कारण सो गया। सुबह 6.00 बजे जब गाँव वालों ने चियान की टाँग को कब्र से बाहर लटके हुए देखा तो इस बात की जानकारी मृत युवती के परिवार वालों को दी। 
पुलिस का मानना है कि चिन चियान नशीली दवाओं का आदी था। उसे कई बार नंगे घूमते हुए भी देखा गया था। एक बात तो ज़ाहिर है कि उसका दिमाग़ी संतुलन ख़ासा बिगड़ा हुआ था। 
पुरवाई टीम को महसूस होता है कि अब समय आ गया है कि नेक्रोफ़ीलिया (लाश के साथ बलात्कार) को अपराध की श्रेणी में रखा जाए। ब्रिटेन, न्यूज़ीलैण्ड, कनाडा, अमरीका आदि देशों में इसे अपराध घोषित कर दिया गया है और उसके लिये हर देश ने अलग-अलग सज़ा भी तय की है। ध्यान देने लायक मुद्दा यह है कि पाकिस्तान ने 10 जून 2024 को संसद में एक बिल पेश करके  नेक्रोफ़ीलिया को अपराध घोषित कर दिया है। कानून की धारा 377 के तहत बलात्कार के मामले में ‘महिला’ शब्द के साथ ‘लाश’ शब्द भी जोड़ दिया गया है। 
अंग्रेज़ों ने भारत के लिये 1860 में बलात्कार के बारे में कानून बनाया था। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश उसी कानून को ढो रहे हैं। पाकिस्तान ने इस मामले में भारत से बेहतर संवेदनशीलता दिखाते हुए कानून में संशोधन कर दिया है। अब तमाम भारतीयों एवं भारतवंशियों की निगाह वर्तमान संसद पर लगी है। क्या हमारे सांसद नेक्रोफ़ीलिया की क्रूरता को समझने का प्रयास करेंगे। यह केवल नैतिक वीभत्सता नहीं मानी जानी चाहिये। इसे सामाजिक ढांचे को चरमराने वाला कृत्य घोषित करते हुए जघन्य अपराध घोषित किया जाए और इसके लिये पाँच से सात वर्ष की क़ैद की सज़ा तय की जाए। 
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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78 टिप्पणी

  1. यह जरूरी है कि भारत में भी लाश के साथ बलात्कार को दंडनीय अपराध माना जाए।

    पाकिस्तान में तो एक कदम और आगे बढ़ाते हुए बकरी के साथ किए गए सेक्स को भी बलात्कार मान कर सजा दी जाए, वहां तो अब बकरियां और भेड़ें भी सुरक्षित नहीं हैं।

  2. ये सब डरावना है और बिल्कुल कानून होना चाहिए ,जज वैसे तो हर बात पर कुछ न कुछ बोलते हैं इस पर कन्नी काट गये , शर्मनाक

      • आदरणीय संपादक महोद
        मैं तो इस अपराध को ऐसा अपराध मानती हूं जिसमें प्राण दंड ही दिया जाना चाहिए। यह तो निश्चित नहीं किया जा सकता की 5 या 7 वर्ष बाद बाहर आने पर उस व्यक्ति की यह विकृति स्वत: ठीक हो जाएगी हो सकती है। करावास के दौरान उसमे अन्य विकृतियों और आ जाने की ही संभावना अधिक है।

  3. अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है सर। मैंने कुछ महीनों पहले क्राइम पेट्रोल सीरीज में ऐसी एक घटना पर आधारित एक एपिसोड देखा था। घृणा तो आई पर क्योंकि यह टीवी सीरियल है इसलिए अपराधी को आजीवन कारदंड मिला। आज आपके संपादकीय से यह पता चला कि हमारे देश में इस पर कोई दण्डविधान है नहीं। अपितु, होना चाहिए..। अपराध तो है… जघन्य अपराध है…। या फिर ऐसी मरीजों को समाज से दूर रखा जाए। अथवा, इसके लिए भी कानून व्यवस्था की जाए।

    आपके विचार सदैव पाठकों के मन को एवं चिंतन को नई दिशा प्रदान करे…

    साधुवाद

  4. सर्वप्रथम तो आपको इस संपादकीय के साधुवाद देना चाहिए, इस लिए नहीं कि ऐसे विषय को संपादकीय में शामिल किया (क्योंकि मुझे नहीं लगता कि समाज से जुड़ी किसी भी विसंगति पर बात करने में किसी गंभीर सोशल मंच को संकोच करने की जरूरत है) बल्कि इसलिए कि आपने एक ऐसे कानून की मांग कदम उठाया है, जिसे कई दशक पहले ही कानून में शामिल कर लेना चाहिए था।
    नेफ्रोफिलिया भले ही आज भी जन साधरण के लिए नया शब्द और नई जानकारी है, लेकिन इससे जुड़े अपराध और घटनाएँ विगत समय में भी (विश्व के विभिन्न देशों में ही नहीं, भारत में भी) होते रहे हैं। ये अलग बात है कि अधिकतर घटनाओं में इसे किसी जानवर का कृत्य या तंत्र-मंत्र का हिस्सस मान लिया जाता रहा है।
    बहरहाल आपके द्वारा नेफ्रोफिलिया के केस और इस मानसिक विकृति जुड़ी पूरी जानकारी विस्तार से देना सहज ही संपादकीय को महत्त्वपूर्ण बनाता है और यह जन जागरण का कार्य लोगों को इस दिशा में जागृत करने का काम भी कर रहा है, जिसके लिए आपको हार्दिक बधाई देना भी बनता है।

    • विरेन्द्र भाई आपने संपादकीय को समग्रता में पसंद किया है और सार्थक प्रतिक्रिया दी है। हार्दिक आभार।

  5. इस तरह के घिनौने और वीभत्स अपराध के लिए अवश्य ही कानून बनना चाहिए।
    संपादक बधाई के पात्र हैं जिन्होंने नेफ्रोफिलिया बीमारी पर संपादकीय लिखकर जागृत करने का कदम उठाया।

  6. आ0तेजेन्द्र जी! मैं हैरान हूँ कि इतने जघन्य अपराध के लिये
    कानून मे सज़ा के लिये कोई प्रावधान नहीं है। और नहीं है तो अब तक ऐसे कानून में संशोधन क्यूँ नहीं किया गया। अगर इस को मानसिक विकृति भी माना जाये तो भी दंडनीय है क्यूँकि शव भी स्वीकृति या अस्वीकृति नहीं दे सकता और यदि शव से बलात्कार के लिये हत्या की जाये तो दंडनीय अपने आप हो जाता है। ख़ैर यदि कानून नहीं है तो बनना ही चाहिए। नेक्रोफीलिया जैसी मानसिक विकृति होती है पता था लेकिन इसके लिये दंड का विधान नहीं है नहीं पता था।

    • ज्योत्सना जी, आपने संपादकीय को समग्रता में समर्थन दिया है जो हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक धन्यवाद।

  7. इतना वीभत्स कुछ समाज में होता है यह पढ़कर रोंगटे खड़े हो गए और मन बहुत ही व्यथित हुआ…..ऐसे कुकृत्य के लिए सजा होनी ही चाहिए।

  8. आदरणीय तेजेन्द्र जी!
    बहुत,बहुत,बहुत तकलीफ़ हुई इस संपादकीय को पड़कर। कानून की यह कमजोरी अकल्पनीय और अविश्वसनीय ही लगी!
    क्या लाश के साथ बलात्कार अपराध है? तो हम तो यही कहेंगे कि, “हाँ है!और 101% अपराध है। हर एक तर्क के खिलाफ एक ही बात महत्वपूर्ण है कि मृत्यु के पश्चात् अगर वह लाश है तब भी देह तो है!हर धर्म में मृत्यु के पश्चात् पूर्ण संस्कार के साथ क्रिया-कर्म की व्यवस्था है। हम सभी मृत देह की सम्मान के साथ विदाई करते हैं !ईश्वर की कृपा है कि हिंदू धर्म में देह को अग्नि को सौंप दिया जाता है,किंतु फिर भी चाहे वह किसी भी धर्म का हो, किसी भी जाति का हो, किसी भी वर्ग का हो, और कोई भी इस तरह का घृणित अपराध करता है तो यह जघन्य और अक्षम्य अपराध की श्रेणी में ही माना जाना चाहिये। मुस्लिम धर्म में तो शवयात्रा को ले जाते हुए इतनी सावधानी बरती जाती है कि वह हिले भी नहीं। ऐसे में कब्र से खोदना और बलात्कार का प्रयास करना सबसे अधिक निकृष्ट कर्म है।
    हमें तो नैक्रोफीलिया बीमारी के बारे में ही आपसे पता चला। यह बीमारी वास्तव में खतरनाक है। सरकार को ऐसे रोगियों को पहचान कर उनके लिए कोई व्यवस्था करना आवश्यक है।
    हमें नहीं लगता कि किसी स्त्री को इस तरह की कोई प्रॉब्लम हो सकती है।
    भारत सरकार को ही इस संबंध में जल्द से जल्द कोई कदम उठाना चाहिए या कोई सख्त नियम बनाना चाहिये ,सजा निर्धारित करनी चाहिये ,नियम बनाना चाहिये। और मृत्यु पर्यंत जेल में रखने से अलग कोई सजा होनी ही नहीं चाहिए सीमित अवधि वाली आजीवन कारावास की सजा से कुछ नहीं होने वाला।
    आपके संपादकीय किसी भी एटम बम से कम नहीं हैं सर जी!!!!कितनी अजीब बात है कि ऐसे- ऐसे अपराध हैं!!! ऐसे-ऐसे कुत्सित और निकृष्ट कर्म हैं जिनके बारे में आम जनता को कुछ पता ही नहीं है।
    इतनी बेचैनी है, इतनी सुलबुलाहट है कि समझ में नहीं आ रहा कि क्या कर डालें।
    ऐसा लग रहा है जैसे चौरस्ता पर उल्टा लटका के नीचे से मिर्ची की धुनी दी जाए और फिर जनता के हवाले कर दिया जाए ऐसे अपराधियों को। हम जानते हैं कि भीड़ में दया नहीं होती और ऐसे लोग दया के काबिल भी नहीं होते।
    काश! ऐसा संभव हो सके कि जानी दुश्मन पिक्चर की तरह मृत इंसान की आत्मा जाग्रत हो सके और भूत-पिशाच बनकर उसी पल ऐसे व्यक्ति से अपनी मृत देह की दुर्गति करने का बदला ले सके।
    हम नहीं समझ पा रहे कि इस संपादकीय के लिए आपको क्या कहा जाए? लेकिन एक सबसे वीभत्स, सबसे जहरीली, सबसे कड़वी सच्चाई से रूबरू करवाने के लिए शुक्रिया कहना तो बनता है।
    एक बात आपसे कहना चाहते हैं कि हम कई बार आपके संपादकीय को पढ़कर यह सोचते हैं की कैसे कूप मंडूक जैसी स्थिति है!कम से कम हमारी तो है। कितना कुछ दुनिया में अच्छा और बुरा बगरा पड़ा है और हम उसका एक प्रतिशत भी नहीं जानते।
    इस दुर
    इस संबंध के प्रति तो एक क्रांतिकारी हमला जरूरी है ताकि। नियम भी बन सके और फिर कोई जज ऐसा न कहे कि इस अपराध के लिए कोई दंड नहीं।
    संपादकीय के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार तो बनता है।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपकी टिप्पणी में आपका आक्रोश साफ़ पता चल रहा है। संपादकीय पढ़ने के बाद अधिकांश पाठकों की कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया है। लिखने के बाद अब तक मैं इससे उबर नहीं पाया हूं। आपका हार्दिक धन्यवाद।

  9. चिंतनीय… नेक्रोफिलिया को विक्षिप्तता नहीं अपराध ही कहा जाना चाहिए… पराकाष्ठा कि शव भी असुरक्षित… आपकी क़लम ने निश्चय ही एक विचारणीय विषय पर बात की है… कानून को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए। साधुवाद!

  10. समाज की एक अजीबोग़रीब विकृति की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद। ये मानसिक बीमारी के साथ साथ एक आपराधिक कृत्य भी है। अपराधी इस क़ानून की जानकारी होने पर कुछ अलग ही हथकंडा अपना कर रवैया अपना सकते हैं।
    ये बात सचमुच शोचनीय है कि कामांधता व्यक्ति को कितना निकृष्ट कर सकती है।

  11. मैंने पहली बार इस विषय पर एक कहानी सआदत अली मंटो की लिखी हुई पढ़ी थी ।
    कलकत्ता में डा की हत्या के बाद कुकर्म की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी छपी थी । परंतु मीडिया पर विश्वास कम है । अब यह मुद्दा छत्तीसगढ़ का !
    निंदनीय !!!
    अंग्रेज कानून बना गये । भारत में कुंवारी लड़की के शव को बैल से बियाह कर मांग में सिंदूर आदि लगाकर चिंता पर रखते हैं । क्योंकि आत्मा तेरह दिन तक आसपास भटकती है । तांत्रिक शव साधना करते हैं सुना था । इसलिए अंग्रेजों ने अधिक ध्यान नहीं दिया क्योंकि शव बचता ही नहीं ।पर अब स्थिति विकट है ।
    अवश्य कानून ,और वह भी सख्त से सख्त बनना चाहिये ।
    आजकल भारत में हर बुराई फैशन में अपनाई जा रही है । इसलिए भी शीघ्र क्रियान्वयन होना अत्यावश्यक है ।।

    • जी शायद आप मंटो की कहानी ठण्डा गोश्त की बात कर रही है। आपसे सहमत कि इस जघन्य कांड को अपराध घोषित किया जाए और सज़ा भी सख़्त रखी जाए।

  12. तेजेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादतीय के विषय को पहली बार सआदत हसन मंटो की कहानी ‘ठण्डा गोश्त’ में पढ़ा था जहाँ ईशवरसिंह कुलवन्त कौर को डूबती हुई आवाज़ में उसके प्रश्न ‘मैं पूछती हूँ, वह है कौन” का जवाब देता है। इस कहानी ने मंटो को तो बहुत मशहूर बना दिया था लेकिन कहानी तो फिर कहानी ही है। मृतक से बलातकार का यह दुशकर्म और इस सम्पादकीय का यह विषय बहुत ही गंभीर है। वैसे आज के ज़माने में यौन सम्बन्धों में भी बहुत छूट आगई है। जहाँ तक कानून की बात आती है, मैं इस बात से पूरणत्या सहमत हूँ कि ऐसी घिनोनी हरकत करने वाले को कड़ी सज़ा देना कानून में होना चाहिए।
    आपके इस सम्पादकीय की पहली टिप्पनी में भेड़ बकरीयों का भी ज़िकर किया है। इंसानी दिमाग़ कभी कभी शैतान का दिमाग़ हो जाता है। कुस किस पर और कहाँ कहाँ तक रोक लगाओगे। मेरे विचार में देश के कानून में सुधार के साथ साथ इस विषय पर रिसर्च होनी चाहिए कि ऐसे लोगों की मानसिक स्थिती क्यों होती है। हो सकता है इसका भी उत्तर मिल जाए।

    • विजय भाई हमारे पड़ोसी मुल्क में बकरियों के साथ दुष्कर्म की भी ख़बरें पढ़़ने को मिली थीं। सच्चाई पता करने का कोई ज़रिया मेरे पास फ़िलहाल नहीं है… बस सुनी सुनाई बातें अवश्य हैं। मंटो की कहानी एक क्लासिक कहानी है और उसी के अंदाज़ में बहुत खुल कर लिखी भी गई है। हम सब इस बात पर एकमत हैं कि इस घिनौने कृत्य को अपराध घोषित किया जाए और साथ ही कड़ी सज़ा मुक़र्रर की जाए।

  13. हैरान परेशान हूँ कि भारत में इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। अब क्या ही कहा जाए, बलात्कार तो बलात्कार ही है फिर यह पहले किया जाए या बाद में। इस विषय से ना केवल उत्पीड़न जुड़ा है अपितु किसी का अपमान व अनादर भी सम्मिलित है। जीवित अवस्था में ये उत्पीड़न तो मृत्यु के बाद इसे कम से कम अनादर की श्रेणी में तो रखा जा सकता है। हिन्दू मान्यताओं में तो इसे घोर अपमान व पाप माना गया है। इस विषय पर सम्पादकीय के लिए साधुवाद।

    • अनीता जी इस अपराध के लिये कानून की धारा 1860 में अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई थी। ज़़ाहिर है कि उन दिनों लाश के साथ दुष्कर्म जैसे कृत्य नहीं होते होंगे। मगर समय के साथ-साथ इन्सान का दिमाग़ी फ़ितूर भी बढ़ा है… ज़ाहिर है कि सरकार को कुछ कठोर कदम उठाने होंगे।

  14. नेक्रोफिलिया एक मनोरोग नहीं बल्कि एक प्रवृति है , भारत के इतिहास में जोहर प्रथा आपने पढ़ी है, प्रथम जोहर रानी पद्मिनी ने किया था 12000 नारियों के साथ। वे सब वीर नारियां थी युद्ध में सक्षम थी पर तु उन्होंने युद्ध न कर अग्नि स्नान स्वीकार किया क्योंकि वे जानती थी खिलजी की अथाह सेना के सामने वे नहीं टिकेंगी और यह कौम उनके शव को भी नहीं छोड़ेगी उसकी भी दुर्गति करेगी इसी लिए उन सब ने अग्नि स्नान कर जोहर किया , यही कारण बाकी के जोहारों में रहा क्योंकि उस कौम में नेक्रोफिलिया की प्रवृति थी।

    • सर, इस ऐतिहासिक तथ्य को उजागर करके आपने जोहर प्रथा की पीछे छुपे उस घिनौने सत्य की जानकारी दी है, जिससे हम अवगत नहीं थे ।
      बहुत धन्यवाद

    • आपकी इस बात के लिखित साक्ष्य भले ही इतिहास में न हो, लेकिन उस दौर के इतिहास को गहराई से देखा जाए तो इस बात के सच होने में संदेह की गुंजाइश कम ही रह जाती है।

      • बहुत ही रोचक प्रासंगिक और दिल दहलाने वाला लेख। पर सत्यता से पूर्ण। मामला केवल कानून का नहीं बल्कि आस्था या भावनाओं का भी होना चाहिए। हरेक व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म का हो वह अपने मृत व्यक्ति की देह के साथ ऐसा कृत्य स्वीकार नहीं करेगा। मृत देह का सम्मान करना भी सभी धर्मों में सिखाया गया है बल्कि यह मानवता भी है। इसलिए इसे भी भयंकर अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इस्लाम में आप्रकृतिक सेक्स की सख्त मनाही है इसे कुरान में निषेध बताया गया। मेरे विचार से इसके लिए भी कठोर क़ानून होने चाहिए सर।

    • सर, आपकी बात ऐतिहासिक तथ्यों की ओर इशारा करती है जो कि सच्ची घटनाएं हैं। आपका ज्ञान इस विषय में वैसे भी ख़ासा गहरा है।

  15. ऐसे अपराध सुने गए हैं, यह वाकई एक गंभीर बीमारी है। प्रकृति क्या क्या बीमारियां बनाकर मनुष्य को दोषी ठहराती है। विश्वास नहीं होता।
    आपको धन्यवाद इस विषय पर सम्पदकीय लिखने लिखने के लिए।

    • निर्देश निधि जी प्रयास रहता है कि समाज से जुड़े तमाम अनछुए विषयों पर पुरवाई पत्रिका कलम उठाए। यही इस बार भी किया है। आपका हार्दिक धन्यवाद।

  16. पुरवाई पत्रिका के संपादकीय समीचीन और ज्वलंत विषयों के साथ साथ उन विषयों पर भी प्रकाश डाल कर अपने पाठकों को ऐसे मुद्दों पर सचेत और संवेदनशील करते हैं,जिनकी कल्पना आम जन के सोच से भी बाहर है।इस का कारण सियासत और मीडिया
    दोनों ही हैं।
    इस बार का संपादकीय नेक्रोफिलिया पर केंद्रित है जो मनोविकार की वीभत्स पराकाष्ठा है।विदेश और पास पड़ोस के देश इस पर कानून बना चुके हैं पर अभी हमारे यहां इस पर कभी चर्चा भी नहीं हुई।हां ,इंटरनेट के पॉल्यूशन या ,,,,र्न पर भी दबे शब्दों में कभी कहा गया तो कहा गया।इस नेक्रोफिलिया को बलात्कार से संबंध अपराध की श्रेणी में अवश्य रखा गया है।
    हमारा देश आज भी झोलाछाप बाबाओं तांत्रिकों और तथाकथित बाबाओं और धर्मगुरुओं के चंगुल से कभी छुटा ही नहीं।वरना आए दिन अखबार पत्रिका और शहरों की दीवारों पर ,,,,,,,बाबा,,,,,जी प्रेम विवाह ,वशीकरण,,,किया कराया,,, जादू टोना जैसे विज्ञापनों से अटे पटे रहते हैं।
    और जब ऐसी अवैज्ञानिक और चमत्कार या लालची मानसिकता के नागरिक होंगे तो नेक्रोफिलिया पर कोई क्या कैसे और कब सोचेगा।हां कुछ बुद्धिजीवी,प्रतिक्रियात्मक पाठक अपने उद्गार
    हैं,,,हैरान हूँ परेशान हूँ ,,,सरकार कुछ करती क्यों नहीं,,,,पढ़ने और सुनने को मिल सकती है।
    वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सक्रिय पठनीयता जैसी जादुई चिड़िया जब तक हमारे जन मानस में धार्मिक ग्रंथों ,परंपरा,संस्कृति ,संस्कार की मानिंद हमारे मन और मस्तिष्क पर शासन नहीं करेंगी तब तक स्वार्थपरता और कुत्सित राजनीति, यहां पर सब चलता है,के रूप में
    विद्यमान रहेंगी।
    काश पुरवाई पत्रिका के ऐसे संपादकीय की पठनीयता हमारे देश के अधेड़ और वृद्ध समाज में या तो लोकप्रिय होती या अनिवार्य।
    बधाई हो।

    • भाई सूर्य कांत शर्मा जी आपने एकदम सही कहा है कि नेक्रोफ़ीलिया को बलात्कार से संबंध अपराध की श्रेणी में अवश्य रखा जाए। इस विस्तृत टिप्पणी के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद।

  17. नेक्रोफ़ीलिया को यदि मेंटल डिसऑर्डर मानेंगे तो कानून इस अपराध के प्रति नरम होगा ही। हर अपराध के पीछे परिस्थितियो से जनित मानसिक द्वंद होते ही है तभी एक सामान्य दिखने वाला व्यक्ति खतरनाक अपराध को अंजाम देता हैं तो क्या उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए उसे दंडित नहीं किया जाना चाहिए ?
    सनातन धर्म में मृत्यु के उपरांत शरीर को बहुत ही सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है। यानी मृत शरीर की एक गरिमा होती हैं। वैसे भी जीवित रहने पर भी बलात्कार तो शरीर का ही होता हैं। आत्मा तो केवल शरीर की दुर्दशा पर आहत ही होती है। और मी लार्ड को आत्मा की गवाही चाहिए ही नहीं।
    तो जीवित अवस्था में भी शरीर का बलात्कार होता है और अब अपराधियों ने मृत्यु के बाद भी शरीर का बलात्कार किया है तो बलात्कार का केस तो बनता है…. साहेब।

    • संगीता जी आपने संपादकीय पर एक सटीक कोण उठाते हुए टिप्पणी की है। हमारी बात सरकार के कानों तक पहुंचनी चाहिये।

  18. मेरे विचार से इस वीभत्स प्रवृत्ति के लोगों को सजा के साथ मानसिक इलाज भी देना चाहिए क्योंकि खुला छोड़ देना समाज के लिए घातक है।
    लाश क्या? जीवित महिला के साथ बलात्कार करने वालों का भी समुचित इलाज होना चाहिए। उन्हें जमानत भी नहीं मिलनी चाहिए।

  19. आज का संपादकीय एक ऐसे विषय को उजागर करता है, जिसपर आमतौर पर चर्चा नहीं होती है । अधिकांश लोग इसके बारे में अधिक जानकारी भी नहीं रखते हैं और ना ही ये उनके सरोकारों में कहीं है । आंखें खोल देने वाला संपादकीय है यह। स्तब्ध रह गए जानकर कि हाईकोर्ट के लिए यह गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आता है । जबकि हमारी संस्कृति में हम लाश को भी “पार्थिव शरीर” पुकारते हैं । मृत्युपरांत विविध संस्कारों के माध्यम से मृतक के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान अर्पित करते हैं।
    हमारी समझ में नेफ्रोफीलिया को अपराध तो निश्चित ही घोषित करना चाहिए । लाश को भी सम्मान मिलना चाहिए।उसका मानहरण घिनौना आपराधिक कृत्य है ।
    बल्कि अपराधी को सज़ा के साथ साथ इलाज भी दिया जाये,ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
    न्याय की मूर्ति बने न्यायाधीशों को ज्ञान के साथ अपनी चेतना जागृत करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है।
    आज के विषय मूलक संपादकीय के लिए साधुवाद सर!

    • रचना आपका कहना है कि, “हमारी समझ में नेफ्रोफीलिया को अपराध तो निश्चित ही घोषित करना चाहिए । लाश को भी सम्मान मिलना चाहिए।उसका मानहरण घिनौना आपराधिक कृत्य है।” पुरवाई संपादक मंडल आपके साथ सहमत है।

  20. गैर-कानूनी इसलिए घोषित नहीं किया जा सकता क्योंकि विधि और संविधान निर्माताओं का ध्यान इस दिशा में नहीं गया होगा। बलात्कार के बाद हत्या करने की घटनाएँ तो आम हैं; किन्तु, शव के साथ व्याभिचार तो अकल्पनीय है। हां, इसे बलात्कार की संज्ञा नहीं देनी चाहिए क्योंकि शव इस ‘अत्कार’ के लिए प्रतिरोध नहीं कर सकता और संबंध बनाने से पहले जिस बल (जबरदस्ती) का प्रयोग अपराधी करता है, उसका भी प्रयोग वह इस कुकृत्य में नहीं करता है। इसलिए यह बलात्कार नहीं है। मैं समझता हूं कि यह व्याभिचार भी नहीं है क्योंकि व्याभिचार में दोनों की रज़ामंदी होती है। लेकिन शव से रज़ामंदी लेना तो संभव ही नहीं है; इसलिए हिन्दी में इसके लिए कोई शब्द तलाशना होगा या बनाना होगा।
    बहरहाल यह अनैतिक और अमानवीय कृत्य है तथा ऐसे कुकृत्य के लिए सज़ा निर्धारित की जा सकती है। न्यायाधीश किताबी कीड़े हैं, उन्हें वही करना होता है जो कानून की किताब में लिखा है। उन्हें बताना होगा कि इस अमानवीय कृत्य के लिए क्या मृत्युदंड से कम सज़ा हो सकती है।

    आलेख बहुत बढ़िया है। आप ऐसे विषयों पर चर्चा करते हैं जो अछूते हैं।
    बधाई!

    • मनोज भाई आपने बात तो बहुत अच्छी कही है। मगर अमानवीय कृत्य के लिये कानून में कोई सज़ा नहीं है। अपराध के लिये है। इसे पहल अपराध की श्रेणी में रखना होगा, तभी सज़ा तय हो पाएगी।

  21. आज का संपादकीय एक मनोविकार पर आधारित है। शव के साथ सेक्स की मनोविकृत। इस तरह की मनोवृत्ति वाले वीडियो पाकिस्तानी यूट्यूबर का देखा था। हत्या करके इस तरह का कृत्य संपादकीय में पढ़ा है। यह मनोवृत्ति मानवता के लिए कलंक है। इसे जघन्य अपराध की श्रेणी में रखना चाहिए।
    भारत की बात करें तो यहां शव जलाए जाते हैं और नष्ट हुए शवों के साथ ऐसी घटनाएं नामुमकिन है। इसलिए इस तरह के कानूनों की आवश्यकता यहां नहीं लागू की गई है।
    चूंकि भारत विविधताओं से भरा देश है तो इस पर कानून बनना चाहिए। हत्या करके उसे शव बनाकर घिनौना कृत्य करना ,इसे जघन्य अपराध की श्रेणी में रखने की आवश्यकता है।
    संपादकीय का यह विषय वीभत्स है। पर इसे यूं ही तो नहीं छोड़ा जा सकता है। इस पर आवाज उठानी पड़ेगी। तेजेन्द्र सर ने संपादकीय के माध्यम से उठाकर ठीक किया है। ऐसे विषयों से संपादक को जूझना ही चाहिए। आपको इसके लिए बहुत बहुत बधाई

    • भाई लखनलाल पाल जी आपसे सहमत हैं कि – इसे जघन्य अपराध की श्रेणी में रखना चाहिए। आपको संपादकीय पसंद आया, हार्दिक धन्यवाद।

  22. संपादक श्री
    नमस्कार
    जैसे जैसे पढ़ती गई लगा जैसे शरीर से जान निचुड़ती जा रही है। कई बार ऐसे केसेज़ के बारे में सुना लेकिन इस संपादकीय को पढ़कर तो जैसे शरीर आत्मा विहीन हो गया।
    यह केवल एक मानसिक बीमारी नहीं, निकृष्टतम अपराध है। मुझे तो इसका नाम भी आपके संपादकीय के द्वारा पता चला।
    यदि इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो यह भी अन्य अपराधों की भाँति एक आम अपराध हो जाएगा। सबकी टिप्पणियों से और भी बहुत सी जानकारी मिलीं। मन द्रवित, दुखित है। कैसे समाज का हिस्सा हैं हम?वैसे ही लगता है दुनिया रहने योग्य रह नहीं गई है।
    आप सदा बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात करते हैं। आज सुबह इसको पढ़ पाई हूँ और मुझे नहीं लगता आसानी से सहज हो सकूंगी।
    बेहद जघन्य अपराध है और साथ ही यदि इसे मानसिक रोग माना जाए तो मैं इस बात से पूर्णता सहमत हूँ कि इसके निदान की ज़िम्मेदारी भी सरकारी को लेनी चाहिए लेकिन इसे अपराध न समझना बहुत बड़ा अपराध है। इसके लिए कड़े से कड़े कदम उठाए जाने चाहिएं।
    यह मानवीय संवेदनाओं पर कुटिल प्रहार है। उपरोक्त सत्य व तथ्यों को जानकर बहुत पीड़ित महसूस कर रही
    हूँ।कहानियों के द्वारा बात दूर तक नहीं पहुंचा जा सकता। वह केवल काल्पनिक कहानी तक सीमित रह जाती है। संपादकीय की आवाज़ बहुत मुखर होती है और सार्थक टिप्पणियों के साथ और भी सशक्त हो जाती है और इसे बहरे बंद दरवाज़ों तक पहुंचना ही होगा । आप बहुत सजग, समर्थ साहित्यकार हैं, आपके संपादकीय को सरकारी कानों तक पहुंचना ज़रूरी है।
    चिंतनशील सशक्त संपादकीय के लिए आपको बधाई व प्रणाम।

    • आदरणीय डॉ. प्रणव भारती जी, आपकी चिन्ता से पूरा पुरवाई संपादक मंडल सहमत है। कड़े से कड़े कदम उठाना अति आवश्यक है।

  23. मानसिक विकृतियाँ दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं और खासतौर पर दुष्कर्म को लेकर, न आयु और न रिश्ता कोई की सीमा अब बची नहीं है और ये प्रवृत्ति अब बढ़ती ही जा रही है।
    हमारे हाथ कानून से क्यों बँधे हैं? जबकि नित नयी मनोविकृतियाँ सामने आ रहीं हैं। एक भी केस सामने आने के बाद ही न्याय और दंड संहिता में अपराध की प्रकृति के अनुसार संशोधन हो जाना चाहिए। और हम हैं कि पुनरावृत्ति का इंतजार करते रहते हैं। ये अपराध भी रेयरेस्ट ऑफ रेयर की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
    एक स्वस्थ समाज में इस तरह की प्रवृत्तियों को आपराधिक कृत्य माना जाना चाहिये। पुरवाई का मंच हमेशा से विचारणीय मुद्दों को उठखकर सोचने पर मजबूर करता है ंर ये सामाजिक मूल्यों के प्रति सजगता है।

    • रेखा जी, न्यायाधीषों की समस्या यह है कि वे कानून के दायरे से बाहर कुछ भी नहीं कर सकते। भारत की संसद को नया कानून बनाना होगा जैसा कि पाकिस्तान की संसद ने 10 जून 2024 को किया है। उसके बाद न्यायालय आसानी से सज़ा दे पाएंगे।

  24. कई बार ऐसी खबरें सुनने में आई है । कितना वीभस्त कांड है।
    संपादकीय से और भी सारे तथ्य सामने आए।
    अपने नए नए विषय को खोजते हैं।
    यह आपकी दूरदर्शिता है संपादकीय बहुत ही अच्छा लगता है।
    बधाई

    • प्रमिला जी, आपकी संपादकीय के समर्थन में लिखी टिप्पणी हमारे लिये महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

  25. बहुत ही डरावना है यह सब। मैंने नेक्रोफीलिया के बारे में पहले भी कहीं पढ़ा है पर आपके संपादकीय से डीटेल में जानकारी मिली। ऐसे विक्षिप्त लोग तो अगर समाज में निर्विघ्न घूमते रहे और सजा का प्रावधान नहीं रहेगा तो सोचने की बात है जब कब्र में से लाशें निकाल सकते हैं तो ये क्या कुछ नहीं कर सकते हैं। ऐसे बीमारों के लिए तो उम्र कैद होनी चाहिए।

    • प्रिय सुधा, हमारा प्रयास रहता है कि जो भी विषय हम उठाएं, अपने पाठकों को कम-से-कम उसकी बेसिक जानकारी अवश्य उपलब्ध करवाएं। इस कृत्य को अपराध की श्रेणी में रख कर सज़ा अवश्य तय करनी चाहिये।

  26. अत्यंत घिनौना कृत्य। मैंने भी खबर पढ़ी थी कि पाकिस्तान ने 10 जून 2024 को संसद में एक बिल पेश करके नेक्रोफ़ीलिया को अपराध घोषित कर दिया है। कैसे नराधम और यौन विकृति वाले पिशाच हैं ये।

    भारत में यह संशोधन अवश्य होना चाहिए क्योंकि एक पाकिस्तान यहां भी है।

  27. आपका इस बार का संपादकीय पढ़कर सिहर उठा। वास्तव में दुनिया में मनुष्य के भेष में नर पिशाच भी घूम रहे हैं, जिनके लिए सेक्स करने हेतु जीवित मृत में भी कोई अंतर नहीं है, बल्कि इन्हें मृतक के साथ ऐसा करने में विशेष आनंद मिलता है। दुर्भाग्य की बात है कि भारत में इस संबंध में कोई कानून न होने के कारण दोषी दरिंदा छूट गया, जबकि यह नृशंसता तो जीवित से भी अधिक निंदनीय है क्योंकि जो इस दुनिया से चला गया, उसके शरीर की दुर्दशा करना बेहद घृणित कार्य है। मुझे लगता है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वप्न में भी ऐसी दरिंदगी के विषय में नहीं सोचा होगा। लेकिन हमारे सनातन धर्म में संस्कारों का निर्धारण करने वाले अपेक्षाकृत अधिक दूरदर्शी रहे होंगे, तभी उन्होंने हमारे धर्म में दाह संस्कार का प्रावधान किया, ताकि देह के सभी पंच तत्व यथास्थान पहुंच जाएं तथा पार्थिव शरीर की भी दुर्दशा न हो सके, लेकिन अब्राहमिक पंथों में ऐसा नहीं है और उन्हें मिट्टी में दफनाने की प्रक्रिया है और वहां आसानी से मृत देह के साथ क्रूर यौनाचार किया जा सकता है।
    इसलिए अब समय आ गया है कि भारत सरकार को भी ऐसी वहशी लोगों के लिए कठोरतम नियम यहां तक कि आजीवन कारावास अथवा फांसी के कानून बनाने चाहिए ताकि इन अपराधों पर लगाम लग सके। आँखें खोल देने वाला संपादकीय लिखने हेतु आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं।

    • पुनीत भाई, सच तो यह कि संपादकीय लिखने के बाद मैं स्वयं इससे अभी तक उबर नहीं पाया हूं। आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि – इसलिए अब समय आ गया है कि भारत सरकार को भी ऐसी वहशी लोगों के लिए कठोरतम नियम बनाए। तभी हम अपराधियों को सज़ा दे पाएंगे।

  28. संपादकीय के रूप में बहुत ही डरावना तथ्य आपने उजागर किया है। क्या हम नरपिशाचों के साथ रह रहे हैं? निश्चित रूप से इस दिशा में प्रयास होना चाहिए। किसी के भी मृत शरीर के साथ दुरव्यवहार करने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। मन को झकझोड़ता हुआ संपादकीय।

    • नीलम जी आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिये पुरवाई संपादक मंडल की ओर से हार्दिक धन्यवाद।

  29. हमेशा की तरह एक और ज्वलंत विषय पर आपका संपादकीय लेख : विषय अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय ही नहीं कहीं झकझोर कर रख देने वाला भी है l लाश के साथ बलात्कार, जिसे कानूनी रूप से नेक्रोफिलिया कहा जाता है, मानवता के मूलभूत आदर्शों और नैतिकता का घोर उल्लंघन है। यह न केवल मृत व्यक्ति के प्रति घोर अनादर है, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना के लिए भी एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
    भारत जैसे देश में, जहां मृत्यु के बाद भी व्यक्ति के शरीर को पवित्र और आदरनीय माना जाता है, वहां ऐसी घटना असहनीय है। हमारी संस्कृति में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को आत्मा की शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसी स्थिति में, लाश के साथ कोई भी आपत्तिजनक कृत्य समाज के उन मूल्यों

    का उपहास है जो हमें मानवीय बनाते हैं।
    लाश के साथ बलात्कार केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारी मानवता पर कलंक है। यह हमारे समाज की नैतिकता और संवेदनशीलता की परीक्षा है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मृत शरीर को भी वही सम्मान मिले जो हम जीवित व्यक्तियों को देते हैं। इस विषय पर कठोर कानून और जागरूकता के माध्यम से ही हम एक सभ्य समाज की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।

    • सुनीता जी, आपका आक्रोश आपकी टिप्पणी में महसूस किया जा सकता है। भारत सरकार को संज्ञान लेना ही होगा।

  30. महिलाएं और लड़कियां कभी भी पुरुष हिंसा से सुरक्षित नहीं हैं, यहां तक कि मृत्यु में भी। कम उम्र के यौन संबंधों के चित्रण से लेकर नेक्रोफिलिया के चित्रण तक आईपीसी के तहत, धारा 297 कब्रों या दफन स्थानों के अपमान या अतिचार को अपराध घोषित करके नेक्रोफिलियाक कृत्यों को शामिल करने के सबसे करीब आती है। निश्चित रूप से कानूनी सुधार की भी आवश्यकता है ताकि नेक्रोफिलिया की सजा जीवित लोगों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए सजा के साथ अधिक निकटता से संरेखित हो। मृतक सहमति नहीं दे सकते, और इस संदर्भ में उनकी भेद्यता उनकी लाश के उल्लंघन से कहीं आगे तक फैली हुई है; यह उनके परिवारों और दोस्तों का भी उल्लंघन करता है, शोक मनाने की प्रक्रिया को बाधित करता है और मृत्यु से जुड़े हमारे व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों, स्वास्थ्य देखभाल और शवगृह सेवाओं में विश्वास और जीवन और मृत्यु दोनों में न्याय की हमारी अपेक्षाओं को सूचित करता है। नेक्रोफिलिया पीड़ितों और समाज को इस हद तक नुकसान पहुंचाता है कि इसके लिए लंबी सजा की मांग की जानी चाहिए। मृतक सहमति नहीं दे सकते, और इस संदर्भ में उनकी भेद्यता उनकी लाश के उल्लंघन से कहीं आगे तक फैली हुई है। एक और सामाजिक मुद्दे को सामने लाने के लिए हार्दिक धन्यवाद।

    • जयंत भाई आपने तो कानून की धारा भी ढूंढ निकाली। आपने संपादकीय पढ़ने के बाद शोध भी कर डाला। भारत सरकार को तुरंत कदम उठाने होंगे।

  31. महत्वपूर्ण आलेख है सर। यह वास्तव में घृणित अपराध है और इस पर कड़े दण्ड का विधान अवश्य होना चाहिए।

  32. इस मसले से परिचित थी अख़बारों के ज़रिए लेकिन आपने इस मुद्दे पर भारतीय क़ानून के संशोधन की माँग कर न्याय के लिए आवाज़ उठाई है। क्या विडंबना है, अब स्त्री मुर्दा होकर भी सुरक्षित नहीं है। अतः समय- समय पर सरकारों द्वारा व्यक्ति का मानसिक परीक्षण और उपचार भी कराते रहने की आवश्यकता है।

  33. आज आदरणीय तेजेंद्र सर की संपादकीय शव के साथ शारीरिक संबंध बनाना ,नेक्रोफिलिया कहा जाता हे , इसे न्यायालय ने, जघन्य दंडनीय अपराध नहीं माना है, इसी का एक उदाहरण9 वर्षीय की बच्ची की हत्या व बलात्कार के मामले में जब सजा हुई तो हत्या के साथ बलात्कार करने वाले को उम्र कैद और शव के साथ बलात्कार करने वाले को 7 वर्ष की सजा मात्र,,,
    सजा देने वाले की सोच भी सोचनीय, क्योंकि दूसरा व्यक्ति भी मनोरोगी तो नहीं था ? सजा कम क्यों ?

    कामुकता हर स्त्री पुरुष में पाई जाती है मगर कुछ संस्कार वश कुछ मानवीय सरोकारों से,नैतिकता से संयमित जीवन जीते हैं।
    आखिर कार नेक्रोफिलिया की उत्पत्ति कैसे होती हे ,

    जो दूसरे व्यक्ति ने मृत बालिका के साथ अनाचार किया ,तो उसे सेक्स का आनंद तो। मिला ,ओर कोई प्रतिरोध भी नहीं हुआ ,
    यहां या तो, इस दूसरे व्यक्ति को बाद में ही सही अगर अपराध बोध हो जाता हे तो
    वह शर्म से डर से ,अपने भयानक कृत्य से , कालांतर में अर्ध विक्षिप्त हो सकता हे , या वह जीवन में उस कर्म को नहीं दोहराना चाहेगा,अथवा वही क्रूरता पूर्वक वही सिचुएशन तलाश करता है,जो ,नेक्रोफिलिया की तरफ उसका बढ़ता कदम हो सकता हे ,

    इन जघन्य अपराधों में
    कामांधता में जब नशा (शराब ड्रग्स )शामिल हो जाता हे तो अपराध की दोगुनी प्रवृत्ति हो जाती हे तीसरी बात कामांधता ,नशा,ओर अश्लील वीडियो फिल्में जिन पर कोई रोक टॉक नहीं हे आसानी से मोबाइल पर उपलब्ध होती हैं ,यह भी साथ मिल जाए,
    तब बलात्कार जेसे जघन्य
    अपराधों की सीमा हर सीमा लांघ सकती हे ,चाहे मृत शरीर ही क्यों न हो,
    हम पूर्व में कई ऐसे जघन्य अपराध को चाहे युवती हो,डॉक्टर,हो निर्भया जैसी स्थिति में हो ,या छोटी बालिकाएं हो , जब मृत के साथ व्यभिचार पर 7 साल की सजा ? सोचो जीवित के साथ कितना तड़पी होगी कैसे जान गई होगी उन पीड़ित बालिकाओं स्त्रियों की ,
    तुरंत न्याय भी कहां मिलता हे
    कल ही पेपर में पढ़ा एक स्त्री के साथ उसका पति ससुर और देवर एक साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं वह शर्म के मारे किसी को बता भी नहीं पाती और 12 साल की बेटी को छोड़कर मर जाती है,विडंबना देखिए की वे तीन पुरुष जो 12 साल की मासूम बच्ची के पिता, चाचा और दादा है स्त्री की मृत्यु के बाद बे भी उस बच्ची से व्यभिचार करते हैं और वह दो माह की गर्भवती बन जाती है तब उसकी मौसी का ध्यान जाता है तो वह लड़की रो-रो कर उसे बताती है वह पुलिस में रिपोर्ट करती है। पेपर में तीनों का नाम नहीं दिया गया ,तीनों का कोई फोटो भी नहीं है,यह पाशविकता ,,,,,देखकर कलेजा फटता हे मित्रों
    क्या न्यायपालिका कोई ठोस कदम जो कारगर हो ,क्यों नहीं उठाती,
    क्यों शराब ,और मीडिया पर फैली ये अश्लील साइड्स पर कड़ा प्रति बंध नहीं लगाती
    क्यों न्याय की गति धीमी हे
    नेक्रोफिलिया की अभी शुरुआत हे ,कहते जब आंख का पानी मर जाता हे तो जहां एक खून वहां दस खून की वही सजा ,
    नाबालिग छूट जाते हैं भले वो अपराध के दूसरे दिन बालिग हो रहे हों
    एक ही दिन बाद,,,,,,
    सरकार को,समाज विज्ञानियों को कोई रास्ता ढूंढना होगा वरना यह बीमारी भी समाज में घुन की तरह लग जाएगी
    आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर नए विषय पर समाज को सतर्क करता हुआ आपका संपादकीय पठनीय है ।आपको साधुवाद
    कुन्ती

    • कुंती जी आपने संपादकीय को पूरी तरह से मथने के बाद एक लंबी इमोशनल टिप्पणी लिखी है। आपकी टिप्पणी पढ़ने के बाद भारतीय सांसदों को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।

  34. आदरणीय तेजेंद्र जी! सबसे पहले तो इस ज्ञानवर्द्धक संपादकीय के लिए साधुवाद!
    लाश के साथ यौन शोषण— उस विकृति तक सोच पाना ही कठिन होता है। सज़ा का हक़दार तो अपराधी होगा ही, होना चाहिए, किंतु जब इसे मानसिक बीमारी के रूप में जाना-समझा गया है तो ऐसे मनोरोगियों को ऐसे घृणित अपराध से रोकने के अन्य उपाय भी कुछ हों तो कृपया अवश्य बताएँ। क्योंकि इससे दोपाए जानवरों की संख्या बढ़ेगी ही। भारत को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए। जब इस तरह के अपराध देखे-सुने नहीं गए थे, तब उसके लिए पहले से नियम बनने का सवाल नहीं उठता, अब तो यह समय और वैश्विक समाज की माँग के रूप में देखे जाने योग्य है कि क़ानून बने।

  35. एक अभूतपूर्व विषय पर वितृष्णा से भरा हुआ भयानक सा ऐहसास हो रहा है। आपकी पकड़ सामाजिक विसंगतियों व मानवीय सरोकार पर बहुत गहराई तक विश्लेषण करती है। कुछ लोगों की पैशाचिक प्रवृत्ति हमारी कल्पना से भी परे की बात है। बात क्या, ये तो बड़ी पेचीदा समस्या है। इसको क़ानून में अपराध ही नहीं माना जा रहा है, यह भी विकट स्थिति है।
    भारतीय क़ानून में नेक्रोफ़ीलिया को तुरन्त दुर्दांत अपराध घोषित किया जाना चाहिए। और हाँ, ढसम्पादकीय के अन्त में इसके लिए जो पाँच या सात वर्ष की सज़ा की बात कही गई है, वह उम्र क़ैद होनी चाहिए। वर्ना अपराधी पाँच वर्ष बाद जेल से बाहर निकल कर फिर से वही अपराध करने लगेगा।
    क़ानून में संशोधन विषयक ये विषय आपने बहुत ही ज़रूरी उठाया है। एतदर्थ हार्दिक साधुवाद।

  36. आदरणीय फिर से एक नये व अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर पाठकों, बुद्धिजीवियों का आपने अपने संपादकीय में ध्यान आकर्षित किया है। मुझे यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि 1816 में अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में ब्लात्कार के लिए सजा का नियम बनाया । आज इतने सालों बाद भी भारत में इस क़ानून में कोई नयापन नहीं आया । दूसरी बात आपने कही नेक्रोफ़िलिया वैसे तो विज्ञान के अनुसार यह एक मानसिक बीमारी है । किंतु इसमें भी यह देखने की बात है कि इस मानसिक बिमारी के साथ उस व्यक्ति के में कितने और विकार है ? भारत में वर्तमान समय में नारी चाहे वह बच्ची हो या प्रौढ़ महीन कोई भी सुरक्षित नहीं है। नीदरलैंड में भी इस तरह की कई घटनाएँ हुईं जिसे देखते हुए जनवरी 2023 से इस कृत्य को सज़ा युक्त माना गया है । नीदरलैंड के क़ानून के अनुसार क्योंकि यह कृत्य केवल मृत शरीर के साथ किया गया है इसलिए कोई कढ़ी सजा का प्रावधान नहीं है । किन्तु ऐसा करने से मृतक शरीर के परिजनों को मानसिक पीड़ा पहुँचती है उसके लिए कढ़ी सजा सुनाई जा सकती है । तथा मानसिक रोगी को जेल में रह कर इसका उपचार करवाना अनिवार्य है । भारत में आज ब्लात्कारियों को ही सजा मिलने में पूरी एक उम्र चली जाती है। तो इस कृत्य के लिए कानून बनने में भी बहुत समय लगेगा । पर यदि यह कानून बनाता है और बनना भी चाहिए तो हमें बहुत प्रसन्नता होगी ।
    एक बार फिर से महत्वपूर्ण विषय को समाज व पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत आभार

  37. आपने अपने संपादकीय में नेक्रोफ़ीलिया मनोविकार की तरफ पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हुए इस विकार से पीड़ित व्यक्तियों द्वारा किये कृत्य तथा कोर्ट के फैसले की तरफ ध्यान आकर्षित किया है। मुझे तो हैरानी जजों के फैसले पर हो रही है जिन्होंने यह कहते हुए अपराधी को बरी कर दिया कि इस अपराध के लिए हमारी न्याय संहिता (भारतीय दंड संहिता) में सजा का प्रावधान नहीं है। शायद इसीलिए क़ानून को अंधा कहा जाता है किन्तु अब तो न्याय की देवी की आँखों से काली पट्टी हट गई है। जजों को अब विवेक से काम लेना चाहिए आखिर शव का भी सम्मान होता है। इस बीभत्स कृत्य के लिए किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए छोड़ना उचित नहीं है कि वह किसी मनोविकार से पीड़ित है।
    शायद अंग्रेजों द्वारा बनाई 1860 में बनाई दंड संहिता इसकी कल्पना भी नहीं की गई होगी। ज़ब इस अपराध की सजा हेतु दूसरे देश क़ानून बना सकते हैं तो भारत की न्याय संहिता में भी इस अपराध के दंड होना ही चाहिए। अगर इस तरह के आरोपी को सजा नहीं मिलती तो मेरे विचार से बलात्कार के आरोपी को भी सजा नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि एक सामान्य व्यक्ति ऐसा घिनौना कृत्य कर ही नहीं सकता…
    आपका कहना अक्षरशः सत्य है कि अब समय आ गया है कि नेक्रोफ़ीलिया (लाश के साथ बलात्कार) को अपराध की श्रेणी में रखा जाए।
    मन मस्तिष्क को उद्देलित करते विषय पर कलम चलाने के लिए साधुवाद आपको।

  38. इस बार आपके सम्पादकीय को पढ़कर मन क्षोभ से भर गया।कैसी दुनिया में जी रहे हैं हम।क्या आदिम युग लौट आया है??बलात्कार यूँ ही अत्यंत घृणित अपराध है उस पर किसी को लाश में बदलना अपनी विकृत मनोकामना हेतु।इसके लिए तो सीधे फाँसी की सजा हो वह भी पहली सुनवाई में।आजकल जज बिके हुए भी हैं।सालों मुकदमा खींचते हैं।।

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