सच तो यह है कि भारत में संवतों का एक दीर्घ इतिहास रहा है। भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत माना जाता है। यह कैलेंडर भारत के प्राचीन कैलेंडरों का एक अद्यतन रूप है। भारत में सबसे पहले सृष्टि संवत, ऋषि संवत, ब्रह्म संवत, वामन संवत, परशुराम संवत, श्रीराम संवत और द्वापर युग में युधिष्ठिर संवत का प्रचलन रहा। बाद में कलि संवत प्रचलन में आया। इसके पश्चात सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत की शुरुआत की। लेकिन स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन सरकार ने 22 मार्च 1957 को शक संवत को राष्ट्रीय संवत घोषित कर दिया।
पूरे विश्व में नववर्ष 1 जनवरी को ही मनाया जाता है। भारत समेत विश्व के लगभग सभी देश ग्रेगोरियन कैलेंडर को मानते हैं और बिना किसी झिझक या हिचक के एक-दूसरे को नववर्ष की मंगलकामनाएँ भी भेजते हैं। मगर भारत में सोशल मीडिया पर नववर्ष की शुभकामनाएँ देने में भी इतने नाटक किए जाते हैं कि सामने वाले को उन बनावटी शुभकामनाओं से वितृष्णा होने लगती है।
बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने एक जनवरी को नए साल के मौके पर बेहद अनोखे अंदाज़ में बधाई दी। नववर्ष की बधाई देने का उनका यह अंदाज़ इतना अलग था कि वीडियो देखते-ही-देखते वायरल हो गया। सुधांशु त्रिवेदी ने बीजेपी मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान कहा- “दोस्तो, आज एक जनवरी है। मैं आप सभी को बधाई देना चाहता हूँ कि रोमन देवता जैनस के नाम पर, रोमन राजा नूमा पोंपिलियस द्वारा मूलतः प्रतिपादित, जूलियस सीज़र द्वारा शुरू किए गए और पोप ग्रेगरी 13वें द्वारा 1582 में संशोधित तथा अंग्रेज़ों द्वारा 1752 में अंगीकृत इस अंग्रेज़ी नववर्ष के पहले दिन की आप सभी को बधाई।”
सुधांशु त्रिवेदी ने जिन पंक्तियों में नए साल की बधाई दी है, वह वास्तव में ग्रेगोरियन कैलेंडर का संक्षिप्त इतिहास है। यह बताता है कि दिन-तारीख तय करने का काम इतना भी आसान नहीं रहा है कि कैलेंडर बदला और तारीख बदल गई। समय-समय पर इसकी खामियाँ सामने आईं, उन्हें दूर किया गया और तभी इसे अपनाया जा सका।
आज भी ग्रेगोरियन कैलेंडर में सभी बारह महीनों के दिन समान नहीं हैं। इसमें एक महीना 31 दिनों का है, तो अगला 30 दिनों का। फरवरी में तो दिनों की संख्या और भी कम होती है-इसे केवल 28 दिन ही मिलते हैं। हर चार साल में फरवरी में एक दिन बढ़ा दिया जाता है, तब यह 29 दिनों का महीना हो जाता है और इसे ‘लीप ईयर’ कहा जाता है।
मगर जिस तरह सुधांशु त्रिवेदी ने नए साल का स्वागत किया, उससे बेचारे नए साल को इतनी बेइज़्ज़ती महसूस हुई होगी कि वह भी सोच में पड़ गया होगा कि अगले साल आऊँ या शर्म के मारे कहीं डूब मरूँ। मैं सुधांशु त्रिवेदी के ज्ञान का बहुत सम्मान करता हूँ, मगर उन्होंने इस नए साल पर जिस तरह से बधाई का संदेश दिया, वह ज्ञान से कहीं अधिक मसखरेपन का प्रदर्शन था। एक सांसद के पास करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण काम होते हैं। यदि वह ऐसी तुच्छ बातों में अपना समय और शक्ति ज़ाया न करें, तो वे इसी समय और शक्ति का सदुपयोग अन्य सृजनात्मक कार्यों में कर सकते हैं।
वैसे सुधांशु जी को यदि अंग्रेज़ी कैलेंडर इतना ही ख़राब लगता है तो भाई आपकी तो अपनी सरकार है। इस कैलेंडर को मानना बंद कर दीजिये… और हाँ अगर हो सके तो अंग्रेज़ी को भी भारत की संसद की भाषा के रूप में मान्यता भी बंद करवा दीजिये!
मैं सुधांशु त्रिवेदी जी से एक सवाल पूछना चाहूँगा-‘जब आपसे कोई आपकी जन्म-तिथि पूछता है, तो क्या आप उसे भारतीय कैलेंडर के हिसाब से बताते हैं या बेचारे विदेशी अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार?’ एक सवाल मैं ‘पुरवाई’ के पाठकों से भी पूछना चाहूँगा-‘भारत में तीस वर्ष से कम आयु के कितने प्रतिशत बच्चों को भारतीय कैलेंडर के महीनों के नाम पता होंगे?’
फ़ेसबुक पर हर वह व्यक्ति अंग्रेज़ी नववर्ष की शुभकामनाएँ दे रहा है, जिसकी नौकरी, पगार, टैक्स और रिटायरमेंट इसी कैलेंडर के हिसाब से हुए हैं। उनके स्कूल, डिग्री और पासपोर्ट में भी वही तिथि दर्ज है, जो अंग्रेज़ी कैलेंडर में लिखी है। सवाल यह उठता है कि आख़िर यह ड्रामा करके आपको हासिल क्या हो रहा है! भाई समय आ गया है कि इस ढोंग को अब बंद कर दिया जाए।
भारत के अधिकांश लोगों को तो शायद यह भी मालूम नहीं होगा कि भारत सरकार ने किस वर्ष कौन-सा भारतीय कैलेंडर सरकारी कैलेंडर के रूप में अपनाया। भारत के मुख्य कैलेंडर कौन-कौन से हैं, यह जानकारी भी बहुतों को नहीं है। तो लीजिए, आज इसी मुद्दे पर हम ‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए यह पता लगाते हैं कि ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ भारत का आधिकारिक कैलेंडर कौन-सा है।
सच तो यह है कि भारत में संवतों का एक दीर्घ इतिहास रहा है। भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत माना जाता है। यह कैलेंडर भारत के प्राचीन कैलेंडरों का एक अद्यतन रूप है। भारत में सबसे पहले सृष्टि संवत, ऋषि संवत, ब्रह्म संवत, वामन संवत, परशुराम संवत, श्रीराम संवत और द्वापर युग में युधिष्ठिर संवत का प्रचलन रहा। बाद में कलि संवत प्रचलन में आया। इसके पश्चात सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत की शुरुआत की। लेकिन स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन सरकार ने 22 मार्च 1957 को शक संवत को राष्ट्रीय संवत घोषित कर दिया।
बताया जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नाम पर विक्रम संवत की शुरुआत हुई थी। उनके शासनकाल में भारतवर्ष के एक बड़े हिस्से पर विदेशी शासकों, यथा-‘शकों’का आधिपत्य था। वे प्रजा के साथ अन्याय करते थे और उनके क्रूर आचरण के कारण भय का वातावरण बना हुआ था। तब विक्रमादित्य ने शकों के शासन का अंत कर अपना राज्य स्थापित किया। इस विजय की स्मृति में विक्रम संवत का प्रवर्तन किया गया।राजा विक्रमादित्य ने इस पंचांग की शुरुआत करवाई थी। ‘ज्योतिर्विदाभरण’ ग्रंथ के अनुसार, विक्रमादित्य ने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत का प्रचलन प्रारंभ किया।
यह कैलेंडर चंद्र चक्र और सौर वर्ष- दोनों पर आधारित है, जिससे त्यौहारों और ऋतुओं का तालमेल बना रहता है। इसमें 12 चंद्र मास होते हैं, लेकिन सौर वर्ष से सामंजस्य बिठाने के लिए लगभग हर तीन वर्ष में एक ‘अधिक मास’ जोड़ा जाता है। उत्तर भारत में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा/उगादी) से नया वर्ष आरंभ होता है। भारत के कई राज्यों और नेपाल में इसका उपयोग धार्मिक और पारंपरिक कार्यों के लिए किया जाता है, जबकि शक संवत को भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर बनाया गया है।
इस कैलेंडर के अनुसार महीने का नामकरण पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र (जैसे चित्रा, विशाखा आदि) में होता है, उसी के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक महीने में शुक्ल और कृष्ण पक्ष होते हैं, जो चंद्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं पर आधारित होते हैं। 21/22 मार्च से आरंभ होने वाले इस कैलेंडर के 12 महीनों के नाम हैं-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन। मैं इतना तो दावे से कह सकता हूँ कि भारत की ‘जेन-ज़ी’ और उसके बाद की पीढ़ियों को इस विषय में बहुत कम जानकारी होगी।
शक संवत की शुरुआत सम्राट कनिष्क ने सन् 78 ईस्वी में की थी। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इसी शक संवत में मामूली संशोधन करते हुए इसे राष्ट्रीय संवत के रूप में घोषित कर दिया। राष्ट्रीय संवत का नववर्ष 22 मार्च से आरंभ होता है, जबकि लीप ईयर में यह 21 मार्च को पड़ता है। इसमें महीनों का नामकरण विक्रम संवत के अनुरूप ही किया गया है, जबकि उनके दिनों का पुनर्निर्धारण अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार किया गया है। इसके प्रथम माह (चैत्र) में 30 दिन होते हैं, जो अंग्रेज़ी लीप ईयर में 31 दिन हो जाते हैं।
ऐसा माना जाता है कि शक संवत मुख्य रूप से सूर्य की गति पर आधारित एक सौर कैलेंडर है, जो इसे एक सटीक और वैज्ञानिक प्रणाली बनाता है। इसकी शुरुआत 78 ईस्वी में कुषाण सम्राट कनिष्क के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में हुई थी, जो भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण कालखंड से जुड़ी है। स्वतंत्रता के बाद गठित कैलेंडर सुधार समिति ने विभिन्न क्षेत्रों में इसकी सापेक्ष एकरूपता और इसके स्पष्ट खगोलीय आधार के कारण शक संवत का समर्थन किया। आप इसे अक्सर आधिकारिक दस्तावेज़ों, रेलवे समय-सारिणी और सरकारी संचार में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ देख सकते हैं।
यदि सुधांशु त्रिवेदी एक अजब-गजब तरीके से नववर्ष की शुभकामनाएँ न प्रेषित करते और हमारे हिंदी के तथाकथित विद्वान सोशल मीडिया पर आंग्ल नववर्ष या अंग्रेज़ी नववर्ष की बधाइयाँ न पोस्ट कर रहे होते, तो आपके संपादक को इतनी मेहनत न करनी पड़ती। मगर एक मामले में यह बेहतर ही है कि आप अपनी ‘जेन-ज़ी’ पीढ़ी के बच्चों को यह संपादकीय पढ़वाकर उन्हें भारत के दो मुख्य संवतों से परिचित करवा सकते हैं, और हाँ, उन्हें भारतीय बारह महीनों के नाम भी रटवा सकते हैं, जैसे हमारे समय में स्कूलों में मास्टर एक हाथ में बेंत लहराते हुए हमें पहाड़े और महीनों के नाम रटवाया करते थे।
चलिए, ‘पुरवाई’ पत्रिका परिवार की ओर से आप सभी को नववर्ष की मंगलकामनाएँ!
संपूर्ण और रोचक जानकारी देता यह संपादकीय भारतीय कैलेंडर इतिहास और ग्रेगोरियन कैलेंडर की समीचीनता व्यवहारिकता को एक ही स्थान पर प्रस्तुत करता है। संपादकीय हिपोक्रेसी यानी प्रदर्शित झूठ और आडंबर की भी औचित्यपूर्ण ढंग से ख़बर लेता है।
सन 1952 में उस समय के प्रधानमंत्री स्वर्गीय नेहरू जी ने सुप्रसिद्ध मेघनाथ साहा के नेतृत्व ने भारतीय कैलेंडर हेतु एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित कर यह कार्य सौंपा था कि भारतीय कैलेंडर कितना औचित्यपूर्ण ,व्यावहारिक और खगोलीय ज्ञान से ओत प्रोत है।
इस कमेटी ने संपादकीय में वर्णित खगोलीय तथा अन्य जानकारियों को अभिलेखित करके भारतीय कैलेंडर को अपनाने की पुरजोर अनुशंसा की थी तिस पर भी उनकी यह बात नहीं मानी गई थीं।विज्ञान प्रसार ,की मैगजीन ड्रीम 2047में एक आलेख मैने भी लिखा था।
आज के संपादकीय ने वो सारी की सारी यादें फिर से ताज़ा कर दीं। संपादकीय की बेबाकी और साफगोई को बड़ा सा सलाम।
भाई सूर्यकांत जी, संपादकीय ने आपकी पुरानी यादें ताज़ा कर दीं, जान कर अच्छा लगा। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
नव वर्ष२०२६ की हार्दिक शुभकामना
नए साल की सम्पादकीय तो पूरा पंचांग का वर्णन हो गया है ।
बृहद जानकारी ।
Dr Prabha mishra
बहुत शुक्रिया प्रभा जी।
बहुत उम्दा संपादकीय है।वास्तव में हम सबकी जिंदगी के सारे जरूरी क्रियाकलाप अंग्रेज़ी कैंलेडर के अनुसार ही तय हो रहे हैं।इस पर इस प्रकार का विवाद खडा करना अजीब है।
हार्दिक धन्यवाद दिव्या जी।
मानते सब अंग्रेज़ी कैलेबदर ही हैं,तर्क कुतर्क चाहे कितने जार लें।मुबारक नया साल।
आपके समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद ममता जी।
आदरणीय सर, सादर अभिवादन के साथ कहना चाहता हूॅं कि हर बार की तरह इस बार का संपादकीय भी मननीय एवं विचारोत्तेजक है। यह संपादकीय आधुनिक भारतीय समाज के दोहरे चरित्र और बनावटी राष्ट्रवाद पर एक अत्यंत सटीक और साहसी प्रहार है, जिससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ।
आपने बड़े ही तार्किक ढंग से इस बात को रेखांकित किया है कि जब हमारा पूरा जीवन— चाहे वह नौकरी हो, पगार हो, टैक्स हो, स्कूल की डिग्री हो या पासपोर्ट—ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार ही चलता है, तो 1 जनवरी को बधाई देने में ‘नाटक’ करना केवल पाखंड ही है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी द्वारा नए साल की बधाई को जिस तरह इतिहास की जटिलताओं में लपेटकर प्रस्तुत किया गया, उसे आपने सही मायनों में ‘ज्ञान से अधिक मसखरापन’ और तुच्छ बातों में समय की बर्बादी करार दिया है।
संपादकीय का यह पक्ष अत्यंत सराहनीय है कि यह केवल आलोचना नहीं करता, बल्कि पाठकों की सांस्कृतिक समझ को भी समृद्ध करता है। यह विडंबना ही है कि सोशल मीडिया पर ‘अंग्रेजी नववर्ष’ का तिरस्कार करने वाले अधिकांश लोगों को भारतीय कैलेंडर के महीनों के नाम या शक संवत और विक्रम संवत का बुनियादी अंतर भी पता नहीं होगा। आपने बहुत ही स्पष्टता से समझाया है कि सम्राट विक्रमादित्य द्वारा ईसा से 57 वर्ष पूर्व शुरू किया गया विक्रम संवत चंद्र चक्र पर आधारित है, जबकि 78 ईस्वी में सम्राट कनिष्क द्वारा शुरू किए गए शक संवत को भारत सरकार ने 22 मार्च 1957 को राष्ट्रीय संवत के रूप में अपनाया था।
यह संपादकीय हमें अपनी जड़ों के प्रति ईमानदार होना सिखाता है। चैत्र, वैशाख से लेकर फाल्गुन तक के महीनों की वैज्ञानिकता और उनके खगोलीय आधार पर गर्व करना एक बात है, लेकिन जिस वैश्विक व्यवस्था का हम हिस्सा हैं, उसे बिना किसी कुंठा या हीन भावना के स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है। आपने ‘जेन-ज़ी’ पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का जो आह्वान किया है, वह आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है ताकि हमारी परंपराएं केवल सोशल मीडिया के ‘बनावटी प्रदर्शन’ तक सीमित न रहकर वास्तविक ज्ञान का हिस्सा बनें।
प्रिय भाई चन्द्रशेखर जी, आपने लिखा है कि – “यह संपादकीय आधुनिक भारतीय समाज के दोहरे चरित्र और बनावटी राष्ट्रवाद पर एक अत्यंत सटीक और साहसी प्रहार है, जिससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ।” आपकी टिप्पणी ने हमें बल दिया है। बहुत बहुत शुक्रिया।
हर बार आपके सम्पादकीय में विविध विषयों का विश्लेषण अचम्भित कर जाता है। आपने सही कहा है , नव पीढ़ी को भारतीय कैलेण्डर से अवगत कराना अत्यंत आवश्यक है। जड़ों से जुड़कर ही वे अपनी संस्कृति को जान पाएगी। साधुवाद
सुदर्शन जी पुरवाई पत्रिका के संपादकीयों के विषयों पर आपकी टिप्पणी हमारे लिये महत्वपूर्ण है। धन्यवाद।
नूतन वर्ष 2026 का पहला संपादकीय इसी नए वर्ष को केंद्र में रखकर लिखा गया है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी जी द्वारा व्यंग्यात्मक लहजे में दी गई नववर्ष की बधाई से प्रेरित है।यह बधाई सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी।
सुधांशु त्रिवेदी जी के बारे में मैं इतना कहूंगा कि वे बहुपठित व्यक्ति हैं। उन्हें इन चीजों की जानकारी अच्छे से होगी। वे एक विचारधारा से जुड़े हुए व्यक्ति हैं तो उन्हें अपनी विचारधारा को आगे रखकर उसी के अनुरूप बात करनी होती है। इसमें कोई बुराई नहीं है। सभी लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं को प्रमोट करते हैं।
किसी ऐसी चीज पर हास्यास्पद बात नहीं करनी चाहिए जो वैज्ञानिक रूप से खरी हो। हमें उसको आत्मसात करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। ग्रेगोरियन कलेंडर बहुत ही तर्कसंगत है। यह पृथ्वी द्वारा सूर्य के चक्कर लगाने की सटीक गणना पर आधारित है। पृथ्वी 365 दिन और 6 घंटे में सूर्य का एक चक्कर लगा लेती है। यही 6-6 घंटे चार वर्ष में एक दिन बन जाता है जो कि फरवरी महीने में जोड़ दिया जाता है। इसलिए लीप वर्ष 366 दिन का हो जाता है।
यद्यपि भारतीय गणना में भी यही बात है। इसमें फर्क इतना है कि हर साल 11 दिन कम रह जाते हैं। वही 11-11 दिन तीन साल में 33 दिन पहुंच जाते हैं। इसी से एक महीना अतिरिक्त बढ़ा लिया जाता है। इस भारतीय कलेंडर में दिनों का घटना बढ़ना आम आदमी को उलझा देता है। कभी-कभी दूज तीज एक साथ हो जाती है तो कभी नवें दसें एक साथ। सारे भारतीय त्योहार इसी के अनुसार होते हैं। और त्योहारों में इस तरह की गणनाएं उलझा जाती हैं।
भारतीय लोग कभी-कभी बहुत ही शुद्धतावादी बन जाते हैं। हर बात को अपने से शुरुआत मानते हैं। अपना ही रिवाज उत्तम है बस इसी की माला जपते रहते हैं। जबकि इस धरती पर विशुद्ध कुछ भी नहीं है। सब में मिलावट है।
संस्कृत से लेकर हिन्दी के साहित्यकारों ने यही एक बात कही है कि –
उत्तम विद्या लीजिए, जदपि नीच पै होय।
परो अपावन ठौर पर, कंचन तजै न कोय।।
जो बात उपयोगी है, जनमानस उसे सहज स्वीकार कर लेता है। और जो थोड़ी सी भी दिक्कत देता है उसे लोग छोड़ देते हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में कहूं तो – ‘दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है, वह उतना ही याद रखती है जितने में उसका स्वार्थ सध जाए। शेष को वह रौंदती चली जाती है।’
जन्मतिथि, शादी-ब्याह आदि की तारीखों में उन्हें सहजता दिखती है। साथ ही उसमें किसी तरह का घुमाव नहीं है। लोगों ने उसे आत्मसात कर लिया। चैत बैशाख.. न बच्चे याद रखते हैं और न याद करना चाहते हैं। दो तारीख के बाद तीन तारीख ही आएगी। वहीं चौथ पांचें एक साथ आ जाएंगी। तारीखों को याद रखने का मूल कारण ये है।
फिर भी हमें अपने महीनों से लगाव होना चाहिए। हमें ये न लगे कि हमारा अपना कुछ नहीं है। ये चीजें हमें अपनी माटी से जोड़ती हैं।
आपकी यह बात अकाट्य है कि आज हर व्यक्ति अपनी जन्मतिथि ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार ही लिखता है। देश के चुनाव भी तारीखों में तय होते हैं। यह कलेंडर विश्वव्यापी हो चुका है। विश्व के बहुतायत देशों ने इसे पूरी तरह से अपना लिया है।
आपने भारतीय कलेंडरों की पुख्ता जानकारी दी है। भारत-सरकार द्वारा मान्य कलेंडर का संक्षिप्त इतिहास भी बता दिया है।
मुझे लग रहा है कि इस नववर्ष की बधाई सभी लोग देते हैं। कुछ भले ही मजबूरी में देते हैं पर उन्हें भी देनी पड़ती है। इस दिन बहुत से लोग बड़े उमंग में पार्टी सार्टी करते हैं। और हां टीवी चैनल तो रात भर गदर काटे रहते हैं।
फिलहाल कोई कुछ भी कहता रहे, यही कलेंडर सर्वमान्य है। उसने अपने आपको इस काबिल बना लिया है।
प्रिय भाई लखनलाल पाल जी आपकी टिप्पणी की हमेशा प्रतीक्षा रहती है। इस बार जवाब देने में मुझे कुछ वक्त लग गया। आपने लिखा है – “आपकी यह बात अकाट्य है कि आज हर व्यक्ति अपनी जन्मतिथि ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार ही लिखता है। देश के चुनाव भी तारीखों में तय होते हैं। यह कलेंडर विश्वव्यापी हो चुका है। विश्व के बहुतायत देशों ने इसे पूरी तरह से अपना लिया है।” इस समर्थक टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया।
प्रिय संपादक श्री!
आपको, पुरवाई परिवार को नव वर्ष हेतु अशेष शुभकामनाएं
सुंदर, सार्थक,संदेशपूर्ण संपादकीय की महती बधाई। आप सदा नव सामयिक विषय सै हम सबको जोड़ देते हैं। इसके लिए आप सदा बधाई के पात्र हैं।
आत्मीर मंगलकामनाएं सदा़
आदरणीय प्रणव जी, इस सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
सम्पादकजी, आपके यहां टिप्पणी भी लेख समान ही होती है। सुदर्शन रत्नाकरजी एवं भारतीजी एक अच्छे टिप्पणीकार महसूस हुए, बधाई।
ज़किया जी, आपकी टिप्पणी बहुअर्थीय है।
जितेन्द्र भाई: सदा की तरह इस बार भी आपका सम्पादकीय बहुत ही ज्ञानवर्धक रहा। माना कि सारे विश्व में अधिक्तर ग्रेगोरियन कैलेंडर से ही नया वर्ष शुरू होता है फिर भी भारत में अभी तक नया वर्ष चैत्र से शुरू होने की प्रथा कायम है। इस के अनुसार बहुत से व्यापारी अपनी बहिएं मार्च महीने में बदलते हैं। यही प्रथा मैं ने, जब १९७५ में मैं वहाँ पोस्टेड था, ईरान में भी देखी थी। ईरान में अधिक्तर लोग अपना कैलेंडर इस्तैमाल करते थे।, इसका मूल हिजरी है और यह बसन्त ऋतु के आगमन से नया साल या नौरोज़ 20 मार्च से शुरू होता है। ईरान में ग्रेगोरियन कैलेंडर भी चलता था, मगर औरों के लिए।
जहाँ तक भारत का सवाल है, हमें अपनी युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृती के साथ साथ अपने कैलेंडर के बारे में भी शिक्षा देनी चाहिए। जहाँ हम अपनी मातृभाषा हिन्दी पर ज़ोर दे रहे हैं वहाँ और दूसरि भारतीय़ परंपराओं पर भी ध्यान देना अब आवश्यक हो गया है। अभी तक हमारी पीढ़ी अपनी ही परंपराओं, संस्कृती और इतिहास की जानकारी से अंजान रही है। समय आगया है और यही वो समय है जब और विदेशी भाषाओं और रिवाजों के साथ साथ हम अपने को भी जाने और भारतीय होने पर गर्व करें।
विजय भाई, आप पुरवाई के प्रत्येक संपादकीय को पढ़ते हैं और सार्थक टिप्पणी करते हैं। आपके अनुभवों ने संपादकीय के साथ नये आयाम जोड़े हैं। हार्दिक धन्यवाद।
बहुत महत्वपूर्ण लेख। आपने शानदार शोध किया। नववर्ष की हार्दिक बधाई।
हार्दिक धन्यवाद चंदेल भाई।
इस संपादकीय में पूरी जानकारी एक जगह पर निष्पक्ष रूप से देने के लिए धन्यवाद। लखनपाल जी ने भी ठीक लिखा कि सुधांशु जी ने अपनी विचारधारा को प्रमोट करने के लिए ही सही पर केवल सत्यवचन का ही उद्गार किया है। यह कंट्रोवर्सी फैला कर उन्होंने जिस अच्छे उद्देश्य की पूर्ति की है, आपका संपादकीय भी उसका अभिन्न अंग है और आप भी बधाई के योग्य है।
भाई हरिहर झा जी हमेशा की तरह आपने सार्थक टिप्पणी लिखी है। हार्दिक धन्यवाद।
संपादकीय – नववर्ष की बधाई इतनी बनावटी क्यों ?
https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-new-year-2026/
नव वर्ष पर काल गणनाओं के इतिहास विकास और भारत में इसकी स्थिति और एक सांसद द्वारा इस नव वर्ष का विवरण मसखरी के अंदाज में देने पर आपका यथार्थ यथार्थ है हम सहमत है।
एक बात और कही जाना चाहिए उचित होगा वह यह कि काल की सही गणना संभव नहीं है
विश्व में एक सूर्य कैलेण्डर है और अनेक चंद्र कैलेंडर है और भारतवर्ष में हर राज्य का अलग-अलग नववर्ष भी समझ आता है फिर किसी नववर्ष पर एतराज़ क्यों? खुशियां मनाने का दिन है स्वागत करने का दिन है भोर का अभिनंदन करने का दिन है फिर यह उपरी मातम क्यों है?
आपके संपादकीय सामायिक है अभिनंदन सादर प्रणाम
भाई कमलेश जी, संपादकीय पर इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। स्नेह बनाए रखें।
स्पष्टता लिए बेहतरीन संपादकीय भारत में 19 मार्च 2026 नववर्ष प्रारंभ होगा। अग्रिम शुभकामनाएं
धन्यवाद संगीता जी।
सादर नमस्कार सर…. नववर्ष की मंगलकामनाएँ सर… हमेशा की तरह आपका संपादकीय हम पाठकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण विचार लेकर आया है। अब इतने सालों से अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार सबकुछ मानते आ रहे हैं.. तो यही सही पर सुधांशु त्रिवेदी जी की इस टिप्पणी को सुनने के बाद आज की पीढ़ी को भारत की प्राचीन व्यवस्था के बारे में जानने का सौभाग्य मिला, महीनों, ऋतुओं के नाम, तिथि इत्यादि के नाम भी जान पाएँगे। अब चाहे कोई कुछ बोले… कुछ बदल नहीं सकता…।
साधुवाद…
आदरणीय अनिमा जी, आपकी सार्थक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
आदरणीय सर आपने भी खूब एक अलग निराले अंदाज में नव वर्ष की शुभकामनाएं दी,
भारतीय शक संवत एवं विक्रम संवत की संपूर्ण जानकारी बढ़िया थी,
सुधांशु त्रिवेदी जी के व्यंग्यात्मक तरीके से नव वर्ष की बधाई प्रेषित करना ,अब क्या ही कहें, आजकल सनातनियों को भी अच्छे खासे पढ़े-लिखे लोग भी नव वर्ष की शुभकामना देते वक्त कहेंगे, भाई यह अपना नया साल तो नहीं है,,अपना तो चैत्र में आता है,ये क्रिसमस क्यों मना रहे? गुरु गोविंद के बच्चों का शहादत दिवस मनाओ,
अरे कोई ये बताए कि देश भक्त होने का प्रमाण देने के लिए नव वर्ष चैत्र में ओर हिन्दू त्योहार छोड़कर कोई न मनाओ या हमारा सिख होनावैशाखी मनाने के लिए ,क्रिश्चियन होना क्रिसमस मनाने केलिए, मुस्लिम होना ईद मनाने के लिए जरूरी हे?
धर्म निरपेक्षता जैसा विषय कोई मायने नहीं रखता।
हमारा हर सरकारी कार्य जब ग्रिगेरियन कैलेंडर से होना हे तो
नववर्ष 1जनबरी को ही होगा ,।हम अपना हिंदी कलेंडर भी मानते ही हैं तिथि त्योहार जानने के लिए,फिर यह नौटंकी क्यों ,की ये हमारा नव वर्ष नहीं हे,जब हे कि ,तुम हर जगह कागजों में दस्तावेजो में तिथियां भर दो,
अरे पूरे विश्व में पूरीतरह खरा उतरने पर ही इसे अपनाया गया है ।
,कुछ तो नव वर्ष की बधाई देने पर, हमे ऐसे देखेंगे जैसे हम देश द्रोही हों,अपना जुमला ठोक ही देंगे, भई ये सनातनियों का नव वर्ष नहीं है।
आदरणीय सर आपकी संपादकीय सम सामयिक ,विचारशील ,तार्किक
पठनीय होती हैं
इसलिए बस सब छोड़िए आपको साधुवाद,,,
कुन्ती जी, इस सार्थक, सारगर्भित एवं ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद कहने से काम नहीं चलेगा… शब्द खोजना आसान नहीं।
बढ़िया संपादकीय। आप भले ही प्रयोग में न लाऐं, किन्तु हिन्दू कैलेंडर के मासों के नामों की जानकारी अवश्य होनी चाहिए।
बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी दी आपने इस विषय पर। आपको भी नव वर्ष की अनंत मंगलकामनाएं आदरणीय।
हार्दिक धन्यवाद सरस जी।
आपके संपादकीय हमेशा ज्ञानवर्धक एवं रुचिकर होते हैं। इस बार आपने उन लोगों पर तंज कसा है, जो दोहरा चरित्र अपनाते हैं। व्यवहार में अंग्रेजी कैलेंडर लाते हैं और बधाई देने के नाम पर उन्हें संकोच होता है। उसे आंग्ल नव वर्ष या ईसाइई नव वर्ष कहकर संबोधित करते हैं। सुधांशु त्रिवेदी जी का उदाहरण अति की सीमा पर है। आप किसी भी विषय के तह तक जाते हैं और तथ्यपरक भरपूर जानकारी देते हैं। बहुत धन्यवाद।
नव वर्ष की शुभकामनाएं!
विद्या जी, आपने संपादकीय के सार को पकड़ लिया है। इस ख़ूबसूरत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।
यह शुभकामना स्वयं में संपादकीय का प्रत्युत्तर है।
विनम्रता सहित !
आपको एवं समस्त पाठक वर्ग को “अँग्रेज़ी नववर्ष २०२६” ( संभवतः यह तिथि भी कुछ अपरिचित ही लगेगी , 2026 ) की मंगलकामनाएंँ ।
मैं आपके विचारों से पूर्णतः असहमत हूंँ । सर्वप्रथम आपने सुधांशु त्रिवेदी जी की बात की, तो मैं कहना चाहूँगी कि संस्कृत भाषा जानने – समझने के कारण मैं यह विश्वास से कह सकती हूंँ कि सुधांशु जी का ज्ञान, अभिव्यक्ति और स्मृति अति प्रशंसनीय है। जहांँ तक उनके सांसद होने और उस रूप में उनके कार्योंं की प्राथमिकताओं की आपने बात उठाई, तो मैं यह निर्विवाद रूप से कह सकती हूंँ कि वे सांसद के रूप में अपने उत्तरदायित्व का ही श्रेष्ठतापूर्वक निर्वहण कर रहे हैं। आपने (इस शब्द में हर भारतीय अभिभावक सम्मिलित है , जो अपने – अपने बच्चों को व्यक्तिगत रूप से अपने मातृभूमि भारत, इसकी सभ्यता, इसकी संस्कृति तथा इसकी भाषा (संस्कृत) से परिचय न करा सके ) अपनी भारतीय युवा पीढ़ी की तो आलोचना कर दी कि उन्हें अपने भारतीय कैलेंडर तक का ज्ञान नहीं है। उन्हें अपने भारतीय कैलेंडर के मासों तक का नाम ज्ञात नहीं है। मैं कहना चाहती हूंँ कि यह कहने से पूर्व प्रत्येक भारतीय अभिभावक का आत्मनिरीक्षण आवश्यक है । क्या अपने पूर्वजों से प्राप्त इस ज्ञान पर उनका उत्तराधिकार नहीं था ? क्या यह अधिकार उन्हें देना हमारा उत्तरदायित्व तो नहीं था ? क्या हमने अपना वह उत्तरदायित्व वहन किया ? युवा पीढ़ी के लिए वर्तमान में जो शब्द प्रचलन में आ रहा है “ज़ैन ज़ी” और जिसका आपने भी बड़ी सरलता से प्रयोग किया है। मैं निश्चित रूप से कह सकती हूंँ कि अधिक नहीं, अगले 50-100 वर्षों बाद कोई भारतीय (किसी भी पीढ़ी से भारत से जुड़ा) संपादक आप ही की तरह भारतीयों पर आरोप लगा रहा होगा कि इन्होंने अपनी भाषिक का पालन न करते हुए क्यों “ज़ैन ज़ी” शब्द का प्रयोग आरंभ किया ? क्यों नहीं “युवा पीढ़ी अथवा भावी पीढ़ी” शब्द का ही प्रयोग करते रहे ? कहने के लिए मेरे पास अत्यधिक विचार सामग्री है, परंतु संभवत: स्थान अभाव है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कितना अधिकार मुझे लेना चाहिए इसका भी ज्ञान है । अंत में मैं केवल इतना ही कहना चाहती हूँ कि मैं भी इसे “अँग्रेज़ी नववर्ष” कह कर ही संबोधित करती हूँ और युवा पीढ़ी मेरे इस शब्द का प्रयोग सुनते प्रति प्रश्न करती है कि फिर भारतीय नववर्ष कब होता है और मुझे यह समस्त ज्ञान देने का अवसर मिल जाता है और उन्हें जानने का। जिज्ञासा उपजे तभी दिया गया ज्ञान व्यवहार में उतर पाता है। अतः सुधांशु त्रिवेदी जी ने यह सूचना देकर अपनी नेतृत्व क्षमता के कर्तव्य का ही पालन किया है। उन्होंने जन-मानस में जिज्ञासा जगाने का ही कार्य किया है। जो कार्य प्रत्येक भारतीय अभिभावक को करना चाहिए उसका उत्तरदायित्व अकेले सुधांशु जी ने ही उठाया है।अत: मेरे विचार में वे प्रशंसा के पात्र हैं आलोचना के तो कदापि नहीं। अंत में —
मैं रहूँ या न रहूँ,
भारत यह रहना चाहिए।
जय भारत!
शुभं भवतु means Stay Blessed
आदरणीय सुषमा जी, पुरवाई को लोगो में लिखा है – अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता… आपको हक़ है कि आप संपादकीय से असहमत हों। धन्यवाद।
बहुत बढ़िया तमिल का अपना अलग कैलेंडर है अपने अलग महीने हैं! आंध्रा का अलग है सबका अपनाअलग है यह बहुत बड़े शोध का विषय है।
नववर्षों की अराजकता….
हमेशा की तरह शानदार संपादकीय, महत्वपूर्ण जानकारी से अवगत कराने वाली, बहुत बढ़िया.
हार्दिक आभार सुषमा जी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी
नव वर्ष की बधाई के साथ इस बार नए वर्ष का संपादकीय आगाज़ भी नयी और पुरानी सभी के विस्तृत ऐतिहासिक जानकारियों के साथ हुआ।
जब से सनातन की जागरूकता का बिगुल बजा है तब से नववर्ष की बधाई देने के तरीकों में परिवर्तन कुछ ज्यादा ही हुए।और विवाद भी।
हमने शुरू से अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से ही सारे काम होते देखे सिवाय त्योहारों के। इसलिए हमारे लिए शुरू से 1जनवरी नववर्ष रहा और यह सही भी है क्योंकि भारत समेत पूरे विश्व के लिये यही नव वर्ष है और समस्त देशों के समस्त कार्य-व्यापार भी इसी के हिसाब से चलते हैं।
सुधांशु त्रिवेदी ने जो भी कहा निश्चित ही स्वयं हास्य के घेरे में रहे।
संवत् से हमारा परिचय सिर्फ जानकारी तक था।विक्रम और शक संवत् के नाम से परिचित थे।कभी विस्तार से इसके बारे में जानने की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि त्योहार हिंदी महीने के हिसाब से चलते थे। संवत सिर्फ वर्ष का संकेत देता था जिसका प्रयोग पूजा पाठ में हुआ करता था विशेष पूजा के अवसर पर जब पूजा का संकल्प लिया जाता था तब। हालांकि जानना चाहिये लेकिन जरुरी नहीं लगा।
हमने शुरू से अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से ही सारे काम होते देखे सिवाय त्योहारों के। इसलिए हमारे लिए शुरू से 1जनवरी नववर्ष रहा और यह सही भी है।
अंग्रेजी और हिन्दी संवत् की विधिवत जानकारी से इस बार के संपादकीय ने अवगत कराया।
पहले हिंदी मीडियम स्कूल ही ज्यादा थे तो प्रायमरी स्कूलों में ही कविताओं के माध्यम से 6 ऋतु के हिसाब से 12 महीनों के नाम याद करा देते थे।
पढ़ाई की पूरी पद्धति ही अब बदल गई है। अंग्रेजी के भार से हिंदी दब गई। तो बहुत कुछ पीछे छूट गया।
यह सही है कि हिंदी महीने वर्तमान में बच्चों को याद नहीं रहते। निबंध के लिए ही याद रखते हैं फागुन की पूर्णिमा को होली, सावन की पूर्णिमा को रक्षाबंधन, कार्तिक की अमावस्या को दीपावली इत्यादि।
इस बार का संपादकीय आने वाले नववर्ष में लोगों के ज्ञान चक्षु खोल सके यह उम्मीद है।
हर बार की तरह प्रबुद्ध करते इस संपादकीय के लिये आपको बधाई।
आदरणीय नीलिमा जी, आपकी कामना कि “इस बार का संपादकीय आने वाले नववर्ष में लोगों के ज्ञान चक्षु खोल सके”… से हमें हौसला मिलता है। हार्दिक धन्यवाद ।
सुधांशु त्रिवेदी के बहाने शक संवत और विक्रम संवत की बढ़िया जानकारी। शेयर कर रही हूं अपने बच्चों और अपने विद्यार्थियो को।
जब बच्चे और विद्यार्थी पढ़ेंगे तो संपादकीय सफल हो जाएगा।
बहुत सुंदर सार्थक उमंग सारगर्भित संपादकीय लगा इस बार का।हर बार जानकारियों का एक नया खजाना खुलता है और हम.सभी चमत्कृत से .ज्ञान के नये नये बिंदुओं से लाभान्वित होते.रहते हैं।इतने विस्तार से शायद ही किसी को ज्ञात होगा।एक कथाकार साहित्यकार, कवि के अतिरिक्त आप एक संपादक के रुप में भी.सफल हैं।
सुधांशु त्रिवेदी जैसे अनेक और भी हैं ,जो नववर्ष को केवल विवाद का विषय. आने हैं,लेकिन एक दूसरे को बधाई अंग्रेजी नववर्ष को ही देते हैं।यापन सच कहा कि.हमारी नयी पीढी तो भारतीय महीनों के नाम नहीं पता होंगे।वर्षांत कैलेंडर के बारे में ,संवत राम संवत,परशुराम संवत से लेकर शक संवत और विक्रम संवत के बारे में विशेष जानकारी मिली।
बहुत बहुत बधाई हो भाई आपको।सादर प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.,बैंगलोर से।
पद्मा आपकी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक धन्यवाद
इस सप्ताह के अपने संपादकीय में नव वर्ष की एक जनवरी को नए वर्ष के प्राधिकृत आरंभ के संदर्भ में हमारे भारत के राष्ट्रीय कैंलेडर के आधार शक संवत तथा दूसरी संवतों के विषय में हमें महत्वपूर्ण जानकारी दी है।
इन सब के इतिहास से भी हमें परिचित करवाया।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
आदरणीय दीपक जी, आपकी टिप्पणियां हमारा हौसला बढ़ाती हैं। हार्दिक धन्यवाद।
बेहतरीन जानकारी के साथ यह भी पता चला कि एक लखक किसी विचारधारा का अगुआ नहीं होता वह जनसाधारण का प्रतिनिधि होता है। पढ़ा और जाना कि आपके पास ज्ञान का पिटारा है। अगले अंक के जादुई पिटारे के इन्तज़ार में उत्सुकता रहेगी।सादर प्रणाम आपको
डॉ रौबी, यह तो ज़बरदस्तम वाली टिप्पणी है। हार्दिक धन्यवाद
सादर अभिवादन
बहुत सही कहा आपने । मानते तो सब अंग्रेजी कैलेण्डर को ही हैं और अब सबको उसी की आदत भी हो गई है तो सबके लिए सुविधाजनक भी वही है ।
नव वर्ष की अनेकानेक मंगल कामनायें ।
समर्थन के लिये हार्दिक धन्यवाद रेणुका जी।
आदरणीय तेजेन्द्र जी ! नव वर्ष शुभ हो।
आपने पंचांग के आधार पर सम्वत् और हिन्दी महीनों चैत्र, वैशाख आदि का अति सुन्दर व सटीक विवेचन प्रस्तुत किया है। आपकी पकड़ हर विषय पर इतनी गहरी और विश्लेषणात्मक होती है कि वास्तव में आश्चर्य होता है। हमें तो चैत्र आदि महीनों के नाम बचपन से ही रटे पड़े हैं किन्तु आज की युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञानगरिमा का महत्त्व समझाना भी हमारा ही उत्तरदायित्व होना चाहिए।
आपका प्रत्येक सम्पादकीय सहसा पाठकों को चकित कर देता है।
आदरणीय शशि मैम, आप पुरवाई के प्रत्येक संपादकीय को ना केवल पढ़ती हैं बल्कि सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी भी करती हैं। आपका हार्दिक आभार।