मर्दों के विरुद्ध लिखे साहित्य का अम्बार जमा हो रहा है - नासिरा शर्मा 3
नासिरा शर्मा

नासिरा शर्मा वर्तमान समय की महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिन्होंने कुइयांजान, ज़ीरो रोड, पारिजात, अक्षयवट, काग़ज़ की नाव जैसे उपन्यास हिन्दी जगत को दिये। उनके कहानी संग्रहों में शामिल हैं – पत्थरगली, इब्ने मरियम और ख़ुदा की वापसी।

नासिरा जी जब ‘कुइयांजान’ के लिये ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’ ग्रहण करने लंदन आईं थीं तो उन्हें कथा यूके की संरक्षक ज़किया ज़ुबैरी जी के साथ कुछ दिन रहने का मौक़ा मिला था। दोनों में एक ख़ास रिश्ता बन गया। इसलिये जब नासिरा जी से साक्षात्कार के बारे में सोचा गया तो ज़किया जी से बेहतर नाम दिमाग़ में नहीं आया। शायद इसीलिये यह साक्षात्कार केवल साहित्य तक सीमित नहीं है… कुछ अपनेपन वाले सवाल भी पाठकों को मिलेंगे। आप महसूस करेंगे कि नासिरा जी ने हर सवाल का जवाब बहुत खुल कर दिया है।

ज़किया ज़ुबैरीः  नासिरा जी जब आपने लिखना शुरू किया तो आपको लिखने के लिए क्या प्रेरित करता था … और आज जब आपको विश्व भर में सम्मानित किया जा चुका है, आप हिन्दी की जानी मानी उपन्यासकार हैं तो आपको अब क्या प्रेरित करता है कि आप क़लम उठाएँ?
नासिरा शर्माः    मेरे घर का माहौल। सभी लिखते पढ़ते रहते थे। उनकी देखा-देखी कहें या अन्दर की इच्छा कहें जिसने कुछ बुनने के लिए प्रेरित किया। घर में कहानी-किस्सों का बड़ा ज़ोर था। बच्चों की कहानियाँ जिसको आप लोक-कथा कह सकते हैं या धर्म से जुड़े कुछ व्यक्तित्व का बयान। इसी के साथ जानवरों व जिन्नातों की कहानियाँ जिस में काली-बिल्ली या बिल्ले की भूमिका होती। दूसरी तरफ ख़ानदानी क़िस्से जो परिवार में हुई घटना, दुर्घटना के साथ परिवार के पुरखों की मजेदार आदतें और उनसे जुड़े अन्य लोगों का बयान। ऐसी लच्छेदार दास्तानें, उस पर से चुटीली, चटखीली ज़बान में हुए संवाद। जिसमें इस बात का लिहाज कि किससे किस हैसियत से बात की जाए। इस माहौल में पलने बढ़ने वाला कौन बच्चा न होगा जो बुज़ुर्गों की तरह कहानी सुनाना नहीं चाहेगा। वही क़िस्सागोई आप कहानी के रूप में लिखने लगते हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः प्रश्न का दूसरा हिस्सा अभी बाक़ी है नासिरा जी…
नासिरा शर्माः अरे हां… ज़किया साहिबा अगर आप अपने अन्दर के क़िस्सागो को शोहरत, इज्ज़त और पुरस्कार के प्रभाव से बचा पाते हैं तो फिर आपका दिल व दिमाग बदलते हालात को उसी तरह देखता और महसूस करता है जब आप ने लिखना शुरू किया था। यह अलग बात है कि लिखने के अभ्यास से और अध्ययन से आपकी अवलोकन की क्षमता बढ़ती और सूक्ष्म होती है यह दुनिया ठहरी हुई तो है नहीं। उसमें न केवल परिवेश बदलता है बल्कि नई-नई घटनाएँ और समस्याएँ लगातार समन्दर की लहरों की तरह पछाड़ती आपको भिगोती और झिंझोड़ती है। लेखक की ‘हिस’ जब तक ज़िंदा है वह लिखेगा। उसका न कोई अन्त है और न ही शर्त है। मैं अपने लिए सिर्फ इतना कह सकती हूँ कि मेरे अन्दर का खदबदाता ज्वालामुखी अभी शांत नहीं हुआ है। पुरस्कार मुझे मिलते रहे हैं। अपने समय के वे सारे पुरस्कार बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे आज लाखों में आज लाखों वाले पुरस्कारों की चर्चा खासी रहती है जो मुझे बहुत बाद में मिले और साहित्य अकादमी पुरस्कार भी। चूंकि आप की नज़र किसी मंजिल पर नहीं टिकी थी और न रिटायरमेंट पर, तो आपको आपका परिवेश प्रेरित करता है लिखने के लिए। आपका पाठक वर्ग आपसे पूछता है नया क्या आने वाला है? और यह भी सच है कि हर नई पीढ़ी के साथ आपके पाठक जुड़ते और छूटते जाते हैं। कुछ नदियां सूख जाती हैं कुछ बहती रहती हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः  इलाहाबाद का आपके व्यक्तित्व पर कैसा असर रहा? क्या आपको अपने लेखन के लिए अपने बचपन की कुछ घटनाओं से सामग्री मिली?
नासिरा शर्माः   जीवन में बचपन एक अहम भूमिका निभाता है। उसको यादें, कुछ अनबूझे प्रश्न, कुछ अधूरे दृश्य, आपके अवचेतन में पड़े रहते हैं जिनका जवाब आपको बड़े होने पर भी नहीं मिलता है और कुछ गुत्थियाँ समझ के साथ सुलझ भी जाती है। मेरे शहर और मेरे परिवार का असर मेरे व्यक्तित्व को बनाने में रहा है। मेरे लेखन में इलाहाबाद शहर का परिवेश उभरता है। मेरा दूसरा कहानी संग्रह ‘पत्थरगली’ नाम से आया। जिसकी कहानी मैंने लिखी होगी अस्सी के दशक में और इसका प्रकाशन वर्ष 1986 रहा। वह लगातार नए संस्करण में छपता व पढ़ा जाता है। नए लोग जो बहुत कुछ आज के हालात पर लिखते और पढ़ते हैं, वह भी उन कहानियों में डूब जाते हैं। अरसे बाद मेरा उपन्यास ‘अक्षयवट’ 2003 में आया जो इलाहाबाद पर लिखा मेरा पहला उपन्यास था जिसमें पहली बार मैने जगह के नाम वैसे ही रखे जैसे थे तब पता नहीं था कि खुद इलाहाबाद का नाम बदल दिया जायेगा। इसके बाद ‘कुइयांजान’ 2005 में आया। जीरो रोड ‘2008’ में और ‘पारिजात’ 2012 में। अब आप सोच सकते हैं कि यह चारों उपन्यासों के लिखने में इलाहाबाद ने मुझे कितना कुछ दिया है जो मैं ज़मीनी समस्याएँ उस शहर से उठाती हूँ और उस शहर की समस्याओं को विश्वस्तर की समस्याओं से जोड़ देती हूं क्योंकि मानवीय समस्याएं और उनसे जुड़ी अनेक समस्याएँ लगभग सभी देशों में एक सी हैं।

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ज़किया ज़ुबैरीः  इलाहाबाद तो उस समय साहित्य के केन्द्र में था। उस काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल भी कहा जाता है। क्या धर्मवीर भारती या अन्य किसी साहित्यकार के लेखन ने आपके शुरुआती लेखन को प्रभावित किया?
नासिरा शर्माः   इलाहाबाद का वह समय तो मैं नहीं जी पाई मगर रामकुमार वर्मा जी को ज़रूर देख पाई और उनकी कोर्स में लगी रचना, ‘पृथ्वीराज की आंखें’ पढ़ी। उनकी बेटी राजलक्ष्मी से ज़रूर दोस्ती हुई। और ज़किया साहिबा एक ख़ास बात कि उन्हीं दिनों फिराक़ साहब से मिली। यह बात है एम.ए. भूगोल पहले वर्ष की है फिर इंगलैंड की वापसी के बाद अमरकांत, अश्क जी, मार्कन्डे जी से साहित्य को लेकर चर्चा भी हुई और दोनों लेखकों ने स्नेह व सम्मान के साथ मेरी कहानियाँ छापी भी। अश्क जी से ख़त व किताबत भी हुई। मार्कन्डे जी और अश्क जी के घर खाना भी खाया। इन सभी के व्यक्तित्व और स्वभाव से बहुत कुछ सीखा। उनके लेखन को भी खूब पढ़ा। बहुत बाद में दूधनाथ सिंह से मुलाकात हुई उन पर छोटा सा लेख भी लिखा था। लेकिन रोज़ की मुलाकातें और उस परिवेश को मैं नहीं जी पाई जो इलाहाबाद में रहने वाले दूसरे नए साहित्यकारों को अवसर मिला। महादेवी जी ने मुझसे मिलने की बात मेरे भाई से कही थी मगर अफसोस उनसे मिल न सकी। दरअसल हमारा दौर इलाहाबाद की रौनकों के लुट जाने के समय का आरम्भ था। भारती जी मुम्बई चले आए। उनसे मुलाक़ात हुई भी तो दिल्ली मुम्बई में। मुझे जो भी टुकड़े-टुकड़े में मिला वह मूल्यवान था। कुछ वर्षों पहले अनिल भौमिक जी ने मुझे अपने नाट्य समारोह के जश्न में बुलवाया। तब कई लोगों से मुलाक़ात हुई। यश मालविया जी व अनिता गोपेश जी से, हिस्ट्री के प्रोफेसर हेरम चतुर्वेदी जी से साहित्य व इतिहास को लेकर बातें होती रहती हैं यह सभी लोग मौके़-मौके़ से याद कर लेते हैं और मैं भी। साहित्यिक चर्चा भी हुई। मगर किसी का वैसा प्रभाव मेरे लेखन पर पड़ा हो ऐसा मुझे नहीं लगता मगर एक बात मैंने इन सब से सीखी वह थी नई पीढ़ी के लेखकों से कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्हें पूरा आदर और प्यार मिलना चाहिए। जो मुझे मिला और मैं इस बात का बेहद ख़्याल रखती हूं वरना ‘मेरे वारिस मेरे क़लमकार’ शीर्षक से ‘आभनिव’ अभिनव कह सकते हैं ‘इमरोज़’ पत्रिका का कहानी विशेषांक न निकालती। कहने का मतलब है पुरानी पीढ़ी ने जो समकालीन भी थी। उसने साहित्य में नैतिक मूल्यों की चेतना दी हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः  सहानुभूति और स्वानुभूति के बारे में काफ़ी सुनते रहे हैं। आख़िर इन दोनों में ऐसा क्या फ़र्क होता है?
नासिरा शर्माः यह सवाल आपने बहुत अच्छा पूछा। दरअसल मैं इस बारे में बहुत सोचती रही हूं। मेरे हिसाब से बहुत बारीक़ फ़र्क है मगर है बहुत अहम। दूर से देखा हादसा या फिर कोई ख़बर लेखक के मन को पिघला देती है और अचानक उसकी सृजनात्मकता जाग उठती है। वह लेखक से कुछ लिखवा लेती है। वहां लेखक के ख़्यालात उड़ान भरते हैं। लेखक का भावुक मन अपना सच तलाश कर लेता है। लेखक की दृष्टि वहीं तक पहुंचती है जहां तक वह देख पाता है। ऐसी रचना में लिखने वाला मौजूद रहता है। वही चरित्रों के संवाद कहलवाता है वही अपनी संवेदना की रचना में उकेरता है। यानी कि वह कहानी बुल लेता है अपनी कलात्मक क्षमता से और ख़ुद ही एक नतीजे पर पहुंच जाता है। लेकिन कुछ विषय ऐसे होते हैं जो किसी घटना, अनुभव, अनुभूति और टीसन से मथ कर निकलते हैं। उस में लेखक कम बोलता है और किरदार अपनी बातें करते हैं। वे वास्तविक पात्र जिस ज़मीन से उठते हैं दरअसल वे जीवन के झेले हुए होते हैं। उनकी संवेदनाएं परतदार होंगी। शायद वह लेखक का व्यक्तिगत दुःख न हो मगर उस व्यथा भरे माहौल को उसने गहराई से महसूस किया है और लेखक उसका साक्षी बन जाता है भले ही पूरा हिस्सेदार न हो। ऐसे समय को जब वह लिखता है तो उस में लेखक की भावनाओं से ज़्यादा वह किरदार अपनी बात कहता नज़र आता है और अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करता है। बेशक वह बयान लेखक का होता है मगर उसमें यथार्थ की प्रमाणिकता होती है और स्वानुभूति  द्वारा लिखा पाठ होता है। वह दस्तावेज़ बन जनाता है।
ज़किया ज़ुबैरीः  दोनों का महीन फ़र्क तो आपने बहुत अच्छी तरह समझा दिया। मगर आप इन दोनों में से बेहतर किसे समझती हैं?
नासिरा शर्माः यहां मैं अच्छे या बुरे की बात नहीं कर रही हूं। मानी बात है कि जो रचना साहित्य की कसौटी पर पूरी उतरेगी वही बेहतर कहलाएगी चाहे वह सहानुभूति में लिखी हो या फिर स्वानुभूति में। मैं यहां पर उस ख़तरे की ओर इशारा कर रही हूं जो कुछ ऐसे विषयों की ओर संकेत करते हैं जो बेहद चर्चित हैं ऐर सनसनाहट से भरे होते हैं। लेखक का ध्यान अपनी ओऱ खींचते हैं। ऐसे किसी विषय से  प्रभावित होकर लेखक सूचनाएं जमा करता है। ख़बरों की कटिंग व दृश्यों को  समेटता है और अपने लेखन में डूब जाता है। उसके पास सब कुछ होता है – भाषा, अभिव्यक्ति, जज़्बा, मगर वास्तविक संवेदना की कमी होती है जो नई भाषा रचती है जो उस यथार्थ की ज़मीन को तोड़ निकलती है जो उसकी स्वानुभूति से निकलती है जिस माहौल को जीने में उसकी हिस्सेदारी रही या फिर उन कैफ़ियतों से गुज़रते हुए उस में तड़पते हुए लोगों को उसने देखा और गहरे महूसूस किया है।
ज़किया ज़ुबैरीः  बात तो आपकी ठीक है… मगर… यह तय कैसे होगा ?
नासिरा शर्माः लेखक की ईमानदारी यह तय करेगी। उसे लहू लगा कर शहीदों में शरीक होना है या वास्तव में जिस विषय को न उसने जिया, न महसूस किया सिर्फ़ चर्चित होने के लिये लिख दिया है। ऐसी रचनाएं पसन्द भी की जाती हैं मगर जब नज़र वाले या भुगत भोगी उसे पढ़ता है तो एक नज़र में समझ जाता है असली और नक़ली के भेद को। यह भी संभव है कि लेखक की पकड़ यदि विषय पर मज़बूत नहीं है तो वह ऐसा कुछ लिख जाता है जो उसके पाठकों को भ्रमित करता है और विषय की पवित्रता को तहस-नहस कर वास्तविक सच्चाई से दूर ले जा अपनी मर्ज़ी के सामने ले आता है जो सही नहीं है। कहना यह है जो अनुभव आपकी ज़िन्दगी में ख़ुद दाख़िल हो जाए और वह अनुभव जो जानबूझ कर ख़ुद करने जाएं। दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क होता है – संवेदना, अनुभूति और विचार के स्तर पर।
ज़किया ज़ुबैरीः आपके कहानी संग्रह ‘इब्ने मरियम’ की तेरह कहानियां भारत के अलावा युगांडा, इथियोपिया, फिलिस्तीन, सीरिया, बंगला देश, पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान इराक़, तुर्की, स्काटलैण्ड और कनाडा जैसे देशों की बैकग्राउंड पर लिखी गयी है। क्या इन कहानियों के तजुरूबे आपके अपने हैं या फिर दूसरों का दर्द महसूस करके कहानियाँ लिखी गयी हैं?
नासिरा शर्माः  ज़किया साहिबा यह सारे किरदार जो मैंने कहानियों में बयान किये हैं उनमें से आधा दर्जन देशों के नागरिकों के साथ हमारा दोस्ताना घरेलू रिश्ता था जिसका सिलसिला इन सब की मौत तक चला। एक बेहद लम्बा जज़्बाती रिश्ता, प्रोफेशनल होने के अलावा। यह सब मेरे शौहर के दोस्त थे जो एक साथ स्काटलैंड में पीएच.डी. अलग-अलग विषयों में कर रहे थे। सभी ब्रिटिश कौन्सिल स्कालरशिप होल्डर थे जिसमें पत्नी और बच्चों का भी खर्चा शामिल था। मकान भी युनिवर्सिटी की ओर से मिला था। इसलिए हमारा प्रवास बहुत आराम देह और बेहद घुलामिला था। उसमें कई स्कालर लंदन और दूसरे शहरों के भी थे। बाक़ी की आधी दर्जन कहानियों के किरदार, उनके दुख-सुख, राजनीति उछाड़-पछाड़ सीधे मेरे तन्हा अनुभव की देन हैं जिनसे कई बार मुलाकातें रहीं और बातों का टेलिफोनिक सिलसिला। इन देशों के बहुत से नागरिक अध्ययन या फिर किसी सेमिनार के चलते दिल्ली आते रहे थे। हमारा बेहद गहरा रिश्ता जापान की हिरोशिमा युनिवर्सिटी के भूगोल विभाग से बना। हर साल रिसर्च टीम यहाँ दिल्ली आती या फिर डॉक्टर शर्मा जाते जिनके साथ परिवार से किसी न किसी को दावतनामा मिलता था। पूरा जापान घूमने समझने के बावजूद भी मैंने कोई कहानी जापान पर लिखी और न ही नेपाल पर। यह लेखन भी बड़ी रहस्यमय दुनिया है। जिस देश में मैं तीन साल रही उस पर सिर्फ एक कहानी वह भी भूरेलाल बीस पच्चीस वर्ष बाद लिखी। एक उपन्यास पाँच वर्षों पहले शुरू किया था वह दूसरे चैप्टर से आगे बढ़ ही नहीं पाया बीच में छूटा तो अभी तक अधूरा पड़ा है।
ज़किया ज़ुबैरीः आपने फ़ारसी भाषा साहित्य में पाँच वर्ष अध्ययन किया। क्या फ़ारसी साहित्य का आपके अपने लेखन पर कोई विशेष असर पड़ा है, या फिर आपके विज़न में विस्तार भी हुआ है?
नासिरा शर्माः   हर स्तर पर मुझे फारसी ज़बान से लाभ हुआ। पहला साहित्यिक दूसरा सियासी। पहली बात तो जग जाहिर है कि फारसी भाषा अपने साहित्य में तो है ही महत्वपूर्ण मगर वह तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब उसके साहित्य में दुनिया भर का साहित्य अनुदित हुआ आपको पढ़ने को मिले। बेहतरीन फिल्में डब की हुई दुनिया भर की फारसी में देखने को मिले तो एक विद्यार्थी एवं शोधकर्ता को दोहरा लाभ होता है पहला विश्व भर की फिल्में देखने को मिलीं उसी के साथ भाषा की अभिव्यक्ति सुनने को मिली। वैसे भी कहा जाता है कि कोई भाषा तीन तरह से सीखी जाती है कान, आँख और ज़बान से।
दूसरा लाभ विश्व स्तर की राजनीति की तरफ ध्यान गया। अपने समय में हुए इंकलाब से रूबरू हुई। इस भाषा के शानदार साहित्य ने मुझे अनुवाद करना सिखा दिया और सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि भारत-ईरान सम्बन्धों का सांस्कृतिक व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य समझ में आया। जिसमें सबसे प्यारी बात यह लगी कि अपने देश के तीन नाम है इंडिया, भारत, और हिन्दुस्तान। मेरा सबसे पसन्दीदा नाम ‘हिन्दुस्तान’ रहा है। बाद में पता चला कि यह ईरानियों का दिया नाम है जो सिन्ध से सम्बन्धित है। ईरानी में कई अक्षरों के उच्चारण क, च, में और स, ह में भी बदल जाते हैं या फिर दोनों तरह से प्रयोग किये जाते हैं। तो सिन्ध हिन्द हो गया। फारसी व संस्कृत भाषा आपस में बहने हैं थान व स्थान भी। मेरे लेखन को ईरान ने अनेक किरदार दिए। संक्षेप में कहूं तो कह सकती हूं कई भाषा जानना सुखद है आपके नज़रिए, सोच-विचार, सरोकारों में बहुत से सकारात्मक बदलाव आते हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः आपका उपन्यास ‘कुइयांजान’ हिन्दी जगत के लिए तो महत्वपूर्ण है ही मगर हम लंदन वालों के लिए इसका खास महत्व है कि इसके लिए आपको हमारी संस्था कथा यू.के. ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट के हाउस ऑफ कॉमन्स में इन्दु शर्मा कथा सम्मान से अलंकृत किया। राजस्थान की पानी की समस्या के साथ आप इतनी गहराई से कैसे जुड़ पाई? और इसके चरित्रों को क्या आप निजी रूप से जानती है?
नासिरा शर्माः  पानी की कमी की परेशानी को सामूहिक रूप से जगह-जगह देखती हुई उम्र गुज़री है? मगर पहला आश्चर्य दिल्ली आकर पेय जल को बिकते देख कर हुआ था। यह उपन्यास मिजोरम में लिखना शुरू किया था। डॉ. शर्मा अजमेर से हैं। राजस्थान में पानी की कमी के क़िस्से सुनने को मिले फिर साहित्य अकादमी की ओर से बीकानेर जाने का मौका मिला। वहां मैंने इस उपन्यास का एक अंश पढ़ा था उसके विषय को लेकर बातें हुईं तो कुछ गांव भी देखने को मिले जहां के रहने वालों से बातचीत हुई फिर आमेर जाना हुआ एन.बी.टी. के द्वारा आयोजित कार्यशाला में। वहां पर इतनी ज्यादा मालूमात लोगों से हुई कि उपन्यास के कई चैप्टर बढ़े। राजस्थान से मेरा बहुत पुराना और गहरा रिश्ता है जो कम लोग जानते हैं। जयपुर तो साल में दो बार जाना होता। कभी भूगोल विभाग के कारण तो कभी मेरे साहित्यिक कार्यक्रमों के कारण। अजमेर मैं तो इतना नहीं जा पाई मगर परिवार के सदस्य ज़रूर जाते हैं। रहा सवाल कथा यू.के. के सम्मान का उसे मैं कैसे भूल सकती हूं जिस धरती (एडिनबर्ग) पर मेरे दो बच्चों ने जन्म लिया। नई गृहस्थी शुरू हुई। विश्व स्तर के परिवारों व बुद्धिजीवियों से गहरे सम्बन्ध बने, उसने मेरे लेखन (उपन्यास) को सम्मान दिया। यह भी सुखद आश्चर्य ही है।
ज़किया ज़ुबैरीः अब एक पर्सनल सवाल… आपका विवाह प्रो. रामचन्द्र शर्मा से हुआ… आप ठेठ शिया परिवार से हैं और पति राजस्थान के ब्राह्मण। जब प्रेम का बुखार उतरा होगा तो जीवन की कठोर सच्चाइयां ज़रूर सामने आई होंगी। इस रिश्ते को बनाए रखने के लिए आपको कितनी तपस्या करनी पड़ी? मुश्किलें तो ज़रूर सामने आई होंगी।
नासिरा शर्माः   रिश्ते बनते हैं। निभते हैं। वह रिश्ता ही क्या जिसके लिए पापड़ बेलने पड़ें। आज के देखते पहले का समय ज्यादा सहिष्णु और खुले दिल व दिमाग़ का था। इसलिए कोई लव जिहाद या खाप पंचायत या आनर किलिंग जैसा कोई अनुभव या घटना नहीं घटी। तब बहुत कुछ पी लिया जाता था। शायद उसका कारण आपका परिवेश और पारिवारिक माहौल और वर्ग पर भी बहुत कुछ निर्भर करता था। तो भी ऐसे विवाह कई कारणों से आपके जानने वालों के गले नहीं उतरते हैं उसमें चिन्ता के साथ असुरक्षा की भावना अपनी औलाद ख़ास कर लड़की को लेकर होती है। आम शादी में जो अरेंज मैरेज कहलाती है सब तरह से ठोंक बजाने के बाद, एक धर्म व खान-पान के बावजूद पति-पत्नी को एडजस्टमेन्ट की परेशानी होती है। तो ऐसे विवाह चिन्ता व परेशानी में बदल जाते हैं जब धर्म, वर्ग, कल्चर, तौर-तरीक़े अलग हों तो पहला ख़्याल आता है क्या पता निभे या न निभे? ऐसा हुआ भी है कि कुछ शादियाँ जेएनयू कैम्पस में टूटीं। उसमें आपसी मोहभंग अकेला कारण नहीं था बल्कि परिवार के सदस्यों का बेजा हस्तक्षेप था जो हमारे यहाँ कि आम रीत है। इस सबके बीच हमारी शादी कैसे चली उसके कई महत्वपूर्ण कारण थे। पहला यह कि हम धार्मिक कट्टर विचारों के नहीं थे। दूसरे हमने एक दूसरे पर अपना धर्म, परिवार कभी थोपने की कोशिश नहीं की तीसरे हमारे अपने रखरखाव से दोनों परिवार की तरफ से हमें प्यार भी मिला और आदर भी। उसकी सबसे बड़ी वजह थी कि हमने सोच लिया था कि किसी भी व्यक्ति के किसी भी बात का हमारे जीवन पर असर नहीं पड़ना चाहिए, उल्टा उनकी आहत भावनाओं को समझने की भी धैर्यपूर्वक कोशिश करनी होगी। मेरे परिवार में चिन्ता और कुछ को सदमा लगा मगर उनकी भाषा केवल दो तीन संतुलित वाक्यों पर समाप्त हो गई जैसे वंशवृक्ष में एक बदलाव आया। विवाह इस्लामिक रीति रिवाज से नहीं हुआ मगर यह सारी बातें न कभी नफरत में न तिरस्कार में न ही बायकाट में बदली। मेरी ससुराल लहसुन, प्याज़ तक से परहेज करने वाला आज भी है मगर मैंने कभी उनकी तरफ से किसी तरह की खटास महसूस नहीं की है। ऐसी शादियों में सबसे बड़ी शर्त होती है दिल व दिमाग को खुला रखना फिर सच तो यह है न इस्लाम इतना तंग है जहां एक हिन्दू न समा सके और न हिन्दू धर्म इतना संकरा है जहाँ एक मुसलमान साँस न ले सके। ऐसी शादियों में आपके परिवार का बर्ताव बहुत अहमियत रखता है। मेरे बड़े भाई ने तीन वर्ष बाद जब मैं इंगलैंड से लौटी तो वह डॉक्टर शर्मा को साथ ले गए और मस्जिद में उनसे रौशनी कराई। दूसरे घर में होने वाले धार्मिक समारोहों में वह सभी से डॉ. शर्मा को मिलवाते हुए कहते ”मेरे छोटे बहनोई।“ सब को अदब से सलाम और हाथ मिलाना पड़ता था। मगर इस ‘पुले-सरात’ से गुज़र कर जब हम ज़िन्दगी में आगे बढ़े तो ‘प्रोफेशनली’ हमको अहसास दिलाया गया कि हम कौन हैं। ऐसे मुट्ठी भर जड़ मानसिकता व संर्कीण दिल व दिमाग़ वालों के लिए हमारे पास कोई जगह न थी तो भी उन्होंने वक़्त वक़्त पर हमें नुक़सान पहुंचाने की कोशिश की और कभी कभी कामयाब भी हुए। हमने दो साथी, दो दोस्त, दो ऐन्टेलेक्चुएल की तरह जीवन जिया। बहुतों ने हमारी जिन्दगी से प्रभावित होकर शादी की और बेहद अच्छी जिन्दगी जी रहे हैं।
ज़किया ज़ुबैरीः  आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला आपके उपन्यास ‘पारिजात’ के लिए। जबकि ‘ज़ीरो रोड’, ‘कुइयाँजान’ की चर्चा साहित्य हल्कों में अधिक रही। यदि पुरस्कार किसी अनएक्सपेक्टिड कृति को मिले तो क्या लेखक की खुशी में कुछ कमी हो जाती या आनन्द की अनुभूति एक सी रहती है?
नासिरा शर्माः  एक वक़्त होता है जब लेखक को कई चीज़ों का इंतजार रहता है। समय के साथ वह सारे इन्तजार उदासीनता में बदल जाते हैं और उस की चाहतें कहीं आगे निकल जाती हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि अपने समय के महत्वपूर्ण पुरस्कार जब मिल रहे थे तब साहित्य अकादमी अवार्ड में शाल्मली, ज़ीरो रोड, ख़ुदा की वापसी, और मेरी कई पुस्तकें पुरस्कार की अन्तिम स्टेज पर पहुँची ज़रूर मगर पुरस्कार नहीं ले पाईं। यह ख़बरें मिलती थीं। इसलिए मुझे उम्मीद नहीं थी कि आगे मेरी किसी किताब पर साहित्य अकादमी पुरस्कार देगी वह भी ‘पारिजात’ जैसे उपन्यास को। जिसके विषय का पसन्दीदा दौर नहीं था। मुझे ताज्जुब ज्यादा हुआ था। रहा सवाल कुइयाँजान का वह शायद हर वर्ष व्यास सम्मान के लिए प्रकाशक द्वारा भेजी गई मगर हर बार नाकामी हाथ लगी। मुझे गिरिराज किशोर जी का एक वाक्य याद आ रहा है जो उन्होंने कहा था कि अब तो शर्म करो, उस पुस्तक को यूके कथा सम्मान मिल गया है। पुरस्कार को लेकर कुछ पता नहीं रहता है कि कब क्या होने वाला है। व्यास सम्मान मिला तो ‘कागज़ की नाव’ पर। जबकि ‘पारिजात’ व्यास सम्मान के लिए पहले चुनी गई थी। परन्तु तय यह पाया कि उस उपन्यास को अकादमी पहले ही चुन चुकी है इसलिए किसी दूसरे लेखक का कोई उपन्यास चुनते हैं। जीरो रोड भी व्यास सम्मान के लिए थी। रहा सवाल लेखक की खुशी और पसंद का तो वह उससे पूछा नहीं जाता है। इसलिए कुछ कहना ज़रूरी नहीं लगता। जिस उपन्यास को मिला आखिर थी तो वह मेरे द्वारा लिखी रचना।
ज़किया ज़ुबैरीः   आपके साथ लंदन में बहुत ख़ूबसूरत समय बीता था। वहाँ इस बारे में बात शुरू भी हुई थी मगर इधर-उधर हो गई। यह बताइये कि एक औरत पति, ससुराल, बच्चे सभी के लिए जीवन में एडजस्टमेंट करती रहती है। ऐसे में अचानक यदि पति का साथ किन्हीं कारणों से छूट जाए तो महिला को जब अचानक फ्रीडम का अहसास होता है तो कैसा लगता है … क्या इस विषय पर आपने कुछ लिखा है?
नासिरा शर्माः ज़िन्दगी अगर सहज रूप से बह रही हो सुख-दुख के साथ तो किसी एक का जाना बहुत खलता है क्योंकि चलता ढर्रा अचानक झटके से रुक जाता है। लेकिन विवाहित जीवन में घुटन है, बोरियत है और साथी से छुटकारा पाने की तमन्ना भी कभी कभी सर उठाती है तो उनके लिए दुख के साथ यह जुदाई एक राहत है। मैंने खासतौर से इस विषय को तो नहीं उठाया है मगर कहीं कहीं इस तरह के अहसास का बयान ज़रूर है। मैंने जो दूसरों की जिन्दगी देखी है उस में अक्सर सब कुछ अच्छा होता है या दिखता है मगर किसी एक को ज़्यादातर औरतों को लगता है कि यह जीवन एक जेलखाना सा हो गया है। उस समय मुझे कई बार लगा कि इन महिलाओं को आक्सीजन की सख़्त ज़रूरत है। इनको तन्हा परवाज़ करना चाहिए। आखिर इन्होंने सारी ज़िन्दगी चर्खी बन सब संभाला है अब इन्हें तन्हाई और आराम की जरूरत है। यह अहसास उस समय मुखर हो उठा जब मेरी सहेली के शौहर का इन्तकाल हुआ तो मेरे मुंह से अचानक निकला कि उनका बहुत बहुत शुक्रिया जो पहले जाकर उन्होंने कुछ वर्षों के लिए ही सही मेरी सहेली को मुक्ति दी जो अब वह राहत से सो और जाग सकती है अपनी तरह जी सकती है। भय और फिक्र से आज़ाद एक इन्सान की तरह अपने परिवेश को अपनी तरह देख और समझ सकती है जो उनका इन्सानी अधिकार रहा है। यह बात पुरुषों के लिए भी है। दरअसल विवाहित जीवन जब शोषण और सत्ता में बदल जाता है तो महल भी कैद खाना लगता है। प्रेम भी मर जाता है। आदत साथ रहने की बाक़ी रह जाती है।
ज़किया ज़ुबैरीः  सोशल मीडिया पर जो नारी विमर्श का घमासान चल रहा है, उससे हिन्दी साहित्य को क्या लाभ होगा। क्या पुरुष विहीन समाज की कल्पना की जा सकती है? इसी के साथ जुड़ा एक सवाल-विमर्श से साहित्य का नुकसान होता है या लाभ?
नासिरा शर्माः    जागरूकता तो आई है मौखिक रूप  से इसमें कोई शक नहीं है। लिखने वाले खूब लिख रहे है बोल रहे हैं। थेसिस तैयार हो रही है। कोर्स मौजूद है। बाल की खाल निकालने की बौद्धिक मशक्क़त भी जारी है। लेख व कहानी संग्रह, उपन्यास, कविता, नाटक, सेमिनार बहुत कुछ कई दशकों से चल रहा है। मगर सवाल यह है कि समाज की जड़ता उस पैमाने पर नहीं टूट रही है जितना इस विमर्श को लेकर चर्चा होती है। उसे जो व्यावहारिक रूप धारण करना चाहिए वह प्रभाव सार्थक रूप से बहुत कम दिख रहा है। बलात्कार, प्रेम और बेवफाई पर क्या कुछ साहित्य में महिला सशक्तीकरण को लेकर आज नहीं लिखा जा रहा है मगर मानवीय सम्बन्धों की पेचीदगियाँ उसी तरह बरकरार हैं। पहले बलात्कार होता था अब वह कम होने की जगह उसमें हिंसा शामिल हो गई है। दरअसल हम ही विमर्श करते हैं, हमी सुनते हैं और हमीं सराहते हैं। हाँ जो संस्थाएं गम्भीरता से ज़मीनी काम कर रही हैं वह ज़रूर कुछ संघर्ष कर रही हैं। रहा सवाल साहित्य का तो मैं कहना चाहूँगी कि मर्दों के विरुद्ध लिखे साहित्य का अम्बार जमा हो रहा है। एक तरफा विलाप है। मानव अधिकार का केवल अपने तक सोच का आख्यान है। यह सब कार्बन कापी की तरह ढ़ेर लग रहा है जो वहशतनाक है। मैंने इसी घुटन से घबरा कर अपने बाद के उपन्यासों में मुख्य किरदार पुरुषों के उठाए हैं। इस ख़्याल से कि कहीं सुन्दर सौम्य, नर्म दिल, पुरुषों का वजूद ही न मिट जाए साहित्य के इस दौर से। मेरे किरदार सिद्धार्थ, ज़हीर, रोहन दत्त, डॉक्टर क़माल तो हैं ही, इसके अलावा कहानियों में मर्दों के मानवीय किरदार भी मौजूद हैं जो अपनी अच्छाई और बुराई के साथ मौजूद हैं। जिन लेखकों ने लम्बे समय की मशक्क़त के बाद अपनी पहचान साहित्य में बनाई। उनके मुकाबले में स्त्री विमर्श पर लिखने वाले क़लम रातों रात अपनी पहचान बना चर्चित हुए। उनको पसंद करने वाले व आगे बढ़ाने वाले भी मौजूद थे जो इसका स्वागत कर रुदाली साहित्य का समर्थन कर महिलाओं को उसी में उलझाए रखना चाह रहे थे। इस शोर-शराबे में समाज-विमर्श भी है। जीवन की और इन्सान की हार व जीत की भी कहानियाँ लिखी जा रही हैं और बहुत शानदार लिखी जा रही हैं। यह कहानियाँ मेरी नज़र में ‘साहित्य’ है।
ज़किया ज़ुबैरीः  तीन तलाक के मामले में वर्तमान भारतीय सरकार की कड़ी आलोचना हुई है। मुस्लिम समाज ने इस पर आपत्ति भी जताई है। क्या आप निजी तौर पर तीन तलाक का समर्थन करती हैं या आपको लगता है कि इस पर बैन लगना ठीक है?
नासिरा शर्माः  भारत में बटवारे के बाद जाने अनजाने बड़े बदलाव आए। मुस्लिम समाज की रीढ़ की हड्डी जिसको मध्यवर्ग कहेंगे उसे बंटवारे और जमीन्दारी उन्मूलन ने तोड़ कर रख दिया और फसादों ने निम्नवर्ग को। ऐसी स्थिति में धार्मिक सत्ता मुसलमानों की रहनुमा बन गई और सरकार के लिए चुनाव बैंक। यह एक नज़रिया है दूसरा नज़रिया यह है कि इस्लाम क्या कहता है, शरियत क्या बताती है। यह बातें धुंधली पड़ती चली गईं। क्योंकि रोजी रोटी के लिए अशिक्षित मुल्लाओं का वजूद पनपा और अरबी न जानने वालों ने इन्हीं को रहबर माना। पैसा लेकर ‘फतवा’ छोटे पैमाने पर जारी कर पुरुषों की मर्ज़ी देख मुल्ला उस राह पर चल पड़े जो इस्लाम व शरियत से अलग था। पढ़े लिखे डिग्री प्राप्त मौलाना और मुट्ठी भर मुसलमानों की आवाज़ दब गई। इससे यह हुआ कि एक ग़लत रिवाज दरअसल सही रिवाज़ बन चल पड़ा और उसे ही मान्यता मिली। पढ़े लिखे मुसलमान इस वर्ग को ‘ज़ाहिल’ कह दाँत कटकटाते और यह वर्ग पढ़े लिखों को यह कह कर तिरस्कृत करता कि यह तो मुसलमान है नहीं। तीन तलाक़ कह कर मुक्ति पाना सभी को भाया। शरियत व क़़़ुरान की नसीहतों व क़ायदों को कौन मनता जहाँ कहा गया है कि तलाक होने से पहले तीन माह तक मियाँ-बीवी कई आयामों से गुज़रें उनके तलाक के कारण ठोस और ज़रूरी हों, उनमें वक्ती गुस्से और जोश में किये गए फैसले पर आधारित न हों। अक्सर तीन महीने की लम्बी अवधि में बहुत कुछ शाँत हो जाता है और घर टूटने से बच जाता है मगर टेलिफोन, तार और मुँहज़बानी तलाक का फैशन चल पड़ा जो हैरतनाक था। इसमें खर्चा पानी का सवाल और ज़रूरत भी खत्म कर दी गई। बात शाहबानों से उठी और गलत रिवाज़ वालों ने हाय-तौबा मचा दी। उनमें बहुत बड़ी तायदाद में लोग शामिल हुए थे। इसमें कोई शक नहीं है कि जो फैसला आरिफ मुहम्मद खान के इस्तीफे के साथ ठंडे बस्ते में चला गया उसे प्रधानमंत्री मोदी जी ने अवैध क़रार दे दिया जिससे वही लोग विचलित हुए जो पहले ग़लत रिवाज के हामीं थे। बेशक यह फैसला एक सकारात्मक क़दम हैं परन्तु इसमें जहाँ सही शरियत व क़ुरान का समर्थन है वहीं पर बहुत से ऐसे पक्ष हैं जो अंत में मर्द को सुधरने की जगह अपराधी बनाते हैं और औरत को पत्नी के रूप में अनेक तरह की दुश्वारियों में डालते हैं और शौहर के घर वालों को लावारिस स्थिति में डाल कर एक नई तरह की सामाजिक समस्या को सामने ला खड़ा करते हैं। इस तरह से इस फैसले की जो हिलती चूलें है। उन्हें फिर से देखना और समझना होगा। इसमें संशोधन के साथ सभी भारतीय स्त्रियों को शामिल करना चाहिए जिस तरह बरसों पहले दूसरी शादी के लिए क़ानून बना था कि उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। औरतों को टुकड़े-टुकड़े में अधूरा न्याय देना असल में बद से बदतर स्थिति की सम्भावना को बढ़ाना है।
ज़किया ज़ुबैरीः  ‘ख़ुदा की वापसी’ संग्रह की कहानियों को लिखने का ख़्याल कैसे आया?
नासिरा शर्माः   शाहबानों के केस के बाद। इसमें शरियत-ला को लेकर कहानियाँ गूंथी गई हैं ताकि सभी औरतों को दूसरे धर्म की औरतों को लेकर जो क़ानून बने हैं उनका ज्ञान हो। जज़्बात से लड़ाईयाँ जीती नहीं जाती हैं। आपको अपने धार्मिक व देश के क़ानून का पूरा ज्ञान होना चाहिए। जो वास्तव में हमारे पास नहीं था। हम पढ़ लिख कर भी मौलवियों से बहस की स्थिति में नहीं थे। जो पुराना धर्म या क़ानून होता है वह समय के साथ अपने आप सूखे पत्तों के साथ झड़ जाता है, क्योंकि ज़िन्दगी किसी भी धर्म और विचारधारा से आगे निकल जाती है और नई मानवीय समस्याएँ अपना हल नए तरह से ढूंढती हैं उनका हल पुराने क़ानून में न लिखा होता है न ही वह वर्तमान की स्थिति में किसी काम का होता है। इसलिए इस्लाम ‘हुज्जत’ और ‘बहस’ की इजाज़त देता है। साथ में यह भी कहता है कि यह रहा शरियत ला अगर नहीं मानते हों तो ठीक है। तुम्हें ऊपर वाले ने अक़्ल दी है। उसका इस्तेमाल करो। अपनी करनी के ज़िम्मेदार ख़ुद बनो।

5 टिप्पणी

  1. आदरणीय ज़किया जी द्वारा लिया गयासाक्षात्कार बहुमत
    अच्छा है नासिराजी के कृतित्व की पूरी जानकारी से सराबोर
    है ।

  2. नासिरा आपा से ज़किया जी की ये बातचीत एक दृष्टिसम्पन्न वरिष्ठ लेखिका को जानने का सुख देती है और हम जैसों को एक दृष्टिकोण से समृद्ध भी करती हैं। पुरवाई टीम और जकिया जी का आभार ये बातचीत उपलब्ध कराने के लिए।

  3. रौनको के लुट जाने का समय एक आंधी की तरह आता है , और जज़्बातन हम ये सोचते हैं कि हम उस आंधी को परास्त कर देंगे; नादाँ जज़्बात राजिस्थानी अंधड़ को पुरवाई समझते हैं!

    इस रोचक व् ज्ञान वर्धक भेंट वार्ता के लिए पुरवाई परिवार को धन्यवाद!

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