Thursday, March 5, 2026
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दीपक गिरकर की कलम से – समाज के विविध रंगों की लघुकथाओं का संग्रह

पुस्तक  : संवेदनाओं का स्पर्श (लघुकथा संग्रह)
लेखक  : रश्मि चौधरी
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, सी – 46, सुदर्शनपुरा, इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर – 302006 
मूल्य   : 250/- रूपए
“संवेदनाओं का स्पर्श” रश्मि चौधरी का दूसरा लघुकथा संग्रह है। इनका पहला लघुकथा संग्रह “श्वेत सतह” काफी चर्चित रहा था। एक दर्जन से अधिक साझा लघुकथा संग्रह में आपकी लघुकथाएँ प्रकशित हो चुकी हैं। देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और साहित्यिक पत्रिकाओं में आपकी लघुकथाएँ निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। रश्मि चौधरी ने तीन लघुकथा संकलनों का संपादन भी किया हैं। लेखिका ने इस संग्रह की लघुकथाओं में मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार और पारस्परिक संबंधों का ताना-बाना प्रस्तुत किया है। इस संग्रह की रचनाओं में रचनाकार मानवीय स्वभाव और समाज की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए दिखती हैं। लेखिका ने बहुत ही सटीकता से सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों के ह्रास के प्रति चिंता व्यक्त की है। इनकी लघुकथाएँ हमारे आसपास की हैं। अधिकतर लघुकथाएँ भावनात्मक और मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत हैं। 
संग्रह की पहली लघुकथा आराधना” लघुकथा दर्शाती है कि धार्मिक अनुष्ठान और आस्था का वास्तविक रूप तब ही पूरा होता है जब हम उन लोगों की मदद करते हैं जो असहाय और भूखे हैं। पंडित जी का यह विचार यह संकेत करता है कि मंदिरों में या किसी भी धार्मिक स्थल पर पूजा-पाठ तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक उन स्थानों के बाहर की वास्तविक जरूरतें पूरी नहीं होतीं। टिफ़िन पार्टी” लघुकथा में सचिन और उसकी पत्नी अपनी शादी की सालगिरह पर गाँव के गरीब बच्चों के साथ टिफ़िन पार्टी करते हैं। वे बच्चों के लिए गिफ्ट्स भी लाए हैं।  बच्चों के चेहरों पर मुस्कराहट देखकर आज उनकी सालगिरह शानदार मन जाती है। “मेरे अपने” में अनाथाश्रम के बच्चे वृद्धाश्रम में वृद्धों के साथ ही रहेंगे, यह जानकर वृद्धाश्रम के बुजुर्गों के चेहरे खिलखिला उठे। “सेंध” रचना में आज रमिया खेत पर मालिक को देखकर परेशान हो जाती है क्योंकि आज रमिया खेत पर अपने साथ गुड्डो और मन्नी को भी लाई थी। रमिया मालिक की गंदी नजर पहचानती थी। “जीविका” लघुकथा में शिव मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए चन्दा इकट्ठा किया जा रहा था। मंदिर के बाहर बैठने वाले कुछ भिखारी भी इसमें चन्दा देते हैं। जब कार्यकर्ता बोलते हैं कि आप लोग चन्दा मत दीजिए, तब भिखारी बोलते हैं कि इस मंदिर के कारण ही हमारी जीविका चल रही हैं। एक बुजुर्ग भिखारी सिक्कों से भरी पोटली दान में दे देता है। “ऊँच-नीच” एक बाल मन की लघुकथा है, जिसमें सोनिया के पास ढेर सारे खिलौने, डॉल हाउस, बार्बी और महंगे खिलौने होने के बावजूद भी वह अपनी गरीब सहेली मुनिया के घर जाकर साधारण गुड़ियों के साथ तन्मय होकर खेलती है। ‘बढ़कर कौन” रचना में अमित और सुमित में इस बात को लेकर बहस छिड़ जाती है कि माता-पिता और ईश्वर में कौन बढ़कर है। सुमित कहता है कि माता-पिता तो ईश्वर से भी बढ़कर है क्योंकि ईश्वर तो मनुष्य को सुख और दुःख दोनों देते हैं जबकि माता-पिता अपने बच्चों को सिर्फ सुख देते हैं। “पुराने ख़यालात” में मकान मालिक का एक सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण व्यक्त किया गया है। जब लिव-इन रिश्ते में रहने वाली लड़की के अन्य लड़के से विवाह की खबर मिलती है, तो मकान मालिक स्तब्ध हो जाते हैं, क्योंकि यह परंपरागत सोच और सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ प्रतीत होता है। मकान मालिक का कहना कि “मैं बहुत पुराने ख़यालातों का व्यक्ति हूँयह इस बात को दर्शाता है कि वह पारंपरिक विचारधारा और मूल्य प्रणाली को मानते हैं, जो इस प्रकार के रिश्तों को स्वीकार नहीं करती। “ईश्वरस्वरूपा” रचना में आदित्य सक्सेना का एक ऑटो से एक्सीडेंट हो जाता है। आदित्य सक्सेना को एक महिला टैक्सी में बैठाकर अस्पताल ले जाती है, उस महिला की साड़ी खून में भर जाती है।  वह आदित्य को अस्पताल में एडमिट करवाकर, पर्स में जितने पैसे से, सारे अस्पताल में जमा कराकर, आदित्य का इलाज चालू करवाकर यह कहते हुए अस्पताल से निकल जाती है कि हे भगवान, अब कभी किसी माँ की गोद सूनी न करना। “भावनाएं” रचना में किन्नरों की मुखिया का यह वक्तव्य एक गहरी मानवीय संवेदनशीलता को दर्शाता है। वह अपने साथियों से कहती है कि जैसे वे खुशी के मौके पर लोगों के साथ खुशियाँ बाँटने जाते हैं, वैसे ही दुःख के समय भी दुखी लोगों के साथ ग़म बाँटना चाहिए। किन्नरों की मुखिया का यह कथन एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश है, जिसमें वह यह सिखाती हैं कि दुख और दुःख की घड़ी में एक-दूसरे के साथ होना, सहानुभूति और संवेदनशीलता का प्रतीक है। “अहमियत” लघुकथा में लेखिका का यह कथन एक तीखा और गहरी सोच को प्रकट करता है, जब वह कहती हैं कि “कि, दादा-दादी और पिताजी की तस्वीरों की अहमियत बस श्राद्ध तक ही है,” तो यह एक कटाक्ष है समाज की उस मानसिकता का, जहाँ परंपराओं और रिश्तों की अहमियत केवल एक विशिष्ट अवसर तक ही सीमित रहती है। लेखिका का यह बयान यह संकेत करता है कि हमारे समाज में कुछ परंपराओं और रिश्तों को केवल रस्म अदायगी के रूप में देखा जाता है, जैसे श्राद्ध के समय इन तस्वीरों को विशेष स्थान मिल जाता है, लेकिन बाकी समय इनकी कोई विशेष महत्ता नहीं रहती। “जैसी कथनी वैसी करनी” रचना में पर्यावरण प्रेमी के चरित्र के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि वास्तविक पर्यावरण संरक्षण केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह किसी के कर्मों में भी दिखाई देना चाहिए। यहाँ पर जब पर्यावरण प्रेमी रास्ते में पिंजरे में बंद तोतों को देखता है, तो उसकी संवेदनशीलता उसे प्रभावित करती है और वह केवल भाषण नहीं देता, बल्कि वह अपने कर्म से पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित करता है। वह सभी तोतों को खरीदकर पिंजरे से मुक्त कर देता है, जिससे यह दर्शाया जाता है कि वह न केवल पर्यावरणीय मुद्दों पर बात करता है, बल्कि उसे सुधारने के लिए सक्रिय रूप से कदम भी उठाता है। “संवेदनाओं का स्पर्श” शीर्षक लघुकथा में लेखिका ने जीवन की नश्वरता और संवेदनाओं की गहराई को बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है। माँ ने अपनी बगिया की देखभाल में अपना पूरा जीवन लगा दिया था, और यह बगिया उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी। जब उनका अंतिम समय आया, तो उनकी अर्थी आँगन में रखी गई और उसके ऊपर बोगनवेलिया की बेल फैली हुई थी, जो माँ के जीवन से जुड़ी हुई एक सुंदर स्मृति थी। महामारी काल में, जब स्वजनों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए फूलमाला नहीं मिल रही थी, तभी अचानक तेज हवा के झोंके से बोगनवेलिया के फूल उनकी अर्थी पर गिर गए। यह दृश्य एक गहरी संवेदनात्मक सजीवता को उजागर करता है। यह एक उत्कृष्ट लघुकथा है।              
“कड़वी बात”, “मिटटी के लड्डू”, “अनुपयोगी फल” जैसी लघुकथाएँ पर्यावरण हेतु सुंदर संदेश देती हैं। “गुलाबी रिश्ता”, “दिखावा”, “अपने-पराये”, “सिलवटें”, “आजादी डे”, “सम्मान” जैसी लघुकथाएँ यथार्थवादी जीवन का सटीक चित्रण है। इस संग्रह की अन्य लघुकथाएँ मन को छूकर उसके मर्म से पहचान करा जाती है। इस तरह इस संग्रह में कुल 65 लघुकथाएँ हैं। प्रत्येक लघुकथा अपने अंदर कोई कोई मूल्य या संदेश लिए हुए है।
समाज की जो संवेदनाएं दफ़न हो गई है, उनको उघाड़ने और जागृत करने का सफल प्रयास रचनाकार ने अपनी लघुकथाओं में किया है। लघुकथाकार जीवन की तल्ख़ सच्चाइयों से रूबरू करवाती है। जीवन की विविध मार्मिक घटनाओं पर रचनाकार की बारीक दृष्टि काबिलेतारीफ है। है। इस संग्रह को पढ़कर दोनों लेखिका के मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था, उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय मिलता है। इस संग्रह की रचनाओं में रचनाकार नारी के मन की उथलपुथल, मानवीय स्वभाव और समाज की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए दिखती हैं। इस संकलन की रचनाएँ अपने आप में मुकम्मल और उद्देश्यपूर्ण हैं और पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती हैं। रश्मि चौधरी ने इन लघुकथाओं में समाज के मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रों को संवेदना के साथ उकेरा हैं। कुल मिलाकर मानवीय स्वभाव और समाज के विविध रंगों की लघुकथाओं का यह संग्रह रिश्तों की अहमियत पर व्यापक प्रकाश डालता है और साथ ही समाज को आईना भी दिखाता है। आशा है प्रबुद्ध पाठकों में इस लघुकथा संग्रह का स्वागत होगा। 
दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर- 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : [email protected]
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