एक लेखक का सबसे बड़ा दुःख यह कि वह लिखना तो चाहता है लेकिन लिख नहीं पाता. उसके जेहन में प्लाट आवारा बादलों की तरह उमड़-घुमड़ रहे होते हैं लेकिन वे बरसते नहीं है. उस समय उसकी आँखें प्रतीक्षारत किसानों जैसी हो जाती हैं. वह विकल्प ढूंढता है. लेखन के बाद पढ़ना सबसे सुन्दर विकल्प है. लेकिन पढ़ने से भी मन उचाट हो जाये तो मुश्किलें बढ़ जाती हैं. ऐसा कई बार होता है. इसके कुछ आंतरिक और बाह्य कारण होते हैं. समय ही इससे छुटकारा दिला सकता है. कभी-कभी अच्छा क्रिकेटर भी फॉर्म में नहीं होता है. शायद यह सभी पेशों में होता है. लय में लौटने की खुशी अनमोल है. शब्द मोती की तरह झरने लगते है. बल्ले से धुआंधार रन निकलने लगते है. क्या लेखक को प्रेमी की तरह प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए. प्रेयसी मिले या न मिले अभिसार स्थल की ओर जाना ही चाहिए. (पिछले दो माह से ऐसी ही मनःस्थिति से गुजर रहा हूँ.)
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पथिक क्यों भटक गए ?
आसपास के लोगों के बारे में सोचता हूँ. देखता हूँ. ख़बरें पढता हूँ. होश संभालने के साथ-साथ थोड़ी बेहोशी भी छाने लगती है. रास्ते में धुंध सी. रास्ते सही दिखलाये,बतलाए जाते हैं .पथिक ही थोड़ा सा भटक जाता है. जानता है कि वह अकेला है पर अकसर भूल जाता है. मनमोहक दृश्य उसके पाँव रोकते हैं. उसकी गति कम हो जाती है. वह कंकड़-पत्थर के बीच हीरे तलाशने लगता है. उसे कुछ चमकदार चीजें मिलती हैं. वह उन्हें ही हीरा समझ लेता है. उसे किसी गुणी जौहरी से भेंट नहीं होती. यदि सौभाग्य से मिला भी तो वह उनसे मिलना नहीं चाहता. वह अपनी रौ- रफ़्तार में बढ़ता जाता है. उसे रास्ते में पड़े पत्थर से चोट भी लगती है. उसके पाँव लहूलुहान हो जाते हैं. मगर वह रुकता नहीं है. उसकी आँखों में माया-लोक बसता है. वह अपने बारे में कम अपनों के बारे ज्यादा सोचता है. प्रिय पत्नी,पुत्र ,पति आदि को बेशुमार खुशियाँ देने का बोझ अपने दुर्बल कंधों पर उठा लेता है. उसकी कमर झुक जाती है. वह रास्ता भटक जाता है. ऐहिक लिप्सा इसके बाद आती है. ख्वाबों की पूर्ति में उसके अपने ख्वाब बिखर जाते हैं. वह गलत को गलत समझते हुए भी उसी रास्ते पर बढ़ता जाता है. जौहरी के सामने जब अपनी पोटली खोलता है तो उसमें कंकड़ के सिवा कुछ नहीं निकलता है. अफसोस कि इन्हीं कंकड़ों के लिए उसने पूरा जीवन व्यर्थ बिता दिया.
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राँची
07.11.2025
पिछले दो महीने से लिखना-पढ़ना लगभग बंद है. अगस्त के अंतिम सप्ताह में घर जाना हुआ और कुछ अप्रत्याशित घटना क्रम से बेहद तनावपूर्ण और बहुत हद तक भय का माहौल बाहर-भीतर बना रहा. कभी-कभी निर्दोष मनुष्य भी आरोपों के शिकार हो जाते हैं. मेरे यहाँ एक लोकोक्ति प्रचलित है जिसका आशय है-दुनिया श्री राम की भी नहीं हुई. सचमुच यही दुनिया है. गाँव में भले स्वच्छ हवा-पानी है लेकिन शुद्ध ऑक्सीजन लेने वाले अधिकांश नराधम वातावरण को विषाक्त करने में जुटे रहते हैं. सूर्योदय के पश्चात दूसरों के अहित ,निंदा ,अपकार और क्षति पहुंचाने का उनका कार्यक्रम शुरू हो जाताहै. गाँव अब काजल की कोठरी बन गया है और यहाँ बेदाग़ रहने की कोरी कल्पना करने का कोई लाभ नहीं है. गांवों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है. पक्के मकान बन रहे हैं. लोन की सुविधा हो गयी है. दो पहिये से चार पहिये तक सड़कों को रौंद रहे हैं. गति से प्रगति का हिसाब आँका जा सकता है. दरवाजे पर बैठे हुए बहुधा एहसास हुआ कि सभ्य आदमी की सवारी भी सभ्य होती है. उसका व्यवहार-विचार सौम्य होता है. गाँव के अधिकांश लोगों का मन-मस्तिष्क अब भी उन्नीसवीं शताब्दी की घेराबंदी को नहीं तोड़ सका है. कोई वैचारिक प्रगति कहीं नहीं दिखती. यह कितना दुखद है कि तीस वर्ष पूर्व जहाँ गाँव को छोड़ आया था,वह आज भी वहीं ठिठका खड़ा है.
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जीवन के दो चित्र
वर्षों पूर्व भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा पढ़ा था. उसका रोमांच आज भी याद है.इस उपन्यास का दुखद यथार्थ यह है कि इसे पढ़ने के बाद आप बिलकुल रिक्त हो जाते हैं. असहाय,निरुपाय दिखने लगते हैं. मन के भीतर सन्नाटा पसर जाता है. मनुष्य मात्र के असहाय होने का बोध होने लगता है. परन्तु यह एक तथ्य है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता. सवाल यह उठता है कि क्या मनुष्य समस्याओं के समंदर में तिनके की तरह बह रहा है.उसकी कोई हैसियत नहीं है? वह क्या हाथ-पैर नहीं चला सकता? क्या वह धारा के विरुद्ध तैर नहीं सकता? क्या वह धारा को अपने अनुकूल मोड़ नहीं सकता? ये सब प्रश्न शाश्वत किस्म के हैं. इन पर सदियों से माथापच्ची हुई है और होती रहेगी. विश्व के दार्शनिक और लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से समाधान देने की कोशिश करते रहे हैं. चित्रलेखा में भी निराशापूर्ण ही सही एक तसल्ली देने वाला समाधान तो है ही. फिर भी इतना तो सत्य है कि हम अपनी बनी-बनाई दुनिया से संतुष्ट नहीं हैं. कुछ लोगों को जीने की खुशफहमी है. पर जीवन तो बहुत दूर खड़ा बच्चे की तरह मुस्करा रहा होता है. यह बड़ा शरारती है. हम इसे पकड़ने का उद्यम करते हैं,वह भाग खड़ा होता है. भगवती बाबू ने यह पाठ तो हमें पढ़ाया ही है कि हम कितने विवश है! दैनिक जीवन में सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोगों की विवशता पढ़िए. वे कितने असहाय और दुखी भी हैं, इसका एहसास बहुत कम लोगों को है. हम अनेक बार अपने ही सपनों को टूटते-बिखरते देखते हैं. ऐसी स्थितियां होतीं हैं कि हाथ मलते रहते जाते हैं. पछतावा और दुःख इनकी प्रतिक्रियाएं हैं . इन पंक्तियों को लिखते हुए मुझे जैनेन्द्र की कहानी खेल की अनायास याद आ गयी. जीवन इनके दो पात्रों मनोहर और सुरबाला में है. यह कहानी हमें जीवन का अर्थ समझाती है. कलेवर बड़ी होने से कोई रचना बड़ी नहीं हो जाती है. कभी-कभी एक कहानी उपन्यास पर भारी पड़ जाती है. यहाँ मैं चित्रलेखा और खेल की तुलना नहीं कर रहा हूँ. केवल दो स्थितियों को प्रस्तुत कर रहा हूँ. ये जीवन के दो चित्र हैं. जाहिर है कि दूसरा चित्र मनोरम और प्रीतिकर है पर यह हमें स्वीकार्य नहीं है. इसका कारण बतलाने की आवश्यकता नहीं है.
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राँची
16.11.2025
कमीना है लेकिन प्यार भी बहुत करता है
कहानी की दुनिया में मेरी हैसियत एक पाठक से अधिक नहीं है. जैसे कविताएँ पढ़ता हूँ,वैसे ही कहानियां भी. पढ़ने के क्रम जो अनुभूति होती है,उसे दर्ज करने के सुख से स्वयं को वंचित नहीं करना चाहता. समकालीन कहानी का परिदृश्य लेखकों, आलोचकों और पाठकों के सामने है. कुछ अच्छी कहानियां ओझल हो जातीं हैं तो अपेक्षाकृत औसत या कम अच्छी कहानियां भी चर्चित हो जातीं हैं. यह कह कर लेखक संतोष कर लेता है कि समय एक न एक दिन उसका मूल्यांकन करेगा. आज इसी सन्दर्भ में कुछ बातें और एक कहानी भी चर्चा के लिए लूँगा. इसके पूर्व एक बात. पानी में कोई रंग मिला दें तो वह प्रदूषित हो जायेगा. शर्बत भले ही पीने में स्वादिष्ट लगे लेकिन उससे प्यास नहीं बुझती. इसी तरह कहानी, कहानी है और कविता कविता . कुछ भी आरोपित हो उससे उसकी शक्ल-सूरत बिगड़ जाती है और जायका भी. यह कोई नसीहत नहीं एक पाठक का अनुभव है.
कल शाम संयोग से नया ज्ञानोदय में रूप सिंह चंदेल की कहानी कमीना पढ़ी. कथा-नायिका पत्रकार है और उसी दफ्तर में कार्यरत एक पत्रकार से उसे प्रेम हो जाता है. उसकी सहेली कथा नायक के बारे में उसे विस्तार से बताती है और चेतावनी देती है कि वह पहले से भी लड़कियों को फ्लर्ट करता रहा है और एक ही बार में दो-दो लड़कियों के साथ उसका रोमांस चलता रहता है. वह उसे चेतावनी देती है कि सोच-समझ कर निर्णय लेना. लेकिन वह प्रेम ही क्या जो सोचने-समझने का अवकाश और घाटे-मुनाफे का गणितीय विवेक दे. लिहाजा लड़की उसके प्रेम में आँख मूँद कर डूब जाती है. वह अपने पूर्व परिचित एक महिला वकील जिसे वह अभिभावक -स्वरूप समझती है की उपस्थिति में आनन-फानन में विवाह रचा लेती है. नायक तो घोषित मनचला है. महीने भर के अन्दर उसका वास्तविक चेहरा सामने आ जाता है. हर दो-चार दिनों के अन्तराल पर वह पत्नी को शराब पीकर पीटता है. लड़की रो-रोकर वकील को अपना दुखड़ा सुनाती है और तलाक लेने के लिए कागजी कार्रवाई करने का अनुरोध करती है. यहाँ तक कि वकील के यहाँ जाती भी है. उसके बार-बार अनुरोध करने जब वकील सारे कागजात तैयार करती है और उसे फ़ोन कर हस्ताक्षर बुलाती है तो यह कह कर टाल देती है कि इस बार उसके पति ने माफी मांग ली है. यदि अगली बार वह प्रताड़ित करता है तो वह अवश्य आयेगी. परन्तु पति के प्रताड़ना का सिलसिला जारी रहता है. वह हर बार रोती है और वकील को फ़ोन लगाकर अपना दर्द सुनाती है. चौथी-पांचवी बार ऐसी घटना घाट जाने के बाद एक दिन वकील उससे पूछती है कि इतनी मारपीट सह कर तुम क्यों उसके साथ रहना चाहती हो . वह कहती है कि मैम है तो कमीना लेकिन प्यार भी बहुत करता है. कहानी समाप्त हो जाती है. अब इस पर विमर्श तो खूब किया जा सकता है. मसलन नायिका कमजोर है,नालायक है. नौकरीपेशा होने के बावजूद कष्ट सहने और प्रताड़ित होने की मजबूरी क्या है. उसे बोल्ड होना चाहिए. आदि-आदि. पर इस प्यारी कहानी का इतना क्रूर पोस्टमार्टम मेरे जैसा सहृदय पाठक क्यों करना चाहेगा. जिस तरह भ्रमर कमल के फूल का रसपान करते हुए उसके कोष में इस तरह बेसुध होकर बंध जाता है कि उसे रात होने का भान तक नहीं होता और सूर्योदय के पश्चात कमल के पुनः खिलने पर ही वह उससे बाहर निकल पाता है, कहानी-पाठ के पश्चात मुझे ऐसी ही अनुभूति हुई .
प्रेम में पड़ा मन ज्ञानी नहीं ध्यानी हो जाता है. वह दुःख में भी सुख के उत्स ढूंढ निकालता रहता है. ऊँचे पद पर काम करने वाली,शक्ति-साधन संपन्न पुरुष-स्त्री भी इस बंधन से नहीं निकल पाते. वे कमजोर नहीं हैं. वे अभागे नहीं हैं. इन प्रेमियों की एक अलग दुनिया है जिनके लिए प्यार व्यापार नहीं है. प्रेम उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न है जिसके उत्तर तलाशने में वे पूरी जिन्दगी बिता देते हैं. आलोचक या सामान्य पाठक कह सकता है कि वे अपनी जिन्दगी बर्बाद कर रहे हैं .पर वास्तविकता यह नहीं है. उनकी अपनी दुनिया है जो विष में भी जीवन ढूंढ रहे हैं. इस कहानी को मैंने ऐसे ही पढ़ा. इसको पढ़ते हुए वर्षों पूर्व सुना हुआ एक भोजपुरी गीत याद आया-
लठिया से मारी-मारी देहिया देलक तुड़
सैंया मारे तहिया मछरी खियावेला जरूर.
(नायिका रो-रो कर कह रही है कि उसके पति ने लाठी से मार-मार कर देह तोड़ दिया है लेकिन जिस दिन मारता है उस दिन मछली अवश्य खिलाता है.)
दुनिया के अनेक रंग-रूप हैं. कथाकार या कवि उन्हीं रंग-रूपों को तटस्थ भाव से दिखाता है. यही तटस्थता किसी रचना में कलात्मक सौंदर्य भरती है. कहानी में नायिका की जगह नायक को भी रख कर देखा जा सकता है.
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दिनांक:15.12.2025
कल रात नींद उचट गयी. नींद जब टूट जाती है तो बहुत मनुहार के बाद भी नहीं आती है. आता है तो विचारों का तूफ़ान. न जाने क्यों सुबह होते ही वे सारे विचार दूर देश के पक्षी की तरह उड़ जाते हैं,अदृश्य हो जाते हैं. उनका इस तरह गुम हो जाना रचनात्मक क्षति है. प्रतिष्ठित लेखक उससे समय विचारों को लिपिबद्ध कर लेते हैं. मेरा शत्रु आलस्य और समय पर सही निर्णय नहीं लेने की काहिली है-दुखिया दास कबीर है,जागे अरु रोवे.
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जिन्दगी समझौता एक्सप्रेस है
कहा जाता है कि सामान विचार वालों की दोस्ती निभती है. दाम्पत्य जीवन में भी पति-पत्नी के विचारों में समानता आवश्यक है. पर ऐसा कहाँ हो पाता है. यह संभव भी नहीं है. दो व्यक्ति एक समान हो ही नहीं सकते. यह सर्वथा प्राकृतिक है. समान हो जाएँ तो भारी विषमता पैदा हो जाएगी. उथल-पुथल मच जाएगा. विज्ञान का सिद्धांत हैरत में डालता है. यहाँ समान ध्रुवों में विकर्षण होता है. विद्युत् धारा के सुचारू संचरण के लिए धनात्मक और ऋणात्मक विन्दुओं का योग अनिवार्य है. यदि प्लस को प्लस से जोड़ दें तो स्पार्किंग होगा,आग लगेगी. इस तरह हम समझ सकते हैं कि कनेक्टिविटी यदि सही है तो विद्युत धारा बहेगी, प्रकाश फैलेगा. गलत कनेक्टिविटी अन्धकार का कारक है. यह खतरा पैदा करने वाला है. ज्ञानी या संत स्वभाव का व्यक्ति विपरीत विचारों के इंसानों के साथ भी तालमेल बिठा लेता है. उसका प्रभामंडल ऐसा होता है कि स्याह भी उसके सानिध्य में थोड़ी देर के लिए ही सही रौशन हो उठता है. जीवन पहेली है. इसे सुलझाने बैठोगे तो जीवन बीत जाएगा. हरेक की समस्या का एक समाधान नहीं है. कुल मिलाकर जीवन समझौता एक्सप्रेस है. सवार हो जाओ और गंतव्य तक पहुँच जाओ. जरूरी नहीं कि सहयात्री सहयोगी हों .पर यह याद रखना जरूरी है कि सफ़र छोटा ही है.
जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि मन उचाट हो जाता है,और किसी भी काम में मन लगता नहीं। अगर आप लेखक हैं तो जाहिर है लिखने और पढ़ने में भी मन नहीं लगता।
तो फिर हमें अपनी दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिये।
अपने दैनिक नियमों को तोड़कर भी अपन कभी-कभी आनंद लेने का प्रयास करें।
सुबह जल्दी उठें। ऊगते हुए सूर्य को देखिये, प्रकृति को निहारिये। अपने अच्छे मित्र से बात कीजिये।भगवान को मित्र बनाइये।उनसे सब कह दीजिये। कुछ काम बेवजह भी कर लीजिए,बस यह ध्यान रहे कि किसी का नुकसान ना हो, किसी को दुख न पहुंचे।
सच! बहुत अच्छा लगेगा। हम ऐसा सोचते हैं और ऐसा ही करते हैं बुरे वक्त में।
बहरहाल आपको पढ़कर मामला गंभीर लगा।
जब स्थितियाँ विपरीत हों सारा ढेर ईश्वर के सामने डाल कर कह दीजिएगा कि आपका दिया हुआ है आप ही संभालें। सब भूलकर एक नई किताब की तरह सामने देखकर नए दिन को एंजॉय करें। एक बार करके देखिए बहुत अच्छा लगेगा। अगर कुछ बुरा भी होगा तो वह किसी अच्छे के लिए होगा।
बस एक छोटी सी सलाह।
क्योंकि जिंदगी में सभी के साथ कभी ना कभी इस तरह की स्थिति बनती हैं।
पर हमारी प्रेरणा है-
“वक्त ने सौ बार ललकारा मुझे”
“मैं सृजन के गीत गाती रही”
यह संसार तो अवतारों के लिए भी सहज नहीं रहा।
अपने मन को अपन ही समझा सकते हैं।
दिन बदलता है और नए ख्याल घेर लेते हैं एक के बाद एक , शुरुआत में कुछ लिखने को मन नहीं कर रहा था फिर भी यही विषय को केंद्रित कर बहुत कुछ लिखी गई। कभी कभी ऐसा होता है मेरे साथ भी। इस धारणा में बहकर के बात सामने आ गई, चित्रलेखा और खेल की अनायास। ऐसे कई विचारों के उथल पुथल में मन हिलोरें खाता रहता है , यह आम बात है। इससे घबराना नहीं बस फिर से खुद को तैयार करने के लिए अवसर देना है। वहीं शराब पीकर मारते हुए पति से अलग होने की सोच, पर अलग होकर भी जिए तो कैसे प्रेम बिन जीवन अधूरा हो जाता है।
आकर्षण और विकर्षण का तथ्य भी सामान्य है , मगर आग और पानी के मिलन से शून्य रह जाता है, प्लस और माईनस से ही बिजली पैदा होता है। बहुत अच्छी थ्योरी।
https://www.thepurvai.com/diary-excerpts-of-lalan-chaturvedi/
१-लेखक का दुख महसूस हुआ!
जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि मन उचाट हो जाता है,और किसी भी काम में मन लगता नहीं। अगर आप लेखक हैं तो जाहिर है लिखने और पढ़ने में भी मन नहीं लगता।
तो फिर हमें अपनी दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिये।
अपने दैनिक नियमों को तोड़कर भी अपन कभी-कभी आनंद लेने का प्रयास करें।
सुबह जल्दी उठें। ऊगते हुए सूर्य को देखिये, प्रकृति को निहारिये। अपने अच्छे मित्र से बात कीजिये।भगवान को मित्र बनाइये।उनसे सब कह दीजिये। कुछ काम बेवजह भी कर लीजिए,बस यह ध्यान रहे कि किसी का नुकसान ना हो, किसी को दुख न पहुंचे।
सच! बहुत अच्छा लगेगा। हम ऐसा सोचते हैं और ऐसा ही करते हैं बुरे वक्त में।
बहरहाल आपको पढ़कर मामला गंभीर लगा।
जब स्थितियाँ विपरीत हों सारा ढेर ईश्वर के सामने डाल कर कह दीजिएगा कि आपका दिया हुआ है आप ही संभालें। सब भूलकर एक नई किताब की तरह सामने देखकर नए दिन को एंजॉय करें। एक बार करके देखिए बहुत अच्छा लगेगा। अगर कुछ बुरा भी होगा तो वह किसी अच्छे के लिए होगा।
बस एक छोटी सी सलाह।
क्योंकि जिंदगी में सभी के साथ कभी ना कभी इस तरह की स्थिति बनती हैं।
पर हमारी प्रेरणा है-
“वक्त ने सौ बार ललकारा मुझे”
“मैं सृजन के गीत गाती रही”
यह संसार तो अवतारों के लिए भी सहज नहीं रहा।
अपने मन को अपन ही समझा सकते हैं।
इस भावभीनी टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार.
दिन बदलता है और नए ख्याल घेर लेते हैं एक के बाद एक , शुरुआत में कुछ लिखने को मन नहीं कर रहा था फिर भी यही विषय को केंद्रित कर बहुत कुछ लिखी गई। कभी कभी ऐसा होता है मेरे साथ भी। इस धारणा में बहकर के बात सामने आ गई, चित्रलेखा और खेल की अनायास। ऐसे कई विचारों के उथल पुथल में मन हिलोरें खाता रहता है , यह आम बात है। इससे घबराना नहीं बस फिर से खुद को तैयार करने के लिए अवसर देना है। वहीं शराब पीकर मारते हुए पति से अलग होने की सोच, पर अलग होकर भी जिए तो कैसे प्रेम बिन जीवन अधूरा हो जाता है।
आकर्षण और विकर्षण का तथ्य भी सामान्य है , मगर आग और पानी के मिलन से शून्य रह जाता है, प्लस और माईनस से ही बिजली पैदा होता है। बहुत अच्छी थ्योरी।
आपकी टिप्पणी के लिए आभार. धन्यवाद .