प्रवासी साहित्य में मातृभूमि (भारत)
- दिविक रमेश
विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए आज हमारे बीच अनेक शब्द विद्यमान हैं, जैसे, गिरमिटिया, प्रवासी, आप्रवासी, भारतवंशी, पुरा-प्रवासी, नव-प्रवासी इत्यादि। इन्हीं में से जिन भारतीयों ने साहित्य रचा उन्हें प्रवासी साहित्यकार कहा गया और उनके साहित्य को प्रवासी साहित्य।
यहाँ मैं अरुण चंद्र राय के द्वारा संपादित पुस्तक ‘समकालीन प्रवासी कविताएँ (ब्रिटेन विशेष)’ के संपादकीय से उनका मत उद्धृत करना चाहूँगा – ‘पुरा-प्रवासी एवं नव-प्रवासी देशों में प्रवासी जीवन की परिस्थितियाँ एवं परिवेश दोनों ही भिन्न हैं। यही भिन्नता इन देशों की प्रवासी हिंदी कविता में स्पष्ट रूप से झलकती है। एक ओर जहाँ पुरा-प्रवासी देशों के काव्य में गिरमिटिया जीवन का दर्द एवं संघर्ष, अपने पुरखों की यादें, अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव की तीक्ष्ण अनुभूतियाँ उजागर होती हैं तो वहीं दूसरी ओर नव-प्रवासी देशों अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा में स्वजनों से बिछड़ने की पीड़ा, पीढ़ीगत द्वंद्व, अलगाव एवं पश्चिमी परिवेश में सामंजस्य न बिठा पाने की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है।”
मेरा सुझाव है कि उपर्युक्त मत में काव्य के स्थान पर साहित्य रख कर पढ़ा जाए क्योंकि प्रवासी साहित्य कहानी, कविता, उपन्यास, यात्रा वृतांत, नाटक, बालसाहित्य आदि बहुत से रूपों में उपलब्ध हो चुका है। दूसरा सुझाव यह है कि माना जाए कि आज का नव प्रवासी साहित्य केवल ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा तक ही सीँमित नहीं है बल्कि वह आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, न्यूजीलैंड आदि सहित युरोप, अरब आदि के कितने ही देशों तक अपने पंख फैला चुका है। मसलन 2024 में ही प्रवासी साहित्य शृंखला के अंतर्गत रेखा राजवंशी के संपादन में एक पुस्तक ‘आस्ट्रेलिया की चयनित रचनाएँ’ प्रकाशित हुई है जिसके प्रकाशक आईसेक्ट, भोपाल हैं।
आज प्रवासी साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध है और वह बहुआयामी भी है। खूब चर्चित भी है। आज भारत में भी कितने ही प्रकाशक प्रवासी भारतीय लेखकों की पुस्तकों और प्रवासी साहित्य की संपादित पुस्तकें प्रकाशित करने में काफी रुचि ले रहे हैं।
मेरा मत है कि प्रवासी साहित्य के विद्वानों और हितैषियों का ध्यान अभी लगभग उपेक्षित से रह गए रचनाकारों की ओर भी जाना चाहिए। पुन: अरुण चंद्र राय से ही शब्द लेकर कहना चाहूँगा कि ‘प्रवासी हिंदी कविता आज पूरी दुनिया में भारत की खुशबू बिखेर रही है।’ कविता अर्थात साहित्य। निश्चित रूप से इस समय पूरे विश्व में उत्कृष्ट और औसत दर्जे का प्रवासी या कहूँ आप्रवासी साहित्य लिखने वालों की संख्या अच्छी-खासी हो गई है। इनमें यदि अल्पकाल के लिए विदेशों में रहने वाले रचनाकारों की संख्या जोड़ ली जाए तो और भी ज्यादा हो जाएगी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिन देशों का प्रवासी साहित्य के रूप में गिरमिटिया साहित्य से संबंध जोड़ा जाता है वहाँ भी अपवाद स्वरूप ही सही, कुछ साहित्यकार नव-प्रवासी साहित्य के साहित्यकारों की श्रेणी में लिए जा सकते हैं, जैसे प्रवासी हिंदी लेखक, कवि एवं संगीतकार प्रोफेसर हरिशंकर आदेश जिनकी कर्मभूमि अन्य देशों के साथ ट्रिनिडाड भी रही है। इनकी एक कविता है – ट्रिनिडाड और टुबैगो जिसका एक अंश है – प्रकृति नटी के हाथों सज्जित / हरा-भरा यह देश है/ नैसर्गिक सुषमा की मानो/ यह कविता आदेश है क्रिकिट; कलिप्सो, लिम्बोअ, सोल/ देश मृदु पक्षी-नाद का। / सागर के आँगन में शोभित/ सुघर द्वीप ट्रिनीडाड का।” मॉरीशस के हिंदी कवि हेमराज सुंदर ने अपने कविता-संग्रह ‘अस्वीकृति में उठे हाथ’, 2002 में लिखा था, “गत पंद्रह वर्षों में गतिशील हिंदी-काव्य में महत्वपूर्ण मोड़ आये हैं। मैंने यथासंभव युग की संवेदनाओं को युग के स्वरों में ही अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।” उनकी कविता अपराजिता में आता है- “ मैं वह पराजित अभिमन्यु नहीं हूँ / जो चक्रव्यूह में फँसकर मर गया।” साथ ही उन्होंने “ऊँचा है भाल मॉरीशस’ जैसी कविता भी लिखी है, जिसका एक अंश है-
पुरुष सो रहा था जो हम में
जाग्रत है – जिसे
अनुभव किया समग्र राष्ट्र ने।
जिस गुलामी में हम थे जकड़े
तत्क्षण (12 मार्च 1968) ही
नव परिवर्तन हुआ इधर
देश में खुशहाली गयी बिख्रर!
मुझे प्रार्थना एल्मो राज का लेख ‘प्रवासी भारतीयों में घर की अवधारणा’ की भी याद हो आई है। मनुष्य के रूप में घर किसी को भी नहीं भूलता। उन्हें भी नहीं जो अपने देश के बाहर उत्साह से कुछ ऊँचे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए न केवल दूसरे देशों में जा बसते हैं बल्कि वहाँ भी घर बना लेते हैं। यह बात अलग है कि अलग-अलग संदर्भ में उन्हें दोनों ही घर याद आते होंगे। घर की याद आना केवल पीछे छूट गए आत्मीय संबंधों का याद आना भर नहीं होता, बल्कि अपने देश और समय की संस्कृति को जीना भी होता है। संक्षेप में कहूँ तो प्रवासी साहित्य में मातृभूमि, घर की स्मृति, दर्शन और संस्कृति की आहटों, परंपरा और भोजन, मिथकीय पात्रों के सहारे, प्रकृति, तुलना आदि अनेक रूपों में मिलती है।
यदि अन्यथा न लिया जाए तो, प्रवासी सहित्यकार न होते हुए भी मैं बहुत ही विनम्रता के साथ, कुछ सालों के अल्पकालीन ही सही पर विशेष रूप से रचनाकार के रूप में अपने दक्षिण कोरिया प्रवास (1994-1997) के अनुभव और उसकी प्रेरणा से लिखे साहित्य के बारे में संक्षेप में अपनी बात साझा करने की अनुमति चाहता हूँ। मुझे लगता है कि विदेश में प्रवासी होकर व्यक्ति सबसे पहले अकेलेपन से जूझता है, खासकर प्रारम्भ में अधिक। वहीं वह अपना देश भी खोजता रहता है – खान-पान, त्योहार, सोच-दर्शन, संबंध आदि में। जहाँ-जहाँ उसे समानता मिलती है, या किसी भी प्रकार का जुड़ाव दिखता है, वह झूम उठता है। इसके बाद उसके सामने अपने और दूसरे के बीच एक साझी जीवन-राह को खोजने की जद्दोजहद शुरु होती है। मेरा एक संस्मरण है ‘कदम बुद्ध की यशोधरा भूमि की ओर’। शीर्षक में ही भारत मौजूद है। एक अंश देखिए –
“शाम को मेरे सहायक ने मुझे बस (उस समय की भारतीय बस से अलग उत्कृष्ट किस्म के बस) के द्वारा मेरे निवास तक पहुंचा दिया था। यह घर जरूर मुझे काफी छोटे आकार का लगा था। बहुत प्रभावशाली भी नहीं लगा था। शायद भारत में बड़े घर में रहने की आदत के चलते। लेकिन यह घर उन तमाम घरों में से एक था जो विदेशी अध्यापकों के लिए थे। मुफ्त का था, बस यही सान्तवना थी। घर की याद ने सताया तो एक कविता खुद ब खुद चली आई मुझे कुछ राहत देने को — समुद्र मेघों का। एक अंश देखिए –
क्या हो गया सबको
लटका हुआ है मुँह घर का।
भूल कर बकबक
कितना चुप है रेडियो!
दरवाजे और खिड़कियाँ
बन्द किए बैठी हैं पुस्तकें।
बर्तनों से आवाज गायब है
रसोई में।
कलम ने सुखा ली है स्याही
कागज़ ने चुरा लिया है मुँह
डायरी भी जा छिपी है कहीं।
मैं क्या करूँ?
क्या करूँ
कान सुनना चाहते हैं एक दस्तक
बहुत अपनी। (यादें महकी जब, किताबवाले, नई दिल्ली)
पुष्पिता अवस्थी की कविताओं – अपनों की याद में-1 और अपनों की याद में-2 की याद हो आई है। अंश देखिए-
विदेश-प्रवास में
तपन और पाले में
एकाकी पड़ा है मेरे मन का चबूतरा
जैसे हवा में
किसी स्मृति-घाव का
गीला निशान
(अथवा)
बेआबरू मौसमों की तरह
पड़े हैं सपने
आँखों के कोने में
एकाकी परदेश प्रवास में …
विदेश में
याद आती हैं सहमी हुई स्मृतियाँ
लेकिन प्रवासी-साहित्य का यह एक मजबूत पक्ष है। दूसरा मजबूत पक्ष होता है प्रवास के देश को अपनाते चले जाना और उसकी पहुँच अपनी मातृभूमि तक बनाना। पुष्पिता अवस्थी के यहाँ यह पक्ष भी उनकी कविताओं और गद्य लेखन में देखा जा सकता है। उनके उपन्यास ‘छिन्नमूल’ को पढ़ा जा सकता है जिसमें गिरमिटिया के रूप में सूरीनाम की धरती पर आए मजदूरों के संघर्ष से रूबरू हुआ जा सकता है। उनके पास ‘कवि माइकल स्लोरी’ की सी कविता भी है जिसका एक अंश यूँ है-
माइकल स्लोरी
सूरीनाम धरती का
चलता फिरता मानव-बॉक्साइट
जिसके शब्द
द्वर्णगर्भी धरती के
भूगर्भ से निकले खरा सोना।
मेरे यहाँ भी ऐसी कविताएँ देखी जा सकती हैं। मेरे कविता-संग्रह ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’ में,
खासकर कोरियाई रचनाकारों से प्रेरित कविताएँ किम सॉ वॉल’ तथा तुम्हें प्यार करता हूँ ‘सोपा’ को पढ़ा जा सकता है। जाहिर है कि इन कविताओं में दृष्टि भारतीय ही मिलेगी।
दक्षिण कोरिया की जमीन पर जब मुझे पग-पग पर टैगोर, बुद्ध और गांधी की उपस्थिति महसूस होने लगी तो परदेश के प्रति सहज रूप से अपनापन भी जगा। बौद्ध धर्म का न होकर भी, बुद्ध की जोरदार उपस्थिति ने ही शीर्षक सुझाया – कदम बुद्ध की यशोधरा भूमि की ओर। टैगोर की कोरिया के पराधीनता के समय लिखी गई कुछ ही पंक्तियों की कविता (जिसकी जानकारी तब तक मुझे नहीं थी) को वहाँ के बच्चों की जुबान पर पाकर अत्यंत उत्साहित हुआ था और उसके बारे में लिखा। यही नहीं मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी पंक्तियों का, लिखे जाने के लगभग 67 वर्ष बाद,पहली बार हिंदी में अनुवाद भी किया – पूरब का दीप-
एशिया के स्वर्णिम युग में / रहा कोरिया एक दीप वाहकों में
और कर रहा फिर प्रतीक्षा / वही दीप होने को ज्योतित
करने को फिर से आलोकित / पूरब का प्रांगण यह सारा
यही नहीं वहाँ के एक त्योहार टलचिप थेऊगी में मुझे होली बसी नजर आई। मैंने अपने संस्मरण का शीर्षक रखा – होली कोरिया की या टलचिप थेऊगी। कोरिया का एक बहुत बड़ा त्योहार है – छुसॉक। इतना बड़ा कि मुझे दीवाली याद हो आई थी। इस पर मेरी एक बाल कविता है जो मेरी पुस्तक मधुर गीत भाग-3 में पढ़ सकते हैं। एक अंश देखिए-
पूरा चाँद निकलता है जब
मिल बैठ कर खाना खाते
भारत की दीवाली जैसा
धूमधाम से इसे मनाते।
किमहे में भारत की राजकुमारी हो ह्वांग ओक और वहाँ के राजा किम सूरो के विवाह की जानकारी ने तो बहुत ही रोमांचित कर दिय था और मैंने तुरंत उनके बारे में खोजबीन करके लिखा। पूसान बहुत ही सुन्दर समुद्री तट पर बसा शहर है और उससे लगभग 20-25 किलोमीटर पर बसा छोटा शहर किमहे है जिसके पास ही किमहे गांव भी है। वहाँ मेरे साथ गए विद्यार्थी ने जब कहा कि मेरी दादी भारतीय थी और मुझमें भारतीय खून है तो सुन कर अजीब रोमांच हो आया था। खैर, अपने से संबद्ध भारत की लौ से प्रदीप्त अपने प्रवास के लेखन के और विस्तार में नहीं जाऊँगा, वह सब आज पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है ही।
अब मैं आगे की अपनी बात अन्य उदाहरण देकर बढ़ाना चाहूँगा। उदाहरण बहुत दिए जा सकते हैं, लेकिन बिना किसी क्रम या व्यवस्था के, मनभाए कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनके माध्यम से आज के प्रवासी साहित्य में मातृभूमि की उपस्थिति के रूप भी देखे जा सकते हैं और प्रवासी साहित्य की कुछ प्रवृतियों की पहचान भी की जा सकती है। और वह भी बिना किन्हीं अतिरिक्त टिप्पणियों के।
स्पेन से एक कविता का अंश देखिए-
शरद पूर्णिमा
— पूजा अनिल (स्पेन)
मां के कहने पर
रखी थी खीर शरद पूर्णिमा
की चांदनी में
खीर में चाँद का पीलापन
बचा रहा
मैंने वह अमृत पेय मां को
समर्पित किया और
चाँद को भेजा अश्रु जल
क्या चाँद वहाँ भीगा होगा?
घर याद आता है मुझे।
एक और अंश देखिए जो अमेरिका की वंदना वात्स्यायन की कविता से है –
माँ अबकी जब घर आऊँगी
तुम्हारे साथ समय बिताऊँगी।
कहने-सुनने की है जो बात
दिन से रात मिलकर
तुम्हें बतलाऊँगी। …
माँ अबकी जैकलीन का
बहाना नहीं बनाऊँगी।
फोन पर कुछ नये एप
सिखला कर आऊँगी।
माँ अबकी जब घर आऊँगी
तुम्हारे साथ समय बिताऊँगी।
आस्ट्रेलिया में साहित्यिक रूप से सक्रिय रेखा राजवंशी की कविता का अंश भी पढ़िए-
शाम जब ढलने लगी, कंगारुओं के देश में
पीर सी पलने लगी कंगारुओं के देश में।
याद फिर आने लगे, कुछ दोस्त अपने वतन के
आग सी जलने लगी कंगारुओं के देश में।
मधु कुमारी चौरसिया (ब्रिटेन) की कविता ‘हमारे दिल में हिन्दुस्तान बस्ता है जनाब’ के एक अंश का भी तनिक स्वाद ले लिया जाए-
पिज्जा-बर्गर तो बस दिखावा है
पेट तो रोटी-दाल से ही भर पाता है जनाब
भले ही हम सात समुंदर पार हों
त्योहार तो वतन का ही भाता है जनाब।
इंदु बरोट (ब्रिटेन) की कविता ‘जीने की वजह’ का भी
एक अंश देख लिया जाए:
आ तो गई हूँ अंग्रेजों के इस देश में
अब बस जीने की वजह ढूँढे जा रही हूँ।
सपने पूरे करते करते
मैं अपनी ही जिन्दगी भूले जा रही हूँ।
वंदना मुकेश (ब्रिटेन) अपनी प्रवासी-पीड़ा को यूँ व्यक्त करती हैं-
अपने घर से दूर पुन: मैं
तिनका तिनका जोड़ रही
देस छोड़ परदेस गयी
पीड़ा फिर भी मौन रही।
वंदना मुकेश की कविता का अंश ‘समकलीन प्रवासी कविताएँ’ ब्रिटेन विशेष से लिया गया है। विविध अच्छे-बुरे अनुभवों से सम्पन्न कविताओं की इस पुस्तक में अनेक उत्कृष्ट कविताएँ हैं जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए। पुस्तक के प्रकाशक हैं ज्योतिपर्व मीडिया एंड पब्लिकेशन, इंन्द्रापुरम, गाजियाबाद।
अमरीका में 1995 में जाकर बस गई डॉ. अंजना संधीर ने प्रारम्भ में ही लिखा था-
जिक्र छेड़ा कभी सखियों ने जो झूलों का यहाँ,
मैंने परदेश में सावन को बहुत याद किया।
डॉ. अंजना संधीर ने संतोष व्यक्त किया है कि प्रवासिनी मशीनी जिंदगी जीते हुए भी संवेदना को बनाए हुए है। उन्होंने अपने लेख ‘अमरीका में हिंदी साहित्य’ (प्रवासी संसार, जुलाई -सितम्बर 2007, संपादक: राकेश पाण्डेय) ध्यान देने योग्य यह भी लिखा है, मैंने पाया कि इस देश में जहाँ न वातावरण है, न परिस्थितियाँ अनुकूल हैं फिर भी भारतीय रचनाकार, माँ सरस्वती के पुत्र अपनी भाषा में काव्य, कहानियाँ, उपन्यास लिख साहित्य सृजन में व्यस्त हैं। उनके लिए प्रकाशन प्रक्रिया कितनी मुश्किल है फिर भी उनकी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। ये अमरीकी प्रवासी हिंदी रचनाकार भी हिंदी साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं।”
एक दो उदाहरण उन रचनाओं के भी ले लिए जाएँ जिनका संबंध गिरमिटिया देशों से है।
मुंशी रहमान खान (सूरीनाम)
आए हम सब हिंदू से करन नौकरी हित
गिरगिट काटी कठिन से फिर सरकारी खेत
फिर सरकारी खेत कोई निज देश चले गए
कोई खरीदी भूमि कोई गांव में बस गए
कोई रहमान भाग्य के कारण पाय लक्ष्मी बहुत हर्षाये
रहित भाग्य विपरीत जिन्हों का कहें की यहाँ नाहक हम आए
स्पष्ट है कि प्रवासी के रूप में हमारे भारतीयों में हर्षाये और नाहक आए दोनों प्रकार के व्यक्ति हैं। वी.एस. नायपॉल द्वारा लिखित एक उपन्यास की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगा। ये पंक्तियां हैं:
“हनुमान हाउस के आर्केड में… पहले से ही बूढ़े लोगों की शाम की सभा थी… लाल रंग की चमकती मिट्टी की चीलम खींच रहे थे और गांजा और जले हुए बोरों की गंध आ रही थी… वे अंग्रेजी नहीं बोल सकते थे और जिस देश में वे रहते थे, उसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी; यह उनकी अपेक्षा से कहीं ज़्यादा लंबा था। वे लगातार भारत वापस जाने की बात करते रहे, लेकिन जब अवसर आया, तो कई लोगों ने इनकार कर दिया, अज्ञात से डरते हुए, परिचित अस्थायीता को छोड़ने से डरते हुए।” ( प्रवासी, घर और नया अंग्रेजी साहित्य, मोहिअमिनुल इस्लाम)। इस अंश के संदर्भ में लेखक इस्लाम ने उचित ही लिखा है, “उपरोक्त पंक्तियों में, कथाकार इस बात पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करता है कि नए मेजबान देश में भारतीय प्रवासी लोग वापस अने की अपनी इच्छा कैसे प्रकट करते हैं। यह इस बात पर भी ध्यान केंद्रित करता है कि वे विदेशी भूमि में एक साथ गांजा पीने की अपनी संस्कृति को कैसे संरक्षित करते हैं और कैसे उनकी मातृभूमि की याद उन्हें वापस आने की इछ्हा करने के लिए मजबूर करती है।“
सुरीनाम के प्रथम कवि माने गए भारतवंशी मुंशी रहमान खां की चौपाई का यह अंश तो आज के भारत के लिए भी कितना प्रासंगिक है-
दुई जाति भारत से आये। हिंदू मुसलमान कहलाए॥
रही प्रीति दोनहुं महं भारी। जस दुई बंधु एक महतारी॥ (विश्वरंग संवाद, जुलाई-
दिसम्बर 2023, आईसेक्ट पब्लिकेशन)
मेरे सामने एक रूपक उभर रहा है। पीहर और ससुराल का। सोच रहा हूँ क्यों न प्रवासी को एक महिला के रूप में देख लूं जो विवाह कराकर, अपना पीहर अर्थात अपना देश छोड़कर ससुराल अर्थात विदेश में जा बसी है। यह जा बसना जबरन भी हो सकता है, गिरमिटियों की तरह और स्वेच्छा से भी। पीहर तो अपना घर होता ही है, ससुराल भी एक न एक दिन घर बनता चला जाता है। ऐसे में, पीहर का प्राय: स्मृतियों में और ससुराल का वर्तमान में घर का एहसास देता रहता है और रचनाकारों की रचनाओं में वह अपने-अपने ढंग से व्यक्त होता रहता है।
प्रवासी साहित्य में मातृभूमि का एक स्वर माता-पिता की चिंता या समझ के इस रूप में भी देखा गया है जो प्रगीत कुँअर की कहानी ‘आखिरी शब्द’ में आया है – “सूरज का बचपन भारत के अनुभवों से वंचित न हो जाए इसलिए दोनों हर वर्ष सूरज को भारत यात्रा पर ले जाते थे और सभी संबंधियों से मिलवाते ताकि सूरज रिश्तों को और साथ ही उनकी अहमियत को भी समझ सके। सुधाकर और शिखा अपने माता-पिता को भी प्रदेश बुलाते रहते ताकि सूरज को उनका साथ यहाँ भी निरंतर मिलता रहे।… सूरज दोनों जगहों की संस्कृति के बीच तालमेल बनाता हुआ बड़ा हो रहा था… माता-पिता और उनके परिवार से मिले संस्कारों ने सूरज को पाश्चात्य माहौल में भी सही-गलत का फैसला करने की कुशाग्र बुद्धि दी थी…।” राशि सक्सेना की एक कहानी है ‘प्रोत्साहन के पंख” जिसमें नए वातावरण और नयी संस्कृति में कैसे अपने को सिद्ध किया जाए, अत्मविश्वास के साथ बसाया जाए को बखूबी रचा गया है। और भी ऐसी कहानियाँ मिलती हैं जो अवैध तरीके से नौकरियों के लिए विदेश जाने वाले भारतीयों को आने वाली मुसीबतों के प्रति सचेत करती हैं।
बहुत ही संक्षेप में, प्रवासी भारतीय बाल साहित्य का भी जिक्र करना चाहूँगा, भले ही इस दिशा में अभी बहुत लिखा जाना बाकी है। एक कविता है ‘सिया का पहला बसंत’ जिसकी लेखिका हैं ब्रिटेन में रह रहीं – दिव्या माथुर। इस कविता की निम्न पंक्तियों से ही समझा जा सकता है कि कैसे भारतीय प्रवासी अपने बच्चों को भारत से जोड़े रखना चाहते हैं-
सुनो सिया तुम देकर ध्यान
क्या बसंत-ऋतु की पहचान
भंवरों की गुनगुन से जागो
और तितलियों के संग भागो
दिव्या माथुर का एक बाल उपन्यास ‘बिन्नी बुआ का बिल्ला’ भी है जिसमें बिल्ले-बिल्लियों से जुड़ी जानकारी तो है ही साथ ही अच्छी बात यह है कि पश्चिमी संस्कृति व तौर-तरीकों के साथ भारतीय संस्कृति और तौर-तरीकों को सकारात्मक ढंग से दिखाया गया है। सामूहिकता और सामाजिकता पर बल दिया गया है। बुआ-फूफा, नाना-नानी आदि संबंधों को जोड़कर रखा गया है।
दिव्या माथुर वही हैं जिनका एक उपन्यास ‘तिलिस्म’ भी काफी चर्चित रहा है। मनोविज्ञान पर टिके इस उपन्यास में कठोर व्यवहार से सताए एक घर से भाग गए बालक उपेंद्र की कहानी है जिसे बाद में उसकी मानसिक समस्याओं से छुटकारे के लिए लंदन भेज जाता है। लंदन में भी उसे अनेक स्थितियों से जूझना पड़ता है।
इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, कम ही सही पर कुछ ऐसे रचनाकारों की कुछ रचनाओं से सीधी मुलाकात करना चाहता हूँ जिनमें प्रवासी साहित्य की एक खास बानगी के रूप में, प्रवासी साहित्य की प्रवृत्तियों आदि पर होती रही अब तक की बहसों के प्रति थोड़ा नया हस्तक्षेप भी लग सकती हैं।
रूस में घर बना कर बस गए एक कवि हैं अनिल जनविजय। उनकी एक कविता है-
मैंने कहा
अकेला हूँ मैं मास्को में
वसंत आया मेरे पास भागकर
साथ लाया
टोकरी भर फ़ूल
बच्चों की खिलखिलाहटें
पेड़ों पर हरी पत्तियाँ
मैंने कहा–
अकेला हूँ मैं
याद आई तुम्हारी
प्रेम आया
इच्छा आई मन में तुम्हें देखने की
मैंने कहा–
अकेला नहीं हूँ मैं
स्नेह है तुम्हारा मेरे साथ
लगाव है
तुम्हारे चुम्बनों की निशानियाँ हैं
मेरे चेहरे पर अमिट
स्मृति में तुम्हारा चेहरा है
तुम्हारी चंचल शरारतें हैं
मैंने कहा–
अकेला नहीं हूँ मैं
प्रिया है मेरी, मेरे पास
मेरे साथ
इस कविता में दो स्थानों पर अपने घर का द्वंद्व उभरता नजर आता है लेकिन कवि एक समझपूर्ण राह भी दिखाता है जो व्यक्ति को द्वंद्व से बाहर भी ले आती है। वर्तमान घर में भी प्रेम मिल जाए तो मातृभूमि से दूर अकेलेपन की समस्या को भी राहत मिल जाती है।
घर, घर होता है। वह चाहे मातृभूमि का हो या अपनी इच्छा से पृथ्वी के किसी अन्य भाग पर बना लिया गया घर हो। सच तो यह है कि यदि हम बाद के गिरमिटिया साहित्य को भी देंखें तो पाएँगे कि भारत से बाहर जिस भूमि को उन्होंने अपना घर मान लिया है वे उसका भी तिरस्कार नहीं करते भले ही अपनी या अपने पूर्वजों की भूमि भारत के प्रति भी अपना सहज लगाव और जुड़ाव महसूस करते रहते हैं। प्रवासी सहित्य में मातृभूमि की सहज-स्वाभाविक उपस्थिति को आज के प्रवासी साहित्य को इस मानवता को जोड़ने वाले संदर्भ में भी देखना होगा।
बताना चाहूँगा कि कवि अनिल जनविजय ने अपनी उपर्युक्त कविता को मुझ तक भेजते हुए लिखा था –“ हाँ, घर (अर्थात भारत के घर) की याद तो आती है। मेरी रचनाओं में भी कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ दिखाई देती हैं।“ अपने मित्र रचनाकार भारत यायावर के लिए लिखी अपनी एक कविता में उनकी भावुकता की अभिव्यक्ति यूँ भी हुई है-
भारत में रहकर, भारत तू खूब सुखी है
रहे विदेश में देसी बाबू, बहुत दुखी है
इंग्लैंड में बस चुके एक कवि मोहन राणा, जिनके बारे में विष्णु खरे ने लिखा था, ‘कवि के रूप में मेरे लिए हमेशा प्रिय और महत्त्वपूर्ण रहे हैं लेकिन हिंदी डायस्पोरा के वे एकमात्र असली किंतु सबसे बड़े कवि हैं’, के कविता-संग्रहों ‘एकांत में रोशनदान’ और ‘मुखौटे में दो चेहरे’ को पढ़ने का अवसर मिला तो उनकी कविताओं ‘अपने-अपने देश’, ‘स्कूल’ और ‘दूर खिड़की पास दिल्ली’ की ओर विशेष ध्यान गया। ‘स्कूल’ का एक अंश है-
हवाई जहाज मध्य यूरोप में कहीं था और मैं
कई बरस पहले अपने स्कूल
लघु आकार की कविता ‘दूर खिड़की पास दिल्ली’ इस प्रकार है-
भाग रहा हूँ पर दूरियाँ चली जाती हैं
6900 किलोमीटर दूर ही रह गई
भाग रहा हूँ नजदीक जाने कहीं
दूर खिड़की पास दिल्ली
पर गंतव्य छूटता रहा पीछे कहीं
जो कल सोचा वह आज नहीं
लपेटता जैसे किसी और तह में खुद को
तस्मों को ढीला करता नंगे पांव दौड़ते
और उनकी कविता ‘अपने-अपने देश’ इसलिए पढ़ी जानी चाहिए क्योंकि यह हमें स्थायी रूप से दूसरे देश के भी हो चुके आप्रवासी भारतीयों की मन:स्थिति और उनके विदेशी अनुभव से रूबरू कराने में सक्षम है। एक अंश देखिए-
पहला सवाल उनका होता है जो देशी होते हैं
कहाँ के रहने वाले हैं?
वे एक कहानी लिखना चाहते हैं मेरी
अपनी स्मृति में
वे मुझे किसी गाँव से जोड़ना चाहते हैं
किसी जिले
किसी कस्बे
किसी शहर से
जिसे वे भी जानते हों
किसी जाति किसी रिश्ते
पर मेरे पास नहीं होता है कोई संतोषजनक उत्तर,
वे मेरा इरादा जानना चाह्ते हैं फिर,
आए कैसे इधर? दूसरा सवाल,
कोई कैसे आ सकता है बिना इरादे के
मेरे पिता प्रवासी थे
दो दिन के पैदल रास्ते से उन्हें
बस मिली थी किसी शहर की कभी
और मैं आप्रवासी हूँ
दस घंटे एक उड़न खटोले
फिर अपने देस फिर अपने देस
जिनके छोर ओर धोर नहीं।
आप समझ गए होंगे ये वे कविताएँ हैं जो एक साथ व्यक्ति की अपनी मातृभूमि और अपने अपना लिए गए अन्य देश से जुड़ाव के भाव से परिचित कराती हैं। ‘फिर अपने देश फिर अपने देश’ के मर्म को समझा जाना चाहिए। यहाँ जटिलता भी है और सहजता भी।
ये दोनों कवि ऐसे हैं जो गुलामवत नहीं बल्कि अपनी इच्छा से विदेशों में बसे हैं। मुझे अपनी इच्छा से ही विदेश में बसे हिंदी लेखक तेजेन्द्र शर्मा का यह कथन, जो उन्होंने लंदन और ब्रिटेन को समझ लेने के बाद व्यक्त किया, की भी याद हो आयी है- “ मेरा प्रयास था कि मेरी कहानियाँ ब्रिटेन की हिंदी कहानियाँ बन जाएँ, हिंदी की प्रवासी कहानियाँ नहीं। मुझे उम्मीद है कि मैं अपने उस प्रयास में कुछ ह्द तक अवश्य सफल रहा, क्योंकि इन कहानियों को पाठकों, लेखकों और आलोचकों ने समान रूप से सराहा।“ हिंदी की प्रवासी कहानियों से उनका आशय शायद वैसी रचनाओं से है जो अपने देश से काफी हद तक स्वेच्छा से विदेश आने पर भी, घर- देश से जुड़ाव के नाम पर केवल स्मृति-दंशों से भीगते-भिगोते रहने के भाव ढोती चली जाती हैं। जहाँ बस चुके हैं उससे आँख मूँद कर केवल अतीत जीवी होकर चलने वालीं। बताना चाहूँगा कि तेजेन्द्र शर्मा के लंदन में बसने से पहले भी कुछ पुस्तकें प्रकाशित हो गई थीं। ऊषा प्रियंवदा आदि कुछ और साहित्यकारों की भी रचनाएँ विदेश में बसने से पहले भारत में रहते छप चुकी थीं। खैर, डॉ. दीपक पाण्डेय के द्वारा लिए गए एक साक्षात्कार (विश्व हिंदी साहित्य 2020, विश्व हिंदी सचिवलय, मॉरीशस) में कहा है, ‘मैं भारत में रहते हुए भी केवल इंडियन कभी भी नहीं था। दरअसल मैं एक एअर-इंडियन था। इसलिए मेरा अनुभव क्षेत्र अधिकांश हिंदी लेखकों से भिन्न रहा।‘
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत से प्रकाशित पुस्तक ‘इतर’ (चयन, संपादन, भूमिका: डॉ. सुधा ओम धींगरा) में अमेरिका, ब्रिटेन, कैनेडा, डेनमार्क, नीदरलैंड और शारजाह की कथाकारों की कहानियाँ हैं। भूमिका में लिखा गया है, “ इस संकलन की कहानियाँ विभिन्नता लिए यहाँ के समाज की सोच और सरोकारों को चित्रित करती, यहाँ के आम आदमी के सुख-दु:ख को दर्शाती और यहाँ रहे रहे भारतीयों की मानसिकता और परिवेश को उकेरती, भाषा और शैली में नयापन लिए हैं।“ ‘कैफे सोशल’ पर दिए गए एक साक्षात्कार में तेजेन्द्र शर्मा ने कहा है, “चाहे मैं कविता लिखूँ या छोटी कहानियाँ, मेरी मातृभूमि का सार हमेशा वहाँ रहता है। ऐसा लगता है जैसे भारत की मिट्टी मेरे साथ चलती है..।” यह मानते हुए कि मानवता की भावनाएँ हर भाषा और संस्कृति में समान होती हैं, उन्होंने आज के प्रवासी साहित्य की भूमिका को इन शब्दों में कहा है, “यह साझा सांस्कृतिक स्मृति बनाते हुए भारत की सुंदरता का जश्न मनाता है।“
इस संदर्भ में तेजेन्द्र शर्मा की बहुचर्चित कहानी ‘कब्र का मुनाफा’ को पढ़ा जाना चाहिए। मुनाफे की सोच वाली अर्थव्यवस्था को लेकर चलने वाले पश्चिमी जगत में रह रहे पूर्व के मुसलमान पात्रों के माध्यम से एक ऐसे विमर्श को सामने लाया गया है जिसमें शिया-सुन्नी भी हैं, भारत-पाकिस्तान भी है और मानवता की जगी हुई अलख आदि भी है। नमूने के लिए कहानी के कुछ अंश पेश हैं-
एक पात्र नादिरा है जो कहती है, “…गलत कह रही हूँ। भारत का प्रधानमंत्री सिख, वहाँ का राष्ट्रपति मुसलमान और कांग्रेस की मुखिया ईसाई। क्या दुनिया के किसी भी देश में ऐसा हो सकता है?”
“अपने-अपने घरों में आबिदा और नादिरा बैठी हैं। आबिदा टी.वी. पर फिल्म देख रही है – लगान। वह आमिर खान की पक्की फैन है। उसकी हर फिल्म देखती है और घंटों उस पर बातचीत भी कर सकती है। पाकिस्तानी फिल्में उसे बिल्कुल अच्छी नईं लगतीं। बहुत लाउड लगती हैं।”
खलील और नजम की बातचीत में नजम का संवाद है –
“भाई जान अब इंडिया की पढ़ाई इतनी खराब भी नहीं होती। पड़े तो मैं और आबिदा भी वहीं से हैं। दरासल मैं तो गोआ में कुछ काम करने के बारे में भी सोच रहा हूँ। वहाँ अगर कोई टूरिस्ट रिजॉर्ट खोल लूँ तो मजा आ जाएगा…! भाई सच कहूँ, मुझे अब भी अपना घर मेरठ ही लगता है। चालीस साल हो गए हिंदुस्तान छोड़े, लेकिन लाहौर अभी अपना नहीं लगता…।”
प्रवासी साहित्य के संदर्भ में एक और सोच की ओर ध्यान दिलना चाहूँगा। तेजेन्द्र शर्मा ने कभी सुविख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव की उपस्थिति में मर्माहत होकर खुद को और विदेशों में रह रहे अथवा बस गए साहित्यकारों के लेखन को प्रवासी विशेषण दिए जाने पर आपत्ति दर्ज करायी थी और प्रश्न उठाया था।
अनिल जनविजय का थोड़ा आक्रामक यह कथन भी उद्धृत करना चाहता हूँ – “मैं ऐसा बिलकुल नहीं चाहता कि मुझे ’प्रवासी रचनाकार’ माना जाए। इसीलिए मैं उन सम्मेलनों में नहीं जाता हूँ, जो प्रवासी लेखकों के लिए विशेष रूप से आयोजित किए जाते हैं। मैं उन संकलनों में भी नहीं छपता हूँ, जो प्रवासी लेखन से जुड़े होते हैं।“
तेजेन्द्र शर्मा और अनिल जनविजय जैसे रचनाकर शायद अपने समय के केंद्रीय हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के समकक्ष अपनी और अपने साहित्य की उपस्थिति दर्ज कराने के पक्षधर हैं। मैंने भी कभी एक आलेख लिखा था जो छपा भी था- “हिन्दी लेखक और बँटवारा।” ( हम लोग, पुणे, 2012) , (जनसत्ता, दिल्ली, 22 जनवरी, 2012)।
मैंने साफ़ लिखा था –“… अहिंदी भाषी हिंदी रचनाकारों का ही नहीं अपितु कितने ही प्रवासी रचनाकारों का भी साहित्य-सृजन इस हद तक अच्छा है कि उसे सहज ही हिंदी लेखन की केंद्रीय धारा में सम्मिलित किया जा सकता है।…वह भी बिना किसी रियायत के अथवा आरक्षण सुलभ विशेष कृपा के। प्रवासी या अहिंदी जैसे शब्द भीतर ही भीतर, कहीं न कहीं प्रवासी और हिंदी लेखन को ‘हिंदी लेखन’ की तुलना में कमतर और केद्रीय हिंदी साहित्य से परे होने का एहसास कराने लगते हैं। उसे दया या सांत्वना के घेरे में लाकर प्रोत्साहन प्राप्त करने का पात्र बनाने की कौशिश की जाती है।“ खैर, इस बहस में न जाकर यह जरूर कहना चाहूँगा कि पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी हो रहे हिंदी साहित्य के सृजन को समान निगाह से देखने और जाँचने की जरूरत अवश्य पहचानी चाहिए।
मॉरीशस के श्रमजीवियों की वेदना को उभारने वाले तथा उपनिवेशों के शोषण पर जोरदार लिखने वाले साहित्य के प्रतिष्ठित आप्रवासी लेखक अभिमन्यु अनत के बारे में डॉ. सरिता बुधू ने अपने लेख ‘अभिमन्यु अनत: रचना के शीर्ष पुरुष (स्मारिका, विश्व हिंदी सम्मेलन, मॉरीशस, 18-20 अगस्त, 2018) में ध्यान देने योग्य लिखा है- “ अभिमन्यु मॉरीशस के होते हुए भी सिर्फ मॉरीशस के न रहकर अपितु उस दुनिया के अप्रतिम साहित्यकारों, कर्मियों और पहुँचे हुए सृजनात्मक रचनाकारों में से हैं, जो न किसी देश, जाति,
समाज या भूगोलिक सीमा की आड़ में होते हैं बल्कि उससे परे होकर बढ़ते हुए क्षितिज पर होते हैं।“
कहना यह भी चाहूँगा कि प्रवासी साहित्य में घर अर्थात भारतभूमि की सबसे बड़ी उपस्थिति तो उसके भारतीय भाषा में रचे हो जाने से ही हो जाती है। हिंदी के पाठक के रूप में कहूँ तो विदेश में रहकर जो भारतीय हिंदी में लिख रहे हैं, अन्य विदेशी भाषा में लिखने की सुविधा होते हुए भी, वे अपने साहित्य में अपनी मातृभूमि को ही समाहित कर रहे हैं, भले ही वस्तु भारत संबंधी हो या उस देश से संबद्ध हो जिसमें वे रह रहे हैं। हम जानते हैं साहित्य में अपनी बोलियों के कारण हिंदी के अनेक रूप मिलते हैं। मसलन तेजेन्द्र की कहानियों में पंजाबी का तड़का बहुत ही जीवंत ढंग से लगा देखा जा सकता है। ‘देह की कीमत’ कहानी के ये दो संवाद देखिए-
“ओये तुम जनानियों को मर्दों की बातों में दखल नहीं देना चाहिए।… तुम अपना घर सँभालो बस..पैसे कमाना ।”
में भी पंजाबी का जोरदार तड़का लगा देखा जा सकता है।
हम जानते हैं कि भाषा बुनियादी तौर पर संस्कृति और सभ्यता दोनों की वाहक होती है। सच ही है कि अपनी भाषा अपनी पहचान भी होती है क्योंकि अपना असल अस्तित्व ह्म अपनी भाषा में ही व्यक्त कर पाते हैं। प्रवास में रह रहे भारतीयों के साहित्य में प्रवास-भूमि के अनुभव, वहाँ के पात्र आदि आना सहज है। चाहे वह विदेश में भारतीय लड़कियों के विवाह पर होने वाले धोखों पर केंद्रित वंदना मुकेश की कहानी ‘सरोज रानियाँ’ ( विश्व हिंदी साहित्य 2020, मॉरीशस) हो अथवा विदेश में धन-संचयन के लोभ में मशीन बनते चले गए भारतीय प्रवासी की कंटकपूर्ण संघर्ष को चित्रित करती रेणु ‘राजवंशी’ गुप्ता (अमरीका) की कहानी ‘यह सच नहीं है’ हो। (प्रवासी संसार, जुलाई-सितम्बर 2007)।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारतीय प्रवासियों के साहित्य में उनकी मातृभूमि भारत किसी न किसी रूप में सहज रूप से निवासित मिलती ही है, भले ही उनका वर्तमान समय और उनकी वर्तमान भूमि भी अपनी सुलझनों और उलझनों के साथ हाथ मिलाए खड़ी नजर आती रहती हैं। यहीं, एक प्रश्न जरूर मन में आ रहा है। स्थायी रूप से बस गए हमारे भारतीय प्रवासियों के वहीं उत्पन्न बच्चों में से, उनके बड़े होने पर, जो रचनाकार बनेंगे क्या उनके यहाँ भी ‘साझा संस्कृति’ का स्वर विद्यमान रहेगा?

दिविक रमेश
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आदरणीय दिविक सर!
काफी लंबा लेख है आपका, हमने कल आधा पढ़ा था। कई शब्द हमारी समझ से परे महसूस हुए। गिरमिटिया, पुरा प्रवासी और नव प्रवासी। गिरमिटिया शब्द को हमने देशज शब्द समझा। सुना हुआ तो है पर इसका प्रयोग किस लिये किया जाता है यह नहीं पता था। हम उसके अर्थ को समझना चाहते थे। सो गूगल से निवेदन किया और अर्थ जानकर शॉक्ड हो गये। इस शब्द को समझना हमारे लिये अकल्पनीय रहा।
पता चला कि सत्रहवीं सदी में आये अंगरेज़ों ने आम भारतीयों को एक-एक रोटी तक को मोहताज कर दिया था फिर उन्होंने गुलामी की शर्त पर लोगों को विदेश भेजना प्रारंभ किया। इन मज़दूरों को गिरी कहा गया। गिरी शब्द अंगरेजी के `एग्रीमेंट’ शब्द का अपभ्रंश बताया जाता है। जिस कागज पर अंगूठे का निशान लगवाकर हर साल हज़ारों मज़दूर दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों को भेजे जाते थे,उसे मज़दूर और मालिक गिरी कहते थे। इस दस्तावेज के आधार पर मज़दूर गिरी थे। हर साल 10 से 15 हज़ार मज़दूर गिरमिटिया बनाकर फिजी, ब्रिटिश गुयाना, डच गुयाना, ट्रिनीडाड, टोबेगा, नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) आदि जगहों पर ले जाये जाते थे। यह सब सरकारी नियम के अंतर्गत था। इस तरह का कारोबार करनेवालों को सरकारी संरक्षण प्राप्त था।
गिरमिटियों के साथ केवल इतनी बाध्यता थी कि वे पाँच साल बाद छूट तो सकते थे, लेकिन उनके पास वापस भारत लौटने को पैसे नहीं होते थे ,वे बेचे भी जा सकते थे। काम न करने या कामचोरी करने पर प्रताड़ित भी किये जा सकते थे। गिरमिटिया चाहे औरत हो या मर्द उसे विवाह करने की छूट नहीं थी। यदि कुछ गिरमिटिया विवाह करते भी थे तो भी उन पर गुलामी वाले नियम लागू होते थे। जैसे औरत किसी को बेची जा सकती थी और बच्चे किसी और को बेचे जा सकते थे।
युवा औरतों को मालिक लोग रखैल बनाकर रखते थे और उनका भरपूर यौनशोषण करते थे। आकर्षण खत्म होने पर यही औरतें मज़दूरों को सौंप दी जाती थीं। गिरमिटियों की संतानें मालिकों की संपत्ति होती थीं। मालिक चाहे तो बच्चों से बड़ा होने पर अपने यहाँ काम करायें या दूसरों को बेच दें। गिरमिटियों को केवल जीवित रहने लायक भोजन, वस्त्रादि दिये जाते थे। इन्हें शिक्षा, मनोरंजन आदि मूलभूत ज़रूरतों से वंचित रखा जाता था। यह 12 से 18घंटे तक प्रतिदिन कमरतोड़ मेहनत करते थे। अमानवीय परिस्थितियों में काम करते-करते सैकड़ों मज़दूर हर साल अकाल मौत मरते थे। मालिकों के जुल्म की कहीं सुनवाई नहीं थी।
यह सब हमारे लिए दिल दहला देने जैसा था।
19वीं सदी के प्रारंभ में यही स्थिति भारत में भी दासों की थी। उसके साथ ही हमें गिरमिटिया साहित्य, पूरा प्रवासी नव प्रवासी सब समझ में आ गया।
पुरा प्रवासी और गिरमिटिया का परस्पर संबंध है इसे समझते हुए हमें केरल के दलित साहित्य की याद आती है।
नव प्रवासी की पीड़ा का दर्द अपना है।
आपके पूरे लेख को पढ़ने के बाद जो हमने महसूस किया-
1-जीवन में खुशियाँ और पीड़ाएँ; दोनों ही दिल तक दस्तक देती हैं। और जीवन चक्र एक पहिये की तरह सुख- दुख , दिन -रात की तरह गुजरता है। किंतु जो लोग अपनी जन्मभूमि से अलग होकर जीवन भर सिवाय दुख के और कुछ भोग ही नहीं पाते, सुख का स्वाद चख ही नहीं पाते; उनके लिये उनका जीवन अनुभव दुख में ही सिमट जाता है। अनुभव की झोली में जिसके पास जो रहता है वह उसी को साझा करता है। गिरमिटिया साहित्य इसका ही उदाहरण है।हम दलित साहित्य को भी इसी के समकक्ष रखते हैं।
2-स्वेच्छा से अपने देश को छोड़कर जो लोग दूसरे देशों में बस जाते हैं उनका अपना अलग दुख रहता है भले ही वे उस मिट्टी में रच- बस जाएँ लेकिन हर पौधे को अपनी मिटटी ही रास आती है। हर देश की अपनी-अपनी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शासकीय परिधि अलग-अलग होती हैं। बाल मन जिसमें रचा-बसा रहता है वह सहजता से भूल नहीं पाता।
‘वियोगी होगा पहला कवि की’ तर्ज पर वही दर्द नव -प्रवासी साहित्य में नजर आता है
3-यह समझदारी वाली बात है कि हम स्वेच्छावश या नौकरी के कारण से, या अन्य किसी भी कारण से अपना देश छोड़कर अन्य किसी देश में बसे हैं तो वहाँ की संस्कृति के अनुरूप अपने को ढालने का प्रयास करना ही चाहिये। उस देश का हो जाना अत्यंत आवश्यक है।पर उस देश में रहते हुए हम अपने देश,अपने संस्कार,अपनी संस्कृति को भी जिंदा रखें तो हम हर जगह, हर तरह से, हर माहौल में खुश रह सकते हैं। और खुश रहना बहुत जरूरी है। आपने सही कहा तेजेन्द्र जी इसके बड़े उदाहरण हैं।
आपने जितने भी कवियों के काव्य पंक्तियों के उदाहरण दिए हैं ;काबिले तारीफ है; वैसे तो सभी बहुत अच्छे हैं लेकिन फिर भी मुंशी रहमान खां की चौपाई ने हमें बहुत प्रभावित किया-
*दुई जाति भारत से आए।*
*हिंदू मुसलमान कहलाए।।*
*रही प्रीति दोनहुं महं भारी,*
*जस दुई बंधु एक महतारी।।*
एक वक्त ऐसा भी था कि हिंदू और मुसलमान भारत देश में एक ही माँ की संतान की भाँति भाई-भाई की तरह रहते थे।
बाकी भी सारे उद्धृत अंश भारतीय यादों का परचम फहरा गये।अंत में जो इस पूरे लेख की सबसे महत्वपूर्ण बात है *प्रवासी* साहित्यकार! आज के दौर में हिंदी भाषा में लिखने वाला कोई भी साहित्यकार , फिर चाहे वह साहित्य की गद्य या पद्य के किसी भी रुप में, विधा में सृजन करे-वह सिर्फ साहित्यकार होता है। हम आपके लिखे से पूरी तरह सहमत हैं
*प्रवासी साहित्य में घर अर्थात भारतभूमि की सबसे बड़ी उपस्थिति तो उसके भारतीय भाषा में रचे जाने से ही हो जाती है।*
जिस तरह भाव के बिना भक्ति नहीं होती, उसी तरह भावों की अनन्यता ही साहित्य के सृजन का मूल है। फिर आप किसी भी देश के किसी भी भूमि पर बैठकर लिख रहे हों।
हमारी भारतीय संस्कृति वसुदेव कुटुंबकम् का भाव रखती हैं। तकनीकी साधनों के विकास ने आज सारी दुनिया को एक दूसरे से गली-मोहल्लों की तरह जोड़ दिया है। ऐसी स्थिति में साहित्यकार को प्रवासी कहना उचित नहीं लगता। और साहित्य तो प्रवासी होता ही नहीं है। उम्मीद है कि भविष्य इस बात पर जरूर गौर करेगा।
हम आपकी इस बात से भी पूरी तरह सहमत हैं कि “पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी हो रहे हिंदी साहित्य के सृजन को समान निगाह से देखने और जाँचने की जरूरत अवश्य पहचानी चाहिए।”
इस लेख को पढ़ने और लिखने में बहुत समय लगा। पर हम यह कतई नहीं कहेंगे कि समय जाया हुआ।देश-विदेश में साहित्य की स्थिति को हम समझ पाये। सबसे बड़ी बात कि गिरमिटिया साहित्य को समझ पाए। दलित साहित्य को पढ़ते हुए जितनी पीड़ा हमने महसूस की थी, सही मानिये उतनी ही पीड़ा हमें गिरमिटिया के अर्थ को समझते हुए हुई।
इस तरह के साहित्य को जब पढ़ते हैं तो इस बात से तकलीफ होती है कि इंसान सब कुछ बन जाता है, वास्तव में जो उसे नहीं बनना चाहिये किन्तु एक इंसान ही नहीं बन पाता इसीलिये सभी धर्मों के संत करुणा, दया ,परोपकार और मानवता की बात करते रहे।
इस बेहतरीन और महत्वपूर्ण लेख के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया।
नीलिमा जी! इतनी अद्भुत और सार्थक प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी के लिए हृदय से आभारी हूँ।
शुक्रिया आपका।आपने तवज्जो दी लिखे पर।