संपादकीय : प्रवासी हिंदी साहित्य के एक युग का अंत 5

जो भी सुषम बेदी को एक बार मिल लेता था उनका प्रशंसक बन जाता था। कथा यू.के. एवं पुरवाई पत्रिका पूरे प्रवासी भारतीय हिन्दी जगत की ओर से अपनी इस महत्वपूर्ण साहित्यकार को श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

हिन्दी साहित्य जगत के लिये एक दर्दनाक समाचार है कि अमरीका की हिन्दी कथाकार उपन्यासकार सुषम बेदी का निधन हो गया है। उनके देहावसान से वर्तमान प्रवासी साहित्य के एक युग का अंत हो गया है। 

सुषम बेदी का जन्म पंजाब के फ़िरोज़पुर शहर में 1 जुलाई 1945 को हुआ था। उनका निधन 19 मार्च 2020 को अमरीका के शहर न्युयॉर्क में हुआ।

सुषम बेदी उपन्यास, कहानी, कविता और आलोचना सभी विधाओं में निरंतर लिखती रहीं। उनके लिखे उपन्यासों में शामिल हैं नवभूम की रसकथा, गाथा अमर बेल की, हवन, लौटना, इतर, मैंने नाता तोड़ा, पानी केरा बुदबुदा और मोर्चे। उनके कहानी संग्रहों हैं चिड़िया और चील, सड़क की लय और अन्य कहानियां तथा कतरा दर कतरा। शब्दों की खिड़कियां एवं इतिहास से बातचीत उनके कविता संग्रह हैं और आलोचना की पुस्तक है – हिन्दी नाट्यः प्रयोग के संदर्भ में। निबन्ध संग्रहः हिन्दी भाषा का भूमंडलीकरण, आरोह अवरोह। 

उन्हें केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के मोटुरी सत्यनारायण सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के प्रवासी साहित्य भूषण सम्मान से अलंकृत भी किया गया। 

सुषम बेदी की पहली कहानी  1978 में प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘कहानी’ में प्रकाशित हुई और 1984 से वे नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। उनकी रचनाओं में भारतीय और पश्चिमी सांस्कृति के बीच झूलते प्रवासी भारतीयों के मानसिक आंदोलन का सुंदर चित्रण हुआ है।

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अभिव्यक्ति वैब पत्रिका के अनुसार रंगमंच, आकाशवाणी और दूरदर्शन की अभिनेत्री सुषम बेदी ने कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली (1966-72) तथा पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ (1974-75) में अध्यापन किया। दिल्ली दूरदर्शन औऱ रेडियो पर नाटकों तथा दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में 1962 से 1972 तक काम किया। लखनऊ रेडियो से बचपन में जुड़ी रहीं (1957-1960 तक)। 1979 में वे संयुक्त राष्ट्र अमरीका में जा बसीं और 1985 से कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क में हिंदी भाषा और साहित्य की प्रोफेसर बनीं। कंप्यूटर द्वारा भाषा शिक्षण के क्षेत्र में भी वे काम कर रही हैं। उनकी अनेक रचनाओं का अंग्रेज़ी तथा उर्दू में अनुवाद हुआ है। उन्होंने भाषा शिक्षा के क्षेत्र में भी अनेक पुस्तकों की रचना की है।

सईद अयूब ने लिखा है- तमाम दुःखद ख़बरें ही मिल रही हैं आजकल। अभी ख़बर मिली कि वरिष्ठ कथाकार सुषम बेदी जी नहीं रहीं। मेरे द्वारा आयोजित खुले में रचनाके 12वें कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत की थी। अभी कुछ ही महीने पहले साहित्य अकादमी द्वारा आईआईटी दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में हमने एक साथ कहानी पाठ किया था। वे कैलोफोर्निया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क में हिन्दी भाषा की प्रोफेसर रहीं और एक भाषा शिक्षक के रूप में भी उनसे मेरा कई वर्षों से जुड़ाव रहा। फ़ेसबुक पर सुषम बेदी के बहुत से मित्रों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए पोस्ट डाली हैं।

सुषम बेदी ने वाराणसी में मधुमति फ़िल्म के एक गीत ‘चढ़ गयो पापी बिछुआ’ को पूरी अदाओं से गाया था वोह भी गंगा नदी के किनारे। फिर यही गीत उन्होंने भोपाल के विश्वरंग सम्मेलन में भी सुनाया था। 

कथा यू.के. और सुषम बेदी का ख़ासा लम्बा साथ रहा है। कथा यू.के. ने लंदन में सुषम जी के कहानी पाठों का आयोजन समय समय पर किया। उन्होंने कथा यू.के. द्वारा आयोजित प्रवासी सम्मेलनों में यमुना नगर एवं मुंबई में भाग भी लिया। 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सुषम बेदी, ज़किया ज़ुबैरी, गंगाप्रसाद विमल जैसे महत्वपूर्ण नामों के साथ मुझे भी कहानी पाठ का अवसर मिला। श्रोताओं में दिल्ली के बहुत से महत्वपूर्ण नाम शामिल थे। 

मेरे साथ निजी तौर पर उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय – आगरा,  गान्धी नगर, चेन्नई, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय – वाराणसी एवं भोपाल में हिन्दी सम्मेलनों में मंच साझा किया। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला।

जो भी सुषम बेदी को एक बार मिल लेता था उनका प्रशंसक बन जाता था। कथा यू.के. एवं पुरवाई पत्रिका पूरे प्रवासी भारतीय हिन्दी जगत की ओर से अपनी इस महत्वपूर्ण साहित्यकार को श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

1 टिप्पणी

  1. मुझे भी विश्व रंग भोपाल में उन्हें सुनने और मिलने ka सुखद अवसर मिला था । कुछ मधुर यादें संजो रखी है, मैने ।

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