1- देवता इंसान नहीं हो सकता

अकेलेपन में अंधेरों से डरते-डरते
ख़यालों में तराश ली एक मूरत
प्राण-प्रतिष्ठा कर

स्थापित कर लिया मन मंदिर में

और पूजने लगी
कि पूजने से पत्थर भी देवता हो जाएगा

लेकिन भूल गई
देवता इंसान नहीं हो सकता

2- वो हारी हुई..

ख़ुशी के प्रदर्शन में
चमकता चेहरा
हमेशा ही मुस्कराहट में फैलें होंठ
लेकिन आँखों में है समेटे
जाने कितने ही समंदर

वो हारी हुई औरत
जो छली गई है
जन्म के साथ ही
बेटे-बेटी के परिपेक्ष्य में
अपने ही भाई से भेदभाव में

उम्र के कुछ अहम हिस्से में
सहमी-सहमी सी गुजरी है
बचाते हुए खुद को
जाने कितनी ही गलीज़ नज़रों की गलियों से

जीवन के इंद्रधनुषी एहसासात के बहाने
फिर छली गई है
अपने ही अन्धविश्वास से
कदम-कदम पर
किया है भुगतान औरत होने की

बिखरे सपनो में समेटे अपना वजूद
पूर्ण समर्पित तन मन से
तुलसी की तरह ही एक आँगन के मध्य
खुद को स्थापित करने की कोशिश में
कितने ही टुकड़ों में विभाजित हुई है

जाने कब सबकी जरूरतों में
ख़त्म हो गई उसकी हिस्सेदारी
पता ही नहीं चला
आंगन के मध्य से तुलसी चौरा कब
बाहर लॉन में विस्थापित हो गया

ढलते सूरज और बढ़ते स्याही के संग
साए भी अलग हो गए
हर भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाने के बाद
आज हाथ आया है *हार*का अनुभव

3- दायरा

निकलती है नदी जब
अपने उद्गमस्थल से
निर्बाध बहने वाली
अल्हड़,उच्छृंखल सी

निकलती तो है
अपने पूरे वेग से
पर धीरे-धीरे बंधने लगती है
दायरे में

निर्मित होने लगते हैं किनारे
और नदी ढल जाती है
उन्हीं किनारों के दरमियाँ

बाध्य हो जाती है वो
उन्हीं दो किनारों के मध्य
उसी आकार में ढल के
बहने को
किनारों के साथ-साथ
विस्तार और संकुचन

चाहती है वो
फिर वही
उत्तपत्ति काल का
अबाध बहाव
अपनी मर्जी के
सफ़र का होना

लेकिन जब कभी भी
छूटी है वह
किनारों के दायरे से

यह उच्छृंखल निर्वाधता
लाई है संग अपने
प्रलय और तबाही

सब बिखर गया है
उजड़ गए हैं घर
खेत खलिहान
हरे-भरे खिले बाग
तो कभी पूरा संसार ही

और आजाद होने की उन्मुक्तता में
मिले हैं तो बस
कुछ घृणित नाम
दुनिया की बेशुमार नफ़रत
उपेक्षा और तल्खियाँ

नदी का नदी होना
उसका नाम-पहचान
उसके वजूद की सार्थकता
इन किनारों के मध्य ही तो है..!!

4- याद है अभी तक…

इन दिनों
तुम इतने व्यस्त हो
कि तुम्हारे  ख्यालों में भी
मेरा ख्याल खो गया है कहीं

लेकिन मेरी बेज़ारी में भी
एक भी लम्हा
ऐसा नहीं गुज़रता
जिसमें
तुम्हारी चाहत नहीं होती

टटोलती रहती हूँ
अपनी उपस्थिति शिद्दत से
कि कहीं तो मिल जाए
तुम मे मेरे होने का कोई निशान

जानती हूँ
इतना भी सरल नहीं है
सहजता से पाना
तुम्हारे मन की थाह

याद है मुझे अब भी
कितने सालों के मशक्क़त के बाद
खोल पाई थी तुम्हारे मन  के किवाड़

एकनिष्ठ समर्पण के  दीप जलाए
तुम्हारे मन के दर पर वर्षों
तब जा के कहीं पहुंच पाई थी भीतर

अपने मन मुताबिक़ बना तो ली
रहने की जगह लेकिन
हसरत ही रही बाक़ी
कि घोषित करो तुम खुद ही
मुझे  मल्लिका अपने मन की।

5- उपहार

समझो मेरे नैनों की मौन भाषा
समझो मेरा सच्चा प्रेम
दे रही हूँ सर्वस्व अपना
उपहार में तुम्हें!

सारे वृक्षों के फूल
और कलियाँ सारी
भौरों की गुंजन
और तितलियां प्यारी
मध्याह्न के चमकते
सूर्य की गर्मी और
जंगल की हरी छाया
दे रही हूँ सर्वस्व अपना
उपहार में तुम्हें!

अंनत नीला आकाश
उसमें उड़ते हुए बादल
सारे खेतों की हरियाली
और अपना उषाकाल
भावशून्य रातों का
संगीतमय स्वर और
वर्षा का लयबद्ध बहाव
दे रही हूँ सर्वस्व अपना
उपहार में तुम्हें!

चिड़ियों का चहकना
चन्द्रमा का चमकना
पक्षियों का उड़ना और
दिन का निकलना
अपना जीवन सारा
और अपना समयचक्र
बस तुम खुश रहो
दे रही हूँ सर्वस्व अपना
उपहार में तुम्हें!

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