डॉ. पुष्पलता की ग़ज़लें
तुमको लगे है क्या ये अभी चाँद रात है
तुमने जिधर को कह दिया उस ओर चल दिये
तुमको मिली न कोई ख़ुशी हमसे,क्या करें
सीखा नहीं है हमने अभी खेल है नया
जानो तो कुछ बताओ कि है कौन सा मुक़ाम
पी लेते ज़हर भी जो पिलाते ख़लूस से
उस खुदाई से हम जुदा तो नहीं
दोष सबमें दिखाई देता है
चोट देकर ये चोट पाई है
दोस्त भी आजमाता रहता है
सब ही नीचे दिखाई देते हैं
आज सूरज बदल गया शायद
हमने सोचा कि धूप निकलेगी
जिक्र तक भी नहीं किया उसने
कल जो देखा तो खूबसूरत था
प्यास बाकी कोई रही होगी
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पुष्पलता जी!
आपकी तीनों गजलें पढ़ीं।कुछ शेर पसंद आए-
तुमको मिली न कोई ख़ुशी हमसे,क्या करें
अपने भी साथ दर्द की पूरी बरात है
उस खुदाई से हम जुदा तो नहीं
अपने होने से पर खुदा तो नहीं
बधाइयाँ आपको।
बहुत सुन्दर ग़ज़ल है महोदया।