Wednesday, September 9, 2026
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डॉ. पुष्पलता की ग़ज़लें

1.
तुमको लगे है क्या ये अभी चाँद रात है
रौशन लिबास में ये अंधेरी हयात है
तुमने जिधर को कह दिया उस ओर चल दिये
मालूम था कहाँ ये तुम्हारी बिसात है
तुमको मिली न कोई ख़ुशी हमसे,क्या करें
अपने भी साथ दर्द की पूरी बरात है
सीखा नहीं है हमने अभी खेल है नया
हम जानते नहीं हैं कि शह है या मात है
जानो तो कुछ बताओ कि है कौन सा मुक़ाम
है साथ कौन किससे भला अब निजात है
पी लेते ज़हर भी जो पिलाते ख़लूस से
जो कुछ दिया है तुमने, जफ़ा की ज़कात है
2.
उस खुदाई से हम जुदा तो नहीं
अपने होने से पर खुदा तो नहीं
दोष सबमें दिखाई देता है
दिल तू खुद से कभी मिला तो नहीं
चोट देकर ये चोट पाई है
तू भी खुलकर अभी हँसा तो नहीं
दोस्त भी आजमाता रहता है
तू खुदी पर कभी तुला तो नहीं
सब ही नीचे दिखाई देते हैं
तुझमें तुझसे कोई बड़ा तो नहीं
3.
आज सूरज बदल गया शायद
ख्वाब आँखों में पल गया शायद
हमने सोचा कि धूप निकलेगी
सुबह- सुबह ही ढल गया शायद
जिक्र तक भी नहीं किया उसने
उसका चेहरा बदल गया शायद
कल जो देखा तो खूबसूरत था
मौन ख्वाहिश में जल गया शायद
प्यास बाकी कोई रही होगी
नीर लेकर फिसल गया शायद
डॉ. पुष्पलता
डॉ. पुष्पलता
संपर्क - 09458513369
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2 टिप्पणी

  1. पुष्पलता जी!

    आपकी तीनों गजलें पढ़ीं।कुछ शेर पसंद आए-

    तुमको मिली न कोई ख़ुशी हमसे,क्या करें
    अपने भी साथ दर्द की पूरी बरात है

    उस खुदाई से हम जुदा तो नहीं
    अपने होने से पर खुदा तो नहीं
    बधाइयाँ आपको।

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