अश्विनी कुमार त्रिपाठी की ग़ज़लें
रिश्तों की टूटन को कितना कम कर देता है
मिलता हूँ तो हर पल उससे आँख चुराता हूँ
पहले ज़ख्मी करता है कुछ अश्क बहाकर वो
ग़म को दिल में पालो लेकिन इतना याद रहे
धीरज रख सब देख रहा है वह ऊपर वाला
न जीवन का वो फ़लसफ़ा ढूँढता है
ज़माने ने उसमें जफ़ाओं को ढूँढा
तुम्हारी सज़ा को है तन ने कबूला
ख़ुदा उस बशर को न मिल पाएगा जो
हकीकत में वो ना मिलेगा मगर दिल
आँसुओं से लिख रहा हूँ हसरतें पानी पे मैं
हाल-ए-दिल ग़र पूछती हो तो ये कहना है मुझे
ज़िंदगानी की ग़ज़ल में भी तो हम तुम दूर हैं
दौर-ए-हाज़िर के जुनून-ए-इश्क पे हैराँ है तू
जिस्म-ए-फ़ानी पर ही लिखकर थक चुकी मेरी क़लम
लगता है पतवारों से मिलवाता है
मस्त हवा के झौंकों का आवारापन
इंसानों को सिर्फ़ डराना ठीक नहीं
पहले प्रेम मिलाता था पर इस युग में
अफ़वाहों का दौर किसी भी मौसम में
उनके आगे हम भला उतने ज़ियादा कब खुले
तेज दोपहरी हो चाहे सुब्ह हो या शाम हो
कश्मकश में हूँ कि मैं किस रंग का तोहफ़ा चुनूँ
वस्ल की रातें मिलें या हिज्र की रातें सही
दिल के दरवाज़े पे दस्तक हो गई वह खुल गया
पत्थरों की चोट से तब तब हमें तोड़ा गया
हवा के साथ मिलकर पंछियों के पर को ले डूबा
सभी को छोड़कर पीछे हमें आगे निकलना था
तभी से ही न कोई सूर मीराँ जायसी जन्मा
जिसे खुद को मिटाकर भी बुजुर्गों ने सहेजा था
ज़माने हो गए बदली नहीं अख़बार की फ़ितरत
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