दिविक रमेश की कविताएँ

दिविक रमेश 1- सिवा तुम्हारे हथेलियों में  कहां रह गई थीं लकीरें  हथेलियां ही आ  बसी थीं तुम्हारी । कुछ झुका –झुका- सा  नहीं लगा था क्या आसमान और धरती  कुछ उठी –उठी- सी ? मैंने गाया खुल-खुल कर गाया। अच्छा है न  उसे कोई नहीं सुन पाया सिवा तुम्हारे। पेट में कुछ भी न पचाने वाली  मेरी...

पद्मा मिश्रा की दो कविताएँ

पद्मा मिश्रा 1. जीवन की बूंद बूंद एक बरसी है जीवन की भींगा नभ,भींगा मन धरती का अंतर्मन अंकुर बन फूटी हैं उम्मीदें जन जन की बूंद एक बरसी है जीवन की, आतप ने सोख लिया मौसम का जीवन रस तप्त हुए, पात सभी, डालियां भी मुरझाईं मुरझाए फूलों की आंखें भर...

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की लघुकथा – आपका दिन

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी "मैं केक नहीं काटूँगी।" उसने यह शब्द कहे तो थे सहज अंदाज में, लेकिन सुनते ही पूरे घर में झिलमिलाती रोशनी ज्यों गतिहीन सी हो गयी। उसका अठारहवाँ जन्मदिन मना रहे परिवारजनों, दोस्तों, आस-पड़ौसियों और नाते-रिश्तेदारों की आँखें अंगदी पैर...

पद्मा मिश्रा की कहानी – अपना वतन

पद्मा मिश्रा उकड़ूँ बैठे बैठे उसके घुटनों में दर्द होने लगा था, जोरों से प्यास भी लगी थी, कंठ सूखा जा रहा था, पानी पीने की कोशिश भी जानलेवा साबित होती,-बाहर बरसती तड़ तड़ गोलियां किसी भी क्षण उसका सीना छलनी कर देतीं -...

पद्मा मिश्रा की कहानी – थकान

पद्मा मिश्रा अभी अभी बारिश रुक गयी थी परन्तु आकाश में काले,घने बादलों का साम्राज्य अभी कायम था. अम्मा जी ने घड़ी की और देखा चार बज गए थे. पांच बजे तक बेटे ,बहू, बच्चेसभी आ जायेंगे. अभी तो नाश्ता भी नहीं बना था...

गाँव का रास्ता – गोविन्द उपाध्याय (कहानी)

कहानी                                                                गाँव का रास्ता  गोविन्द उपाध्याय                                                                              "अब उ गाँव कहाँ रह गया बाबू । रहिए दू-चार हफ्ता, अपने आप सब बूझ जाएंगे ।"जब राम लखन पाड़े यह बताए तब विनय पाड़े ने इतना गंभीरता से नहीं लिया ।  हर पीढ़ी को अपने अगली...