जीतेंद्र शिवहरे की लघुकथा

झूठ रविना की आखें अखबार की एक खबर पर जमी थी। पहले पन्ने पर बीती रात हुये एक सामुहिक दुष्कर्म का ब्यौरा था। उसे याद आया कि ऐसा ही कुछ तो हुआ था उसके साथ भी। उसकी शादी के पहले। हालांकि उसने कभी किसी को...

देवमणि पाण्डेय की दो ग़ज़लें

1 मेरा यक़ीन, हौसला, किरदार देखकर मंज़िल क़रीब आ गई रफ़्तार देखकर जब फ़ासले हुए हैं तो रोई है मां बहुत बेटों के दिल के दरमियां दीवार देखकर हर इक ख़बर का जिस्म लहू में है तरबतर मैं डर गया हूँ आज का अख़बाऱ देखकर बरसों के बाद ख़त्म हुआ बेघरी...

कीर्ति श्रीवास्तव की चार कविताएँ

1. शुभ शगुन क्या हूँ मैं कुम्हार के हाथों गढ़ी हुई उसकी कल्पना का एक रूप जिसने बनाया और उसने ही आग में तपाया भी मुझे और सौंप दिया एक अंजान साये को अब मैं एक कठपुतली से ज्यादा कुछ न थी गढ़ी तो गई एक हुनरबाज के हाथों पर रीति -रिवाजों की रस्सी में कस दी...

डॉ. तारा सिंह ‘अंशुल’ की तीन नज़्में

डॉ. तारा सिंह 'अंशुल' 1. इस दिल के आंगन चुपके से फिर आये हैं दिल दार , वो आकर खड़े हुए मेरे सामने तो उमड़ा है फिर प्यार ! यादों का सागर लहराया फिर टूटे ये बंधे हुए तटबंध , एहसासों में स्मृतियों में  फिर लौट हैं बिसरे...

दिविक रमेश की कविताएँ

दिविक रमेश 1- सिवा तुम्हारे हथेलियों में  कहां रह गई थीं लकीरें  हथेलियां ही आ  बसी थीं तुम्हारी । कुछ झुका –झुका- सा  नहीं लगा था क्या आसमान और धरती  कुछ उठी –उठी- सी ? मैंने गाया खुल-खुल कर गाया। अच्छा है न  उसे कोई नहीं सुन पाया सिवा तुम्हारे। पेट में कुछ भी न पचाने वाली  मेरी...

पद्मा मिश्रा की दो कविताएँ

पद्मा मिश्रा 1. जीवन की बूंद बूंद एक बरसी है जीवन की भींगा नभ,भींगा मन धरती का अंतर्मन अंकुर बन फूटी हैं उम्मीदें जन जन की बूंद एक बरसी है जीवन की, आतप ने सोख लिया मौसम का जीवन रस तप्त हुए, पात सभी, डालियां भी मुरझाईं मुरझाए फूलों की आंखें भर...