कीर्ति श्रीवास्तव की चार कविताएँ

1. शुभ शगुन क्या हूँ मैं कुम्हार के हाथों गढ़ी हुई उसकी कल्पना का एक रूप जिसने बनाया और उसने ही आग में तपाया भी मुझे और सौंप दिया एक अंजान साये को अब मैं एक कठपुतली से ज्यादा कुछ न थी गढ़ी तो गई एक हुनरबाज के हाथों पर रीति -रिवाजों की रस्सी में कस दी...

डॉ. तारा सिंह ‘अंशुल’ की तीन नज़्में

डॉ. तारा सिंह 'अंशुल' 1. इस दिल के आंगन चुपके से फिर आये हैं दिल दार , वो आकर खड़े हुए मेरे सामने तो उमड़ा है फिर प्यार ! यादों का सागर लहराया फिर टूटे ये बंधे हुए तटबंध , एहसासों में स्मृतियों में  फिर लौट हैं बिसरे...

दिविक रमेश की कविताएँ

दिविक रमेश 1- सिवा तुम्हारे हथेलियों में  कहां रह गई थीं लकीरें  हथेलियां ही आ  बसी थीं तुम्हारी । कुछ झुका –झुका- सा  नहीं लगा था क्या आसमान और धरती  कुछ उठी –उठी- सी ? मैंने गाया खुल-खुल कर गाया। अच्छा है न  उसे कोई नहीं सुन पाया सिवा तुम्हारे। पेट में कुछ भी न पचाने वाली  मेरी...

पद्मा मिश्रा की दो कविताएँ

पद्मा मिश्रा 1. जीवन की बूंद बूंद एक बरसी है जीवन की भींगा नभ,भींगा मन धरती का अंतर्मन अंकुर बन फूटी हैं उम्मीदें जन जन की बूंद एक बरसी है जीवन की, आतप ने सोख लिया मौसम का जीवन रस तप्त हुए, पात सभी, डालियां भी मुरझाईं मुरझाए फूलों की आंखें भर...

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की लघुकथा – आपका दिन

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी "मैं केक नहीं काटूँगी।" उसने यह शब्द कहे तो थे सहज अंदाज में, लेकिन सुनते ही पूरे घर में झिलमिलाती रोशनी ज्यों गतिहीन सी हो गयी। उसका अठारहवाँ जन्मदिन मना रहे परिवारजनों, दोस्तों, आस-पड़ौसियों और नाते-रिश्तेदारों की आँखें अंगदी पैर...

पद्मा मिश्रा की कहानी – अपना वतन

पद्मा मिश्रा उकड़ूँ बैठे बैठे उसके घुटनों में दर्द होने लगा था, जोरों से प्यास भी लगी थी, कंठ सूखा जा रहा था, पानी पीने की कोशिश भी जानलेवा साबित होती,-बाहर बरसती तड़ तड़ गोलियां किसी भी क्षण उसका सीना छलनी कर देतीं -...