1 – मत छलना उसे
मत छलना उसे
जिसने किसी अबोध बालक की
दंतुरित मुस्कान-सा
अपना निरामय विश्वास
तुम्हारे हाथों में सौंप दिया । 
मत छलना उसे
जिसने तुम्हारी चुगली खाती
तमाम आवाज़ों की ओर से
फेर लिए अपने कान
और तुम्हारी एक पुकार पर
बिखेर दी अपनी अनारदाना हँसी । 
मत छलना उसे
जिसने सदियों से
अपनी आत्मा पर बंधी
पट्टियों को खोलकर
उसमें झाँकने का हक
तुम्हें दिया । 
मत छलना उसे
जिसने तुम्हारी ओर
इशारा करतीं तमाम उँगलियों को
अनदेखा कर
अपनी उँगली थमा दी तुम्हें । 
मत छलना उसे
जिसने झूठ से बजबजाती
इस दुनिया में
सिर्फ़ तुम्हें ही सच समझा । 
अपनी फितरत से मजबूर तुम जब
फिर भी छलोगे उसे
तो यकीनन
नहीं बदल जाएगी ग्रह-नक्षत्रों की चाल
धरती पर नहीं आएगा भूकंप
पहाड़ नहीं होंगे स्खलित
नदियों में बाढ़ नहीं आएगी
तट बंध नहीं होंगे आप्लावित
दिन और रात का फर्क भी नहीं मिटेगा,
मगर ताकीद रहे
कि किसी की भाषा से
विलुप्त हो जाएंगे
विश्वास और उसके तमाम पर्यायवाची शब्द
और शब्दों के पलायन से उपजा
यह रिक्त स्थान ही
एक दिन लील जाएगा तुम्हें ।
2 – दु:ख-1
उसके अच्छे दिनों का 
सबसे वफ़ादार साथी था दुःख । 
सुख ने जब-जब किया अट्टाहास 
जीवन में 
दुःख ने मजबूती से थाम लिया उसे 
जैसे थामता है प्रेमी
भरोसा अपनी प्रेमिका का
जैसे थामता है हाथ 
पिता अपनी संतान का । 
दुःख ने उसको साधा 
कुछ गलाया, कुछ तपाया 
कुछ माँजा 
कुछ घिस-घिसकर चमकाया 
अच्छे दिनों के मक्कड़जाल पर 
उदासी की चादर डालकर 
दुःख कुनमुनाया । 

इस तरह दुःख ने अच्छे दिनों में 
सच्चे दोस्त का धर्म निभाया
दुःख टँगा रहा उसके काँधे पर 
बेताल की तरह …
3 – दु:ख-2
दुःख किसी पेड़ की 
जड़ तो था नहीं 
कि जिसे वह उखाड़ फेंकता 
जड़-मूल समेत । 
दुःख तो पसरा धीरे-धीरे कैंसर की तरह 
लीवर से शुरू होते हुए 
एक-एक हड्डी में
दुःख ने बनाया हड्डियों को इतना कमज़ोर 
कि बाथरूम में ज़रा सा फिसल जाओ
सीढ़ियों से जरा सा लुढ़क जाओ 
तो तुरन्त टूट जाएगा 
टखना, घुटना । 
फिर दुःख ने आहिस्ता से कसी अपनी गिरफ़्त 
रीढ़ की हड्डी पर 
अब उसका सीधा तनकर 
खड़ा रहना भी दूभर था । 
दुःख से लदा-फदा 
वह झुकता रहा धरती की ओर 
कम होता रहा उसका नाता 
आसमान से
यह झुकना 
उस फलदार पेड़ का झुकना कतई नहीं था 
जो नीचे झुककर भी 
बढ़ता है आसमान में । 
दुःख इतना फैला बरगद की तरह 
कि उसकी शाखाओं से भी फूटने लगी जड़ें 
दुःख अब पेड़ की जड़ भी था 
लेकिन वह फिर भी नहीं उखाड़ सका उसे 
जड़-मूल समेत ।
4 – प्रेम
शहर नहीं कर सके प्रेम उन हाथों को
जिन्होंने उन्हें सजाया-सँवारा…
चूमकर उन हाथों को
वे नहीं रोक सके उन्हें पलायन से । 
दो वक्त की रोटी
और सिर पर छत होती
तो आखिर कोई क्यों भागता अपने गाँव-गुवार
पागलों की तरह
भूखा-प्यासा, अधमरा, गिरता-पड़ता,
कभी बेसुध होता
तो कभी ट्रेन की पटरी पर कटता । 
शहर के पास नहीं थे वे हाथ
जो आगे बढ़कर थाम लेते उन्हें,
पोंछ देते उनके चेहरे पर
छाई उदासी के दाग,
उन्हें गुदगुदाकर
बिखेर देते
एक अमलतासी हँसी उनके चेहरों पर । 
कोई दो-चार दिन का साथ तो था नहीं
एक लंबा नाता था
(भले नौकर और मालिक का ही सही) । 
यूँ तो सब कहते हैं
कि चार दिन मनुष्य अगर कुत्ते के साथ रह जाए
तो उससे भी प्रेम हो जाता है !
तो अब कौन से किस्से सुनाए जाएगें
गाँव के सीवान पर?
कि शहर में अब मनुष्य नहीं बसते
या मजदूर कुत्तों से भी ज्यादा गए-गुजरे हैं…..

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