1 – मां के रंग
अकेले चांद के साथ
तारों भरी रातों में
मां देखती अनंत दृश्य
आंधी में तब्दील होने के अनेक सपने
पूरा न कर पाने की ऊहापोह में
सूरज के उजास भरे दिन में भी
खिड़की के सीखचों के अंदर
आंखों की दहलीज पार करते आंसुओं को
सपनों से भरे दृश्यों के परे
जिन्दा शोरगुल के बीच
वह धीरे से गुन लेती
गीतों के स्वर लहरी
और फेंक आती
ठीक किसी अभाव की तरह
चूल्हे की राख को
वह शामिल रहती
घर के सभी कोनों में
दृष्टिकोण के मूल्यांकन में
साक्षी रहती धरती की
और आत्मा के खरोंचों को
भूल आती बिछावन में
मां चुपचाप
समेत लेती अपने पास
समय की नब्ज पहचानती हुई
आकाश के फैलाव में
उड़ान भरते अपने डैनों को.
2 – चाय पे चर्चा
चलो
पीते हैं चाय
और करते हैं चर्चे
दुनिया जहां की
वैसे
चाय से मीठी
न कभी देश हुआ
न ही कभी ये दुनिया
कि खोज ही लिया जाए
कोई न कोई हल
बेहतर दुनिया की तलाश में
होती है फिर भी
चाय के वक्त ही सही
कुछ चर्चे
हमारी दुनिया की
भले कोई हल
चाय के भाप के साथ
इसी दुनिया में उड़ जाती हो
होनी ही चाहिए
चाय पे चर्चे
शायद किसी दिन
सुलझ सके
हमारी सारी मसले.
3 – कहां बचेंगे हम
मुश्किल था बचना
जहां हम खड़े हैं
वहां मुर्दा कौमें इंतजार नहीं करती
कि धरती की आखिरी अनुकंपा
अंधेरे जंगलों में जा छिपे
और प्रतिबद्ध होता हर हालत
अनजान दिशाओं से ठोकर खाकर
समा जाए प्रतीक्षा सूची में
हां बचना और बचाना के पीछे
सचमुच आकाश के तारे
भंवर में वृत बन जाते हैं
और आंचल पसरता समय
छिपने के लिए
खंडहरों को ढूंढते हैं
इसी तरह खत्म होती रेखा में
फिर कभी
आंखों की रोशनी नहीं बचती
और समुद्र सा फुंफकारता दुःख
बड़ी मुश्किल से बच पाता है
यहां जाना कहां था के पहले
सात तालों के भीतर
जानना के बादल में
कोई इश्तिहार सामने नहीं आता
और कितना कितना भीतर
अलविदा के स्वर
दबते कुचले जाते हैं
ऐसे में
हमारा बचना
कहां तय होगा
जब संसद में ही
हंगामें के सिवा कुछ भी नहीं है.


सार्थक रचना श्रृंखला,बधाई हो।
मोतीलाल दास जी सर!
आपकी तीनों कविताएँ पढ़ीं।
“माँ के रंग” कविता में आपने माँ के सभी कर्तव्यों को रंगों का रूपक देते हुए माँ के प्रति संवेदनाओं को कविताबद्ध किया। माँ कहने के बाद कुछ और कहने के लिए शेष रह भी नहीं जाता । अच्छी कविता है यह।
“चाय पर चर्चा” कविता सामान्य लगी। पर यह बात पूरी तरह सच है कि चाय पीते हुए कई विषयों पर चर्चा हो जाती हैं।
“कहाँ बचेंगे हम” कविता थोड़ी अबूझ लगी !समझ नहीं पाए। बस आखरी पद ही समझ में आया कि,” संसद में भी हंगामे के सिवा कुछ नहीं है।
कविताओं के लिए आपको बधाई।