पद्मा मिश्रा की दो कविताएँ 3
  • पद्मा मिश्रा

1. जीवन की बूंद
बूंद एक बरसी है जीवन की
भींगा नभ,भींगा मन
धरती का अंतर्मन
अंकुर बन फूटी हैं उम्मीदें जन जन की
बूंद एक बरसी है जीवन की,
आतप ने सोख लिया मौसम का जीवन रस
तप्त हुए, पात सभी, डालियां भी मुरझाईं
मुरझाए फूलों की आंखें भर आईं हैं
यही एक आशा विश्वास लिए जागी है
कलियां जो रातों को सोई नहीं,,
सपनों की नींद, कहीं दूर के नगर में,
वैरागी भंवरे की प्रीत की
बूंद एक बरसी है जीवन की,
आए हैं मेघदूत, उमड़ रहे नभ में
भरी मांग नदिया की,मन के जल दर्पण में
हुलसित मन -आगन में
सुधियो के पाखी की,पोर पोर डूबी है पाखे
आस जगी पाहुन के आने की
बूंद एक बरसी है जीवन की,
2. भोर सुहानी
तारों की छैंया में जागे सपने मन के
चांद थका सा ,मद्धम मद्धम
कहीं सो गया,
तब रात ढली उम्मीदों वाली,,,
दूर कहीं से टेर लगाती
दिप दिप करती भोर किरन की,
धीरे धीरे उतर रही है भोर
सुहानी-
स्वर्ण-किरण की ओढ चुनरिया,
शर्माती सी,बल खाती सी,,,
मुस्कानों के रथ पर बैठी,
नाच रही है, खलिहानों में,
घर आंगन में, चौबारों में,,
अलसायी सी नींद भरी आंखें जागी‌ हैं,,
निरख रहीं उत्सुक नयनों से
ये कौन आ गया,मन के आंगन
कैसा अद्भुत समां बंधा है
चित्रलिखित सा मन जब तक
 ,भ्रम के मोहक जाल तोड़ता,,
तभी सुनहली भोर हो गई,,,,,
धीरे धीरे उतर रही है भोर सुहानी,,

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