1 – विषवृक्ष धृतराष्ट्र से!
हे शतश: व्याधि! महा विनाश!
अंध-दृष्टि! धिकराष्ट्र! धृतराष्ट्र !!!
तुम्हारी ही गर्हित आकांक्षाओं का
कुफल था दुर्योधन…
जिसकी परिणति हुई महाभारत में/मृत्यु में!
एक मात्र युवराज होना पर्याप्त नहीं होता
राष्ट्राधयक्ष होनेके लिए,
सिद्ध या स्थापित नहीं होता अधिकार किसी का
राजसिंहासन पर कभी भी!
इसलिए,
किसी धृतराष्ट्र की अंध-आकांक्षा,
दुरभिसंधि दुर्योधन की,
षडयंत्र शकुनि का,
कि इच्छा-अनिच्छा से भी सहयोग
भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा
कृपाचार्य और कृतवर्मा का…
महाभारत तो  मचा सकता है,
पर पराजय नहीं टाल सकता।
एक व्यास-दृष्टि है
असद् पर सद् की विजय सिद्ध है,
किंतु  क्या ,
कोई धृतराष्ट्र इसे समझता है
हठी दुर्योधन मानता है?
2- द्रोण  का आत्मघात
हे ऋषिवर! गुरुवर!!
ज्ञानकोष!!!
कहीं से उचित नहीं था
एकलव्य का अंगूठादान
गुरुदक्षिणा में!
स्वयं साध्य से,
स्वाध्याय से,
संदर्भ से
अनुचित नहीं है विद्याग्रहण
अधिगम- ऊपर उठना अज्ञान-दशा से।
फिर यह अन्याय कैसा?
सीमित नहीं है ‘सरस्वती’ और शौर्य किसी कुल-वंश में
पुरुषार्थ का मतलब नहीं है किसी का मात्र क्षत्रिय होना
खिलते हैं कितने ही अनजान पुष्प कंटक-कानन में।
क्या यह नियति-भेद भी है वश उसी के?
और क्या सुयश है यह
किसी गुरु के लिए अधिग्रहण?
पूर्व निर्धारित नहीं है किसी का प्रथम आना
अस्तु अपने प्रिय अर्जुन के लिए
एकलव्य का अंगूठादान
आत्मघात था तुम्हारा!
और सोचो, नियति का खेल कैसा
लड़ना पड़ा तुम्हें उसी दुर्योधन के लिए,
जो सफल नहीं हो सका गुरु दक्षिणा चुकाने में!
3 – पांडवों से
था सत्य तुम्हारे साथ!
सुनो पांडव!
धर्मराज युधिष्ठिर!
गदाधर भीम!
पार्थ,वीर अर्जुन, केशव प्रिय!
अप्रत्याशित नहीं था तुम्हारा जीतना,
इस कर्म-कुरुक्षेत्र में
जो जितना चलता है,जलता है और तपता है,
निखरता है उतना ही उसका जीवन।
तुम चले, तुम जले,तुम झुलसे
दीन-हीन, छिन्न मूल ,बहुविध विपत्ति-ग्रस्त!
जंगल-जंगल /कंटक पथ/अनजान नगर
बने परिचारक/बने दास
इसलिए कि जब लौटे
था सत्य तुम्हारे साथ!
4- अमर वीर अभिमन्यु से!
वीर अभिमन्यु!
तुम आत्म-सम्बल हो
कोटिश: युवाओं का/ अनगिनत योद्धाओं का
इसलिए कालातिक्रमित हो,
मृत्यु के बाद भी जीवित हो!
आकस्मिक नहीं था चक्रव्यूह में तुम्हारा फँसना
जूझना अपन समय से।
क्योंकि न सही
निमित्त होता है व्यक्ति-व्यक्ति
अपने कर्म-कुरुक्षेत्र में,
देह-धारण के साथ अपने राष्ट्र-समाज में।
भले ही कोई महाभारत नहीं हो उसका अभिप्सित
किंतु क्या किसी धृतराष्ट्र की उच्चाकांक्षा
किसी दुर्योधन के अन्याय और अत्याचार का सिलसिला
सीमित रहा है पांंडवों तक?
अपने समय के समानांतर
तुम्हारा युद्धरत होना
सत्य संवलित होना
दुर्योधनी शक्तियों के खिलाफ
श्लाघ्य है!/तुम मर कर भी अमर हो!
5 – शूद्र शापित के महासूर्य कर्ण से!
कर्ण !
तुम वीर हो! महादानी हो!
परम योद्धा हो!
समर्थ हो समर में जूझने में,
धनुर्धर अर्जुन से, गदाधर भीम से
और चतुर चक्रधर कृष्ण से भी
अकेले ही आत्मसम्बल हो कौरवों का!
सतत् कर्मशील हो,
माना  कि वीरों का, ऋषियों का और नदियों का
कोई कुल-गोत्र नहीं होता
अपने भुजबल ,तपबल
और सतत प्रवाह के सिवा…
सदियों से समय के समानांतर एक चुनौती हो
आरोपित शील-बल की श्रेष्ठता के प्रति।
आत्मसम्मान हो अंत्यजों का
कि सत्य- साध्य नहीं है किसी का जन्मना
ऊँच या नीच होना।
अस्तु , सदियों से दीन-हीन, दमित -कुंठित
अपमानित और उपहासित लोगों का
अखण्ड तेज हो तुम
घोर अंधकार में भी उद्दीप्त!
किंतु हे हतभाग्य !
मित्रता का मतलब नहीं है
अपनी आत्मा को बेच देना।
नहीं यह कृतज्ञता ही प्रतिदान है किसी उपकार्य का
वीरोचित नहीं रहा द्रौपदी से तुम्हारा प्रतिशोध भी
क्योंकि व्यक्ति से नहीं व्यूह से लड़ना था तुम्हें
छिन्न-भिन्न करना था असंगति के इन्द्रजाल को,
तोड़ना था मोह गुरुद्रोण के उतप्त अहंकार का,
कि श्रेष्ठ अर्जुन नहीं एकलव्य है,
शूद्र में भी वीर कोई कर्ण है।
परंतु क्या मित्रता के नाम पर
दुष्ट दुर्योधन की दुरभि-संधि का यह फल नहीं है
और क्या अर्द्धसत्य नहीं है समर में
अर्जुन का जीतना?
6 – कृष्ण से!
हे स्वयं सिद्ध! हे सत्य-साध्य!
हे कर्म-लक्ष्य! हे देश-काल!
हे ग्रह-दिशा! हे महाकाल!
तुम जनम-मरण के आर-पार!
मानव मुक्ति के महाद्वार!
आए तुम करने उचित उप कर्म
देह धरने मर्त्य-लोक में/मृत्तिका में।
आधि-व्याधि, चिंता-क्रोध,प्रतीक्षा-प्रतिरोध,
दंश-उपदंश, आशा-निराशा, ईर्ष्या-द्वेष, प्रेम-राग के महाजाल में।
करना पड़ा वह सब/जो था समाज हित और मानवोचित
और फिर मरना पड़ा हमारी तरह।
उचित और आवश्यक ही नहीं
अनिवार्य था न्याय-अन्याय, सत-असत
और धर्म-अधर्म का यह निराकरण
ताकि फिर कोई दु:शासन किसी दुर्योधन के इशारे पर
भरी सभा में फिर किसी द्रौपदी को नग्न नहीं करे
और कोई धृतराष्ट्र विष-वेलि नहीं बोए
कि सर्वनाश नहीं करे राष्ट्र-समाज का।
…किंतु क्या यह आश्वासन नहीं था?
…और जब आज फिर
द्रौपदियों के चीरहरण हो रहे हैं
कि स्थापित हो गया है साम्राज्य कंस-जरासंध  का
तब क्या यह तुम्हारे देह धरने का समय नहीं है?
7 – एक अभिमत युद्धोपरांत
एक प्रज्ञा-दृष्टि है संजय
कि दृश्यवाचक ?
यही है उसकी नियुक्ति का साध्य!
और कहा भी उसने धृतराष्ट्र से महाभारत
दिव्य-दृष्टि के सहारे निश्चित समय तक।
किन्तु समाधान नहीं है वह
धृतराष्ट्र की अंध-दृष्टि का!
अनुत्तरित हैं और भी कई प्रश्न-
प्रतिज्ञा भीष्म की,
विवशता विदुर की,
द्यूत-क्रीडा में युदिष्ठिर का द्रौपदी को हारना,
अभिमन्यु, द्रोण,कर्ण,विकर्ण,जयद्रथ से लेकर बर्बरी
कि विरक्त दुर्योधन का वध भी,
आक्रोश उद्भ्रान्त अश्वत्थामा का,
आत्महत्या युयूत्सु की,
अभिशाप गंधारी का
आत्म-गोपन कुंती का
युद्धोपरांत एक अभिमत माँगता है
आज भी अपने समय से!
संजय कुमार सिंह
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