1 – चुप्पी
अब कैसे मन संवाद करे
अधरों ने चुप्पी साधी है |
अँखियों की गहरी झीलों में
कुछ तिरता-तिरता रहता है
कुछ चुभता सा इन पलकों में
कुछ सीला-सीला रहता है
अब कैसे नदिया पीर बहे
कोरों ने चुप्पी साधी है
गठरी बाँध उम्मीदों की
खुद ने खुद को बहलाया
कतरा कतरा झरा कहीं
झरनी का छेद न दिख पाया
अब नई उम्मीदें कौन गढ़े
साधों ने चुप्पी साधी है
कुछ यादे-बातें बीते की
कुछ बोल अबोले रहे कहीं
न मौन मुखरित हुआ कभी
न मन ने आखर लिखे कहीं
अब कौन काँधे हाथ धरे
रिश्तों ने चुप्पी साधी है
2 – अब न आतीं चिट्ठियाँ
बाट जोहते घर दरवाज़े
बाट जोहती देहरियाँ
अब न आते हैं हरकारे
न आती अब चिट्ठियाँ
वो बात अलग, था दौर अलग
शब्दों के रिश्ते नाते थे
लाज शर्म के पहरे थे पर
शब्द कहाँ रुक पाते थे
अब न आखर न वो कागज़
न स्याही की रंगीनियाँ
कैसी यह मजबूरियाँ
कहाँ खो गईं चिट्ठियाँ
दूर गली के मोड़ छोर तक
आँखें छू कर आतीं थी
बंद लिफाफे की परतों में
बिन खोले पढ़ जातीं थी
अब न वो हाथों की कंपन
न आँखों की बदलियाँ
कहाँ रह गईं चिट्ठियाँ
छुए कभी खुशबू का झोंका
फूल पाँखुरी छिपी कहीं
प्रीती के गीतों की कड़ियाँ
विरह वेदना लड़ी कहीं
अब न वो मनुहार संदेसे
तकरारें न ही संधियाँ
बैरन हो गईं चिट्ठियाँ
कहाँ खो गईं चिट्ठियाँ


आपकी दोनों ही कविताएंँ अच्छी लगीं शशि जी!
चुप्पी कविता निराशा की कविता लगी पर कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ भी बनती है कि मन उदास हो जाता है और कुछ इस तरह से अभिव्यक्ति हो जाती है।
चिट्ठियाँ कविता में चिट्ठियों को लेकर आपकी भावनात्मक अभिव्यक्ति बिल्कुल अपनी सी महसूस हुई।
नीलिमा जी , आपको मेरी कविताएँ अच्छी लगीं , आभार आपका। मन:स्थिति शब्दरूप ले लेती है कभी और कभी हम अपने अतीत में झांकते हैं । पुरवाई के संपादक मण्डल का भी धन्यवाद मुझे अपने पाठकों से मिलवाने के लिए ।