मुक्तक
जिस साँझ कभी बारिश में
पत्तों पर न हो ठहरा पानी
शायद है शरारत मौसम की
या फिर है हवा की नादानी।
गीत
अपना पानी बचाकर रखे है कँवल
और गुलाबों को पानी की दरकार है
जिसकी चाहत है जो ,वो उसे मिल रहा
कौन किसके मुक़द्दर का हक़दार है।
जो सहारा दिया तो नदी ही रही
जो बहा ले गई एक मझधार है।
ख़्वाब आये तो पलकों से हटते नहीं
नींद आँखों में आने को बेज़ार है ।
खुश्बुओं से उसे क्या शिकायत रहे
फूल जिसके लिए एक व्यापार है ।
आस्था को बदलती नई सोच है
देव, जिसके लिए एक उपहार है।
वो तुम्हारी अदब, या मेरी सभ्यता
आ बचाकर चलें, विश्व  बाजार है ।

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