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पुरवाई के संपादकीय ‘किसान आन्दोलन : कितने सच कितने झूठ’ पर कुछ पाठकीय प्रतिक्रियाएं

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31 जनवरी 2021 को प्रकाशित पुरवाई के संपादकीय ‘किसान आन्दोलन : कितने सच कितने झूठ’ पर संदेश के माध्यम से प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं।

डॉ. तारा सिंह अंशुल
अभी कुछ समय पूर्व पुरवाई पत्रिका की संपादकीय शीर्षक ” किसान आंदोलन : कितने सच कितने झूठ ” पढ़ा, यह शीर्षक पढ़ते ही लम्बे समय से जारी ये  किसान आंदोलन का पूरा परिदृश्य मानस पटल पर अपनी तस्वीर के साथ उपस्थिति दर्ज कराता छा जाता है । यहाँ इस संपादकीय आलेख में संपादक जी द्वारा ,..
वर्तमान समसामयिक ज्वलंत मुद्दे, किसान आंदोलनकारियों के बीच उग्रवादी तत्वों के द्वारा ,.. संविधान विरोधी दंगा-फ़साद ,  तोड़-फोड़ , हिंसात्मक कारनामों  का उल्लेख बहुत ही साफगोई व निर्भयता से किया गया है । साथ ही इसमें संपादक महोदय द्वारा उग्र दंगाइयों के कुत्सित मानसिकता के तहत किये गये , कुकृत्यों  के प्रति सरकार की उदसीनता का उल्लेख कर सरकार को अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहने हेतु     याद दिलाया गया है ।
ये देश हित के प्रति आप की सचेत मानसिकता का द्योतक है । जो राष्ट्रीय हित में महत्वपूर्ण , सतर्क विचरों को प्रतिपादन को प्रवाह देने में सक्षम है।   बेशक , आप का यह तथ्यात्मक आलेख तथ्यात्मक धरातलीय बिम्ब उपस्थित करके अत्यंत  सराहनीय हो गया है।
संपादकीय  दायित्व का निर्वहन करते हुए आप  द्वारा कैप्टन अमरिंदर सिंह के निषपक्षतापूर्ण वक्तव्य का उल्लेख किया जाना यहाँ  ज़रूरी प्रतीत होता है कि       एक  लोकतांत्रिक देश में ,  देश हित में , स्वच्छ राजनीति कैसे की जानी चाहिए  ? …. की तरफ़ इशारा करते हुए  एक बेहतर उदाहरण  पाठक वर्ग के समक्ष प्रस्तुत किया गया गया है।
विरोधी दल के नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह का यह निष्पक्ष  वक्तव्य ऐसे दुषित राजनीतिक परिदृश्य में स्वार्थी ,  कपटपूर्ण राजनीति के मुंह पर एक बड़ा जोरदार तमाचा है ।
इससे अन्य राजनीतिक दलों , नेताओं को  , राष्ट्रीय हित में एक अच्छी सीख लेनी चाहिए । देश व देश हित , हमेशा राजनीति से उपर होता है , इसका ध्यान सभी राजनीतिक दलों , नेताओं को हर हाल में रखना चाहिए ।
विडम्बनाओं से भरे इस लम्बे अरसे से चल रहा किसान आंदोलन के आंदोलनकारियों  और सरकार दोनों  ही  किं कर्तव्यविमूढ़ हैं।
दोनो की अपनी अपनी हठधर्मिता पर अडिग रहने के कारण  हाल-फिलहाल इस प्रचंड होते आंदोलन का शांतिपूर्ण हल निकलने का सुलभ रस्ता सुझता दिख नहीं रहा है ।
अतः यहाँ ये उल्लेख करना समीचीन प्रतीत  है कि ,…….. किसानों की हठधर्मिता के मद्देनजर इस ज्वलंशील  मुद्दे पर, पुरवाई के संपादक  आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी द्वारा अपनी क़लम को धार देते हुए लिखा गया सकारात्मक सारगर्भित संपादकीय आलेख , …..
संदर्भित किसान आंदोलनकारियों /सरकार को सुलभ शांतिपूर्ण हल की विकट तम भरी राह पर अग्रसर होने के लिए ,… एक नन्हें प्रज्वलित दीप की भांति कुछ  प्रकाशांश   का उजाला देने में सफल  होने का माद्दा रखता है ।आप का यह संपादकीय अपने लक्षित उद्देश्य मे सफल व प्रशंसनीय है।
हार्दिक बधाई
अनंत शुभ कामनाएँ
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उषा साहू, चेम्सफोर्ड, यूके
सचमुच किसान आंदोलन एक एक गुत्थम गुत्था मामला बनता जा रहाहा है । वास्तव में देखा जाए तो क्या यह आंदोलन किसानों का है ? या मतलब परस्त काठ के उल्लुओं का है जो, किसानों की पीठ में छुरा भौंककर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं । क्या भारतीय किसानों में इतनी हिम्मत है कि वे सीधे प्रशासन से टकरा सकें?
अरे ! किसानों को तो गली का बनिया तक, बहकाकर अपना मतलब साध लेता है । फिर प्रशासन तो बहुत दूर की बात है । बिचौलिए ही अपना नुकसान होता देखकर उन्हें  निशाने पर रख रहे हैं ।  ……और करेले और  नीम चढ़ा  को, चरितार्थ कर दिया, तथा कथित ‘ किसानों ‘ के 26 जनवरी के  अशोभनीय क्रिया कलापों ने ।
यह बहुत दुखद है । हमारा अन्नदाता ही आज दो पाटों के बीच में पीस रहा है । फिर भी, मोदी साहब ने किसानों की लाचारी को देखते हुए,  कुछ बहुत ही  उदार निर्णय लिए हैं । जैसे अगर किसान अपना आंदोलन वापस ले लेते हैं तो, किसान बिल को एक या डेढ़ साल के लिए मुल्तवी कर सकते हैं । किसान कभी भी अपनी समस्या को लेकर सीधे ही है मुझसे मिल सकते हैं। फिर भी, आंदोलन को लेकर, फिलहाल तो मोदी सरकार ही कुछ जादू दिखा सकती है ।

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अर्चना पेन्युली, डेनमार्क
बहुत ही उत्कृष्ट सम्पादकीय. Balanced. आपको भारत की राजनीति में होना चाहिए था।

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