प्रवासी साहित्य की यात्रा – एक संघर्ष गाथा (भाग-1), संपादक – प्रदीप गुप्ता, प्रथम संस्करण – 2026
पृष्ठ संख्या – 158, मूल्य – ₹300 /- मात्र, प्रकाशक – अद्विक पब्लिकेशन प्रा. लि., दिल्ली -110092
समीक्षा: डॉ अरुणा अजितसरिया, एम बी ई
प्रदीप गुप्ता द्वारा संपादित, ‘प्रवासी साहित्य सृजन का संसार एक संघर्ष गाथा’ में उन पंद्रह प्रवासी हिंदी रचनाकारों के अनुभव हैं जिन्होंने भारत से बाहर जाकर एक नयी धरती पर संघर्ष करते हुए न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि हिंदी साहित्य को भी नई दिशा दी। साहित्यकारों के जीवन-अनुभव उनके वक्तव्यों के रूप में प्रस्तुत करने से उनकी प्रामाणिकता और प्रभविष्णुता बढ़ी हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से विदेश में हिंदी में साहित्य सृजन का बीजारोपण बहुत पहले हो गया था, वर्तमान डिजिटल युग में यह एक विराट वटवृक्ष के रूप में विकसित और पल्लवित होकर साहित्य के अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहा है। पुस्तक में उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को रेखांकित करने के बजाय कुछ समसामयिक लेखकों के वक्तव्य शामिल हैं।
विदेश में रचे हिंदी साहित्य के नामकरण को लेकर चले आए लंबे विवाद की शृंखला में उलझने की अपेक्षा प्रदीप गुप्ता इस संकलन में शामिल लेखकों के साथ जुड़े ‘प्रवासी’ विशेषण को उसके शाब्दिक अर्थ में स्वीकारते हैं, ‘प्रवासी साहित्य वह रचनात्मक अभिव्यक्ति है, जो अपने देश से दूर रह रहे लेखकों द्वारा रचा जाता है। …उसका मन दो संस्कृतियों के बीच झूलता हुआ अपनी ही एक तीसरी दुनिया रचता है।’ इस कथन में महत्वपूर्ण बिंदु ‘तीसरी दुनिया रचना’ है।
लेखक स्वदेश और प्रवास की सांस्कृतिक धारणाओं, मूल्यों और व्यावहारिक अनुभवों को अपनी रचनात्मक ऊर्जा से संपोषित कर जो साहित्य रचता है वह हिंदी साहित्य को एक वैश्विक धरातल पर आसीन करता है। मेरे विचार से भारत और विदेश में लिखे जाने वाले कथा साहित्य में यही मौलिक अंतर है। दोनों में से कोई एक कमतर या बेहतर नहीं है, अंतर अनुभव जनित कैनवस के विस्तार का है जो स्वदेश के कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकल कर कल्चरल शॉक को आत्मसात करने और ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जुटाने के संघर्ष से जूझते हुए अपनी आंतरिक रचनात्मक शक्ति को बचाते-तराशते हुए नये सिरे से अपनी पहचान बनाने के संकल्प से उपजता है। अलग-अलग देशों में प्रवास करते लेखकों के वक्तव्य मेरी इस धारणा की पुष्टि करते हैं।
अंग्रेज़ी में लेखन कर अपनी वैश्विक पहचान बनाने वाले भारतीय मूल के लेखकों में वी.एस. नायपॉल, सलमान रुश्दी, झुम्पा लाहिड़ी, किरण देसाई, विक्रम सेठ, अमिताव घोष और अनीता देसाई जैसे लेखकों ने विदेश में रहकर अंग्रेज़ी में साहित्य रचकर अपनी वैश्विक पहचान बनाई। संग्रह में उनके नाम का उल्लेख भर है उनके संघर्षों का विवरण या लेखकों के वक्तव्य नहीं हैं। संग्रह के केंद्रबिंदु वे लेखक हैं जो हिंदी में रचना कर रहे हैं। लेखक के अनुसार प्रवासी हिंदी लेखकों में संख्या और गुणवत्ता की दृष्टि से ब्रिटेन के लेखकों का नाम सर्वोपरि है। यह सच है कि ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग में डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के कार्यकाल में हिंदी साहित्य की गतिविधियों को एक नई गति मिली थी जिसके परिणाम स्वरूप हिंदी में रचना की एक सशक्त लहर चली जिसके अंतर्गत उषा राजे सक्सेना, पद्मेश गुप्त, दिव्या माथुर आदि अत्यंत सक्रिय हुए थे।
वस्तुत: ब्रिटेन में हिंदी के वर्चस्व को स्थापित करने में उनका महत्व नींव के पत्थर सदृश हैं जिस पर ब्रिटेन के प्रवासी साहित्य की इमारत खड़ी है। दिव्या माथुर के अनवरत संघर्ष और हार न मान लेने के संकल्प का संज्ञान मुझे अपनी पुस्तक, ‘प्रवासी साहित्यकार दिव्या माथुर’ लिखने के सिलसिले में उनका साक्षात्कार करते समय हुआ था। इस पुस्तक में ब्रिटेन के प्रवासी लेखकों के वक्तव्यों में पुरवाई की सह-संपादिका और वरिष्ठ लेखिका, उषा राजे सक्सेना, वातायन की संस्थापिका, तीन उपन्यास, दस से अधिक कहानी और कविता संग्रह, वातायनम् पत्रिका की संपादिका और अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत, दिव्या माथुर जैसे अत्यंत वरिष्ठ रचनाकारों की अनुपस्थिति चौंकाने वाली है। उन्हें सम्मिलित न करने के पीछे चाहे जो भी कारण हों, ब्रिटेन के हिंदी रचनाकारों की चर्चा उनके बिना सर्वथा अधूरी है। इन लेखकों के कठिन संघर्ष पूर्ण अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाना ऐतिहासिक दृष्टि से सही और प्रेरणात्मक होता।
ब्रिटेन के लेखकों के वक्तव्य में सबसे पहले पद्मेश गुप्त के अनुभव उनकी सहज और आत्मीयतापूर्ण शैली में प्रवासी हिंदी साहित्य की यात्रा का एक ऐसा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिच्छेद है जिसने ब्रिटेन के प्रवासी साहित्यिक मानचित्र पर हिंदी का नामांकन किया। साहित्यिक परिवेश में पले-बढ़े पद्मेश फ्रांस में केमिकल इंजीनियरिंग और एम बी ए करने के बाद इंटर्नशिप करने के लिए लंदन आए प्रारंभिक कल्चरल शॉक के साथ अपने सम वयस्कों की भारतीय संस्कारों के प्रति उदासीनता ने उन्हें उद्वेलित कर कुछ करने को प्रेरित किया। पद्मेश के शब्दों में, ‘मुझे लगने लगा कि इस देश में हिंदी के लिए कुछ करना बहुत आवश्यक है। बस फिर क्या था, मेरे संस्कार जो मैं अपने परिवार और अपने देश से लाया था वे ज्वालामुखी की तरह उबलने लगे और फिर मैंने इनकी आग को कभी मद्धिम नहीं होने दिया।’ व्यवसाय में स्थापित होने के समानांतर वह आग प्रज्वलित रही और वे रचनाशील रहे। लखनऊ के अपने पारिवारिक घर में आए दिन होने वाली गोष्ठियों के अनुभव ने उन्हें निश्चित रूप से लंदन में साहित्यिक गोष्ठियाँ और कवि सम्मेलन का बीजारोपण करने को प्रेरित किया होगा। उनके साथ हिंदी प्रेमियों का एक सक्रिय समुदाय बना और सर्वोपरि था भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त स्वर्गीय लक्ष्मीमल्ल जी सिंघवी का वरद हस्त एवं मार्गदर्शन! यूके हिंदी समिति, पुरवाई पत्रिका और वातायन संस्था उस समुदाय की सामूहिक सक्रियता के उदाहरण हैं जो वर्तमान में ब्रिटेन ही नहीं बल्कि वैश्विक हिंदी प्रेमियों को जोड़ने में सफल हैं और एक से एक बढ़कर नये कीर्तिमान स्थापित करने के साथ ब्रिटेन में हिंदी साहित्यकारों की एक सक्षम नई पीढ़ी को मंच दे रहे हैं।
प्रवासी साहित्यकारों में तेजेंद्र शर्मा एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने व्यक्तिगत कारणों से ब्रिटेन को अपना घर बनाया और यहाँ आने से पहले ही वे एक ऐसे स्थापित कहानीकार थे जिनके तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। एअर इंडिया में परिसर के रूप में काम करने के सिलसिले में उनके अनुभव का वितान पूरब और पश्चिम के देशों तक फैला हुआ था। इसलिए लंदन उनके लिए नया नहीं था। फिर भी संघर्ष मनलायक नौकरी खोजने और दो छोटे बच्चों की समुचित देखभाल का तो था ही। कल्चरल शॉक की बात न भी करें, उनके अपने शब्दों में उनका संघर्ष ‘आंतरिक अधिक था।’ लंदन प्रवास से पहले भी वे लगातार लिख रहे थे और यहाँ आकर भी लिखना जारी रहा, पर अंतर यह था कि अब कहानी के विषय बदल रहे थे। संवेदनशील लेखक अपने परिवेश के जीवन के सुख-दुख, आशा-निराशा और सरोकारों से अछूता नहीं रह सकता। तेजेंद्र ने अपने अपनाए हुए देश के समाज की पड़ताल कर जो लिखा उसमें नौस्टैल्जिया की छौंक तक नहीं है। अपने निकट लेखकों को भी वे यही सलाह देते हैं कि वे नौस्टैल्जिया की संवेदना से दूर ही रहें, कहानियों के विषय हमारे और आपके बीच से लिए गए हों। तेजेंद्र की कहानियाँ इस निकष पर पूरी तरह से खरी उतरती हैं। उनके पात्र आपके और मेरे पड़ोस में रहने वाले हो सकते हैं और उनकी मानसिकता और समस्या से जुड़ना सहज और उससे समानुभूति स्वाभाविक रूप से ही हो जाती है।
अपने वक्तव्य में तेजेंद्र ने कुछ गंभीर बिंदु रखे हैं। कहानी के पारम्परिक छह तत्वों, कथावस्तु, पात्र,चरित्र चित्रण, देशकाल, शैली और उद्देश्य को तेजेन्द्र ने, ‘घटना में कल्पना और उद्देश्य जब दोनों डाले जाते हैं तब कहीं जाकर कहानी का जन्म होता है।’ में समेट दिया है। कुछ अन्य महत्वपूर्ण बिंदु जैसे प्रवासी साहित्य की रचना केवल पहली पीढ़ी के लेखक ही करते हैं क्योंकि सही मायने में वे ही प्रवासी हैं। इस देश में जन्मे लेखक की हिंदी रचना को प्रवासी साहित्य में शामिल नहीं कर सकते। इस दृष्टि से प्रवासी साहित्य का अस्तित्व बहुत आशाप्रद नहीं लगता। जो नये प्रवासी आ रहे हैं वे अधिकतर अंग्रेज़ी में शिक्षित होकर आजीविका के सिलसिले में आते हैं। इस दृष्टि से मॉरीशस में जन्मे लेखकों को प्रवासी नहीं कह सकते। वे ‘नारी विमर्श’ ‘दलित विमर्श’ आदि खाँचों को अनावश्यक मानते हैं और इस सिलसिले में साहित्य के साथ ‘प्रवासी’ विशेषण की वांछ्नीयता पर भी संदेह करते हैं। भारत में रहकर विदेश के बारे में लिखे साहित्य को प्रवासी साहित्य नहीं माना जा सकता है। उनकी ये मान्यताएँ साहित्य के विद्यार्थी की जानकारी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
एक और महत्वपूर्ण बिंदु प्रवासी लेखकों को भारत में पढ़े जाने के बारे में है। प्रवासी साहित्य के पाठकों की सीमित संख्या को लेकर उनकी चिंता वाजिब है। यह एक संश्लिष्ट समस्या है। प्रवासी लेखक पैसे देकर अपने किताब छपवाता है, बदले में प्रकाशक उसे किताब की कुछ प्रतियाँ दे देता है जो प्राय: पुस्तक के लोकार्पण में बट जाती हैं। हिंदी का पाठक आदतन किताब ख़रीदने से कतराता है और अनजान प्रवासी लेखक की किताब ख़रीदने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। विश्वविद्यालयों में प्रवासी साहित्य के आरक्षण के कारण कुछ प्रसिद्ध लेखकों की रचनाएँ पाठ्य-पुस्तकों में सम्मिलित हो जाती हैं या उन पर शोध कार्य होता है। पर हिंदी के सामान्य पाठक से प्रवासी साहित्य का जुड़ाव नहीं हो पाता है। ‘अधिकांश हिन्दी साहित्य लायब्रेरियों में डपं होने के लिये लिखा जाता है।’ प्रवासी लेखक का यह ऐसा संघर्ष है जिस पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
प्रवासी साहित्यकारों में से अधिकांश लेखक भारत में रहते हुए ही लिखना शुरू कर चुके थे और समाचार पत्रों तथा पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी थीं। पुस्तक में शामिल लेखिकाओं के विदेश जाने का एक सामान्य कारण अपने पति के काम के सिलसिले में उनके साथ आना है। पति के साथ आने से उनके संघर्ष कम नहीं हुए पर उससे भिन्न संघर्ष दिव्या माथुर के थे जो अपने पति और ससुराल वालों के उत्पीड़न से बचने के लिए अपनी एम्स की सम्मानित और सुरक्षित नौकरी से त्याग पत्र देकर, छोटी सी बेटी को अपनी माँ के पास छोड़कर और उससे भी छोटे बेटे को साथ लेकर डेनमार्क जैसे एक अनजान देश में आई थीं जहाँ न भाषा अपनी थी न ही उन्हें आश्रय देने वाले लोग। उनके संघर्ष उन सबसे अलग थे जो अपने वैवाहिक जीवन की सुरक्षा में रहकर अपनी पहचान बना रही थीं। उनके संघर्ष की प्रेरणाप्रद दास्तान को शामिल करना इस पुस्तक को समृद्ध करता।
उत्तर भारत में पली-बढ़ी, पाकिस्तान में ब्याही गई और अपने बैंकर पति का लंदन में तबादला होने पर पति के साथ लंदन आने पर ज़किया जी का संघर्ष उन लेखिकाओं से भिन्न था जिन्हें विदेश में आकर अपनी योग्यता के अनुकूल नौकरी न मिलने पर नये सिरे से स्वयं को प्रवास में उपलब्ध नौकरी के लायक योग्यता प्राप्त करनी पड़ी थी। उनके शब्दों में, ‘ज़ाहिर है कि पति के उच्च पद पर होने के कारण हमारे संघर्ष दूसरे लोगों से अलग थे।’ लंदन आने से पहले उनका एक बड़ा संघर्ष पाकिस्तान जाने पर मिलने वाला कल्चरल शॉक का था। भारत में हिंदी और संस्कृत सीख कर पाकिस्तान में उर्दू में सौदे की लिस्ट न बना पाने का अनुभव उस कल्चरल शॉक का ही उदाहरण है। उससे उबरने के लिए उन्होंने लंदन में उर्दू लिखना-पढ़ना सीखा और शुरू में उर्दू में कहानियाँ लिखने के साथ यूके की राजनीति में सक्रियता से भाग लिया। वे वर्षों से लेबर पार्टी की काऊंसलर होने के साथ हिंदी में कहानियाँ लिखती हैं। लंदन में तेजेंद्र शर्मा से परिचय ने उनके अंदर के रचनाकार को एक दिशा प्रदान की जिसके प्रभाव को ज़किया जी ने स्वयं स्वीकारा है। तदनुसार उनकी कहानियाँ नॉस्टैल्जिया से परे अपने परिवेश के व्यक्तिगत, सामाजिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक सरोकारों को भी उकेरती हैं। उनकी कहानियों में संघर्ष की अपेक्षा अनुभवों की ऐसी झलक मिलती है जिसमें ब्रिटेन के प्रवासी परिवारों का जीवन उभरता है।
ब्रिटेन के कहानीकारों में अगला नाम अरुण सब्बरवाल का है। अरुण ने पति के साथ यूके आकर अपने जीवन के पचास वर्ष अंग्रेज़ी ऐक्सेंट, विषम मौसम और अलग जीवन शैली से तालमेल बैठाने के प्रारंभिक संघर्ष के साथ पति के दुर्व्यवहार, तलाक, पुनर्विवाह के क्षणिक सुखद अनुभव के बाद पति की असामयिक मृत्यु, आजीविका के लिए अध्यापन और पुरुष प्रधान समाज में अपमान और अवहेलना सहते हुए एक ‘पथरीली और कटीली’ राह तय की। पैंसठ वर्ष की उम्र में लेखन यात्रा की शुरूआत बर्मिंघम में ममता कालिया, रवींद्र कालिया और तेजेन्द्र शर्मा द्वारा आयोजित लेखन-कार्यशाला में प्रतिभागिता से हुई, तब से वे लगातार प्रवासी जीवन में व्यक्तिगत संघर्ष के मुद्दों पर लिख रही हैं।
डेनमार्क से अर्चना पैन्यूली ने अपने वक्तव्य द्वारा अपने परिवार के साथ कोपेनहेगन आने पर हिंदी लेखन की चुनौतियों और उपलब्धियों के अनुभव साझा किए हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा भारत में ही शुरू हो चुकी थी। कोपनहेगन में रहकर अंतरराष्ट्रीय विद्यालय में अध्यापन के साथ प्रवास के अनुभवों और डेनिश लेखकों के समृद्ध साहित्य से परिचय ने उनके वैचारिक और भावनात्मक क्षितिज का विस्तार किया। अर्चना पैन्यूली की चुनौती हिंदी में लिखने के कारण स्थानीय पाठकों से संवाद करने की असमर्थता है। यह चुनौती भारत के बाहर ही नहीं बल्कि भारत जैसे बहुभाषी देश की भी है जहाँ हिंदी का लेखक अन्य भाषाओं के पाठक के साथ संवाद नहीं कर सकता है। इस समस्या का समाधान अनुवाद का पुल है जो विभिन्न भाषा-भाषियों को जोड़ सकता है। अर्चना पैन्यूली की दूसरी चुनौती, ‘अपने लेखन को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाना है।’ पर वे चुनौतियों से हार नहीं मानती क्योंकि उनके लिए, ‘विदेश में रहते हुए हिंदी में लिखना मात्र एक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक आत्मिक और सांस्कृतिक साधना है।’ हिंदी के प्रति उनकी निष्ठा उनके कथन, ‘डेनमार्क की ठंडी हवाओं और शांत वातावरण के बीच जब कोई लेखक हिंदी में अपने विचारों को शब्द देता है तो वह दरअसल यह साबित करता है कि भाषा की जड़ें भले ही मातृभूमि की मिट्टी में हों, उसका फूल दुनिया के किसी भी कोने में खिल सकता है।’ वस्तुत: पिछले वर्षों में प्रवासी हिंदी लेखकों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई है, पर उस अनुपात में सक्रिय पाठकों की संख्या नहीं बढ़ी है।
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में छह साल बिताने के बाद टोरंटो, कनाडा में बसते समय हंसा दीप के लिए परिवार का साथ एक बड़ा आश्वासन था। ‘शुरुआती दो वर्षों का समय हर दिन नयी चुनौतियों वाला था।’ हंसा दीप मानती हैं, ‘लेखक कहीं भी रहकर लिखे, अपने बचपन से युवावस्था तक पल्लवित भावनाओं को बदल नहीं सकता। कई आलोचक मित्रों ने भी उनकी रचनाओं पर अपनी टिप्पणी देते हुए यह कहा है कि “स्थान और पात्र तो विदेशी हैं पर विस्तार में भारतीय संवेदना है।’ उनकी कहानियाँ उनके इस विश्वास की पुष्टि करती हैं कि, ‘संवेदनाएँ कभी किसी देश की सीमाओं में नहीं बंध सकतीं। संवेदनाएँ तो मानवीय होती हैं।’
अमेरिका और इंग्लैंड में कुछ वर्ष बिताने के बाद शैलजा सक्सेना कनाडा में प्रवास कर रही हैं। सभी देशों की अलग -अलग चुनौतियाँ थीं। जब बच्चे छोटे थे तब बच्चों और गृहस्थी की देखभाल के साथ पी एच डी समाप्त करने की चुनौती थी। अमेरिका से पति की नौकरी के सिलसिले में अमेरिका से इंग्लैंड आने पर कल्चरल शॉक, अंग्रेज़ी के ऐक्सेंट समझने में दिक्कत और फिर कनाडा जाने पर अचानक पति और अपनी नौकरी की समस्या ने शैलजा को कनाडा प्रवास के शुरुआती वर्षों ने अवश्य परखा होगा। पर हार मानने की अपेक्षा शैलजा ने विश्वविद्यालय में दो वर्ष लगाकर मानव संसाधन में डिग्री ली और इस क्षेत्र में नौकरी की। साथ ही पाँचवीं कक्षा से लेखन करने की आदत भी बनी रही। काम के सिलसिले में स्थानीय समाज की संस्कृति और सरोकारों को निकट से देखने-समझने के अवसर ने उन्हें कहानी के विषय दिए और कुछ अपने अनुभव, कुछ आसपास वालों के अनुभवों को कल्पना की दीप्ति प्रदान कर कविता और कहानियाँ लिखने का सिलसिला जारी रहा। प्रवासी जीवन को शैलजा ने पूरी शिद्दत से अपनाया। वे कहती हैं, इस देश और शहर से मेरी अब उतनी ही पहचान है जितनी भारत से है।’ कनाडा की साहित्यिक और रंगमंचीय गतिविधियों और हिंदी के अंतरराष्ट्रीय मंच पर शैलजा का नेतृत्व उल्लेखनीय है।
शैलजा के अनुसार, ‘प्रवासी शब्द पाठक को यह सुविधा देता है कि वह जाने कि लेखक ने उस देश का पर्याप्त अनुभव प्राप्त करके उसकी पृष्ठभूमि पर लिखा है।’ इसके साथ ही वे ‘प्रवासी लेखक कहने के स्थान पर रूस का हिंदी लेखक, कनाडा का हिंदी लेखक आदि वर्गीकरण सम्यक मानती हैं। प्रवासी साहित्य के प्रति बढ़ते उत्साह, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में प्रवासी लेखकों की रचनाओं को शामिल करना, उनपर होने वाले शोध कार्य आदि प्रमाणित करते हैं कि प्रवासी साहित्य गति पकड़ कर अपनी स्वतंत्र पहचान बना रहा है। उनका विश्वास है कि ‘प्रवासी लेखन वैश्विक लहर है, यह इतनी विस्तृत और सघन हो गई है कि इसका संज्ञान लिए बिना अब हिंदी की मुख्य धारा अपूर्ण है।’
प्रवासी लेखिका अनिल प्रभा कुमार, ‘विदेश में अपनी इच्छा से नहीं आई। अपने सारे सपनों, महत्वाकांक्षाओं और आत्मीय सम्बन्धों की गठरी पीछे छोड़कर, केवल अपने पति की महत्वाकांक्षाओं में योग देने के लिए मैं नींव का पत्थर बन इस ठंडे देश अमेरिका में आ गई।’ उनके संघर्ष की शुरुआत अनिच्छापूर्वक भारत छोड़ने से ही हो गई जिसे वे अपने भीतरी रचनाकार के लिए ‘काला पानी की सज़ा’ कहती हैं। ऐसे में कहानियाँ उनके अंदर ही अंदर घुमड़ती रहतीं, पात्र हाहाकार मचाते पर उनके अनलिखे संवाद कागज़ पर नहीं उतरते थे। पर धीरे-धीरे लेखनी का जंग साफ हुआ और लेखन ने गति पकड़ी। प्रारंभिक अनिच्छा से उबर कर वे यह मानती हैं कि, ‘प्रवास मेरा यथार्थ है, मेरा वर्तमान और मेरा परीक्षा-स्थल भी।’
पुस्तक के उत्तरार्ध में चुने लेखकों के अनुभव पाठक को एक नितांत नई धरती पर ले जाते हैं। यह इस बात को भी प्रमाणित करते हैं कि जहाँ न जाए रवि वहाँ जाए कवि। कुछ साहित्यकारों की परिस्थितियाँ उन्हें बिलकुल अजनबी परिवेश में ले गई जहाँ उनके संघर्ष बाहरी और भीतरी दोनों थे।
सौमित्र की जीवनयात्रा अत्यंत रोचक रही। मेरठ जैसे गंगा-जमुनी तहजीब के शहर में जन्म, घर का साहित्यिक वातावरण, प्रसिद्ध कवि नीरज से पारिवारिक संबंध और कवि-सम्मेलन में कविता सुनकर बिताए बचपन ने उनके साहित्यिक संस्कार रचे। साहित्य रचना का आरंभ कविता लिखने से हुआ। उच्च शिक्षा के लिए अमरीका प्रवास के समय कल्चरल शॉक और अध्ययन की माँग के साथ तीसरी चुनौती अपने अंतर के कवि को जीवित रखना था। इन चुनौतियों ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों को समृद्ध किया। ‘कविता साँसों की तरह निरंतर आती-जाती रही। साथ ही कहानियों के प्लॉट भी ‘मन में कुलबुलाने लगे।’
नौकरी के सिलसिले में उनका दूसरा प्रवास रेगिस्तानी देश सऊदी अरब के धहरान शहर में हुआ जहाँ की भाषा, पहनावा, खानपान, सामाजिक तौर-तरीके सभी कुछ भिन्न थे। सऊदी अरब में बिताए समय ने सौमित्र के शब्दों में, ‘बाहरी और भीतरी दोनों तरह की यात्राएँ करवाईं और लेखन को विस्तार दिया।’ उनके बहुआयामी लेखन में पूर्व और पश्चिम, विज्ञान और दर्शन, स्मृति और कल्पना सबका संगम है। प्रवास में विपरीत परिस्थितियों का अनुभव साहित्यकार को नई ऊर्जा देकर उसकी सृजन-प्रतिभा को कैसे समृद्ध करता है, सौमित्र के अनुभव इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।
इसी शृंखला में थाईलैंड और जकार्ता के परिवेश में साहित्य-रचना करने वाले वैशाली रस्तोगी हैं। प्रवास में मिले अजनबी बोलचाल, खानपान, सामाजिकता और संस्कृति के संघर्ष के बदले में प्रवासी को बहुत कुछ ऐसा मिलता है जिसकी अपने देश में रहकर वह शायद कल्पना तक नहीं कर पाता। वैशाली के शब्दों में, ‘थाईलैंड ने मुझे सात्विक जीवन और समर्पण सिखाया तो इंडोनेशिया में मुझे आत्मसम्मान एवं सहृदयता का दर्शन हुआ।’ अपने शुरुआती लेखन में वैशाली ने उन चुनौतियों से परास्त होने की जगह अपनी रचनाओं का विषय बनाया। प्रवासी साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रति वे आशावान हैं।
प्रवासी लेखक धर्मपाल अमरीका होते हुए कनाडा पहुँचे। प्रारंभिक चुनौतियाँ भारत से दिन और रात का अंतर, सड़क के दाहिनी ओर गाड़ी चलाना आदि के साथ शुरू के पाँच महीने ठंड और स्नो के मिजाज समझने में लग गए। फिर न्यूयॉर्क के हिंदी साहित्यकारों से परिचय ने उनकी साहित्यिक गतिविधियों को गति दी और जीविका के लिए वे अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद कार्य में संलग्न रहे।
अमरीका में पहले से बसे व्यक्ति के साथ अरेंज मैरेज करके अमरीका आई सुधा ओम धींगरा के सामने दोहरी चुनौतियाँ थीं। उनका अपनाया हुआ देश ही नहीं पति भी अनजाना था जिसके साथ शादी करके वह अपना देश छोड़कर चली आई थी। उनको दोहरे दबाव झेलने थे। भारत में वे प्रतिष्ठित समाचार पत्र, पंजाब केसरी की पत्रकार, दूरदर्शन और रंगमंच की कलाकार और लेखिका थीं। अमरीका के सेंट लुइस जैसे शहर में जहाँ भारतीय बहुत कम थे, वे खो सी गईं। इस देश ने मस्तिष्क के कई दरवाज़े खोले जो भारत में शायद खुलते ही नहीं। एक वर्ष के अंदर बावर्ची, मेहरी, धोबी, सफाई वाली, हलवाई और न जाने क्या-क्या बन गई। नये देश में सब कुछ सीख लिया पर लिखना छूट गया। पर बहुत देर तक नहीं छूटा रहा। सुधा ने उद्यम करके हिंदी भाषियों को जोड़ा, विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण के अवसर ने उन्हें स्थानीय समाज को निकट से जानने के अवसर मिले और पंजाब केसरी में अमरीका की डायरी स्तंभ की शुरूआत हुई। इस अनुभव ने पुराना खोया आत्मविश्वास जगाकर आत्मबल दिया। कविताएँ और कहानियाँ लिखने लगीं। सुधा की कहानी नये प्रवासियों के लिए प्रेरणाप्रद है। उनका कहना है, ‘एक देश मेरी जन्मभूमि है, दूसरा देश मेरी कर्मभूमि है; इसलिए लिखते समय दोनों के साथ न्याय करती हूँ।’ ‘विभोम-स्वर’ की सम्पादक के रूप में वे विश्व भर में के प्रवासी लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित करती हैं। उनका मानना है कि प्रवासी साहित्य का अलग से मूल्यांकन होना चाहिए। प्रवासी लेखक उन विषयों पर लिखता है, जिन पर भारत के लेखक लिखने से झिझकते हैं।
पति के साथ सिडनी आस्ट्रेलिया जाकर रेखा राजवंशी की पहली चुनौती पति-पत्नी दोनों के लिए नौकरी की तलाश थी। स्थानीय समाज से जुड़ने के लिए रेखा राजवंशी ने रविवार को बच्चों को हिंदी पढ़ाना शुरू किया। पूरी तरह से स्थापित होने से पहले हे ब्रेस्ट कैंसर होना एक गंभीर समस्या बनी। आस्ट्रेलिया प्रवास से पहले भारत में उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं। प्रवास के दौरान लेखन और प्रकाशन जारी रहे। कुछ कहानियों में स्थानीय समाज के साथ समायोजित होने का संघर्ष अनुभव जनित है। वे स्वीकारती हैं कि हम जिस देश में रहते हैं उसके परिवेश और सरोकार रचना में स्वाभाविक रूप से प्रतिबिम्बित होते हैं। विदेश भ्रमण के आधार पर लिखी रचना या गूगल सर्च करके विदेशी पृष्ठभूमि में लिखे जाने वाले साहित्य की गणना प्रवासी साहित्य में नहीं की जानी चाहिए।
काम के सिलसिले में इंडोनेशिया में प्रवास के दौरान आशीष वर्मा के लिए सबसे बड़ा संघर्ष ‘संवाद’ का था और दूसरा संघर्ष पहचान का था। परिवार को पीछे छोड़ कर आने से तीसरा संघर्ष अकेलेपन का था। पर इन संघर्षों ने उन्हें अपने भीतर झाँकना सिखाया, मजबूत बनाया, संवेदनशील बनाया और दो संस्कृतियों के बीच सेतु बनने की समझ दी। आशीष अपने प्रवास के अनुभवों को कवि होने का श्रेय भी देते हैं।
जिस उम्र में लोग सेवानिवृत्त होकर विदेश से अपने देश लौटते हैं, हरिहर झा ने उस उम्र में आस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में प्रवास करने का निश्चय किया। सपरिवार वहाँ पँहुचने पर शुरुआत में उन्हें लगा कि वे विदेशी गाड़ी में भारतीय इंजन फिट कर रहे हैं। प्रारंभिक नौस्टैल्जिया भरी कविताओं का स्थान शीघ्र ही वहाँ बसे भारतीयों की मानसिकता और सरोकारों ने ले लिया। प्रवासी लेखकों के कथ्य में क्रमिक विकास उनकी विकसन शीलता के साथ इस बात का प्रमाण होता है कि वे अपने अपनाए हुए देश में पूरी तरह से समायोजित हो गए हैं।
सारांश में यही कहना चाहूँगी कि प्रवास के संघर्षों से विचलित हुए बिना जिन लेखकों ने वैश्विक मंच पर अपनी सर्जनात्मक ऊर्जा को अक्षुण्ण रखते हुए अपनी पहचान बनाने के साथ हिंदी साहित्य की मुख्य धारा को समृद्ध किया है, यह संग्रह उनके अनुभवों का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
- डॉ अरुणा अजितसरिया एम बी ई, लंदन

डॉ. पद्मेश गुप्त का साहित्य प्रवास की अनुभूति को भारतीय संवेदना से जोड़ने वाला सृजन है। आकृति, सागर का पंछी और प्रवासी पुत्र में देश से दूरी, स्मृति, अपनापन और प्रवासी मन की अंतर्द्वंद्वपूर्ण स्थितियाँ मुखर होती हैं। उनकी कविताएँ केवल नॉस्टैल्जिया नहीं रचतीं, बल्कि बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ से संवाद करती हैं। डेड एंड की कहानियों में प्रेम, संबंध, मूल्य-संघर्ष और बहुसांस्कृतिक जीवन की जटिलताएँ दिखाई देती हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा की विशेषता सहज भाषा, मानवीय संवेदना और वैश्विक दृष्टि है। लेखक के साथ हिंदी-सेवी और संपादक के रूप में उनका योगदान ब्रिटेन में हिंदी की साहित्यिक उपस्थिति को सुदृढ़ करता है।
तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में प्रवास किसी स्मृति-लोक की यात्रा नहीं, बल्कि वर्तमान से सीधा सामना है। ब्रिटेन पहुँचे तो अपने साथ भारतीय जीवन का अनुभव था, लेकिन उन्होंने उसे नए समाज पर आरोपित नहीं किया। उन्होंने वहाँ के मनुष्य, संबंधों, अकेलेपन और सामाजिक तनाव को उसकी अपनी जमीन पर समझा। यही उनकी कथा का महत्त्व है। उनके पात्र दो संस्कृतियों के बीच खड़े होकर केवल पहचान का संकट नहीं झेलते, वे बदलती दुनिया के प्रश्नों से भी जूझते हैं। तेजेंद्र का लेखन इसलिए प्रवासी साहित्य की सीमित परिभाषा से आगे जाता है और मनुष्य के बदलते अनुभव को व्यापक मानवीय संदर्भ देता है