मानो जैसे कल की बात हो पूरी दुनिया पर सिर्फ मर्दों का ही साम्राज्य था, तब औरतें घर की चारदीवारी में रहती थीं | चूँकि मर्द कमाकर लाते थे और और उनके हिसाब से दिमाग भी उन्ही के पास था सो वो खुद को बड़ा तुर्रमखाँ समझते थे | फिर अचानक महिला और पुरुष की बराबरी की लहर उठी जिससे मर्द के एकछत्र राज्य वाली दीवार में दरार आने लगी |
अपने कार्यक्षेत्र में यूं अचानक हुई घुसपैठ पुरुष बौखला गए, परेशान हो गए क्योंकि उनकी मर्दवादी सोच ये हजम नहीं कर पा रही थी कि महिलाएं उनसे कंधे से कंधा मिलाकर चलें उनसे बराबरी करें | वो महिलाओं को परेशान करने के हर हथकंडे अपनाता, कुछ मर्द तो जानबूझ कर बस में उसी सीट पर बैठते जो महिलाओं के लिए आरक्षित होती | यदि महिला कहती ये मेरी सीट हैं तो बेशर्मी से कहते – कहाँ लिखा है,या जहाँ लिखा है वही बैठ जा टाइप |
अरे भई मैं कोई फालतू कहानी सुना कर बोर नहीं कर रही आप इस किस्से के अंत तक जायेंगे तो अपने आप समझ आएगा कि मैं क्या कहना चाहती हूँ …………….


अर्चना जी बहुत ख़ूब लिखा ।