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उर्वी वानिया सिंह की लघुकथा – समझदारी

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आज शाम छत पर ठहल थे हुए मैंने देखा
 कि मस्जिद से पंछी आकर हमारी छत पर बैठ गया और वहाँ पंछियो के लिए रखे गए पानी से पानी पीने लगा।
वहाँ पहले से एक पंछी बैठा था। उसने आगन्तुक पंछी से बोला, “तुम कहाँ से आए हो?”
वह पंछी बोला-“मैं उस दिवार पार मस्जिद से आया हूँ।”
वहाँ पहले से बैठा पंछी बोला- “यहाँ क्यों आ गए?”जानते नहीं हो तुम मस्जिद के पंछी हो और मैं मंदिर का?”
दूसरा पंछी बोला-“देख भाई, इंसानों जैसी बातें मत कर,
धर्म में हर चीज़ न बाटों।
पानी इस पार के लोग भी नीला पीते हैं, पानी उस पार भी नीला पीते हैं। साँस उस पार भी हवा मे लेते हैं।साँस इस पार भी  हवा में लेते हैं। मरता जब कोई उस पार हैं लोग वहाँ भी रातें हैं। मरता जब कोई इस पार हैं लोग यहाँ भी रोते हैं। भूख उस पार भी लोगों को लगती हैं। भूख इस पार भी लोगों को लगती हैं।जब सत्ता के वहसी नेता लडाते हैं दोनों पार के लोगों को तो खून उस पार भी लोगों का लाल होता हैं। खून इस पार भी लोगों का लाल होता हैं। मस्जिद उस पार भी लोगों जाते हैं तो मंदिर इस पार भी लोग जाते हैं। इबादत उस पार भी लोग करते हैं। पूजा इस पार भी लोगों करते हैं। ये तो नेताओं ने और कुछ लोगों कि मंसिकता ने लोगोँ को बाँट दिया । वरना किसी धर्म का किसी धर्म से बैर कहाँ? मंदिर न खुदा ने तोडा था न मस्जिद राम ने तोड़ी थी।” हमारी तो संस्कृति ही हैं जियो और जीने दो।”
वह पंछी बोला-“आह मित्र तुमने मेरी आँखें तो खोल दी, लेकिन न जाने धर्म के नाम पर लड़ने वालों की आँखें कब खुलेंगी?”
पंछियों की बातें सुन मेरे मन को सुकून मिला और मैं अंदर से अनाज के दाने ला बाकी पंछियों के लिए बिखेरने लगी।

6 टिप्पणी

  1. वाह कितने आसान शब्दों में धार्मिक उन्माद करने वालो को सीख दे दी गयी इस लघुकथा के माध्यम से. लेखिका इतनी कम उम्र में इतनी उच्च सोच रखती है. नन्ही लेखिका को बधाई

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