संध्या आज नही समझ पा रही है कि वह खुश है या दुखी। कायदे से तो उसे बहुत खुश होना चाहिये था क्योंकि इस समय घर के सभी चारो सदस्य – खुद ,पति अजित , बेटा , बेटी , सभी  घर पर  एक साथ रह रहे है – कोरोना के कारण ।  काफी लंबे समय  से  उसकी यही शिकायत थी कि घर के चार लोग हैं और चारो अक्सर अलग अलग रहते हैं ।कभी एक आता तो कभी दूसरा। चारो तो बहुत मुश्किल से त्योहार पर एक साथ एक दो दिन के लिये एक साथ होते ,और बच्चे अगले दिन जाने की तैयारी कर लेते।
वह अकेले दो हज़ार वर्ग फुट के फ्लैट में अपना समय बीता रही थी । झाड़ू , पोछा , बर्तन धुलने , कपड़ा धोने के लिये नौकरानियां आती थी लेकिन वह काम खत्म करके ही भागने की फिराक में लग जाती थी कि संध्या कोई अतिरिक्त कार्य न कह दे , बात करने न लगे।वह यह समझ ही नही पाती कि अकेले रहने पर क्या खाना बनावे। उसकी आदत पड़ी थी कि पहले पति और बच्छो के बड़े होने के बाद बच्चों के पसंद का खाना दोनों समय बनाये ।
सबसे पहले बड़ा बेटा घर से निकला। उसका एक एन0 आई 0टी 0 के बी 0टेक 0पाठ्यक्रम में  एडमिशन हुआ था। उसका नाम बहुत था। सरकारी संस्थान था , फीस भी कम था। उसे व पति अजित को बहुत खुशी हुई कि बेटे ने बिना ड्राप किये , पहले प्रयास में एन0 आई0 टी 0 में एडमिशन पा लिया। पास पड़ोस के लोग , रिश्तेदारों , पारिवारिक दोस्तो ने बधाई दी ।उसको सब लोग संस्थान  छोड़ने गए थे।  उसे संस्थान के छात्रावास में छोड़ने पर बहुत दुःख हुआ। संस्थान के पास एक होटल में 7 दिन रहे। वहाँ पहुंचने के अगले दिन ही उसका एडमिशन हो गया और उसे होस्टल का रूम भी अलॉट हो गया। शाम को सभी लोग जाकर उसका सामान , उसके  कमरे में सेट कर दिया। बेटा गुमसुम हो गया। उसका मन बदलने के लिये  संध्या  बोली ,
– बेटा , तुम हम लोग के साथ होटल चलो ।वही से कल सुबह इंस्टीट्यूट चले जाना।
अजीत कुछ बोलते , इसके पहले बेटा नोट बुक आदि  लेकर तैयार हो गया और रूम पार्टनर को बता दिया कि कल मिलेंगे।चारो लोग होटल , एक साथ लौटे। होटल लौटते ही बेटे के चेहरेपर पुरानी स्वाभाविकता वापस ही गयी।बेटा होटल से रोज एन0 आई0 टी 0 पढ़ने जाता और शाम को वापस लौट आता। ऐसे ही पांच दिन चला । जिस दिन संध्या व परिवार की वापसी थी  ,उस सुबह बेटा थोड़ा बुझा रहा और संध्या का मन भी बुझा बुझा रहा, बेटा छूट रहा है।
बेटे को एनआईटी छोड़कर घर लौटने पर कुछ दिन तो घर मे उदासी सी रही । बाद में बेटी ने बेटे की जगह पूरी तरह ले ली। बेटी का महत्व बढ़ गया ।अब घर का खाना बेटी और पति के फरमाइश पर बनने लगा। बेटा अवकाश में जब घर आता तो उसकी फरमाइश पर खाना बनता।
दो साल बाद, पति अजित का स्थानांतरण 200 किलोमीटर दूर के शहर में हो गया । पति अजित , वहाँ योगदान देकर लौटा ।तब  संध्या ने पति से कहा ,
– वहाँ कोई फ्लैट ले लो। हम लोग वही रहेंगे ।
– बेटी की  पढ़ाई का क्या होगा  ?
अजित ने प्रश्न किया।
– वही ,किसी स्कूल में उसका एडमिशन करा देंगे ।
– वहाँ के स्कूल इतने अच्छे नही है । फिर एडमिशन में भी समय लगेगा । सेकेंड ईयर – फाइनल ईयर का समय है।इस समय उसे डिस्टर्ब करना बिल्कुल उचित नही है।… बोर्ड का एग्जाम है।
– बेटी से पूछ लेते हैं।…. शायद वह इस स्थिति को हैंडल कर ले।
संध्या ने उम्मीद नही छोड़ी , लेकिन बेटी ने यह बात सुनते ही ऐलान कर दिया , वह कही नही जाएगी। यही पढ़ेगी । वह बरस पड़ी ,
– यह आप लोगो के समय की पढ़ाई नही है। …. बहुत मेहनत है… बहुत कॉम्पिटिशन है…. फिर बोर्ड की परीक्षा है…. नया माहौल .. नए लोग…। मेरी पूरी पढ़ाई डिस्टर्ब हो जाएगी। इसी परीक्षा के आधार पर मुझे ग्रैजुएशन में एडमिशन मिलना है….- वो भी प्रभावित होगा।
बेटी की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो इसलिए दोनों  ने निर्णय लिया कि अजित उस नए शहर में अकेले रहेगा , संध्या यही रहकर बेटी की पढ़ाई कराएगी ।
अजित ने वहाँ उसने एक पी 0जी0 ले लिया। पी 0 जी 0 मे नाश्ता खाना मिल जाता  था लेकिन कपड़े धुलने की व्यवस्था नही थी ।  हर सोमवार को कुछ कपड़े लेकर नए शहर जाता ,उन्हें 6 दिन पहनता और शुक्रवार या शनिवार की रात को उन कपड़ो को लेकर  वापस आ जाता ।सोमवार को  जाते समय फिर साफ 6 सेट कपड़े लेकर जाता । अजित के यहाँ न रहने पर , संध्या को  कई बाहर के काम भी करने पड़े। इन नए कामो से भी उसने बहुत परेशानी झेली ताकि पति अजित अपनी नौकरी सुचारू रूप से चला सके और  बेटी की पढ़ाई में डिस्टर्ब न हो ।
बेटा व पति के बाहर रहने के कारण ,अब खाना पूरी तरह बेटी के रुचि के अनुसार बनने लगा । संध्या ,  बेटी को यही के विश्वविद्यालय में एडमिशन करा कर अपने साथ रखना चाहती थी लेकिन इंटर पास करते ही बेटी ने खुलकर कह दिया ,
– मेरी सारी सहेलियां पड़ने दिल्ली जा रही है मैं भी दिल्ली में ही पढूंगी ।
– तुझे दिल्ली क्यो जाना है? यहाँ भी यूनिवर्सिटी है। तुम यहाँ पढ़ सकती हो।
संध्या बोली।
– क्या भाई को तो आपने बाहर पढ़ने से नही रोका ?
– उसे बी 0टेक 0करना था ।
– तो मुझे क्यो रोक जा रहा है ?
-…. तुम्हे तो…. बी0 ए0 ही तो करना  है ।
– क्या बी0 ए0 की पढ़ाई महत्वपूर्ण नही होती है ……….?.बी 0ए 0करने वाले आई 0ए0 एस0 , पी 0सी 0एस 0बनते हैं…. मालूम है न?
–  जो बच्चे पढ़ने वाले होते  हैं , वे कही भी पढ़ लेते हैं।
– अगर ऐसा ही है , तो उसकी सहेलियों के पेरेंट्स उन्हें दिल्ली क्यो भेज रहे हैं ? क्या सब मूर्ख है ?
– ….
संध्या चुप रही।
– दिल्ली में पूरे देश के बच्चे पढ़ने  आते हैं ।…  वहाँ की पढ़ाई अच्छी  है…तभी तो .. एडमिशन का मेरिट इतना हाई रहता है…. मैं तो वही  पढूंगी।
बेटी ने पुनः एलान किया।
पति अजित तो तटस्थ रहे , संध्या ने बहुत प्रयास किया कि बेटी दिल्ली में एडमिशन न ले।लेकिन बेटी अड़ी रही ।अंततः उसका भी एडमिशन दिल्ली में एडमिशन हो गया ।होस्टल मिलने में देर हुई । होस्टल अलॉट होने के बाद , तीनो फिर दिल्ली गए। बेटी को वहाँ होस्टल में सेट कर दिया।  स्कूल की एक उसकी एक सहेली बेटी की रूम पार्टनर थी ।बेटी ख़ुशी ख़ुशी वहाँ एडजस्ट हो गयी ।संध्या , इस बार भी उदास होकर घर लौटी।
वापस लौटे तो केवल संध्या व अजित थे ।   घर लौट कर संध्या ने अजित  से कहा –
– अब मैं यहाँ अकेली हो गयी हूँ । बहुत खराब लगता है ।जल्दी से  तुम वहाँ एक फ्लैट ले लो। मैं वही तुम्हारे साथ रहूंगी।
– फ्लैट ढूंढता हूँ…. ।
अजित ने उत्तर दिया।
अगली बार अजित घर आया तो संध्या ने  फ्लैट खोजने के लिये कहा। अजित ने बताया
–  ढूंढ रहा हूँ।ऑफिस टाइम के बाद ही ढूंढने निकल पाता हूँ । छुट्टी में इधर आ जाता हूँ।
ऐसा तीन चार बार हुआ। तब तक लगभग 2- 3 माह बीत चुके थे।
अगली बार संध्या ने फिर फ्लैट खोजने के लिये कहा तो अजित ने उत्तर दिया ,
-अब 6 माह में फिर ट्रांसफर हो जाना है। ऐसे में वहाँ शिफ्ट होना उचित नही लग रहा है।
– 6 माह तो बहुत हूँ………यहाँ अकेले क्या करूँगी?
– फ्लैट मिलने और शिफ्टिंग करने में डेढ़ दो माह लग जायेगा । फिर ट्रांसफर  3 – 4 माह रहेगा।फिर ट्रांसफर होगा , फिर नए शहर में  फ्लैट ढूंढना होगा , समान की शिफ्टिंग करनी  होगी।
-…..
संध्या मायूस चुप रही।
– अब मैं प्रयास करूंगा कि शुक्रवार को ही आ जाया करू। सोमवार को जाता ही हूँ। तीन दिन तुम्हे अकेले रहना पड़ेगा।… चाहो तो किसी नौकरानी को दिन भर के लिये रख लो।
– नौकरानी रहने पर आदमी बंध जाता है। ….. उस पर नज़र रखनी पड़ती है।
– जैसा उचित समझो….. नॉकरानी रहने से बोरियत नही होगी  और तुम्हारे ऊपर काम का बोझ  भी नही पड़ेगा।
संध्या सुनकर चुपचाप रही।
वह अक्सर उस 4 बैडरूम के लक्ज़री फ्लैट में अकेले दिन बीताती थी। अपने लिये खाना बनाना उसे पहाड़ सा  लगता । कुछ भी खा लेती – कभी ब्रेड तो कभी पराठा, तो कभी मैग्गी तो कभी कुछ। दिन भर टी 0वी 0देखती या सोती या फोन पर लंबी बात करती या नौकरानियां से बात करती । घर का एक एक समान साफ रखती । उसे सेट रखती।उसके पास समय ही समय था। न्यूनतम काम था । जब चाहो उठो , जब चाहो सोओ। जब इच्छा करे तो खाना बनाओ , इच्छा न हो तो मत बनाओ। शनिवार और रविवार को अजित के आने पर यह दिनचर्या टूटती। तब दोनों समय खाना नाश्ता बनता । वह समय से  नहा धोकर तैयार होकर अपने कार्य करती। शेष 5 दिन तो वह अपनी इच्छा से रहती।
एकाएक कोरोना महामारी फैली ।कोरोना के कारण दोनों बच्चे व पति घर आ  गए।उसे बहुत अच्छा लगा कि अब उसकी एकरसता टूटेगी , अब वह पूरे परिवार के साथ रहेगी,साथ बाते करेंगी , साथ खाना खाएंगी, साथ समय बिताएगी , जिसकी बहुत दिनों इच्छा थी।  लॉकडाउन  की शुरुआत में अपार्टमेंट के सचिव ने बाहरी लोगों  का सोसायटी में प्रवेश रोक दिया, ताकि कोरोना का संक्रमण रोक जा सके ।इसका  पहला असर यह पड़ा कि काम करने वाली नौकरानियों   का आना बंद हो गया।
पति अजित ने समझदारी दिखाई और पूरे परिवार के साथ बैठकर जिम्मेदारी बांटी गई।  तय हुआ कि अजित रोज झाड़ू पोछा करेंगे। बेटी ने  डस्टिंग और कपड़े समेटने का काम लिया। बेटे ने बिस्तर ठीक करने ,बाहर से सब्जी दूध लाने व सब्जी काटने का काम लिया । भारी काम संध्या के मत्थे ही पड़ा- बर्तन माजने व खाना बनाने का। सबने तय किया कि सब लोग अपना अपना कार्य पूरी अच्छी तरह से समय पर करेंगे ताकि संध्या के ऊपर बोझ न पड़े। संध्या को लगा कि परिवार यही होता है – मिल जुल कर दुःख से लड़ना , वक्त से लड़ना , समस्या से लड़ना ।
कुछ दिन तक तो सब ठीक चला। सब लोग अपना कार्य करते थे। जो खाना संध्या बना देती , बच्चे खुशी खुशी  खा लेते । कुछ दिन बाद ,बच्चों को बाहर का खाने की ललक होने लगी , उन्हें घर का खाना अच्छा नही लगने लगा। वे अलग अलग तरह के खाने की मांग करने लगे। संध्या अलग अलग तरह की डिशेज बनाती , यू ट्यूब देखकर डिशेज़ बनाती  ,उसके बाद भी दोनों बच्चे संतुष्ट नही होते । भुनभुनाते रहते।
धीरे धीरे तीनों ने अपनी जिम्मेदारी छोड़ दिया। कभी कभार कोई अपना कार्य कर लिया – मन किया तो किया नही मन किया तो नही किया । दोनों बच्चे या तो मोबाइल में लगे रहते या  लैपटॉप में लगे रहते थे  ।  घरेलू कार्यो में   कुछ मदद के लिये यदि  संध्या कहती तो दोनों एक दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी डालते हुए आपस मे लड़ने लगते। उधर अजित को लगता कि संध्या उनके लिये कुछ करती ही नही , उसका बिल्कुल ध्यान नही रखती । संध्या महसूस रही थी कि वह सुबह 8 बजे से रात तक , परिवार के तीनों सदस्यों के काम मे लगी रहती, थक जाती है । शरीर के साथ साथ मन भी थक जाता  किंतु कोई खुश नही है।
वह समझ नही पा रही थी कि पूर्व  में उसका अकेला रहना , दुःख का कारण  था या अब परिवार  के  सभी लोगो के साथ रहना।
अमित कुमार मल्ल
कई काव्य-संग्रह और पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां-कविताएँ प्रकाशित. सम्पर्क - amitkumar261161@gmail.com

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