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अनुज की कहानी – बोर्डिंग पास

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गायत्री का मन तो जैसे बल्लियों उछल रहा था… 
वह यह सोच-सोचकर फूली नहीं समा रही थी कि “एक ही बेटा है लेकिन है लाखों में एक!  ऐसा आस-पास कहाँ किसी का बेटा दिखता है जिसकी माँ उसपर इस तरह नाज़ कर पाए, किसी का बेटा ऐसा नहीं है जो श्रवण जैसा हो और जो अपनी माँ का इतना ख़्याल रखता हो! आज अयान के पापा होते तो देखते अपने बेटे को कि शादी हो जाने के बाद भी एक बेटा अपनी माँ का किस तरह ख़्याल रखता है। 
उनका सारा सिद्धांत धरा-का-धरा रह जाता। हमेशा बेटी के नहीं होने का मातम करते रहते थे। गायत्री को याद आ रहा था कि किस तरह वे हज़ारों बार यह जुमला बोलते रहते थे, “बेटा तभी तक बेटा होता है जब तक कि उसकी शादी नहीं हो जाती, लेकिन एक बेटी जीवन-भर बेटी रहती है”, और इसीलिए वे एक बेटी तो चाहते ही थे। बेटे के तो नाम से ही चिढ़ उठते थे, लेकिन रब को जो मंजूर था वही हुआ। अयान आ गया और तब वे सब भूल गए थे। बस ले देकर वही उनकी दुनिया बन गया। किस तरह सीने से चिपकाए घूमते रहते थे। यही सब सोच-सोचकर अपने आप से ही बातें करती जा रही थी। 
अमेरिका का तो बस नाम-भर सुना था, अब बेटे के कारण देख भी लेगी। कितने क़िस्से सुन रखे थे उसने अमेरिका के बारे में! पहले जब मुखर्जी नगर वाले घर में रहती थी तो पड़ोस में ही कितने लोग थे जिनके बच्चे अमेरिका में रहते थे। पड़ोस की औरतें ही बताया करती थीं कि – “अमरीका में ऐसा होता है, अमरीका में वैसा होता है।” 
यह सोच-सोचकर वह खूब ख़ुश हो रही थी कि आज वह ख़ुद अमेरिका जा रही है। हालांकि इन्हीं ख़ुशियों के बीच कभी यह सोचकर थोड़ी उदास-सी भी हो जाती कि आज अयान के पापा ज़िन्दा होते तो कितने ख़ुश होते। लेकिन चले गए जल्दी से बिना कुछ बताए! थोड़ा इन्तज़ार भी नहीं किया बेटे को उस मुक़ाम तक पहुँचने देने का जिसकी कल्पना में दिन-रात डूबते-उतराते रहते थे! जीवन-भर तो बेटे के लिए ही जीये थे। अपने आप को तो कभी देखा भी नहीं कि ज़िन्दगी में ऐश करना भी कुछ होता है। रात-दिन खटते रहे। बस यही एक धुन कि बेटा बहुत बड़ा इंजीनियर बन जाए। जाने के दिन तक यही कहते रहे कि ‘पूत सपूत तो का धन संचय’। फिर भी अपने सामर्थ्य भर तो सब कुछ कर ही गए थे, जो करना चाहिए था! प्लॉट, घर और थोड़ा बहुत फिक्सड डिपॉज़िट भी, लेकिन सबसे बड़ा धन तो बेटा था, जिसे वे इतना बड़ा इंजीनियर बना गए थे। अपने समाज में धन भी तो इसी को कहते हैं! धन और होता क्या है? यही तो है असल धन, बुढ़ापे की लाठी! आज बेटे के बारे में सोच-सोचकर नाज से भर उठ रही थी। बहू के लिए साड़ी भी खरीद लाई थी। 
अयान रोक रहा था, “लगेज इतना ज्यादा हो जाएगा तो एयरलाइन्स वाले नाहक अलग से पैसे ले लेंगे और ये साड़ी-वाड़ी किसलिए, तुम्हारी बहू क्या वहाँ अमेरिका में साड़ी पहनेगी?” 
लेकिन माँ के सामने उसकी एक ना चल पाई। अभी गहने भी रखे जाने थे। 
अयान झिड़क उठा, “परसों जब हमलोग करोल बाग़ गए थे तो ये गहने घर पर ही क्यों छोड़ गयी थी? इन्हें भी ज्वेलर्स को दे देती!” 
गायत्री ने समझाने के लहजे में प्यार भरी झिड़की लगायी, “ऐह तेरी दादी दी दित्ती होई है पुत, आपणे खानदान दी निशानी है, उसनूं क्यों लै जांदी। खानदानी निशानियां वी किते बेचियां जांदियां ने! अमरीका विच रहके कैसी सोच हो गयी है तेरी!” 
अयान ने अपनी चिढ़ पर काबू करते हुए कहा था, “अच्छा चलो छोड़ो, जाने दो। तुम इतने पुराने ख़्याल की हो ना कि तुमसे बात करना भी मुश्किल है। चलो लाओ इधर, इन गहनों को अपने ब्रीफकेस में रख लेता हूँ।” 
पिछली होली में गायत्री ने कितना कहा था कि अयान आ जाता तो कितना अच्छा होता। तब तक तो अयान के पापा भी थे ही। वैष्णो माता के मंदिर जाना था, वह मन्नत भी पूरी हो जाती। मन्नत भी तो अयान के नाम की ही थी जिसे उतारना गायत्री को जरूरी लग रहा  था। उसने अयान को फोन पर समझाया भी था कि “माता दे दरबार चल के मन्नत उतारनी है, तूं आ जाएंगा तां माता दा इक कर्ज उतर जाएगा।” लेकिन अयान आ नहीं पाया था। 
वह सोचती, “पता नहीं ये अमरीका वाले बच्चों का कितना ख़ून चूसते हैं! आजकल के बच्चे भी तो वैसे ही हैं, कहाँ मानते हैं, जान भी तो अमरीका में ही अटकी रहती है! स्कूल में था तभी से अमरीका जाने की रट लगाए हुए था। बस जाएगा तो अमरीका ही, मानो अमरीका कोई देश नहीं, परियों का डेरा हो।”  
अयान के नहीं आने से वह दुःखी तो हुई थी, लेकिन वह इसमें अयान का दोष कम मानती थी। सोचती, “ये बड़ी-बड़ी मल्टी नैशनल कंपनियाँ साँस भी तो लेने नहीं देतीं बच्चों को!” फिर सोचती, “कोई भी अगर पैसे देगा, तो जान निकालकर काम भी तो लेगा!” यह ख्याल आते ही वह सिहर उठती। फिर यह सोचकर कि अयान ख़ुश है, वह भी ख़ुश हो जाती थी। आख़िरकार, दोनों बूढ़ा-बूढ़ी मन मारकर अयान के बिना ही वैष्णो मंदिर चले गए थे और माता का वर्षों पुराना कर्ज उतार आए थे। 
अयान के वैष्णो मंदिर नहीं जाने की बात से गायत्री दुःखी तो हुई थी लेकिन उसने अपने मन को यह कहकर समझा लिया था कि “बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम की बहुत व्यस्तता रहती है और फिर अमरीका कनॉट प्लेस तो है नहीं कि रजौरी गार्डेन से मेट्रो में बैठे और आधे घंटे में पहुँच गए। अमरीका से भाग-भागकर आना भी तो कठिन काम था। इतनी मुश्किल से तो अयान को यह नौकरी मिली थी और इतनी बड़ी कंपनी का कोई महत्त्वपूर्ण काम हर्ज हो गया और कहीं कंपनी ने उसे नौकरी से ही निकाल दिया तो!फिर क्या होगा? ऐसी नौकरियाँ क्या कहीं रोज़-रोज़ मिलती हैं?” 
लेकिन उसके मन में यह बात हमेशा शूल की तरह चुभती रहती थी कि “अयान माता के दरबार में जाने के समय दिल्ली नहीं आ पाया, न सही, लेकिन पिता को आग देने तो आना ही चाहिए था! अच्छी नौकरी रोज़-रोज़ नहीं मिलती, ठीक बात है, लेकिन बाप को आग भी तो रोज़-रोज़ नहीं देनी होती है!” 
आज जब अयान उसे अमेरिका ले जाने आ गया था, वह सारे गिले-शिकवे भूल गयी थी। “बेटे को आज इतना ख्याल तो आया ना कि बूढ़ी और अकेली माँ इतने बड़े शहर में अकेली कैसे रह रही होगी!”  यह अहसास-भर काफी था माँ के मन को शीतल करने के लिए। 
अयान तो बहुत पहले से चाह रहा था कि उसके पापा-मम्मी दोनों अमेरिका ही चलकर रहें। क्या रखा है इस देश में? इस बात पर उसकी अपने पापा से लगभग रोज़ ही फ़ोन झिकाझोरी हो जाती थी। अयान इसबात पर ज़ोर देता कि रजौरी वाला घर और रोहिणी वाले प्लॉट को बेचकर पापा-मम्मी उसके साथ अमेरिका चलें और वहीं उसके साथ आराम से रहें लेकिन अयान के पापा थे कि अपनी मिट्टी छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। 
जब भी अयान सब कुछ बेच-बाचकर अमेरिका चलने की बातें करता, वे कहते, “जीवन में एकबार गलती कर दी है, गाँव की सारी जायदाद, ज़मीन-घर सब बेचकर, गाँव छोड़कर दिल्ली भाग आया था। अब यह गलती दोबारा नहीं करूँगा। अपनी जड़ से उखड़ जाने का दर्द क्या होता है, यह तभी समझ में आता है जब आदमी अपनी जड़ से उखड़ जाता है।” 
उनकी यही सब बातें अयान को चिढ़ा जाती थीं। ‘अपनी मिट्टी’, ‘अपना देश’, ‘जड़ से उखड़ जाने का दर्द’, ‘गाँव छूटने का अहसास’, ऐसे-ऐसे जुमले अयान को कोरे आदर्शवादी और बेमानी दिखते थे। अपने पिता को समझाने में तो वह अंत तक असफल रहा था, लेकिन माँ को समझा लेना उसके लिए आसान था। गायत्री भी अपनी इकलौती बहू और होने वाले पोते-पोतियों के साथ रहने का लोभ-संवरण नहीं कर पायी थी। 
अयान ने माँ की ममता से हामी भरवा ली थी। उसने ने घर-प्लॉट और घर का फर्नीचर तक, सबकुछ बेच दिया। सारा सामान अमेरिका ले जाना संभव तो था नहीं इसलिए बेच देने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। इस प्रक्रिया में ‘बेच दे’ कहने वाली नई-नई मल्टी-नैशनल कंपनियों ने उसकी बहुत सारी मुश्किलें आसान कर दी थीं, नहीं तो पहले के ज़माने में पुराने फर्नीचर और बर्तन-बासनों को ख़रीदता ही कौन था? वर्षों से पाई-पाई जोड़कर इकट्ठा किया हुआ साजो-सामान घंटों में काग़ज़ी टुकड़ों में तब्दील हो गया। 
आख़िरकार अयान इन काग़ज़ी टुकड़ों और गायत्री अपनी यादों को समेटे आज देश छोड़कर हमेशा के लिए अमेरिका जा रहे थे। वतन छूटने का थोड़ा-बहुत दर्द तो गायत्री के मन में उठा था, लेकिन उसका दर्द जल्दी ही यह सोच-सोचकर हर्ष में तब्दील हो गया कि उसे बहू से बहुत सारी बातें करनी हैं, वह अगले महीने दादी भी बनने वाली है, उसे अभी इसकी भी तो तैयारी करनी थी, और भी बहुत कुछ! उसके मन में पता नहीं और भी क्या-क्या ख़ुशियाँ हिलोरे ले रहीं थीं। वह ऐसे ही अनगिनत ख़्यालात में डूब-उतरा रही थी कि अचानक फ़र्राश ने टोका, “माता जी, थोड़ा पैर ऊपर कर लेना।” 
गायत्री की तंद्रा टूटी। उसने देखा फ़र्राश अपनी मशीन लेकर फ़र्श की सफाई में लगा था। उसने आस-पास देखा। लोग आ-जा रहे थे। एयरपोर्ट का फ़र्श चमचम कर रहा था। उसे ध्यान आया कि जब अयान पेट में था और वह अम्बाला कैंट स्टेशन पर जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। गाड़ी आने वाली थी और उसकी साड़ी के फॉल में किसी का फेंका हुआ कचरा चिपक गया था और वह उसे झाड़-झाड़ कर गिराने की कोशिश कर रही थी। पहले तो उसकी साड़ी के फॉल से चबाकर फेंका हुआ च्यूंगम चिपक गया और बाद में उस च्यूंगम से लाल चटनी में लबरेज़समोसे वाला दोनाभी चिपक गया था। दोने को झाड़-झाड़कर गिराने की कोशिश के कारण पूरी साड़ी पर सॉस-चटनी के छींटे पड़ गए थे। 
अयान के पापा बार-बार बोलते जा रहे थे, “गाड़ी छूट जाएगी फिर झाड़ती रहना कचरा। पता नहीं कोई दूसरी गाड़ी है भी या नहीं। होगी भी तो आधी रात को ही होगी। टिकट के पैसे भी तो पूरे वापस नहीं होंगे। जल्दी चलो, साड़ी में लगा कचरा गाड़ी में बैठने के बाद भी साफ किया जा सकता है और रही बात कचरा फेंकने वाले को गाली देने की तो पहले गाड़ी में बैठ जाओ, फिर हम डब्बे के बाकी साथी यात्रियों के साथ मिलकर उस आदमी को भला-बुरा कहेंगे जिसने स्टेशन पर कचरा फेंका होगा। गाड़ी छूट जाएगी तो फिर बैठी रहना स्टेशन पर रातभर, प्लेटफॉर्म पर बिखरे पड़े उसी कचरे के ढेर के बीच।” 
गायत्री भागती जा रही थी और उस व्यक्ति को कोसती जा रही थी जिसने वह कचरा फेंका होगा। उस समय अयान के पापा के समझाने-बुझाने का असर इतना  हुआ कि गायत्री और अ‍धिक नाराज़ हो गयी। लेकिन यह नाराज़गी तब झगड़े में तब्दील हो गयी जब रेलगाड़ी में बैठने की जगह भी बामुश्किल मिली। साड़ी खराब हो जाने का सारा गुस्सा अयान के पापा पर ही उतरा, और उतरता भी किस पर? गुस्साई पत्नियों के लिए तो उनके पति ही ‘सेफ्टी-वॉल्व’ का काम करते हैं। लेकिन पति बेचारे को फरीदाबाद तक खड़े रहकर आता देख पत्नी का सारा गुस्सा सहानुभूति में बदल चुका था। रेलगाड़ी में पैर रखने की जगह नहीं थी, गायत्री को तो फिर भी किसी ने बैठने की जगह दे दी थी। एयरपोर्ट की सफाई देखकर उसने सोचा कि कहाँ रेलवे स्टेशन की बदहाली और कहाँ अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का रख-रखाव! फ़र्श इतना साफ कि इंसान का अपना अक्स दिख जाए।
फ़र्राश ने अपना काम करना शुरु कर दिया था। उसने नीचे पड़े झोले को सीट के ऊपर रखने का आग्रह करते हुएपूछ लिया, “झोले से परांठे की खुशबू आ रही है माता जी।”
“हाँ, परांठे ही हैं, आलू दे और गोभी दे हैं। तू खावेंगा? देवां?”
“नहीं-नहीं माता जी, मैं ड्यूटी पर हूँ। लेकिन मैंने खुशबू ठीक पहचान ली है ना?”
“हाँ, बिल्कुल, तूने बिल्कुल ठीक पहचानिया। देवां इक, खाएंगा? ड्यूटी पर है तां की, खाने-पीने ते भी बंदिश है?” 
“नहीं-नहीं, रहने दो। आप कहाँ जा रहे हो माता जी?”
“अमरीका जा रही हाँ, पुत दे नाल। पुत ओथे नाल ही रक्खूगा। अयान दे पापा जब से गुजरे हैं, मैं भी इकल्ली हो गयी हाँ। इसलयी हमेशा वास्ते जा रही हां, ओत्थे रहांगी, पुत नूंह दे कोल।” फिर थोड़ा दमभर कर बोली, “तेरा घर कित्थे है पुत?” 
“मैं पंजाब से हूँ माता जी, जलंधर से।” फ़र्राश ने भी गायत्री से पूछ लिया, “और माताजी आप लोग?”
गायत्री ने शान्त स्वर में कहा,“पिच्छयों असीं वी पंजाब से ही हैं, गुरुदासपुर तों, पर अब हम लोग दिल्ली विच ही बस गये हैं, रजौरी गार्डन विच, अब गुरुदासपुर विच तां अपणा कहण नूं मिट्टी भर बची है, रिश्तेदार हैं पर खेत-खलिहान कुझ नहीं बचया।” 
ऐसा कई बार होता है कि जब इंसान ज़्यादा ख़ुश होता है तो वह किसी अजनबी से भी अपनी बहुत सारी निजी बातें साझा करने लगता है और उसे अपने बारे में ज़्यादा-से-ज़्यादा बता देना चाहता है। गायत्री भी शायद इसी मन:स्थिति में थी।
“कितने बच्चे हैं आपके?” फ़र्राश ने पूछ लिया।
“एक ही पुत है, अयान नाम है उसदा। अयान दे पापा दा ख्याल सी कि इक बेटी हो जांदी तां चंगा हुंदा पर मैं सोचदी सी कि दो पुत हो जांदे तो किन्ना अच्छा होंदा। इक नूं गुरुद्वारे दे नाम कर देंदी और उसनूं सिक्ख बना देंदी। वैसे असी लोक हिन्दू हैं।”
“तो अच्छा हुआ ना माता जी कि दो बेटे नहीं हुए।” 
“ऐसा क्यों भला?”
“मुश्किल हो जाती। घर में एक बेटा हिन्दू होता और एक सिक्ख होता, और मान लो कि फिर से कभी दूसरी ‘चौरासी’ हो जाती, तब क्या होता? दोनों आपस में ही भिड़ जाते। फिर एक भी ना बचता बेटा कहलाने को। आज एक तो है जो आपको अमरीका ले जा रहा है।” फ़र्राश ने बड़े फूहड़ ढंग से हँसते हुए चुटकी ली थी। 
“चुप कर फिटे मुँह, ऐसा अशुभ कोई बोलदा है? जा आपणा कम कर,” गायत्री उसकी बातें सुनकर थोड़ी नाराज़-सी हो गयी थी।
फ़र्राश ने सफाई दी, “बुरा न मानो माता जी, मैंने तो यूँ ही आपसे मजाक कर लिया था। सॉरी जी।” 
“कोई नहीं पुत्तर, पर इक बात सीख लै, जिन्दगी में काम आएगी, आदमी नूं आपणे मुंह से कोई अशुभ गल नहीं बोलनी चाहिए, सच हो जांदी है।” गायत्री की इस बात पर फराश मुस्करा कर रह गया था और अपने काम में लग गया था। 
अबतक फ़र्राश जा चुका था। लेकिन जाते-जाते वह गायत्री को कई आशंकाओं से भर गया था। अचानक उसे एक अज्ञात भय सताने लगा। अभी उसे अयान के पापा की कमी खलने लगी थी। वे साथ होते तो वह इतनी आशंकित नहीं हुई होती। 
‘चौरासी’ कहकर फ़र्राश जैसे किसी जलाशय के ठहरे पानी में पत्थर फेंक गया था। चौरासी के बाद ही तो अयान के पापा गाँव से सबकुछ बेच-बाचकर दिल्ली आ गए थे। उन्होंने ढूँढ़कर हिन्दुओं के मुहल्ले में घर खरीदा था। अयान तो तब तीन साल का ही था। कैसा जलजला आया था, सब तहस-नहस करके चला गया था! 
पहले तो हिन्दू-सिक्खों में कोई भेद न था, लेकिन चौरासी में जब सिक्खों पर कहर बरपा, हिन्दू भी सशंकित रहने लगे थे और अपने-अपने कुनबे को ही अपने लिए सुरक्षित समझने लगे थे। अब हिन्दू परिवारों में घर के बड़े बेटे को सिक्ख बनाने की परम्परा का लोप होने लगा था। अब तो हिन्दुओं और सिक्खों के अलग-अलग मुहल्ले भी बसने शुरु हो गए थे।
गायत्री अब बेचैन हो उठी थी। अयान कहाँ चला गया, इतनी देर हो गयी! गायत्री बैठे-बैठे थक भी गयी थी। ऊपर से यह फ़र्राश, पता नहीं किधर से आया और हलचल मचाकर चला गया। 
उसी समय हाथों में वॉकी-टॉकी लिए सूट-बूट वाली एक सुन्दर सी लड़की गायत्री की परेशानी भांपती हुई उसके क़रीब आई और पूछा, “एक्सक्यूज़ मी, मे आई हेल्प यू?”
गायत्री मुँह देखती रह गयी। उसने फिर पूछा, “कोई परेशानी है आपको?”
“मेरा पुत मैनू यहाँ बैठाकर गया है, बहोत देर हो गयी। मैं उसनू ही उडीक रही हां, पता नहीं कित्थे चला गया। बोलकर ते गया सी कि बोर्डिंग पास बनवान जा रिहा है।”
“कहाँ जाना है आप लोगों को?”
“असी लोक अमरीका जा रहे हैं।”
“किस एयरलाइन्स से?”
गायत्री ने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कहा, “मैं समझी नहीं पुत्तर”
“आप लोगों को किस हवाई जहाज से जाना है?”
“अमरीका वाली से जाना है। मेरा बेटा बोर्डिंग पास लैण गया है।”
“अच्छा, कितने बजे जाना था आप लोगों को?”
“सवा बजे वाली से जाणा था।”
“सवा बजे क्या?”
तबतक फ़र्राश भी आ चुका था। उसने स्पष्ट किया, “सवा मतलब एक पन्द्रह की मैडम। ये माता जी तो पिछले दो घंटे से यहाँ बैठी हुई हैं।” 
फ़र्राश की बात सुनकर लड़की की पेशानी पर थोड़ा बल पड़ा। खुसर-फुसर होने लगी और अब वहाँ धीरे-धीरे और भी लोग इकठ्ठा होने लगे थे। अफ़रा-तफ़री देख सूट-बूट पहना एक मोटा-सा आदमी भी वहाँ आ गया। शायद वह एयरपोर्ट प्रबंधन में किसी ऊँचे ओहदे का अधिकारी था। वह पूरी बात समझकर तत्काल आस-पास खड़े अन्य सहकर्मियों को बहुत सारे निर्देश देने लगा। उसने गायत्री से पूछा, “माँ जी, आपके बेटे का क्या नाम है?”
“अयान सिंह और मेरा गायत्री है।”
“आपलोग अमेरिका में कहाँ जा रहे हैं?”
“मैनू ठीक-ठीक मलूम नहीं बेटा लेकिन कोई लौसबेस जगह है।”
उस अधिकारी ने पास खड़े एक अन्य कर्मी को बुलाया और उसे कुछ निर्देश दिया।
पूरे एयरपोर्ट पर हलचल मच गयी। उद्घोषणा होने लगी, “मि. अयान सिंह, यू आर रिक्वेस्टेड टू रीच टू चेक-इन लाउन्ज, य्योर मदर इज वेटिंग देअर। मि. अयान सिंह…” 
अबतक गायत्री के आस-पास भीड़ जैसी इकठ्ठी हो आयी थी। उद्घोषणा का कोई सकारात्मक परिणाम आते नहीं देख, उस अधिकारी ने एक सुरक्षाकर्मी के कान में धीरे से कहा, “बार में चैक करो, कहीं पीकर ना पड़ा हो।” एक सुरक्षाकर्मी तत्काल बार की ओर भागा। 
मोटे अधिकारी ने उस सूट-बूट वाली लड़की से पूछा, “ये माता जी जो समय बता रही हैं उस समय पर वेगस के लिए कितनी फ्लाइट्स हैं?”
“सर, आज की डेट में एक बजे से दो बजे के बीच सिर्फ दो ही फ्लाइट्स हैं, एक डेल्टा की और दूसरी ऐमिरेट्स की।” अधिकारी ने कलाई घड़ी की ओर देखा और लड़की को आदेश भरे लहजे में कहा, “ओके, चेक द पैसेन्जर लिस्ट ऑफ बोथ द फ्लाइट्स ऐन्ड रिपोर्ट टू मी, इम्मेडियेटली।”
“सर…,” बोलती हुई लड़की काउन्टर की ओर भागी।
सभी हरकत में आ गए। एयरलाइन्स के चेक-इन काउन्टर से पैसेन्जर्स की लिस्ट खंगाली जाने लगी। सुरक्षाकर्मी ने आकर अयान सिंह नाम के किसी भी आदमी के ‘बार’ में या ‘स्मोकिंग जोन’ में नहीं होने की पक्की सूचना दे दी थी। एयरपोर्ट की गहमा-गहमी देखकर गायत्री के अन्दर बैठा ‘माँ का मनʼ किसी अनहोनी की आशंका से काँप उठा। उसकी आँखें बरसने लगीं। 
लड़की ने वॉकी-टॉकी पर रिपोर्ट की, “सर, दोनों फ्लाइट्स टेक-ऑफ कर चुकी हैं।” 
“चेक द बोर्डिंग लिस्ट।”
“सर…।” और कुछ ही सेकण्ड बाद लड़की ने सारी सूचनाएँ दे दीं।
वह मोटा अधिकारी अब गायत्री के नज़दीक आया और उसकी बगल वाली सीट पर बैठकर आत्मीय बातचीत करते हुए उससे उसके परिवार और रिहाइश के बारे में पूछने लगा। 
फिर उसने धीरे से गायत्री को बताया, “माता जी, आपका बेटा आपको यहीं छोड़कर अमेरिका चला गया है। हमलोग आपको आपके घर तक छुड़वाने की व्यवस्था करा देते हैं।”
यह सुनकर गायत्री स्तब्ध रह गयी। उसने चश्मे वाले मोटे अधिकारी की ओर सूनी आँखों से देखा और बोल पड़ी, “अब कौन-सा घर…!” 
प्रकाशित पुस्तकें - कैरियर, गर्लफ्रैंड और विद्रोह’ (कहानी-संग्रह), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली; ‘ठेले पर ग्लोब’ (कहानी-संग्रह), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली; ‘मीराँबाई : आज के समय में’ (सं.), प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली; ‘मार्कण्डेय की श्रेष्ठ कहानियाँ’ (संचयन), नैशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली; ‘मार्कण्डेय’ (मोनोग्राफ़), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली; ‘बाल साहित्य और आलोचना’ (सं.), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली; ‘दृश्य-श्रव्य माध्यम’ (स्वतंत्र शोध), विजया बुक्स, नई दिल्ली; इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय के लिए फ़िल्म और टेलीविज़न संबंधी पाठ लेखन। विविध पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, आलेख, पुस्तक समीक्षाएँ आदि प्रकाशित; आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा, नई दिल्ली के लिए दर्जनों फ़ीचर का निर्माण; रिपोर्टिंग एवं सम्पादन, ‘यूएनएन’, नई दिल्ली; संप्रति : साहित्यिक जर्नल ‘कथानक’ का सम्पादन; सम्पर्क : anuj.writer@gmail.com

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