रात का एक बज रहा था, हेलेना को अपनी आराम कुर्सी में बैठे हुए भी जब चैन न आया तो वह उठ कर कमरे में टहलने लगी। अपना मन भटकाने के लिए वह क्रोशिया का मफ़लर बनाने बैठ गई पर कुछ देर बाद उस पर भी झल्लाहट उठी तो साथ की मेज़ पर फ़ेंक दिया। रातें सोने के लिए होती हैं पर किनके लिए? जिनके जी में जलन न हो, उन्हीं के लिए! जिनके जी जल रहे हों, वे आँख बंदने की कोशिश भी करें तो नींद जल उठती है और फिर उसके धुँए और कालिख को मन में मलते वे या करवटें बदलते हैं या टहलते रहते हैं जैसे इस समय हेलेना टहल रही है।
६५ वर्षीया हेलेना अपनी ८५ वर्षीया माँ, क्रिस्टीना को एक आँख नहीं सुहाती पर विवशता यह है कि रहना उन्हें हेलेना के साथ ही पड़ता है क्योंकि उनकी देखभाल करने के लिए उनका प्रिय पुत्र क्रिस तो उनके साथ आकर रहने से रहा। क्रिस आता है तो घर से पैसे या किसी कीमती सामान को ले जाने या घर को अपने नाम करने के लिए अपनी माँ को फ़ुसलाने के लिए और आज तो वह सफ़ल हो ही गया। हेलेना की भी मजबूरी है कि वह माँ की जली कटी भी सुनती है और उनकी देखभाल भी करती है। सब उसे सलाह देते हैं कि उसकी माँ अब हिंसक होने लगी है अत: उसे किसी “दीर्घकाल चिकित्सा घर’ (लॉंग टर्म फ़ैसेलिटी) में भेज दिया जाये। हेलेना भी माँ को अपनी केवल मातृभक्ति के कारण घर पर नहीं रखे हुए है पर उसे लगता है कि उसके पास कोई और विकल्प नहीं। क्रिस अगर उन्हें अपने साथ रखने को तैयार हो तो वह छुट्टी पाए पर ६२ वर्षीय नाकारा क्रिस कहने पर भी माँ को कभी अपने घर ले जाने को तैयार नहीं हुआ। जवानी में कभी उसने अपने माँ -बाप को नहीं पूछा तो अब क्या पूछेगा! ’डिसएबिलिटी’ (अपंगता) का बहाना करके सरकार से पैसे ए ऐंठता है और उसी बहाने से माँ की देखभाल से मुकर जाता है। अपनी ताकत रहते हेलेना उन्हें नर्सिंग होम नहीं भेज सकती। वह जानती है कि नर्सिंग होम की व्यवस्था बहुत खराब हैं, नर्सें बहुत कम और रोगियों की संख्या कहीं ज़्यादा, इस कारण उनकी देखभाल ठीक से नहीं हो पाती। कई स्थान तो बदबू और रोगियों की चिल्लाने की आवाज़ों से ही बजबजाते रहते हैं। वह स्वयं नर्स है और जानती है कि ऐसी जगहों में रोगियों की देखभाल का स्तर क्या है फिर ऐसी जगह पर अपनी माँ को कैसे छोड़ आये? उसका मन इसकी गवाही नहीं देता। जैसी भी हैं पर हैं तो माँ ही। पिता ने मरते वक्त हेलेना से वायदा लिया था कि वह क्रिस्टीना की देखभाल करेगी। वह जानते थे कि क्रिस्टीना बेहद चिड़चिड़ी और पुत्र प्रेम में अंधी होकर बेटी को गालियाँ देने वाली औरत है, बीमार भी रहती है। स्वाभाविक रूप से उन्हें पत्नी के भविष्य की चिंता थी। वे जानते थे कि हेलेना पर उनका ज़ोर चल जाता है, वह अगर उन्हें क्रिस्टीना की देखभाल का वचन दे देगी तो निबाहेगी। क्रिस्टीना का प्यारा क्रिस महीनों गायब रहता, कहाँ है, किसी को कुछ पता नहीं! कोई पता, फोन नंबर नहीं जहाँ उससे संपर्क किया जा सके, महीनों बाद आ धमकता और हफ़्ते -दस दिन साथ रह, कुछ सामान, पैसा लेकर फिर लापता। कितनी बार पूछने पर भी उसने अपना फोन नम्बर या पता नहीं दिया था, बहाना यह कि वह ’नोमेड’ (खानाबदोश) है। हाँ, यह अवश्य बता दिया था कि उसने शादी कर ली है और उसके एक बच्ची भी है। क्रिस ने अपने परिवार से माता-पिता को कभी नहीं मिलवाया पर माँ दादी बनने के सुख में मगन होती, शायद क्रिस ने अपने परिवार की फोटो उन्हें दिखाई हो। हेलेना को नहीं पता, उसे नहीं पता कि क्रिस माँ को बातों का ऐसा कौन सा मीठा शरबत पिलाता है कि वह बेटे के प्रेम में मगन, सच्चाई से आँखें बंद किए रहती है।
टहलते हुए भी वह जब वह शांत न हो सकी तो थक कर बिस्तर पर बैठ गई। उसे अपने पिता पर क्रोध आया, वे जानबूझ कर उसे वायदे में फ़ँसा गये, वे जानते थे कि हेलेना वायदा नहीं तोड़ेगी। वह उनकी आज्ञाकारी, उनसे प्रेम करने वाली बेटी थी, पिता के अनुसार वह उन लोगों के बुढापे की लाठी थी। अपने पिता के प्रति प्रेम का खामियाज़ा अब वह माँ की गालियाँ खाते हुए, उनकी लाठी की मार से बचते हुए उतार रही है। सीने में जलन के गुबार उठने लगे तो गला सूखने लगा। उसने उठ कर कोक का एक कैन खोल लिया, सारा दिन कॉफ़ी या कोक उसके जलते जी पर पानी की छींटे छिड़कते रहते हैं।
बेचैनी हद से बढ़ी तो वह बाथ टब में पानी भरने लगी। यह रात जैसे लंबी होती चली जा रही थी, मन की आग शरीर को भी तपाने लगी। शायद टब का पानी उसकी जलन को शांत कर सके और वह कुछ देर सो सके, कल काम पर भी जाना है। उसका ’कोर्गी’ कुत्ता, बस्टर उसकी हर हरकत को अपने बिस्तर से सिर उठाये, ऊँघता सा देख रहा था। उसकी छॊटी-छोटी आँखों में नींद भरी थी पर हेलेना की बेचैनी कमरे में घनीभूत हो कर मानों उसमें भी रिस रही थी, उस बेचैनी को वह समझ नहीं सकता पर महसूस कर रहा था।
हेलेना जब बाथ टब में लेटी तो बस्टर दुम हिलाता उसके पास बाथरूम में आ बैठा। हेलेना के बाहर लटके हाथ को अपनी जीभ से चाटता वह सांत्वना की मोहर लगाने की कोशिश करने लगा। हेलेना उसके व्यवहार से भरभरा आई। बस्टर की आँखॆं हेलेना पर ही टिकी थीं, हेलना की आँखों से बहता दुख और सिसकियाँ उसकी कहानी टब के पानी पर लिखने लगे, बस्टर उसे एकटक देख रहा था जैसे उस कहानी को पढ़ रहा हो। उसका अपना बेटा तक उसे नानी से अपमानित होते और हालात बदलने के लिए कुछ न करते देख नाराज़ होकर, बोलना बंद कर चुका है। संवेदना के सारे शब्द उसके थके मन और शरीर के बाहर ही गूँगे हो चुके हैं, पर इस गूँगे जानवर को शब्दों की ज़रूरत नही, उसका सारा शरीर ही शब्द है। बस्टर अपना शरीर उससे रगड़ता है और उसका अनकहा प्यार, हेलेना पर फूल सा झरने लगता है!
आज आठ बजे जब वह नर्सिंग होम से लौटी तो अपने कई जोड़ी कपड़े पोर्च की ज़मीन पर पड़े देख कर हैरान हुई। भीतर अभी कदम रखा ही था कि मुख्य कमरे में बैठी माँ अपनी लाठी के सहारे उठ खड़ी हुई और गरज कर बोली, “देख लिए न अपने कपड़े, अभी तो ये थोड़े से ही फ़ेंके मैंने बाहर, जब क्रिस इस घर में आयेगा न तब तेरे सारे कपड़े क्या, सारा सामान उठा कर बाहर फ़ेकेगा। तब मज़ा आयेगा। अब यह घर उसका है, आज मैंने यह घर उसके नाम कर दिया।“ हेलेना ठगी सी खड़ी रह गई। क्या माँ सच कह रही है? वह यह तो जानती थी कि क्रिस उसके जाने के बाद जब-तब घर आता है और पिता की जोड़ी हुई कुछ मँहगी चीज़ें भी ले जाता है, जैसे उनकी घड़ी, एक पुराना पर एंटीक में बिक सकने वाला टाइपराइटर, चाँदी के सिक्के आदि पर वह ऐसे पीठ में छुरा भौंकेगा, इस आशंका पर उसने कभी विश्वास करना नहीं चाहा था। उसे परेशान देख कर उसकी माँ को विचित्र सी खुशी हुई। वह नहीं जानती कि उसने पहले बच्चे के रूप में पैदा होकर माँ को कौन सा ऐसा दुख दिया था जिससे माँ अब तक नहीं उबर पाई है। उसके रंग उतरे चेहरे को देखती हुई क्रिस्टीना मुस्कुराती हुई अपनी लाठी के सहारे खड़ी हो गई।
“आने दे क्रिस को, वही तुझे यहाँ से निकालेगा” उसे गालियाँ देती काँपते पैरों से रसोई की ओर बढ़ने लगी कि रास्ते में ही लड़खड़ा गई। पैरों में गठिया के कारण उसका चलना फिरना मुहाल है। हेलेना ने तेज़ी से आगे बढ़ कर उसे सँभाल न लिया होता तो वह गिर गई होती। माँ ने सँभलते ही उसे धक्का दिया, बोलने के लिए मुँह खोला ही था कि हेलेना ने ज़ोर से कहा,
“कपड़े फ़ेंकने से पहले अपने को सँभालने के लिए क्रिस को बुलाओ न..कहाँ है वो तुम्हारा लाडला बेटा? आकर करे न तुम्हारी देखभाल और मुझे भी छुट्टी दे। कभी दो दिन जिसने तुम्हारा ख्याल नहीं रखा, तुम हमेशा उसी के ख्याल में डूबी रहती हो। अरे माँ, होश करो, मकान लेकर क्रिस मेरे साथ तुम्हें भी निकाल बाहर करेगा, फिर चिल्लाती रहना, नर्स, नर्स और कोई तुम्हारी देखभाल को नहीं आयेगा।“
कहते हुए उसने माँ को उनके कमरे में ले जाने का प्रयास किया। वे पूरे रास्ते उसे या तो धक्का देने की कोशिश करती रहीं या अपनी लाठी से उसके पैर पर चोट करने की कोशिश में लगीं रहीं। उनकी लाठी उनका हथियार है, जब उन्हें बहुत गुस्सा आता, तो लाठी से उसे पीटने की कोशिश करतीं, मुँह बराबर अपने बेटे की तरफ़दारी और बेटी के लिए अपशब्द उगलता रहता। हेलेना निपुण नर्स है, दायें, बायें करके प्राय: लाठी से बच लेती है पर वह बेटी भी तो है, कभी न कभी तो यह लाठी दिल पर लग ही जाती है। आज भी माँ की लाठी ने चोट की। हेलेना यंत्रवत उन्हें बिस्तर पर बिठा कर उनका खाना साथ की मेज़ पर लगाने लगी। उसका दिमाग आज की घटना की सच्चाई जाँचने की हालत में न था। माँ उसे स्वार्थी, खून चूसने वाली जोंक कह रही थीं, और हेलेना बुड़बुड़ाती हुई उन्हें मोह में अंधी और दिमाग खो देने वाली कह रही थी। लगभग हर दिन यही सब होता है पर आज की बात अलग है, क्या माँ ने सचमुच मकान क्रिस के नाम कर दिया है? अगर ऐसा हुआ तो… !! वह काँप गई। अपने लिए नहीं, वह तो चाहें किसी सस्ते मकान में भी रह लेगी पर माँ को क्रिस अपने पास कतई नहीं रखेगा, ज़रूर किसी भी नर्सिंग होम में मरने के लिए छोड़ देगा। कैसा है यह क्रिस! एक दिन भी माँ की देखभाल नहीं की उसने, और कैसी है उसकी माँ, जो अपनी बेटी को इतनी गालियाँ देती है और उस बेटे को सिर चढाये बैठी है जो उसका सब लेकर एक दिन उसे घर से बाहर कर देगा! कभी-कभी दुख उसे जकड़ लेता है, क्या किसी की माँ उसकी माँ जैसी होगी?
आज ही ऑफ़िस में खाने के समय सहकर्मी मित्रों में ’विल’ लिखने की ज़रूरत पर बात चल पड़ी। बातों-बातों में एक पूछने लगी कि “क्या तुम्हारी माँ की कोई ’विल’(जायदादनामा) है? करवा लो नहीं तो मुश्किल पड़ती है”। हेलेना हँसने लगी, ”माँ की विल नहीं विलिंगनेस है कि घर इनके बेटे को मिले और मैं घर से बाहर हो जाऊँ!” मित्र ने चिंता से कहा, “मज़ाक मत समझो इसे, और अपनी लापरवाही या गर्व में इसे टालो मत”। हेलेना ने कहा, “माँ मुझे इतना बुरा-बुरा कहती है, गालियाँ देती है कि उससे विल लिखवाने का तो सोचना भी कठिन! तब तो वह मुझे निसंदेह लालची और घर हड़पने वाली कहेगी। मुझे उसका घर चाहिए भी नहीं…”। उसकी मित्र ने उसे अव्यावहारिक कहा और इस तरफ़ ध्यान देने को बाध्य किया था पर हेलेना को क्या पता था कि आज ही यह दिन आ जायेगा।
बाथ टब में लेटे हुए उसके आँसू अपने पिछले वर्षों के दुख कह रहे थे। दस वर्ष पूर्व पिता के निधन के बाद से हालात बहुत बिगड़ गये थे, पिता थे तो वे उसे माँ की कड़वी बातों से बचा लेते थे। माँ भी तब इस तरह से आक्रामक नहीं थीं पर पिता के जाने के बाद तो माँ ने अपनी कड़वाहट, क्रिस के घर न आने, अकेले रह जाने के गुस्से की पूरी तोप ही उसकी ओर मोड़ दी थी। तीन वर्ष पहले अल्ज़ाइमर की शुरुआत होने के बाद तो धीरे-धीरे वह शारीरिक रूप से भी अक्रामक होने लगी। हेलेना पिता के जाने के बाद, माँ के रहते भी अनाथ महसूस करने लगी। ६५ की उम्र, २८ साल में जो तलाक हुआ, उसके बाद कभी विवाह नहीं किया हेलेना ने! नौकरी, बेटा और माता-पिता, उन्हीं में सारी उम्र निकल गई! अब? अब उसका कोई नहीं!
’माँ तो कब से उल्टा-सीधा कहती आई है, तब आज चोट क्यों ज़्यादा लग रही है?” वह अपने को सँभालने की कोशिश कर रही है पर आज आँखें बाँध तोड़ रही हैं, ..माँ की लाठी उसके मन पर पड़ रही थी। वह उनके बुढ़ापे की लाठी तो नहीं पर अपने बुढ़ापे में उनकी लाठी खाने वाली बन गई! और उसकी खुद की लाठी कौन है? अपने कपड़े बाहर पडे देख कर वह स्तब्ध थी पर माँ के शब्दों और उसके चेहरे पर आने वाली खुशी ने उसे हरा दिया! पिता के वचन के टूटने की आशंका उसके गर्व को तोड़ रही थी, उसकी सारी कोशिशें बेकार होने वाली थीं। क्रिस कम से कम माँ के मरने तक तो रुक जाता! माँ उसका बुरा चाहने के चलते अपना ही बुरा कर बैठीं। उसके मुँह से गाली निकलने को हुई।
वह जानती है कि वह भी कोई संत नहीं है कि हमेशा चुप ही रहती हो, प्राय: वह भी चिल्ला देती है, दूसरे कमरे में सारी शाम बिता देती है, माँ बुलाये तो थोड़ा देर करके जाती है….पर फिर भी जाती है, दवाई देती है, ज़िद करके खाना खिलाती है, डायपर बदलती है, रातों को उनके चिल्लाने, घबराने पर साथ जाकर बैठी रहती है। उनके सारे काम वही करती है, वह न करे तो कौन करे? दिन भर के लिए तो एक सहायिका रखी हुई है पर शेष समय तो उसी की ज़िम्मेदारी है। एक दिन की उसे छुट्टी नही, क्रिसमस पर भी बेटे के घर जाने की छुट्टी नहीं। बेटा नानी के दुर्व्यवहार से इतना दुखी है कि उन्हें अपने घर बुलाना नहीं चाहता और हेलेना, जो भी कहो, माँ को क्रिसमस के दिन अकेले घर में छोड़ कर जाने को तैयार नहीं। माँ-बेटे के बीच अबोला चल रह है…उसने सब सहा, बेटे का न बोलना, उम्र की थकान, क्रिस्टीना की हमेशा की बकझक..! पर आज सहने की सीमा टूट रही है। अंदर कुछ गहरा चटक गया, अच्छा है सब टूट जाये, पिता को दिया वचन भी टूटॆ तो उसकी जान बचे…सोचते सोचते वह हिलक कर रो उठी। जाने कब से जमा भीतर का दुख बाहर आने को हुड़कने लगा। काश, एक कंधा होता जिस पर सिर रख कर वह रो सकती। उसका तो कोई साथी नहीं! उसका मन अकेलेपन के समुद्र में नाव की तरह हिचकोले खाने लगा। रोते हुए उसके गले से ज़ोर से हिचकी निकली कि बस्टर कूँ-कूँ करता उसके निकट आ गया, टब के पास, इधर-उधर से हाथ मारने की चेष्टा करने लगा। जब हेलेना के रोने में कमी नहीं आई तो मानो बस्टर और नही सह सका…बहुत दम लगा कर वह भी पानी में कूद आया और हेलेना के आँसुओं से भरे चेहरे को चाटने लगा, मानों कह रहा हो, ’रो मत! मैं तुम्हारे पास हूँ’ हेलेना ने बस्टर को बाँहों में भर लिया और उसके गीले फ़र पर माथा टिका कर फ़फ़क उठी…! उसके आँसू बस्टर के शरीर पर गिर कर अपना अगला- पिछला सब कहने लगे।
चिंताओं के व्यूह से घिरी वह बस्टर को सीने से लगाए, शिथिल सी पड़ी थी। बस्टर कूँ-कूँ करता अपना सिर उसके कंधे पर रगड़ रहा था, मानों कहता हो, ’उठो..मैं हूँ न!’
डॉ. शैलजा सक्सेना
Co- Founding Director- Hindi Writers Guild, Canada
संपर्क – [email protected]
बहुत अच्छी कहानी है।हेलेना की भावनाओं को लेखिका ने बहुत अच्छी तरह अभिव्यक्त किया है। क्रिस्टीना का पुत्र मोह उसे अंधी बनाए हुए हैं। मूक जानवर बस्टर की हेलेना के लिए सहानुभूति सराहनीय है।
शैलजा जी!
कहानी पढ़ कर हेलेना के लिए दुख हुआ। पिता के वचन पालन की दृष्टि से वह कितना दुख भोग रही है। कल्पना नहीं कर सकते कि माताएँ ऐसी भी होती हैं। नाकारा पुत्र के लिए इतना प्रेम और जो सेवा कर रही है उसका तिरस्कार!! ऐसी माँ से तो मूक जानवर बूस्टर ही अच्छा है।
जो रिश्ते सबसे पास और संवेदनशील हैं- माँ और संतान के बीच के उन्हीं रिश्तों की ऐसी सूरत तकलीफ दे गई। हेलेना की तकलीफ महसूस हुई।
नमस्ते नीलिमा जी, माता को कुमाता नहीं कहा जाता चाहें बच्चे कुपुत्री या कपूत हो पर आज के समय में कितनी ही माताएँ इसका अपवाद बन गई हैं। यह भारतीय ही नहीं, दूसरे देश के समाजों में भी है। कहानी पसंद करने के लिए हार्दिक आभार।
एक सत्यता को बखान करती ही कहानी,मेने बहुत सी पुत्र मोहमे आंधी माओ को देखा है जो नाकारा निकम्मा होते हुए भी मां का प्रिय बना रहता है
ओर हेलेना जैसी बेटी को जो उसी मां के गर्भ से जन्मी है उसे तिरस्कृत करती रहती है।
विडंबना स्त्री स्त्री की शोषक बन जाती है
मूक जानवर की संवेदना बेहतर जान पड़ती है
साधुवाद आपको ,मां बेटी जैसे रिश्तों में एक दूसरे के प्रति, बेटी का अनुकूल ,मां का प्रतिकूल स्वभाव चिंतनीय है।
कहानी में प्रवाह है
क्या बेटों की प्रधानता हरएक देश और हरएक संस्कृति में विद्यमान है
बेटी हेलेना अपने पिता के वचन से बंधी है कि मेरे जाने के बाद मां ख्याल रखना . भाई नकारा और मां क्रूर .कहानीकार शैलजा जी हेलेना का गजब का किरदार गढ़ा है . कहानी भावपूर्ण है
इन्सान से बेहतर जानवर है, जो मानव की भावनाओं को समझते हैं। बहुत सुंदर कहानी ।
कहानी पसंद करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।
बहुत अच्छी कहानी है।हेलेना की भावनाओं को लेखिका ने बहुत अच्छी तरह अभिव्यक्त किया है। क्रिस्टीना का पुत्र मोह उसे अंधी बनाए हुए हैं। मूक जानवर बस्टर की हेलेना के लिए सहानुभूति सराहनीय है।
विद्या जी, कहानी में हेलेना की भावनाओं से आप जुड़ीं, आपका हार्दिक आभार।
शैलजा जी!
कहानी पढ़ कर हेलेना के लिए दुख हुआ। पिता के वचन पालन की दृष्टि से वह कितना दुख भोग रही है। कल्पना नहीं कर सकते कि माताएँ ऐसी भी होती हैं। नाकारा पुत्र के लिए इतना प्रेम और जो सेवा कर रही है उसका तिरस्कार!! ऐसी माँ से तो मूक जानवर बूस्टर ही अच्छा है।
जो रिश्ते सबसे पास और संवेदनशील हैं- माँ और संतान के बीच के उन्हीं रिश्तों की ऐसी सूरत तकलीफ दे गई। हेलेना की तकलीफ महसूस हुई।
बधाई आपको इस कहानी के लिये।
नमस्ते नीलिमा जी, माता को कुमाता नहीं कहा जाता चाहें बच्चे कुपुत्री या कपूत हो पर आज के समय में कितनी ही माताएँ इसका अपवाद बन गई हैं। यह भारतीय ही नहीं, दूसरे देश के समाजों में भी है। कहानी पसंद करने के लिए हार्दिक आभार।
एक सत्यता को बखान करती ही कहानी,मेने बहुत सी पुत्र मोहमे आंधी माओ को देखा है जो नाकारा निकम्मा होते हुए भी मां का प्रिय बना रहता है
ओर हेलेना जैसी बेटी को जो उसी मां के गर्भ से जन्मी है उसे तिरस्कृत करती रहती है।
विडंबना स्त्री स्त्री की शोषक बन जाती है
मूक जानवर की संवेदना बेहतर जान पड़ती है
साधुवाद आपको ,मां बेटी जैसे रिश्तों में एक दूसरे के प्रति, बेटी का अनुकूल ,मां का प्रतिकूल स्वभाव चिंतनीय है।
कहानी में प्रवाह है
क्या बेटों की प्रधानता हरएक देश और हरएक संस्कृति में विद्यमान है
बेटी हेलेना अपने पिता के वचन से बंधी है कि मेरे जाने के बाद मां ख्याल रखना . भाई नकारा और मां क्रूर .कहानीकार शैलजा जी हेलेना का गजब का किरदार गढ़ा है . कहानी भावपूर्ण है
बेटी और बेटे के प्रति माँ का व्यवहार भिन्न होने से संबंधों में दूरी और क्रूरता पैदा हो जाती है। आपको कहानी ने छुआ, उसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।