रोज की भांति आज भी सुमेर सिंह को अटारी बॉर्डर से अपने जिगरी यार से बगैर मिले ही लौटना पड़ा। करीब पंद्रह दिन हो गए लेकिन जिगरी यार से मुलाक़ात न हुई क्या हुआ? उसने कुछ बताया भी नहीं। पिछत्तर साल के सुमेर सिंह का शरीर भी अब जबाव दे गया लेकिन मन है कि मानने को तैयार न था। अरे ऐसा क्या काम लग गया उसे जो उसने मुझसे मिलने तक के लिए समय न निकाल पाया, गज़ब करता है यारा… देखता हूँ कब तक नहीं आएगा। अटारी बॉर्डर पर लगे सेना के जवान भी बूढ़े आदमी को देखकर कहते थे अरे सरदार जी और किते दिन परेशां होंगे। ऐसे रोज रोज मत आया करो। सुमेर और अशरफ की दोस्ती सेना के जवानों से भी छिपी न थी। नफरत के दौर में इन दोनों की दोस्ती, जीवन के अंतिम पड़ाव में भी सरहदों के पार भी प्यार का संदेश देती थी। सुमेर सिंह का प्रतिदिन का नियम था सुबह आठ बजे सलकनपुर से अटारी जाते थे और सात बजे तक वापस आते थे। अटारी में पान मसाले की छोटी सी दुकान थी उनकी, सलकनपुर और अटारी के बीच महज दो किलोमीटर का फासला होगा। कितनी बार सुमेर सिंह की बोटी परमजीत कहती थी तुस्सी पागलों सा काम करदा है जब हमारे पास किसी चीज की कमी ही नहीं तो ये छोटी मोटी दुकान दा की मतलब..? और सुमेर हँसकर उसकी बात टाल जाता। देख बिल्लो सब कुछ तो हमारे पुत्रों ने संभाल लिया मैं यहाँ बैठा बैठा बोर होता रहन्दा हूँ होर कि सी… परमजीत तुम जानो और तुम्हारा रब जाने…हुंह और मुँह बिचका कर अपने काम में लग जाती है।
सुमेर सिंह सलकनपुर से अटारी आता था अपने बिछड़े यार अशरफ़ भाई से मिलने के लिए, अशरफ मिया भी बाघा से कुछ दूरी पर रहते थे। वो भी सुमेर से मिलने के लिए ठीक समय पर आ जाते थे तारों के आमने सामने खड़े होकर जी भर निहारते एक दूसरे को अशरफ़ सेवई लाते तो सुमेर सिंह भी उनके घर में जो अच्छा पकता था बंधवा लाते थे। मिलने ही आते थे एक दूसरे से दुकान बुकान तो बस बहाने थे दोनों के। कैसे अपनी बचपन की दोस्ती को सरकार के फरमान पर तोड़ देते ?  उन्हें मिलने का जो रास्ता सूझा वो चुन लिया। बहुत लंबे अरसे तक इंतजार किया कि शायद दोनों देशों के रिश्ते एक दिन दोस्ताना हो जाएंगे। फिर हमेशा के लिए चैन ओ अमन होगा। दोनों देशों के बीच का, यह इंतजार लंबा होता गया….पर उसका अंत न हुआ। मिलना जब सम्भव न हो सका तो दोनों ही एक दूसरे से मिलने के लिए बैचेन हो उठे…. 
इधर से सुमेर सिंह और उधर से अशरफ़ भाई चल देते थे अपने अपने बॉर्डर की ओर…प्रतिदिन आने लगे कि किसी रोज तो मिलगें। 
और एक रोज एक दूजे से आँखे टकरा गयीं और अश्रुओं की बरसात हुई उस दिन से…रोज मिलने का सिलसिला शुरू हुआ
आज अशरफ मिया अपनी बेटी के निकाह का न्यौता देने आए थे आँखों में आँसू लेकर अशरफ सुमेर सिंह से कहता है… सुमेरे हमारे बीच ये सरहदें न होती तो तू मेरी बुलबुल को आशीर्वाद देने आता न.. हम्म.. क्यों नहीं आता, जरूर ….आता और दोनों की ही आँखों की कोरें गीली हो गयीं…सुमेरे अब मैं चलता हूँ निकाह की तैयारियां करनी है। मियां अशरफ रब खैर करे जल्दी मिलेंगे…
अगले दिन सुमेर सिंह बुलबुल के लिए सुंदर उपहार लेकर आये थे लेकिन ..….आज अशरफ नहीं आया सुमेर सिंह इंतजार करता रहा….धीरे धीरे करीब दस दिन होने को आये लेकिन अशरफ मियां की कोई खबर न थी। 
इधर परमजीत सोच रही है कि सुमेर सिंह कुछ दिनों से काफी उदास हैं समझ नहीं आ रहा कौनसी बात उनको अंदर ही अंदर दीमक की तरह खोखला कर रही है… बीमार बीमार से रहने लगे हैं आजकल। अभी कुछ दिनों पहले तक भले चंगे थे।परमजीत को सुमेर सिंह चिंता सता रही है बार बार पूछने पर भी सुमेर सिंह कुछ नहीं बताता। परमजीत को नहीं पता कि यह दुकान सुमेर के लिए क्यों कीमती है। क्योंकि परमजीत को अब कुछ याद भी नहीं। वह तो अपनी गृहस्थी में मगन थी। चार चार लड़के बहुएं पोते पोतियां हैं घर भरा रहता है पूरा दिन बालकों के पीछे भागते भागते कब कट जाता है पता ही न चलता। सुमेर को पता था कि अगर उसकी मोट्यार को पता चलेगा तो वह उसे अटारी हरगिज़ न जाने देगी। सुमेर वर्षों की पीढ़ा अपने दिल में दफ़्न कर जिये जा रहा था। जो थोड़ा बहुत सुकून था वह उसकी अटारी वाली दुकान से था। बाकी तो जीना उसे बेमानी लगता था। बंटबारा होने से पहले सुमेर के घर जिस दिन महफ़िल न सजे उसे जिंदगी जीने में मजा न आता। कविता पाठ, शायरी, मुशायरों का दौर जब जमता तो पूरी पूरी रात कब बीत जाती पता ही न चलता। घर पहुँचते ही मोट्यार की डांट…आ गए हम तो जैसे पागल, तेरे पिछलग्गू हैं जो रात रात भर तेरी राह देखते हैं और तू वहाँ रंग जमाये बैठा रहन्दा है मैं पूछती हूँ मैं तेरी कुछ लगदी हैं न कि सिर्फ फोकट में तेरे नाल इंतजार करां दी
ओये कुड़ी नाराज न हो तुझे तो पता है मेरे यार जब मिलते हैं तब मुझे टाइम का ख्याल ही न कहाँ रहता है..परमजीत हुंह…करके मान जाती।
कहाँ फुर्ररर हो गए वे दिन….,
सुमेर लेटे लेटे अकेले ही हँस रहा था पुरानी यादें जो आँखों में कौंध गयी थीं।  हँसते हँसते ही आँखों की कोरें भी गीली हो गयीं और सुमेर रात के अंधेरे में रुआँसे हो गए उन्हें वो अफरा तफरी याद आ गयी…लोग भागते दौड़ते खुद को बचाये रखने के लिए छिपते हुए नजर आए….और देखते ही देखते सुमेर पसीने में तर हो गए आखिरकार उनसे वो हाथ छूट गया जिसे वो सबसे ज्यादा मजबूती से पकड़े हुए थे। नहीं नहीं अशरफ़ मत जा मुझे छोड़कर…. रुक न यारा…
सुमेर सोते सोते बड़बड़ा रहा था परमजीत गुस्से में बोली ये आदमी भी न, बड़ी मुश्किल से सब कुछ भूला था… अचानक आज ये सब कैसे? और परमजीत को अशरफ का नाम सुनकर जैसे धक्का सा लगा। और परमजीत सुमेर को  देखती है सुमेर का हाथ ऐसे उठा था जैसे किसी ने उसका थामा हो, और देह ठंडी पड़ चुकी है।
सहायक प्राध्यापक( हिंदी) शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय श्योपुर मप्र

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