Sunday, June 23, 2024
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शिखा वार्ष्णेय की कहानी – आश्रय

सूरज आज निकला नहीं था। अक्टूबर की एक अलसुबह सिया एक बड़े से मग में अपनी ग्रीन टी में एक पत्ता बेसिल का डालकर पीछे वाले बगीचे में बैठ गयी थी ।। वहाँ एक पेड़ को काट कर बनाई गई बेंच उसे बहुत पसंद है। अच्छी ठिहरन थी। घास पर अभी भी ओस ठहरी हुई थी। पेड़ अपने पत्तों को त्याग चुके थे और अब ठंडी हवा के झोंकों का सहारा ले, अपनी सूखी टहनियों से सिया को छूने की कोशिश कर रहे थे। सिया को हल्की ठंड महसूस हो रही थी पर उसका मन अंदर जाकर जैकेट लेने का नहीं हुआ। यूँ भी उसे ठंड पसंद थी। गर्मी उसे उलझन देती थी और ठिहरन जीवन में डटे रहने का हौसला।
पिछले साल इन्हीं दिनों की बात है। उसने इस इमारत में सबसे नीचे वाला दो कमरों का घर ले लिया था, जिसमें पीछे की तरफ एक छोटा सा बागीचा उसे मिला था। वह अपना एक सूटकेस और कुछ और सामान से भरा एक बड़ा सा गत्ते का डिब्बा लेकर यहाँ शिफ्ट हो गई थी। आज एक साल बाद भी उसे अपने इस फैसले पर संतुष्टि ही है। बल्कि कभी कभी वह सोचती है कि और पहले यह फैसला लेना चाहिए था।
गोद में पड़े मोबाइल की स्क्रीन पर बिल्ली लिखा चमकने लगा।
“अरे इसे आज क्या हो गया?” हेलो, क्या हुआ बेटा? सब ठीक है ना”
झट से सिया ने फोन उठाकर बेसब्री से बोला। छुट्टी वाले दिन इतनी सुबह बेटी के फोन से उसे घबराहट होने लगी। हाथ कांपने लगे।
“रिलेक्स मॉम, कुछ नहीं हुआ”
“आह! शुक्र है। कितनी बार कहा है ऐसे अचानक फोन मत किया कर। एक धड़कन मिस हो गई मेरी। क्या हुआ? इतनी जल्दी उठ गई आज?।
“आप भी तो उठ गईं। क्या कर रही हो?
पहले मेरी बात का जवाब दे? फोन तूने किया है।
“अच्छा बाबा। अरे कुछ नहीं। हम तो अभी सोए ही नहीं।”
फोन पर सुमी यानी बिल्ली की खिलखिलाती आवाज सुनाई दी।
“रात को एक के बाद एक फिल्म देखी। अभी बस सोने जा रही थी तो सोचा थोड़ा आपको डरा लूं “
उफ्फ! ये लड़की भी ना! सच में बिल्ली है। एकदम सही नाम रखा है मैंने इसका।
“चुड़ैल है पूरी तू। जा सो जा अब” सिया लाड़ में बोली।
“हाँ हाँ। जा रही हूं। आपका क्या प्लान है आज का।?”
“अरे बताया तो था। आज हमारा यहाँ का ग्रुप वो गाँव की सैर पर जा रहा है ना। बस वही है। नौ बजे करीब निकलेंगे, रात तक वापस।”
यार आपकी ऐश है। जाओ जाओ मजे करो। हाँ सुनो! अगला शनिवार खाली रखना”
“क्यों?”
“अरे! बाद में बताऊंगी। बस रखना। ठीक है? चलो गुड नाईट, मतलब गुड मॉर्निंग ही ही ही”
और सुमी ने खिल खिल करते हुए फोन रख दिया।
अब पता नहीं क्या प्लान बना लिया इस लड़की ने अगले हफ्ते का। मेरी तो मीटिंग है अपने संगीत ग्रुप के साथ उस दिन। अब उन्हें कोई बहाना बनाना पड़ेगा। ये बिल्ली तो मानने से रही।
सिया बेटी के प्लान का अनुमान लगाते हुए ट्रिप की तैयारी करने के लिए घर के अंदर आ गई।
वैसे काफी समझदार हो गई है अब तो सुमी। उसे याद आने लगा। कैसे बिफर बिफर जाती थी पहले जरा जरा सी बात पर। कितना हंगामा किया था उसने तब, जब सिया ने इस बिल्डिंग में एक अपार्टमेंट लेकर यहाँ शिफ्ट होने की बात की थी। एकदम से फैल गई थी बच्चों की तरह।
ये क्या नया शौक चर्राया है आपको मॉम? क्या तकलीफ है आपको यहाँ ? इतना बड़ा घर नहीं संभलता तो ठीक है ना। अपना कमरा तक संभाल लो बस। मत किया करो कोई काम। कोई कहता हैं क्या ? या हमारे साथ रहने में समस्या है आपको? बोलो।
“अरे समस्या कोई नहीं सुमी, पर तू ही सोच न। वहाँ उस अपार्टमेंट में सारी सुविधाएं हैं। मेरी अपनी उम्र के लोग हैं। सबकी एक सी जरूरतें, एक जैसी सोच। वहां ज्यादा आराम से रहूंगी न।”
“हाँ हाँ। उस वृद्धाश्रम में तो आपको आराम आना ही है। वहाँ तो आप अपनी बेटी के यहाँ से ज्यादा खुश रहोगी। वाह क्या बात है।”
सुमी ने ताना सा मारा। उसका चेहरा लाल हो गया था। लगा कि बस अब रोई कि तब रोई।
“अरे नहीं बेटा ! कहाँ से कहाँ ले जा रही है बात। तुझ जैसी प्रेक्टिकल बच्ची से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी। देख हर उम्र और अवस्था की अपनी जरूरतें होती हैं। अलग सुविधाएँ चाहिए होती हैं। अब तू देख। जब हम पढ़ते हैं कॉलेज में तो हमें क्या चाहिए होता है? बस एक हॉस्टल का कमरा! बस सोने भर को। तब हमारी जिन्दगी में सबसे महत्वपूर्ण होता है पढ़ना, घूमना, दोस्तों के साथ समय बिताना। फिर एक उम्र आती है जब हम अपने एक साथी के साथ एक छोटा सा घर चाहते हैं। फिर बच्चे आते हैं जीवन में तो जरुरत एक बड़े घर की होती है। जहाँ खेलने की जगह हो, पास में स्कूल हो, पार्क हो। हमारा सामाजिक परिवेश बदलता है। है कि नहीं? हमने भी ऐसा ही किया न? बोल अब। क्या गलत कह रही हूँ मैं? “
सिया ने सुमी को शांत करने की कोशिश की।
“फिर बच्चे बड़े होते हैं, अपनी अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ते हैं। अपना ठिकाना, बसेरा बनाते हैं तो फिर माँ बाप भी दूसरी अवस्था में प्रवेश करते हैं। उनकी भी जिन्दगी बदलती है, जरूरतें बदलती हैं। उन्हें अब अलग तरह की सुविधाओं की जरुरत पड़ती है। मैं और तेरे पापा वैसे भी तो कुछ समय के बाद एक छोटे से सुविधा संपन्न अपार्टमेंट में रहने जाने का सोचा ही करते थे न”
हाँ तो ठीक है न। मैं दूँगी न आपको जो सुविधा चाहिए।”
सुमी फिर खीज कर बोली।
“ओफ्फो तू यह तो देख नहीं रही कि उस जगह पर कितनी सुविधाएँ हैं। डॉक्टर की, काम की, मनोरंजन की सब तरह की सुविधा कैम्पस में ही है। अपनी ही उम्र के लोगों के बीच रहूँगी तो मन भी लगेगा न मेरा। उन लोगों ने एक पार्ट टाइम जॉब भी दे दिया है मुझे वहीँ। एक बुक क्लब चलाने का। मेरी रूचि का काम है, पैसे मिलेंगे वो अलग। अब तेरे घर में रहूँगी तो तुम दोनों अपने काम पर जाओगे या मेरी निगरानी करोगे। मुझे कहीं आना जाना हो, कुछ करना हो तो बैठी रहूँ तुम लोगों के इंतज़ार में। कभी मुझे किसी अपने मेहमान को बुलाना हो तो? मेरी कोई प्राइवेसी नहीं है?”
सिया ने आखिरी दाँव फेका। इस ‘प्राइवेसी’ शब्द पर आज की पीढ़ी बहुत भरोसा करती है। अब शायद सुमी मान जाये।
सिया को समझ में नहीं आता था कैसे सुमी को समझाए। चार साल पहले पति रोहित के जाने के बाद उसे अब इस घर में रहने में ही जाने क्यों उलझन होती है। सुमी के घर जाकर रहना तो फिर दूर की बात।
पहले तो वह बहाने बहाने से सुमी के घर आ धमकती थी। उस तीन कमरे के घर में सुमी अपने साथी के साथ रहने लगी थी। अच्छी नौकरी थी दोनों की तो अपने माँ बाप के घर से कुछ ही दूर दोनों ने यह घर ले लिया था। जहाँ सिया गाहे बगाहे हक़ से पहुँच जाती थी। कभी कोई व्यंजन बनाकर ले जाती और रात को वहीं रुक जाती। कभी सुमी की छींक फोन पर सुनकर, कहती अरे तेरी तबियत ठीक नहीं ? मैं आती हूँ और अपने दो जोड़ी कपड़े और टूथब्रश लेकर उसके पास भाग आती। सुमी का साथी हँसता, खूब चिढ़ाता उसे। मम्मी का मन पापा के साथ नहीं लगता, बहाने ढूँढती रहती हैं यहाँ आने के।
सिया भी हँस देती।
“हाँ तो? मेरी बेटी का घर है। ज्यादा बोला ना तो यहीं आकर बस जाऊँगी। “
और सिया झट से सुमी के लिए सूप बनाने के लिए उसकी रसोई में घुस जाती।
सुमी का बचपन सिया के सामने चलचित्र सा घूमने लगा। इतनी हाइपर एक्टिव बच्ची थी सुमी, जाने कहाँ से अचानक टपक जाती, जाने कैसे उसका मन भाँप जाती। जरा सिया का मन उदास सा हुआ नहीं कि आकर उससे चिपक जाती। पता नहीं कैसे उसके मन के हर भाव का भान हो जाता था उसे। बड़ी हुई तो अचानक ही किसी दिन घर आते समय सिया के लिए फूल ले आती, या सिया की पसंद का केक। पता नहीं कैसे इस लड़की को उसके मूड का पता चल जाता था। उसकी इसी खासियत के चलते सिया ने लाड़ से उसका नाम बिल्ली रख दिया था। पहले पहले तो सुमी अपने इस नाम से चिढ़ती थी, बाद में उसे इसमें मजा आने लगा। उसने खुद ही सिया के फोन में अपना नाम बिल्ली फीड किया था।
अब ना जाने क्या नया तोता पाल लिया शनिवार के लिए इसने। यूँ सिया को उसके घर जाने में या उसके दोस्तों की पार्टी में शामिल होने से कोई गुरेज़ नहीं है। बल्कि उसके सभी दोस्तों के साथ खूब हिलमिल जाती है वह। पर फिर भी कभी कभी उसे लगता है कि सुमी जबरदस्ती उसे अपने आयोजनों में शामिल करती है। शायद उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास होता है या फिर मम्मी के उसके साथ न रहने का गिल्ट। बचपन में जब सिया बात बात पर उसे छेड़ने के लिए कहती कि
“अभी तो चिपकी रहती है, बड़ी होगी तो पास नहीं फटकने देगी” तो तुरंत सुमी बोलती “क्यों बड़े होकर क्या पर उग आते हैं? जहाँ मैं रहूंगी वहाँ आप रहोगी मेरे साथ। उसकी इस बात पर रोहित उसे चिढ़ाते “अच्छा ! बिल्ली अपने बिल्ले के साथ चली जायेगी एक दिन तो क्या मम्मी को दहेज में ले जाएगी “
“दहेज इललीगल है समझे! दहेज में कुछ नहीं जायेगा। मम्मी बस मम्मी की तरह मेरे साथ रहेगी। पीरियड!
तुरंत तुनककर सुमी बोलती।
फिर बीच में माहौल संभालने के लिए सिया को ही आना पड़ता
“हाँ। और क्या। मैं तो इसी के साथ रहूँगी । कोई कुछ भी कहे, कुछ भी करे। ” पर मन ही मन सिया सोचती कि वो दिन कभी न आए जब उसे अपनी बेटी या किसी के भी साथ रहने को मजबूर होना पड़े।
और वाकई जब सुमी ने अपना घर लिया तो अपनी जरूरत से अधिक तीन कमरों का लिया। उसमें एक कमरा अकथित रूप से मम्मी का था। हालांकि सिया का उसके साथ शिफ्ट होना उस समय असंभव ही था। परंतु अचानक हुई रोहित की मृत्यु के बाद सुमी उसे अपने साथ शिफ्ट होने के लिए पीछे पड़ी रहती थी। जाने कैसे कैसे ऊट पटांग बहाने बनाकर सिया उसे चार साल तक टालती रही थी।
कभी कहती “अरे तेरे कबूतर खाने में नहीं रहा जाएगा मुझसे। बड़े घर की आदत है ना”
कभी कहती अच्छा अगले साल आ जाऊँगी , थोड़ा सामान तो संभालने दे यहाँ का” सुमी को उसके बहाने समझ में आते थे पर फिर वह थोड़े- आड़े तिरछे मुँह बनाकर मान जाती थी। उसे लगता था कि एक दिन तो मम्मी को वह अपने पास ले ही आयेगी। कभी तो सिया के बहाने खत्म होंगे। आखिर वह भी सिया की ही बेटी थी।वह अपनी माँ को पहचानती थी।
सिया का स्वाभिमान अहम की सीमा को बस छूता सा ही था। वह हमेशा स्वाभिमान की सबसे ऊँची सीढ़ी पर होती और जरा सा भी किसी पर आश्रित होना या किसी का उसके कामों में दखल देना उसे झट उछाल कर अहम् की पहली सीढ़ी पर चढ़ाने के लिए तैयार हो जाता। वह हमेशा से अपने बूते पर जी थी और अपनी जिंदगी में किसी की भी दखलंदाजी उसे तानाशाही लगा करती। बेशक वह देखभाल या परवाह के नाम से की जाए या प्रेम के नाम पर। सिया से बर्दाश्त नहीं होता। रोहित से भी जब तब उसकी इसी बात पर ठन जाती थी। तब यही सुमी इसी “प्राइवेसी” और स्पेस का तर्क देकर रोहित को समझाती थी। सिया हमेशा से अपने जीवन की मालकिन स्वयं रही है। अब रोहित के जाने बाद क्या उसका जीवन भी ख़त्म हो गया? उसकी तो अभी जिन्दगी बाकी है। वह क्यों किसी के भी आश्रय में रहे। बेशक सुमी उसकी बेटी है और बहुत प्यार करती है उससे। परन्तु उसकी भी तो अपनी जिन्दगी है। वह क्यों उसपर बोझ बने और अपनी जीवनशैली भी बदले।
सिया को समझ में नहीं आता था कि ये ‘ओल्ड एज होम’ या ‘वृद्धाश्रम’ नाम की जगहों का समाज ने इतना बवंडर क्यों मचाया हुआ है। उस दिन सुमी भी बस इसी नाम पर हाय तौबा मचाये थी। ऐसे कह रही थी जैसे मैं किसी मिट्टी की झोपड़ी में रहने जा रही हूँ। ‘सीनियर सिटीजन होम’ कहती तो शायद ज्यादा समझ आता उसे। “वृद्धाश्रम” तो लोग ऐसे इस्तेमाल करते जैसे जहन्नुम हो। या फिर वहाँ रहना कोई महा पाप हो। सिया को तो वहां रहते लोग भी इतने ही प्रसन्न और जीवन से भरपूर लगते हैं जितने कि इनसे बाहर रहने वाले। बल्कि कभी कभी तो ये लोग अपने जीवन से ज्यादा सुखी और संतुष्ट नजर आते हैं। यह तो सच है कि एक उम्र के बाद जीवन को अधिक और अलग तरह की सुविधाएँ चाहिए होती हैं, अलग देखभाल की जरुरत होती है जिसे इस तरह के संस्थान बेहतर तरीके से पूरा करते हैं तो फिर क्या गुरेज़ होनी चाहिए ऐसे स्थानों में रहने से , अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने में। बाकी रही अपनों की बात ! तो वे तो अपने रहेंगे ही न। मिलते जुलते रहेंगे, जरुरत पर साथ भी रह सकते हैं। वैसे ही जैसे अब मिला करते हैं। यही सब बार बार समझाकर आखिरकार सिया ने सुमी को मना ही लिया था और इस सुविधासंपन्न सीनियर सिटिजन अपार्टमेंट काम्प्लेक्स में एक अपार्टमेंट ले लिया था। सुमी ने भी जब यहाँ की व्यवस्था आदि देखी तो “चलो ठीक है, आप ऐसे खुश हो तो यही सही” कह कर अपनी सहमति दे दी थी।
“और क्या फिर कल तेरे बच्चे होंगे, तेरे घर पर रहूँगी तो वो नानी के घर कैसे आयेंगे जायेंगे ?” सिया ने इतरा कर कहा और अपने ही बचपने वाले तर्क पर हँस दी।
दरवाजे की घंटी बजी तो सिया ख्यालों से वर्तमान में लौटी। दरवाजा खोला तो वहाँ उन्हें गाँव की सैर पर ले जाने वाला वैन का ड्राइवर मुस्कुराकर कह रहा था
“तैयार मैम ? हम चलने के लिए तैयार हैं”
 “बस दो मिनट में आई” सिया ने भी मुस्कुरा कर कहा और आकर फटाफट अपने बैग में सामान रखने लगी।
वैन कैम्पस के गेट के पास ही खड़ी थी। सब लोग उसमें अपनी अपनी सीटों पर जम गए थे। ड्राइवर ने सबसे सीट बेल्ट लगाने की गुजारिश की और वैन चल पड़ी। दो घंटे की यात्रा के बाद हँसते, बतियाते स्त्री पुरुषों की यह टोली अपने गंतव्य पर पहुँच गई। एक पार्क में एक अच्छा सा कोना तलाश कर सबने अपना अपना पिकनिक ब्लेंकेट बिछाया और अपने अपने पिटारे खोलने लगे। नीता आंटी ने अपने डिब्बे से थेपले निकालकर रखे, रिया ने सब्जियों वाले सैंडविच। जॉर्ज बढ़िया सलाद लेकर आया था और मार्था मीठी पाई। सिया ने भी अपनी बनाई हुई खस्ता कचौड़ियाँ निकाल कर रख दीं। तभी मरिया ने वाइन की बोतल भी निकाल ली और सब जोर से चियर्स चिल्लाए।
सिया गर्व से उन हँसते, खिलखिलाते, जीवन से भरे लोगों को निहार रही थी। जिन्होंने किसी मजबूरी वश या हताशा से नहीं, बल्कि अपना जीवन गरिमा और ख़ुशी से जीने के लिए यह विकल्प चुना था। उन्होंने आश्रय नहीं, अपने लिए घर चुना था।

 

 

 

शिखा वार्ष्णेय
शिखा वार्ष्णेय
नई दिल्‍ली में जन्‍मी शिखा वार्ष्णेय मोस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से टीवी जर्नलिज्म में परास्नातक। अब वे लंदन में स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कार्य में सक्रिय हैं। देश के लगभग सभी मुख्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। 'संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय, अमरावती' के बी.कॉम. प्रथम वर्ष, हिन्दी (अनिवार्य) पाठ्यक्रम के अंतर्गत विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकृत टेक्स्ट बुक में कविता शामिल. ‘लन्दन डायरी’ नाम से दैनिक जागरण (राष्ट्रीय) में और लन्दन नामा नाम से नवभारत में नियमित कॉलम लिखती रहीं हैं। एक काव्‍य संग्रह ‘मन के प्रतिबिम्ब’ और एक पुस्तक "देशी चश्मे से लन्दन डायरी" भी प्रकाशित। संपर्क - shikha.v20@gmail.com
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1 टिप्पणी

  1. बुढ़ापे का एक दिन
    होता नहीं हर दिन
    और रोज़ रोज़
    वही दिन
    नहीं मुमकिन!

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