‘‘अरे जूही, जल्दी करो. तुम्हारे साथ यही समस्या है, आख़िरी तक कुछ न कुछ पैक करती रहती हो. अभी घर से नहीं निकले तो एयरपोर्ट पहुंचने में देर हो जाएगी,’’ माही की झुंझलाई और अपनत्व भरी पुकार सुनकर जूही ने जल्दी से बैग की ज़िप बंद की और धड़धड़ाती हुई सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी.
‘‘अरे संभल के…पहले देर करती हो, फिर इतनी जल्दी कि हर वक़्त डर ही लगा रहता है. पूरी अफ़लातून हो तुम,’’  माही ने फिर झिड़की दी.
‘‘अरे दीदी क्या करूं? कितनी कोशिश करती हूं कि सब जल्दी जल्दी कर लूं, लेकिन कुछ न कुछ छूट ही जाता है,’’ जूही ने हमेशा की तरह कहा.
‘‘हर ड्रेस से जुड़े मैचिंग शूज़ और एक्सेसरीज़ की पैकिंग बिल्कुल नहीं भूल सकतीं तुम, भले ही फ़्लाइट मिस हो जाए. और फिर कहती हो सब जल्दी करने की कोशिश करती हूं…’’
‘‘अरे तो साल भर के बाद वापस जा रही हूं. मां-पापा से मिलूंगी, दोस्तों से मिलूंगी. उन्हें ये कहने का मौक़ा तो नहीं मिलना चाहिए ना कि मेरी स्मार्टनेस में कमी आ गई है,’’ फूल-सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए जूही ने कहा.
‘‘हां, हां…जैसे सब तुम्हारी स्मार्टनेस का जायज़ा लेने ही बैठे हैं वहां. इन सब मामलों में तो तुमसे बात करना ही बेकार है. अब चलो भी. बाहर तुम्हारे जीजाजी हमारा इंतज़ार कर रहे हैं.’’
साल भर बाद मां-पापा के पास अपने देश भारत लौटती जूही को उसकी बहन माही और जीजाजी ललित ने एयरपोर्ट तक पहुंचाया. अंदर जाने से पहले माही ने जूही को गले लगाया और माथे पर एक चुंबन देकर हिदायत दी कि पहुंचते ही सबसे पहले उसे फ़ोन करे.
‘‘मुझे तुम्हारी बहुत याद आएगी दीदी,’’ जूही बोली.
‘‘मुझे भी तुम्हारे बिना यहां बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा जूही, पर दो ही महीनों की तो बात है. फिर मां-पापा से मिलकर तो तुम मुझे याद भी नहीं करोगी.’’
‘‘हां, माही को तो तुम्हारी बहुत याद आएगी ही जूही, पर मुझे भी बहुत आएगी. इसकी डांट सुननेवाले दो ही तो लोग हैं एक मैं और एक तुम. और दो महीने तक सिर्फ़ मैं ही डांट खाऊंगा इसकी, तो मैं भी तुम्हें बहुत बहुत याद करूंगा ना जूही. सोचूंगा जूही होती तो मुझे माही का आधा ग़ुस्सा ही झेलना पड़ता,’’ ललित ने मुस्कुराते हुए कहा.
‘‘जीजाजी, आप यूं ही मेरी दीदी को छेड़ते रहते हैं. उसकी डांट के हम मज़े नहीं लेते क्या?’’
‘‘अरे अब जा भी जूही, नहीं तो सचमुच फ़्लाइट मिस हो जाएगी. इनकी ख़बर तो मैं ले ही लूंगी,’’ मुस्कुराते हुए माही ने कहा.
फ़्लाइट में बजाय टीवी देखने के जूही को किताब पढ़ना पसंद है. नॉवेल निकालने के लिए उसने अपना पूरा बैग छान मारा…जब वो नहीं मिला तो याद आया कि घर से निकलते समय उसने नॉवेल बिस्तर पर रख दिया था और सोचा था कि जाते-जाते रख लेगी. पर दीदी की झिड़की सुनकर वो इतनी जल्दी में भागी कि नॉवेल रखना ही भूल गई. दीदी की डांट कितनी अनोखी होती है. ग़ुस्सा भी दिलाती है और उसके प्रति स्नेह से भी भर देती है कि उसे कितनी चिंता है मेरी. यात्रा के दौरान करने को कुछ ख़ास था नहीं तो बस विचारों का समंदर हिलोरें लेने लगा.
दीदी-जीजाजी और मां-पापा सभी तो कितना प्यार करते हैं उसे. उनके स्नेह की वजह से ही तो वो इतना आगे बढ़ पाई है. पिछले तीन सालों से यूएसए में है. इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग करने के बाद जल्द ही एक एमएनसी में उसकी नौकरी लग गई और वहां के एक प्रोजेक्ट पर जब उसे यूएसए जाने का प्रस्ताव मिला तो उसने तुरंत मान लिया. मानती भी क्यों नहीं? उसकी माही दीदी और जीजाजी भी तो वहीं थे.
मां-पापा को जब उसने ये बताया तो वे बड़े ख़ुश हो गए और तुरंत ही उसे जाने की हामी दे दी. हालांकि उसके जाने के बाद वे दोनों और भी अकेले रह गए. माही और जूही वो दोनों ही तो मां-पापा का जीवन थे. माही भी अपनी शादी से पहले यूएसए में ही काम करती थी और वहीं उसने ललित को अपने जीवनसाथी के रूप में पसंद किया. जैसे ही मां-पापा को इस बारे में पता चला, उनकी शादी करवाने में ज़रा भी देर नहीं की उन्होंने. और तो और मां ने जूही से भी कहा था,‘जूही, बच्चे तुझे भी अपने लिए कोई लड़का पसंद आए तो नि:संकोच बता देना. अपने मनपसंद साथी के साथ तुम दोनों जीवन बिताओ, इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात क्या होगी हमारे लिए?’ ये बात याद आते ही मुस्कान तैर आई उसके चेहरे पर.
कभी-कभी वह सोचती है कि यदि मां-पापा उसे न लाए होते उस अनाथालय से तो न जाने आज वो कहां होती? न जाने पढ़ भी पाती या नहीं. पापा से जब वो ये बात कहती है तो पापा हमेशा यही जवाब देते हैं,‘बेटा, जो भी होता है ईश्वर की मर्ज़ी से ही होता है. उसने तुम्हारी किस्मत ऐसी ही लिखी थी, हम न बनते तो कोई और ज़रिया बनता तुम्हारी तरक्की का.’ मन में किसी तरह का कोई बोझ रखने ही नहीं देते वो जूही को.
फिर जूही को वो समय याद आने लगा, जब वो सात बरस की थी और अनाथालय में रहा करती थी. उसे नहीं पता था कि उसके माता-पिता कौन हैं? अचानक ही एक दिन अनाथालय की केयरटेकर ने उसे बताया कि उसे लेने उसके माता-पिता आ रहे हैं. कितना बुरा लगा था उसे. इतने दिन यहां छोड़ने के बाद अब क्यों आ रहे हैं लेने? मैं तो उनसे बात भी नहीं करूंगी. मेरे मां-पापा कितने गंदे हैं. जब उसने देखा कि उनके साथ एक और लड़की खड़ी है, जो उन्हें मां-पापा कहकर बुला रही है तो और भी ग़ुस्सा आ गया था उसे. तो मेरी एक और बहन है…उसे तो घर पर रखा इन लोगों ने और मुझे यहां छोड़ दिया. मां-पापा ने जब उसे अपने पास बुलाया तो उनके पास तो गई, पर दूसरी तरफ़ मुंह करके खड़ी हो गई थी वो.
‘‘क्या हमसे बात नहीं करोगी?’’ पापा ने पूछा.
‘‘आप मेरे मम्मी-पापा हैं क्या?’’
‘‘हां बेटा, मैं तुम्हारी मां हूं, ये तुम्हारे पापा और ये तुम्हारी दीदी है, माही.’’ मां ने बड़े अपनत्व से कहा.
‘‘तो दीदी को इतने दिनों तक अपने पास रखा और मुझे यहां क्यों?’’
‘‘बहुत बड़ी ग़लती हो गई हमसे. घर चलोगी तो बताएंगे,’’ पापा का जवाब आया.
‘‘मैं नहीं जाऊंगी.’’
‘‘अच्छा तुम्हारा नाम आशा है ना?’’ मां ने बात आगे बढ़ाई.
‘‘ये अच्छा नाम नहीं है मां. इसका नाम जूही रखो. जूही, घर चल ना. हम दोनों मेरी गुड़िया से खेलेंगे और मां ने तेरे लिए पेस्ट्री भी मंगवाई है. चल ना…’’ माही दीदी बीच में ही बोल पड़ी.
‘‘पेस्ट्री क्या होती है?’’
‘‘केक के छोटे-छोटे टुकड़े,’’ मां ने समझाया.
मुझे तो सालभर में एक या दो ही बार केक मिलता था. नाम सुनकर ही मुंह में पानी आ गया था. और मैं ग़ुस्सा-वुस्सा भूलकर तुरंत उनके साथ जाने तैयार हो गई. केक मिलेगा और गुड़िया से खेलने भी. एक बच्चे को और क्या चाहिए?
उनके घर पहुंचकर कुछ अटपटा-सा तो लगा था, लेकिन माही उसके साथ ख़ूब खेलती थी और बहुत ख़्याल रखती थी. मां-पापा भी माही और जूही का एक-सा ख़्याल रखते थे. जब वो उनके घर पहुंची तो माही की गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं. मां-पापा जूही को भी पढ़ाना चाहते थे. अत: उस दौरान जूही को पढ़ाने घर पर एक ट्यूटर आया करते थे. उसे बहुत बुरा लगता था पढ़ना. वो रोज़ मां से शिकायत करती थी,‘‘आप मुझे अनाथालय से लाई हैं इसलिए रोज़ पढ़वाती हैं, जबकि दीदी उस समय में भी खेलती रहती है.’’
नतीजा ये हुआ कि मां ने ट्यूटर से कहा कि जब वो पढ़ रही हो तब वे माही को भी आगे की क्लास की तैयारी करवाना शुरू कर दें. जब वो भी पढ़ने बैठने लगी तो मैं शिकायत किस बात की करती? फिर मेरा दाख़िला भी स्कूल में हो गया. मैं और दीदी एक-दूसरे को प्यार भी बहुत करते तो हमारे बीच झगड़ा भी होता था. मां-पापा हमारे झगड़े को सुलझाते और ज़रूतर पड़ने पर हम दोनों को एक-सी सज़ा भी देते. इस बीच मैं ये भूल ही गई कि मैं अनाथालय से आई हूं. मुझे लगता था कि ग़लती से मां-पापा ने कुछ दिनों के लिए अनाथालय छोड़ दिया था, पर अब मैं अपने घर आ गई हूं.
 जब मैं सातवीं कक्षा में आई तब तक माही दीदी ग्यारहवीं में पहुंच गई थी. न जाने कैसे मेरे क्लास की एक लडक़ी को ये बात पता चल गई कि मां-पापा मुझे अनाथालय से लाए हैं. शायद वो मां की किसी सहेली की बेटी थी. उसने मुझसे पूछ लिया,‘‘तू तो उनकी बेटी ही नहीं है, जिनके घर में रहती है. कहीं तेरे घर में तेरी पिटाई तो नहीं होती?’’
इतना ग़ुस्सा आया मुझे कि मैंने उसे अच्छी तरह धुन दिया. इतना कि बात प्रिंसिपल तक जा पहुंची. प्रिंसिपल ने मां-पापा को बुलाया और कहा,‘‘आपकी दोनों बेटियां पढ़ाई और व्यवहार में इतनी अच्छी हैं कि उनसे ये उम्मीद नहीं की जा सकती. ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए हम सिर्फ़ चेतावनी दे रहे हैं.’’
मां-पापा बहुत दुखी हो गए थे उस दिन. शाम को मां-पापा, माही दीदी तीनों मेरे पास बैठे और मुझसे पूछा कि मैंने ऐसा क्यों किया? मैंने रोते-रोते सारी बात बता दी. फिर मैंने मां की ओर देखकर पूछा,‘‘क्या सचमुच आप मेरे माता-पिता नहीं हैं?’’
‘‘अब तुम बड़ी हो गई हो जूही. और हम नहीं चाहते कि सच्चाई से अनजान रहो,’’ मां ने बड़े प्यार से मुझे दुलारते हुए कहा.
‘‘ये सच है मेरे बच्चे कि तुम हमारी अपनी बेटी नहीं हो, पर ये ख़ुद अपने दिल से पूछो कि क्या हमने कभी माही में और तुममें कोई भेद किया है?’’ पापा ने पूछा.
‘‘जब मैं आपकी अपनी बच्ची नहीं हूं तो अनाथालय से मुझे यहां लाने की कोई तो वजह होगी ना?’’ मैंने तल्ख़ स्वर में पूछा.
‘‘उसकी वजह है माही. माही हमारी अकेली संतान थी और वो अपने साथ खेलने के लिए एक बहन ही चाहती थी,’’ यह कहते हुए मां बोलीं,‘‘यदि हम अपना ख़ुद का दूसरा बच्चा इस दुनिया में लाने की सोचते तो इस बात की कोई गैरंटी कहां थी कि वो तुम जैसी चांद-सी गुड़िया ही होती.’’
‘‘…और हमने तो सोचा था कि हमारी एक ही संतान होगी. इस बीच माही १०-११ साल की हो चली थी और एक बहन पाने की उसकी ज़िद इतनी बढ़ गई थी कि हमने सोचा क्यों न उसे एक बहन ही ला दी जाए,’’ अब बात की डोर पापा ने संभाल ली थी. वे आगे बोले,‘‘मुझे और तुम्हारी मां को एक बच्ची गोद लेने का विचार आया और हमने ये बात माही से बांटी. हमने उसे तैयार किया कि हम इसी शर्त पर उसके लिए बहन लाएंगे कि वो उसके साथ अपने सारे खिलौने शेयर करेगी और उससे लड़ाई नहीं करेगी. माही के मन में बहन पाने की लालसा इतनी तीव्र थी कि उसने हमारी बात तुरंत मान ली और हम तुम्हें इस घर में ले आए.’’
पापा की बात ख़त्म होते-होते तो रुलाई के मारे मेरी हिचकियां बंधने लगीं. मां मेरे सिर पर हाथ फेरती रहीं और पापा चुपचाप वहीं खड़े रहे.
‘‘जूही तू ऐसे क्यों रो रही है? क्या ये बातें जानने से तुझे ऐसा लग रहा है कि ये तेरा घर नहीं है? मैं तेरी बहन नहीं हूं? मां-पापा तेरे नहीं हैं? आज तूने उस लड़की को मारा था ना? कल मैं भी उसे मारूंगी…उसने मेरी बहन को इतना रुलाया. मैं छोड़नेवाली नहीं हूं उसे…’’ माही दीदी अपने आवेश को क़ाबू में नहीं रख सकी.
‘‘नहीं माही, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी. उसने ग़लत काम किया तो तुम भी ग़लत करो, मैं इसकी इजाज़त नहीं दूंगा,’’ पापा की सख़्त आवाज़ आई,‘‘और रहा सवाल जूही का तो मुझे और तुम्हारी मां को पूरा भरोसा है अपनी परवरिश पर. वो जल्द ही संभल जाएगी.’’
‘‘लेकिन पापा, मैं आपसे ज़िद करना नहीं छोड़नेवाली. आप ही मेरे पापा हैं, बस. मुझे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप मुझे कहां से लाए हैं. मुझे बस इतना पता है कि आप मेरे पापा हैं और मम्मा मेरी मां हैं. माही दीदी मेरी दीदी है.’’ मैंने रोते-रोते कहा.
‘‘जब तुम हमें इतना प्यार करती हो जूही तो आज अपनी मां से प्रॉमिस करो कि आगे कोई तुम्हें इस बारे में कुछ भी कहे तो तुम उनकी बातों को दिल से नहीं लगाओगी,’’ यह वादा लेते हुए मां ने कहा,‘‘दुनिया चाहे जो कहती रहे मेरे बच्चे सच्चाई तो ये ही है कि माही और तुम ही हमारी ज़िदगी हो.’’
उस दिन के बाद जब भी इस बारे में सोचती मां-पापा और दीदी उसे और प्यारे लगने लगते. ये सारी बातें सोचते-सोचते आंखें लग गईं जूही की. और वो जागी तो इस उद्घोषणा से कि पांच मिनट बाद ही उनका विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड करनेवाला है. मां-पापा से मिलने को उत्साहित हो उठी जूही. पापा उसे एयरपोर्ट पर अकेले ही लेने आए थे. पापा से लिपटते हुए उसने पूछा,‘‘मां नहीं आईं पापा?’’
‘‘उसकी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है जूही.’’
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘हल्का बुख़ार है और बाक़ी उमर के साथ होनेवाली समस्या-जोड़ों में दर्द वगैरह.’’
‘‘अरे आपने तो बताया ही नहीं?’’
‘‘तुम लोग दूर रहते हो बेटा. ये सब बताएं तो तुम्हारा मन ही नहीं लगेगा वहां. फिर बुख़ार ही तो है उसे.’’
इसी बीच माही पापा के मोबाइल पर माही का फ़ोन आ गया.
‘‘जूही ठीक से पहुंच गई न पापा?’’
‘‘हां बेटा, अभी हम रास्ते में ही हैं. तुम्हें रात को इत्मीनान से फ़ोन करेंगे.’’
घर पहुंचकर जूही ने मां से उनका हालचाल पूछा और बोली,‘‘अभी मैं आप लोगों के लिए चाय बनाती हूं.’’ किचन में पहुंचते ही गंदे बर्तनों का अंबार देखकर उसने पूछा,‘‘अरे मां, रजनी नहीं आई क्या आज?’’
‘‘अरे दो दिन की छुट्टी लेकर गई थी जूही. देख ना, आज तीसरा दिन है और अब तक नहीं आई. तू बर्तन मत कर बेटा. सिर्फ़ चाय बना ले. तेरे पापा ने पोहा बना लिया है नाश्ते के लिए,’’ मां ने जवाब दिया.
‘‘अरे पापा, आप कब से नाश्ता बनाने लगे?’’ किचन में आते पापा से उसने पूछा.
‘‘तेरी मां बीमार है और रजनी आ नहीं रही. अगर नहीं बनाऊंगा तो हम खाएंगे क्या?’’ पापा मुस्कुराते हुए बोले,‘‘और अब रिटायरमेंट के बाद खाना बनाना सीखने में अच्छा टाइम-पास हो जाता है.’’
मन भर आया जूही का. दोनों अकेले हैं और बीमार पड़ जाएं तो कोई देखभाल करनेवाला भी नहीं. चाय और नाश्ता लेकर जूही ने डायनिंग टेबल पर रखा. ‘‘मां आपके लिए वहीं ले आऊं क्या बिस्तर पर?’’
‘‘ना बेटा, मैं तुम लोगों के साथ ही खाऊंगी. आ रही हूं.’’
‘‘पापा, नाश्ता लगा दिया…’’ पापा का कोई जवाब न पाकर जूही ने पूछा,‘‘मां, पापा कहां चले गए?’’
‘‘वो माली भी नहीं आ रहा है ना तो छत पर गए हैं. पौधों में पानी देने. बाहर निकलकर आवाज़ दे तभी सुनाई देगी उन्हें.’’
बाहर निकल आई जूही. बाहर न्यूज़पेपर पड़ा था. उसे उठाया और पापा को पुकारा,‘‘पापा, जल्दी आ जाइए. नाश्ता लग गया और मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है.’’
पापा के आने तक वो उन तीनों के लिए नाश्ता परोस चुकी थी. वे तीनों बातें भी करते जा रहे थे. जूही बता रही थी कि माही दीदी और जीजाजी उसका कितना ख़्याल रखते हैं और ये भी कि दोनों का प्रोजेक्ट तीन-तीन साल का है इसलिए वे बीच में छुट्टी लेकर तो आ सकते हैं, पर उनका भारत लौटना तीन साल बाद ही संभव होगा. बातें करते-करते वो न्यूज़पेपर भी उलट-पलट रही थी. अचानक उसकी नज़र उस ख़बर पर गई, जिसमें एक पुराने नौकर ने पैसों के लालच में अपने वृद्ध मालिक दंपति की हत्या कर दी थी. उनके दोनों बच्चे विदेश में काम करते थे और उस दंपति की मौत के तीन दिन बाद यह पता चल पाया कि उनकी मौत हो चुकी है.
हे भगवान! जूही ने सोचा. वो अपने माता-पिता के लिए बहुत घबरा उठी. ये इस ख़बर का असर था या मां की ख़राब तबियत या फिर पापा का खाना पकाने या पौधों में पानी देने का काम…या शायद इन सब का मिलाजुला परिणाम. जूही ने मन ही मन कुछ तय कर लिया. दीदी तो तीन साल तक यहां नहीं लौट सकती, पर मैं तो अपनी कंपनी से कहकर वापस भारत आ सकती हूं. एक समय था, जब मुझे माता-पिता के स्नेह और सहारे की ज़रूरत थी. तब उन्होंने मुझ पर प्यार न्योछावर किया. और आज उन्हें मेरे स्नेह और साथ की ज़रूरत है तो मैं पीछे नहीं हट सकती.
‘‘मां आपको मेरी शादी की चिंता नहीं है क्या?’’ शाम को सब्ज़ी साफ़ करती मां से उसने अचानक पूछा.
‘‘अरे ये अचानक तेरी शादी की बात कहां से आई और चिंता क्यों नहीं है भला? कहा तो है तुझसे कि तू अपना मनपसंद साथी ढूंढ़ ले.’’
‘‘मां, मुझे तो कोई पसंद ही नहीं आ रहा. अब तुम एक काम करो कि पेपर में ऐड निकलवाओ और मेरी शादी के प्रयास शुरू कर दो.’’
‘‘ठीक है.’’
‘‘और मां मैंने तय कर लिया है जब तक मेरी शादी नहीं कराओगी, मैं यहीं डटी रहूंगी. आप दोनों के पास और भारत में ही. अभी थोड़ी देर पहले मैंने भारत में पोस्टिंग पाने के लिए मेल भी लिख दिया है मैंने अपने ऑफ़िस को. यदि उन्होंने पॉज़िटिव जवाब नहीं दिया तो दूसरी जगह अप्लाइ कर दूंगी, पर अब रहूंगी आप लोगों के पास ही.’’
मां ने कहा कुछ नहीं. बस जूही के सिर पर हाथ फेरा और उसकी ओर अर्थपूर्ण नज़रों से यूं देखा, मानो कह रही हों,‘मैं जानती हूं मेरे बच्चे. शादी का तो सिर्फ़ बहाना है. दरअस्ल, तुम्हें हमारी फ़िक्र है.’
पीछे से अंदर आते हुए पापा ने कहा,‘‘ठीक है जूही कल ही हम मेट्रीमोनी में तुम्हारे लिए एड देते हैं और मेट्रीमोनियल साइट पर भी तुम्हारा प्रोफ़ाइल डाल देते हैं.’’
पापा की बात सुन कर वो मुस्कुरा दी और उनके गले से लग कर बोली,‘‘वाह पापा. यू आर सो क्विक. लव यू.’’
इस पल माता-पिता और बेटी की मुस्कुराहट में छुपा सुकून… बस, वही तो जीवन का सार है!
शिल्पा शर्मा
प्रकाशित कृतियाँ : काव्य-संग्रह- सतरंगी मन (मुंबई के प्रसिद्ध साहित्य, कला व संगीत उत्सव लिट-ओ-फ़ेस्ट में पुरस्कृत पांडुलिपि) और डिजिटल कहानी संग्रह-तुम सी (जगरनॉट बुक्स), ऑडियोबुक्स- चलती रहे ज़िंदगी, स्टोरीटेल; तुम सी, कुकू एफ़एम, संपादन- तीन उपन्यास (जगरनॉट बुक्स), चार ऑडियोबुक्स (स्टोरीटेल), साझा उपन्यास- 30 शेड्स ऑफ बेला, साझा ऑनलाइन कहानी सीरीज़- मूड्स ऑफ़ लॉकडाउन, मातृभारती. संपर्क - shilpaansharmaa@gmail.com

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