इस कहानी की बैकग्राउंड सेटिंग कुछ भी रखी जा सकती थी। कहानी कहीं से भी शुरू हो सकती थी। उस बड़ी-सी गोल इमारत की छोटी-छोटी खिड़कियों से भी। उस गोल इमारत की पहली मंज़िल से दिखते उस वीरान उजाड़ और लगभग सूख चुके उस छोटे तालाब के पास से भी या उस लड़की के मुलायम सुंदर हाथों से भी, जिन्हें इस वक़्त वह लड़का सहला रहा था। उस सहलाने में कितना अपनापन था और कितनी ज़रूरत, पहली नज़र में तो यह यक़ीनन नहीं बताया जा सकता था। उनके आसपास घास कम थी, रोड़े, कंकड़, धूल ज़्यादा। ज़िंदगी में सुख और दुख की सैटिंग का अनुपात भी लगभग यही है।
लड़का लगातार लड़की की आँखों में निहार रहा था। लड़की की आँखें, लड़के को निहारते हुए भी कुछ नहीं निहार रही थीं।
उन दोनों ने बहुत सारे लम्हे ऐसे ही गुज़ार दिए। दूर कहीं से मस्जिद की अज़ान की आवाज़ आई। दोनों ने जैसे किसी अलिखित क़रार पर हस्ताक्षर किए और वहाँ से उठ गए। उस झाड़-झंखाड़ उगी हुई बगिया से आहिस्ता-आहिस्ता बाहर की तरफ़ चलने लगे। जैसा कि इन रास्तों पर और इन जगहों पर आम होता है, वहाँ का नज़ारा भी कुछ ऐसा ही था। कुछ चरसी इधर-उधर पड़े गाँजा फूँक रहे थे। कुछ नई उम्र के लड़के बीयर की बोतल लेकर हाथों में मोबाइल पकड़े पोर्न देखकर अश्लीलता में ख़ुद को टॉप ऑफ़ वर्ल्ड महसूस कर रहे थे। कुछ बेरोज़गार किसी कोने में ताश के पत्ते पीट रहे थे।
उस लड़की का हाथ पकड़े वह लड़का वहाँ से तेज़ी से गुज़र जाना चाहता था। अश्लीलता की गंध दूर तक आती है, इसलिए भी लड़के ने बात बदली होगी। लड़के ने अचानक से अपनी बहादुरी के क़िस्से सुनाने शुरू किए कि कैसे उसने एक बड़े से मॉल में, एक बहुत छोटे चोर को दूर से ही पहचान लिया था, जब उसने चालाकी से एक लड़की के पर्स से मोबाइल पार किया। फिर कैसे उसने सीढ़ियाँ लाँघते हुए, एस्केलेटर को और भी तेज़ी से टापते हुए, उस लड़के को पकड़कर वहाँ के सिक्योरिटी गार्ड्स को दिया।
लड़की ने धीरे से लड़के से कहा, “घर में दादी इंतज़ार कर रही हैं।”
लड़के ने लड़की से पूछा, “मेरे कपड़े ज़्यादा गंदे तो नहीं लग रहे?”
लड़की ने लड़के की तरफ़ देखा और मुस्कुराकर कहा, “यह क्या कम है कि ये फटे नहीं हुए!”
लड़के ने हाँ में सिर हिला दिया।
तभी लड़के को जैसे कुछ याद आया। उसने लड़की से पूछा, “तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगी न?”
लड़की ज़ोर से हँसते हुए बोली, “छोड़ने के लिए पकड़ना पड़ता है जनाब।”
लड़के ने लड़की की हँसी का विरोधाभास पहले सुना, हँसी बाद में। लड़के ने लड़की का हाथ कसकर थामते हुए कहा, “मैं तुम्हें बहुत याद करता हूँ।”
लड़की ने कुछ कहना चाहा, पर कुछ नहीं कहा कि इस बात पर वह अब क्या ही कहती… जब वह जान चुकी थी… हालातों की मार से जब देह के कपड़े फटने शुरू होते हैं और पेट के भीतर अकाल जगह बनाता है तो इंसान के मन से चिपके हुए सबसे कोमल एहसास सबसे पहले झड़ते हैं। सबसे पहले झड़ता है प्रेम और अक्सर उसके बाद झड़नी शुरू होती है संवेदनशीलता… करुणा…।
“तो तुम मुझसे शादी करोगी न” लड़के ने बहुत उम्मीद से पूछा।
लड़की एक पल को अवाक् रह गई। सँभली तो बात की दशा जानबूझकर बिगाड़ती हुई बोली, “यह बोटनी के प्रोफ़ेसर साहब का दिल तुम पर कुछ ज़्यादा ही निसार हुआ जाता है और हमें भी दौड़ाए रखते हैं तुम्हारे साथ अपने फ़िजूल के कामों में। वरना यह सूखी घास पत्ती इकट्ठी करने, यहाँ तुम्हारे साथ आती हमारी जूती” लड़की ने बहुत अदा से लड़के को छेड़ते हुए कहा।
इसी चुहल में आसमान का रंग बदलने लगा। अचानक घनघोर काले बादल छा गए। दृश्य पलटने लगे और समय भी।
—
चार साल बाद
“तुम्हें लगता है यह बचेगी! ख़ून बहुत बह गया है।”
“बचना तो चाहिए पर यार वह लड़का जो इसे यहाँ लाया था, उसके साथ बहुत बुरा हुआ। पुलिस वालों ने उसे ही फँसा दिया है।”
“हाँ सुना है कि यह लड़की अलग धर्म की है और वह लड़का अलग, तो मज़हबी फ़साद में, उस लड़के ने दोस्तों के साथ मिलकर गैंगरेप किया है।”
“अजीब बात है! मैंने उस लड़के की हालत देखी थी। मैं मान ही नहीं सकती कि ऐसा हो सकता है! वह जिस बदहवासी में इस लड़की को लाया था, उसके बस आँसू ही नहीं टपक रहे थे।”
उन दोनों की बात सुनकर तीसरी नर्स ने कहा, “आजकल शक़्ल पर तो किसी की क्या ही जाना! मासूम से मासूम लोग हैवान निकलते हैं।”
“कुछ भी हो पर मेरा मन नहीं मानता कि यह काम उस लड़के का हो सकता है।” पहली नर्स से दृढ़ता से कहा।
चार घंटे पहले
लेडी कॉन्स्टेबल बार-बार उसका गाल थप्पड़ा रही थी।
“अरे बोलो कुछ। कितने लोग थे? क्या हुआ तुम्हारे साथ? कहाँ और कब हुआ?”
लड़की बहुत मुश्किल से आँखें खोल पाती और फिर बेहोश हो जाती। डॉक्टर ने उस महिला कॉन्स्टेबल को कहा, “मैडम अब आप हमें ट्रीटमेंट करने दीजिए प्लीज़। अभी यह किसी तरह का बयान देने की हालत में नहीं है। बहुत ख़ून बह चुका है। पहले लड़की को बचाना ज़रूरी है। आप अपनी तहक़ीक़ात बाद में कीजिएगा।”
लेडी कॉन्स्टेबल ने झल्लाकर डॉक्टर से कहा, “अरे डॉक्टर साहब हमारी भी मजबूरी है। इस तरह के केस में प्रेशर आजकल इतना बढ़ा दिया गया है कि अगर गुनहगार नहीं मिलता तो सरकार हमें ही सस्पेंड करके अपनी जान छुड़ा लेती है। बताइए हम भी क्या करें!”
कहकर लेडी कॉन्स्टेबल बुरा-सा मुँह बनाकर कमरे से बाहर चली गई। हालात और मजबूरियाँ अच्छे-अच्छों की संवेदनशीलता झाड़ देती हैं। वैसे कभी-कभी यह काम लालच भी करता है।
दो दिन बाद
लड़की को होश आया। एक बार फिर से पूछताछ शुरू की गई।
इस बार लेडी कॉन्स्टेबल नहीं इंस्पेक्टर था।
“जो लड़का तुम्हें लेकर आया, उसने ही अपने दोस्तों के साथ मिलकर यह सब किया न? तुम तो अच्छे ख़ानदान से हो। शादीशुदा भी हो। उस लड़के के साथ इतनी रात गए बाहर क्या कर रही थी?”
इंस्पेक्टर ने जब यह पूछा तो पीछे से लेडी कॉन्स्टेबल ने जवाब दिया, “सर जी मुझे तो लगता है कि पहले कांड किया फिर लगा लड़की मर जाएगी तो डरकर इसे यहाँ छोड़कर भागने के चक्कर में था।”
इंस्पेक्टर ने कॉन्स्टेबल की बात पर कुछ प्रतिक्रिया न देते हुए लड़की की तरफ़ देखकर कहा, “देखिए मैडम जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ, उस विधर्मी ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर आपका यह हाल किया है। आप उसे जानती थीं न?”
लड़की इंस्पेक्टर की विधर्मी वाली बात पर चौंकी। फिर उस ने अटक-अटककर बहुत धीरे से कहा, “वह जो मुझे यहाँ लेकर आया, उसने मुझे सड़क पर इस हालत में देखा और अस्पताल ले आया। उसे तो पता भी नहीं है कि किसने मेरे साथ यह सब किया। आप उस लड़के को जाने दीजिए। इसमें उसका कोई क़ुसूर नहीं है।”
इंस्पेक्टर ने पलटकर अपने दूसरे कॉन्स्टेबल की तरफ़ देखा, “तुमने लड़के के बारे में मालूमात की?”
“सर जी वही करने में तो माथा चकरा गया मेरा। अलग-अलग रंग के हैं दोनों। जवानी के दिनों में ख़ूब साथ-साथ घूमते थे। मैं तो बोल रहा हूँ आपसे, मामला कुछ मज़हबी-सा लगता है। ऐसा तो नहीं उसी ने वरग़लाकर इस को मजबूर किया हो और पिछले साल, जो इसका पति एक्सीडेंट में मरा है, उसमें भी इन्हीं दोनों का हाथ रहा हो। अब बात कुछ बिगड़ रही होगी तो लड़की का यह हाल कर डाला। कुछ तो गहरा चक्कर है सर जी।”
“वाह रे मेरे ब्योमकेश बक्शी! तूने तो पूरा केस ही सॉल्व कर डाला।” इंस्पेक्टर ने कॉन्स्टेबल का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा। आसपास खड़े सब हँसने लगे।
संवेदनशीलता की बुलबुल कुछ देर अस्पताल के उस कमरे की खिड़की पर बैठी सबको टुकुर-टुकुर देखती रही, फिर उड़ गई।
लड़की बातों का पलटता रुख़ देखकर अवाक् रह गई। कहाँ तो वह उस सामूहिक बलात्कार की पीड़ा से बुरी तरह टूट चुकी थी और कहाँ अब उस पर ही इस तरह के इल्ज़ाम लगाए जा रहे थे! और न सिर्फ़ उस पर बल्कि उस मासूम लड़के पर भी जिसने उसकी जान बचाई। बलात्कार करने वाले उसे कब का सड़क पर फेंक गए थे। कितनी गाड़ियाँ वहाँ से गुज़रीं। कुछ ने गाड़ी को धीमा भी किया, पर कोई उतरकर उसकी मदद को नहीं आया। वह हाथ पैर पटकती रह गई कि कोई तो उसकी मदद कर दे। उठने की हालत में नहीं थी वो। तब सिर्फ़ वही लड़का जो बाइक पर था, रुका। न सिर्फ़ रुका बल्कि उसकी मदद की। वह जानती थी कि उस लड़के ने बाइक उसकी शक़्ल देखकर नहीं रोकी थी। उसकी जगह कोई भी लड़की होती तो वो उसकी भी मदद करता। वह था ही ऐसा। बल्कि होना तो यह चाहिए था कि वह उसकी शक़्ल देखकर उसको यूँ ही मरने को छोड़ देता पर…
जब वह चार साल पहले शहर छोड़कर गया था तो उसकी आँखों में लड़की के लिए कुछ था, जिसे वह आज तक डिकोड नहीं कर पाई थी। कभी-कभी वो सोचती, शायद ‘लानत‘ थी। बावजूद इसके, उसने लड़की की जान बचाई। और आज यह लोग उसे ही फँसा रहे हैं! लड़की को लगा वो लड़के के जीवन में मनहूसियत का पर्यायवाची है।
सोचते-सोचते लड़की ने बेबसी से आँखें बंद कर लीं। उसे यह अहसास बहुत गहराई तक था कि वो जंगलराज में है। इंसानों-सा दिखने वाली यह प्रजाति कुछ भी हो सकती है पर इंसान यक़ीनन नहीं है।
—
चार साल पहले
‘आख़िर कितना महसूसा जा सकता है कुछ भी, एक समय के दायरे में! इंसान के मन में, एक साथ इतने सारे एहसास पलते हैं जिनमें गहरा विरोधाभास भी होता है, इतना कि उसे ख़ुद एहसास नहीं होता बहुत-सी भावनाओं का और ख़ासकर वह भावनाएँ जो अब तक के जिए जीवन से विपरीत हों। कभी ख़ुद की फ़ितरत का हिस्सा ही नहीं लगती हों। क्या मुझे यह करना चाहिए! क्या मुझे यह नहीं करना चाहिए! इन दोनों सवालों के बीच में बहुत सारी परिस्थितियाँ बनती हैं जिनका अवलोकन इतना भी आसान नहीं होता।
नटकंजर जैसे दो सिरों से बँधी रस्सी के बीच में हम झूलते रहते हैं। न इधर जाते बनता है, न उधर जाते बनता है और बीच का तो हाल सब जानते हैं कि कैसा होता है, अब गिरे कि तब गिरे। फिर ज़िंदगी भी तो तय नियमों के अनुसार नहीं चलती। न मोहब्बत, न नफ़रत, न रिश्ते।
पर हम अपने साथ सख़्त क्यों नहीं होते?
हम अपने साथ सख़्त नहीं होते इसलिए कोई न कोई हमारे साथ सख़्त होता चला जाता है।‘
समय से आगे चलने वाली उसकी दार्शनिक दादी की कही ये पंक्तियाँ उसके जीवन का मूलमंत्र थीं। लड़की जानती थी कि लड़का उसे बेहद प्यार करता है। वह यह भी जानती थी कि वह उसके लिए कुछ भी करेगा। वह उसका साथ पसंद करती थी, पर शायद इतना भी नहीं करती थी कि चंद ख़ुशियों के लिए सब कुछ ही दाँव पर लगा दे। प्रेम में पगलाई बहुत-सी सहेलियों को उसने अपनी दादी की दी हुई सीख बाँची थी कि प्रेम में जाने क्यों हम संयम को ताक पर रख देते हैं! भावनाओं की अंधी दौड़ में मन के पीछे भागते हैं! कुछ चीज़ों के लिए ठहर जाना चाहिए। सब कुछ पकड़ने की होड़ में कुछ भी हाथ नहीं आता है। आगे जाकर हालात… मन और ज़ेहन के लिए बोझ बनने लगें ऐसे निर्णय बहुत सोचकर लेने चाहिएँ।यह छोड़ने की प्रवृत्ति इतनी भी बुरी बात नहीं है जितनी हमारे दिमाग़ में ठूस दी जाती है।
उसकी दादी की समझ के हिसाब से हिंदुस्तान की जो हालत कर दी गई है, अलग धर्म में विवाह अब यहाँ आसान नहीं रह गया है। आप कर भी लेंगे तो बात-बात पर ससुराल में सुनने को मिलेगा– फ़लाँ रंग की लड़की, छत्तीस ऐबखोरी जो अपने परिवेश से उसे मिले, और ऐसा ही कुछ फ़लाँ रंग का लड़का भी लड़की के नाते-रिश्तेदारों से रात-दिन सुनेगा। उसे भी कोई इज़्ज़त तो देने वाला था नहीं। फिर बच्चों के भविष्य की कल्पना तो क्या की जाए!
लड़की के इस घोर व्यवहारिक रवैए को बहुत से लोगों ने संवेदनहीनता कहा और सबसे ज़्यादा तो लड़के ने ही, पर लड़की ने दोस्ती के रिश्ते को आगे बढ़ाने से साफ़ इंकार कर दिया।
—
हादसे के चार दिन बाद जंगलराज का दृश्य
गिद्धों की बैठक सजी थी जिसमें बचा मांस खाने वाले कव्वे भी शामिल थे।
“ओ वर्दीधारी, आपको जो कहा है न, आप तो बस उस पर ध्यान केंद्रित कीजिए। कैसे भी करके अपनी मैना से हाँ करवाईए। इस पूरे इलाक़े में अस्सी प्रतिशत तबका हमारे रंग का है। मुझे सबका वोट चाहिए। इस मामले को मज़हबी रंगबाज़ी में बदलना ही है। मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उस तोते का बैकग्राउंड क्या है। उसका बैकग्राउंड काला नहीं है तो काला बनाओ। यह उसकी मैना नहीं भी थी तो सबूत पैदा करो। इस मैना से कहो, इसकी भलाई इसी बात में है कि यह मान ले कि उस ख़ास रंग के तोते ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर इसका बलात्कार किया है। समझाइए जो मैं कह रहा हूँ उसमें इसी का फ़ायदा है। जो लुटना-लुटाना था इसका, सब पहले ही हो चुका है, अब कम से कम इस पूरी स्थिति का फ़ायदा उठाएँ और हमें भी उठाने दें। वह क्या कहावत है अंग्रेज़ी की, ब्लेसिंग इन डिसगाइज़। और इस तोते को बचाकर इसे मिलेगा क्या? पहले ही ख़ूब बदनामी हो चुकी है कि इतनी रात गए इसके साथ कर क्या रही थी! अपने कलगीदार के मरने के बाद इतनी जल्दी रंग-रलियाँ मनाने लगी पुराने आशिक़ के साथ! समझाइए अच्छे से। बाक़ी, नहीं मानी तो बहुत से लोग इन हादसों में मर भी तो जाते हैं!”
वर्दीधारी कव्वे ने इलाक़े का घोर काला गिद्ध जो दिखता सफ़ेद था, की बातें सुनकर हाँ मैं मुंडी हिला दी। क्योंकि वह जानता था, न करने जितनी पॉवर उसके पास है नहीं, और न करने की नाफ़रमानी के बाद बचा-खुचा मांस तो हाथ से जाएगा ही, हो सकता है कव्वा ख़ुद भी मुर्ग़ी में बदल, दावत के काम ले लिया जाए।
—
हादसा
“छोड़ना नहीं है साली को। यह साले पैसे वाले, हम ग़रीबों को कीड़ा-मकोड़ा समझते हैं। हमारा हक़ मारते हैं। हमारी बहू-बेटियों को अपना माल समझते हैं और इनकी लड़कियाँ परियाँ हैं! हमें खाने को रोटी नहीं और यह लोग हज़ारों का खाना नालियों में बहाते हैं! पकड़ साली के पैर। आज तो तबीयत से इसकी दुर्गत बनाऊँगा।” शराब के नशे में धुत उस लड़के ने यह कहकर उस लड़की के मुँह पर थूक दिया। लड़की समझ ही नहीं पा रही थी कि उसके साथ क्या हो रहा है! उन तीनों की आँखों में उसके प्रति अपार घृणा थी।
बलात्कार के समय वह बार-बार गंदी गालियाँ देते हुए उस पर थूक रहे थे।
वह शुरू में उन लड़कों के साथ संघर्ष कर रही थी पर जैसे-जैसे वह उनकी नफ़रत भरी बातें सुनती गई, सुन्न होती गई। वह उसका बलात्कार नहीं कर रहे थे, अपने ज़िंदगी भर के शोषण का उसकी देह से बदला निकाल रहे थे। उसकी देह में अंदर बाहर होते हुए उनकी आँखों में कोई वासना का भाव नहीं था। थी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ भयानक घृणा।
—
हादसे के पाँच दिन बाद
मैना ने सब सच वर्दीधारी कव्वे को बताया, पर सफ़ेद गिद्ध की बातों के बाद मैना भी समझ चुकी थी कि ये सब मांसाहारी, उन बलात्कार करने वालों के लिए कार्यवाही करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते।
क्योंकि बात यह सच ही थी कि उन हालातों से हार और खार खाए गीदड़ों को पकड़कर उस गिद्ध का कोई बड़ा फ़ायदा नहीं होने वाला था। ग़रीबी और ग़रीब उनका मुद्दा है ही नहीं। उनका फ़ायदा सिर्फ़ और सिर्फ़ रंगों के बँटवारे का बखेड़ा खड़ा करने में ही है। दुनिया के सारे फ़साद औरत की देह पर ही खेले जाते हैं। चाहे वो शोषित खेलें या शोषण करने वाले।
वह यह भी समझ गई थी कि अगर वह नहीं मानेगी तो मैना होकर, मुर्ग़ी का नसीब पाएगी और तंदूर में भभकाई जाएगी। रिपोर्ट में लिखा जाएगा कि अंदरूनी चोट लगने से उसे बचाया नहीं जा सका और वह शांति-पसंद तोता फिर हर हाल में फांसी चढ़ा दिया जाएगा।
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हादसे के छः महीने बाद
“तुम बहुत बुरी औरत हो। उसने तुम्हारी जान बचाई थी, तुमने उसके साथ ऐसा क्यूँ किया? तुम्हारी वजह से उसे उम्रक़ैद हो गई।” कोर्ट से बाहर आते वक़्त उस पहली नर्स ने मैना… माफ़ कीजिए… लड़की से सवाल किया।
नर्स के चेहरे पर लड़की के प्रति कड़वाहट साफ़ दिख रही थी। लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गई।
चार क़दम ही चली होगी कि तीन साल की नन्ही फ़ाख़्ता ने उसकी अँगुलियाँ थाम लीं। वह फ़ाख़्ता जिसकी वह माँ है। वह फ़ाख़्ता जिसके पिता के मरने के बाद बहुत सारे गिद्ध, चाचा–ताया बन, जायदाद और उस फ़ाख़्ता की बोटियों पर नज़र गड़ाए बैठे हैं। वह फ़ाख़्ता, जिसके पिता के बाद अगर माँ भी नहीं रहती तो यक़ीनन वह किसी बूचड़खाने में पहुँचा दी जाती।
लड़की, नन्ही फ़ाख़्ता को गोद में उठाए बुदबुदाई…
‘अब ज़िंदगी अच्छे और बुरे में विकल्प नहीं देती। ज़िंदगी विकल्प देती है बुरे या बहुत बुरे में। और कभी-कभी हम ख़ुद बहुत बुरा होना चुनते हैं ताकि अपनों के साथ कम बुरा हो…।‘
—
बीतता रिसता जीवन
बलात्कार की सज़ा काटता वह तोता… माफ़ कीजिएगा… वह लड़का हर साँस यह सोचता रहा कि आख़िर लड़की ने उसके साथ ऐसा क्यों किया! लड़की संवेदनशील नहीं है, यह तो वह बहुत पहले समझ गया था पर इतनी क्रूर हो सकती है कि उस से घिन आने लगे, ऐसा कैसे हो गया!
वह दिल के हाथों हारा, उस जेल की बड़ी-सी गोल इमारत की पहली मंज़िल पर बनी अपनी कोठरी की छोटी-छोटी खिड़कियों से सामने दिखाई देते उस तालाब को देखते हुए, आज भी याद करता है उसकी नरम हथेली को अपनी हथेलियों के बीच।
तालाब तो आपको याद होगा ही, जहाँ से कहानी शुरू हुई थी।
सुषमा गुप्ता
चर्चित लेखिका
पिन 121002
हरियाणा
ई मेल : [email protected]
फोन न• 9899916431
कहानी का यह पैटर्न कुछ अलग लगा। क्रमबद्धता ऊपर नीचे होती रही।
लेखन शैली से इतर यह कहानी राजनीतिक लाभ के लिये इंसानियत के टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरने की कहानी है।
प्रेम के प्रति अविश्वास की कहानी है।
कहानी को पढ़कर महसूस होता है कि आजकल रास्ते में पड़े हुए एक्सीडेंट से घायल मरणासन्न व्यक्ति की मदद इंसान क्यों नहीं करता?
कौन सी मजबूरी है जो उसे मदद करने से रोक लेती है?
हमने एक्सीडेंट के कारण मदद के अभाव में कई अपनों को मरते हुए देखा है। वह सब याद आया।
यह कहानी न्यायालय पर अविश्वास की कहानी है।
यह कहानी बताती है की सच्चाई को किस तरह ,कितने और कौन-कौन से लोग कैसे-कैसे षडयंत्रों में उलझा कर मारने का प्रयास करते हैं।
एक सामान्य इंसान पुलिस,जातिवाद, राजनीति और चुनावी लाभ के दायरे में अगर उलझ जाए तो भगवान को भी उसे सुलझाने में चक्कर आ जाएगा।
बहरहाल।
कहानी बताती है कि प्रेम एक धोखा है।
मदद करना एक छलावा है।
विश्वास एक भ्रम है।
और ये सब पुलिस और राजनीतिक षड्यंत्रों और लाभ के जूती तले है।
जिस कथन ने ध्यान आकर्षित किया –
*हालातों की मार से जब देह के कपड़े फटने शुरू होते हैं और पेट के भीतर अकाल जगह बनाता है तो इंसान के मन से चिपके हुए सबसे कोमल एहसास सबसे पहले झड़ते हैं।सबसे पहले झड़ता है प्रेम और अक्सर उसके बाद झड़नी शुरू होती संवेदनशीलता…. करुणा….।*
पूरी कहानी में लड़के और लड़की का नाम नहीं है।
लड़के का प्यार, लड़की की उपेक्षा।
कुछ वर्षों पश्चात लड़की का सामूहिक बलात्कार इत्तफाकन ही उस लड़के का उसे बचा लेना।
पुलिस का जबर्दस्ती उस लड़के को फँसाना विधर्मी की बात करके।
लड़की के कहने के बाद भी कि “मैं मर जाती अगर यह नहीं बचाता तो ।उसने कुछ नहीं किया।”
राजनीतिक दबाव और लड़के को जेल।
कहानी बस इतनी सी है लेकिन बहुत बड़ी बात कह गई ।लोगों के हृदय से मदद करने का भाव खत्म कर दिया। प्रेम और न्याय दोनों पर से विश्वास उठ गया।
कहानी सोचने पर विवश करती है।
कि यह दौर कितनी नाजुक स्थिति से गुजर रहा है।
पहले तो शीर्षक पढ़कर अजीब स लगा कि क्या शीर्षक है? कहानी क्या होगी?लेकिन पूरी कहानी के बाद समझ में आया कि वास्तव में शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण है।
ख्वाब की छाल में यथार्थ की कील बहुत गहरी गड़ी।
अंत में कहानी के साथ ही ,आपकी प्यारी सी मुस्कान के लिए आपको बहुत-बहुत शुक्रिया। यह फ्री का टॉनिक है जो दूसरों को अपनी और सहजता से आकर्षित करता है।
आपकी यह मुस्कान बनी रहे।
सुषमा जी!
कहानी का यह पैटर्न कुछ अलग लगा। क्रमबद्धता ऊपर नीचे होती रही।
लेखन शैली से इतर यह कहानी राजनीतिक लाभ के लिये इंसानियत के टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरने की कहानी है।
प्रेम के प्रति अविश्वास की कहानी है।
कहानी को पढ़कर महसूस होता है कि आजकल रास्ते में पड़े हुए एक्सीडेंट से घायल मरणासन्न व्यक्ति की मदद इंसान क्यों नहीं करता?
कौन सी मजबूरी है जो उसे मदद करने से रोक लेती है?
हमने एक्सीडेंट के कारण मदद के अभाव में कई अपनों को मरते हुए देखा है। वह सब याद आया।
यह कहानी न्यायालय पर अविश्वास की कहानी है।
यह कहानी बताती है की सच्चाई को किस तरह ,कितने और कौन-कौन से लोग कैसे-कैसे षडयंत्रों में उलझा कर मारने का प्रयास करते हैं।
एक सामान्य इंसान पुलिस,जातिवाद, राजनीति और चुनावी लाभ के दायरे में अगर उलझ जाए तो भगवान को भी उसे सुलझाने में चक्कर आ जाएगा।
बहरहाल।
कहानी बताती है कि प्रेम एक धोखा है।
मदद करना एक छलावा है।
विश्वास एक भ्रम है।
और ये सब पुलिस और राजनीतिक षड्यंत्रों और लाभ के जूती तले है।
जिस कथन ने ध्यान आकर्षित किया –
*हालातों की मार से जब देह के कपड़े फटने शुरू होते हैं और पेट के भीतर अकाल जगह बनाता है तो इंसान के मन से चिपके हुए सबसे कोमल एहसास सबसे पहले झड़ते हैं।सबसे पहले झड़ता है प्रेम और अक्सर उसके बाद झड़नी शुरू होती संवेदनशीलता…. करुणा….।*
पूरी कहानी में लड़के और लड़की का नाम नहीं है।
लड़के का प्यार, लड़की की उपेक्षा।
कुछ वर्षों पश्चात लड़की का सामूहिक बलात्कार इत्तफाकन ही उस लड़के का उसे बचा लेना।
पुलिस का जबर्दस्ती उस लड़के को फँसाना विधर्मी की बात करके।
लड़की के कहने के बाद भी कि “मैं मर जाती अगर यह नहीं बचाता तो ।उसने कुछ नहीं किया।”
राजनीतिक दबाव और लड़के को जेल।
कहानी बस इतनी सी है लेकिन बहुत बड़ी बात कह गई ।लोगों के हृदय से मदद करने का भाव खत्म कर दिया। प्रेम और न्याय दोनों पर से विश्वास उठ गया।
कहानी सोचने पर विवश करती है।
कि यह दौर कितनी नाजुक स्थिति से गुजर रहा है।
पहले तो शीर्षक पढ़कर अजीब स लगा कि क्या शीर्षक है? कहानी क्या होगी?लेकिन पूरी कहानी के बाद समझ में आया कि वास्तव में शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण है।
ख्वाब की छाल में यथार्थ की कील बहुत गहरी गड़ी।
अंत में कहानी के साथ ही ,आपकी प्यारी सी मुस्कान के लिए आपको बहुत-बहुत शुक्रिया। यह फ्री का टॉनिक है जो दूसरों को अपनी और सहजता से आकर्षित करता है।
आपकी यह मुस्कान बनी रहे।
ठीक ठीक कहानी है लेकिन परिवेश और डिटेलिंग की कमी है।