(1) – आँगन
आँगन जहां खुला आसमान
झाँकता था दोपहरिया
उघड़े कपड़े दुरुस्त किए जाते थे
बड़ियाँ पापड़ खाट पर बिछाए जा
पारदर्शी मर्तबान में भरा जाता
चीरा लगा मिर्च का अचार
किनार गोटे सलमा सितारे से टाँकी जाती
सयानी होती बिटिया कि सुहाग चूनर
गूँथी जाती लंबी चोटी
कहाँ रहा वो आँगन
सुनहरी मनहरी दुपहरिया
कि गूँथा जाये मन
टाँक आए दुःख
बिछा आए ऊब ..
पा जाए चटपट स्वाद ज़िंदगी
(2) – प्रियम्वदा
गुनगुनाती हुई कोई गीत
इतराती हुई
आँखो में भरती हुई काजल
नेल पोलिश लगाती हुई
दरवाज़े पर हुई आहट
और झट खोलती हुई
महकती हुई
मेरे घर को खनक हँसी से भरती हुई
रंगोली में हर रंग भरती हुई
तुम कितनी याद आती हो..
पहला निवाला लेना
और स्वाद का चटकारा लेते हुए
मुझे दुनिया का बेस्ट शेफ का दर्ज़ा देना
तुम कितनी याद आती हो…
तैयार होते समय
तुम्हारा टिकुली ले आना
कभी साड़ी से मैच करता बक्कल लगा देना
इत्र छिड़क देना
तुम कितनी याद आती हो…
आँखों से भर भर रस टपकना
गलबहियां करना
हाथ हिलाना
मेरे बिखरे बेतरतीब पलों को संवार देना
तुम कितनी याद आती हो
तुम कितनी याद आती हो
मेरी बेटी प्रियम्वदा।